जय वाल्मीकि जी 🙏💙🙏
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः यत् क्रौंचमिथुना देकमवधीः काममोहितम् ।
(अर्थात जो तुमने इन क्रौंच पक्षियों को प्रेम में मग्न देख कर काम की अग्नि में पीड़ित हो जुदाई का दुख दिया, वैसी ही जुदाई की पीड़ा तुम्हें भी झेलनी पड़ेगी ।)
आदिकवि वाल्मीकि दयावान के मुख से प्रकट इस श्लोक ने प्राकृति के कई नियम प्रतिपादित किए। एक, 'यह संसार प्रेम का प्रतिफल है। दूसरा प्रेम पाप नहीं, प्रेम को भंग करना पाप है, तीसरा प्रेम भी केवल इंसानों से नहीं, बल्कि जीवों से हो ।
सृष्टिकर्त्ता वाल्मीकि दयावान
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