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#🌞 Good Morning🌞 फटाफट क्रिकेट। क्रिकेट का गिरता स्तर। व्यंग लेख
🌞 Good Morning🌞 - फटाफट क्रिकेट के सिकंदर चकोले खाते खाते आखिर नैया हि पार हो ही गई और भारत फटाफट क्रिकेट का चक्रवर्ती सम्राट बन गया। क्रिकेट और हॉकी में यही अंतर है कि हॉकी बाई प्रैक्टिस होती है और क्रिकेट बाईचांस| क्रिकेट में बाइचांस बहुत कुछ होता है। कभी कभी कोई कमजोर समझी जाने वाली टीम दिग्गज कही जाने वाली टीम के छक्के छुड़ा देती है और कभी कोई दिग्गज  सुधाकर आशावादी खिलाड़ी शून्य पर आउट होकर बत्तख बन जाता है। खिलाड़ी का भी खास दिन होता है तीखी नजर गेंद बल्ले के खेल में कब किस खिलाड़ी कोी बल्ले बल्ले हो जाए खिलाड़ी खुद नहीं जानता। कब किसी खास टीम केलिए  अभिशप्त समझे जाने वाले खेल मैदान में कोई कर्मयोगी टीम टोने टोटके और मिथकों को धराशायी करके आलोचकों का मुंह बंद कर दे, इसकी भविष्यवाणी  भी नहीं की जा सकती | एक दौर था कि जब हर कोई पत्रकार या खेल समीक्षक नहीं हुआ करता था। खेल की समीक्षा चाय की दुकान और पान के खोखे की परिधि से बाहर नहीं निकल पाती थी। सोशल मीडिया का तो नामोनिशान न था। आजकल जिसे घर में प्लास्टिक के बल्ले और प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलना न आता है, वह स्वयं को क्रिकेट का विशेषज्ञ समझता है। क्रिकेट में हर बॉल और हर शॉट पर सोशल मीडिया की नजर रहती है। खेल के परिणाम से पहले ही स्वयंभू विश्लेषक जीत हार की भविष्यवाणी कर देते हैं | खेल शुरू होने से पहले ही मनचाही टीम को विजयी घोषित कर देते हैं। बहरहाल खिलाडियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। खिलाड़ी यदि सभी की बातों पर ध्यान देने लगे या किसी ज्योतिषि की भविष्यवाणी को सच मानने लगे, तो मैदान में उतरने से पहले सौ बार सोचना उसकी मजबूरी बन जाएगी। ताज्जुब तो तब होता है कि जब सोशल मीडिया खिलाडियों के खेल को नहीं, बल्कि उसकी जाति को जीत या हार का श्रेय देने लगता है। सोशल मीडिया पर टीम का चयन कर दिया जाता है , वह भी बिना चयनकर्ताओं की मर्जी के। किसी मैच में किसी भी खिलाड़ी के फ्लॉप प्रदर्शन पर त्वरित टिप्पणी करके उसकी जाति को उसके चयन पर ही सवाल खड़े किए जाते हैं | टूर्नामेंट में फाइनल तक पहुंचने के लिए सभी टीमें एडी से चोटी तक का जोर लगाती हैं, फिर भी दिग्गज खिलाडियों से सन्नद्ध कोई टीम टूर्नामेंटट के सेमी फाइनल में स्थान बनाने से वंचित रह जाती है। कमजोर समझी जाने वाली टीम फाइनल तक पहुंचने की दौड़ में बनी रहती है। फील्डिंग की प्रैक्टिस अधिक की जाती थी॰ फील्डिंग एक समय थाः जब यदि मुकद्दर के आधार पर कोई खिलाड़ी टीम इलेविन में स्थान बना लेता था। में जीत है, तो खिलाडी सिकंदर बन ही जाते हैं । जीत का सेहरा कप्तान के सर पर बंधता है। रिकार्ड बनते हैं, बिगड़ते हैं । क्रिकेट में कब कौन हारते हारते जीत  जाए, पहले से निश्चित नहीं होता, यही क्रिकेट की विशेषता है। वैसे खेल चाहे कोई भी हो, जीत हार खेल के अंग होते हैं, जीत किसी की कभी स्थाई नहीं होती, पर जीतने वाले की सदा ही जै होती है।  फटाफट क्रिकेट के सिकंदर चकोले खाते खाते आखिर नैया हि पार हो ही गई और भारत फटाफट क्रिकेट का चक्रवर्ती सम्राट बन गया। क्रिकेट और हॉकी में यही अंतर है कि हॉकी बाई प्रैक्टिस होती है और क्रिकेट बाईचांस| क्रिकेट में बाइचांस बहुत कुछ होता है। कभी कभी कोई कमजोर समझी जाने वाली टीम दिग्गज कही जाने वाली टीम के छक्के छुड़ा देती है और कभी कोई दिग्गज  सुधाकर आशावादी खिलाड़ी शून्य पर आउट होकर बत्तख बन जाता है। खिलाड़ी का भी खास दिन होता है तीखी नजर गेंद बल्ले के खेल में कब किस खिलाड़ी कोी बल्ले बल्ले हो जाए खिलाड़ी खुद नहीं जानता। कब किसी खास टीम केलिए  अभिशप्त समझे जाने वाले खेल मैदान में कोई कर्मयोगी टीम टोने टोटके और मिथकों को धराशायी करके आलोचकों का मुंह बंद कर दे, इसकी भविष्यवाणी  भी नहीं की जा सकती | एक दौर था कि जब हर कोई पत्रकार या खेल समीक्षक नहीं हुआ करता था। खेल की समीक्षा चाय की दुकान और पान के खोखे की परिधि से बाहर नहीं निकल पाती थी। सोशल मीडिया का तो नामोनिशान न था। आजकल जिसे घर में प्लास्टिक के बल्ले और प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलना न आता है, वह स्वयं को क्रिकेट का विशेषज्ञ समझता है। क्रिकेट में हर बॉल और हर शॉट पर सोशल मीडिया की नजर रहती है। खेल के परिणाम से पहले ही स्वयंभू विश्लेषक जीत हार की भविष्यवाणी कर देते हैं | खेल शुरू होने से पहले ही मनचाही टीम को विजयी घोषित कर देते हैं। बहरहाल खिलाडियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। खिलाड़ी यदि सभी की बातों पर ध्यान देने लगे या किसी ज्योतिषि की भविष्यवाणी को सच मानने लगे, तो मैदान में उतरने से पहले सौ बार सोचना उसकी मजबूरी बन जाएगी। ताज्जुब तो तब होता है कि जब सोशल मीडिया खिलाडियों के खेल को नहीं, बल्कि उसकी जाति को जीत या हार का श्रेय देने लगता है। सोशल मीडिया पर टीम का चयन कर दिया जाता है , वह भी बिना चयनकर्ताओं की मर्जी के। किसी मैच में किसी भी खिलाड़ी के फ्लॉप प्रदर्शन पर त्वरित टिप्पणी करके उसकी जाति को उसके चयन पर ही सवाल खड़े किए जाते हैं | टूर्नामेंट में फाइनल तक पहुंचने के लिए सभी टीमें एडी से चोटी तक का जोर लगाती हैं, फिर भी दिग्गज खिलाडियों से सन्नद्ध कोई टीम टूर्नामेंटट के सेमी फाइनल में स्थान बनाने से वंचित रह जाती है। कमजोर समझी जाने वाली टीम फाइनल तक पहुंचने की दौड़ में बनी रहती है। फील्डिंग की प्रैक्टिस अधिक की जाती थी॰ फील्डिंग एक समय थाः जब यदि मुकद्दर के आधार पर कोई खिलाड़ी टीम इलेविन में स्थान बना लेता था। में जीत है, तो खिलाडी सिकंदर बन ही जाते हैं । जीत का सेहरा कप्तान के सर पर बंधता है। रिकार्ड बनते हैं, बिगड़ते हैं । क्रिकेट में कब कौन हारते हारते जीत  जाए, पहले से निश्चित नहीं होता, यही क्रिकेट की विशेषता है। वैसे खेल चाहे कोई भी हो, जीत हार खेल के अंग होते हैं, जीत किसी की कभी स्थाई नहीं होती, पर जीतने वाले की सदा ही जै होती है। - ShareChat
#🌞 Good Morning🌞 सेहत के लिए संकल्प
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#🌞 Good Morning🌞 सेहत के लिए विटामिन
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#🌞 Good Morning🌞 सेहत के लिए
🌞 Good Morning🌞 - अब बड़ी संख्या में युवा भी आ रहे वेरिकोज की चपेट में वेन्स healthalert जवानी में जाम हो रही नसें, लंबे समय खड़े रहने, बैठने की आदतें भारी एक्सपर्ट व्यू पत्रिकी  न्यू्ज नेटवक  पदाकी थकान समझकर नजरअंदाज करना गलत patrika com; समय पर ध्यान नहीं जयपुर   बदलती जोयनशैली और विशेषद् यताते ऐ कि मोटाप नसों रहने की आदत जोखिम बढा देती कामकाज के तरीके के कारण नर्सो से दिया तो गंभीर के वाल्च का कमजोर होना धूमपान  ऐे। युवा परां मे दर्द या नारानन को खतरा जुडी बीमारी बेरिकोज बेन्स के मामले  पानी की कमी कब्ज आर शरार थकान समझकर नजरअदाज कर तेजी से बढ़ रहे हे। पहले यह समस्या देते हें॰ जिससे बीमारी बढ़ जाती है 9!69 गी इस बीमारी के प्रमुख कारण र रिकोज बन्स की समस्या अब  अधिकतर बजुगों और महिलाओं में लबे समय तक एक ही स्थिति में॰ और उपचार कठिन हा जाता हे। युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही हे । देखने को मिलती थी लाकन अनदेखा के कारण देरसे कइ गराज अंग हटाने तक की नौबत लक्षण कैसे पहचानें बड़ो संख्या में युवा भो॰ इसको  चपट अस्पताल पहुचते है जिससे उन्हे म आ रहे हे। एसएमएस में गंभार परिणाम भुगतने पड़ते हे। ०पैरों की नसों का उभरना  विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय पर ٧ ٧ ٥٧  अस्पताल संक्रमण या अल्सर बनने को स्थिति में रोजाना 8 से सीटीवीएस ओपीडी में रोजाना 8 से १० उपचार नहीं कराया जाएतो स्थिति रार्जरी कर अंग हटाने तक को नाबत ० पैरों में दर्द और मारीपन १० ऐसे नए নিনপ ম2 ম गंभीर हो सकती है। कई मामलों  नए गराज पहुच रह आ सकती हे। समय पर ध्यान न देने को सर्जरी की जरूरत पड़ रहो ह। नसों का मुड़ना फूलना खुजली  संफ्रमण बढने परअंगुली या अंगूठा  मरीज पर यह बीमारी डीप चैन थोम्बोसिस का चिकित्सर्कों के अनसार आने बाले हटाने तक की नौवत आ जाती हे खड़े रहने पर पेरों मे सूजन  रूपल सफती जसम गसा फ मरीजों मे करीय ३५ से ४० प्रतिशत २ से 3 मरीजों बचाव क उपायः लब समय तक अदर सून का थक्का जम जाता ई रात मे परों नं ऐंठन बेटने या खड़ रहने वाले लोग बीचर  युवा शामिल ह जाचिता का विषय और यद फेफड़ों तक पहुच जाए तो को सर्जरी की का कहना है कि पैरों को हें। विशेषज्ञों बाच  चलत रहे। पर्यप्त पाना पिए जानलेवा भी हो सकता हे। - डौं॰ राम गसी की नील दिखन नसें फूलकर उभरने लगती हे, इसे ही  ओर वजन नियंन्रित रखें लक्षण दिखे गोपाल यादव विगागाध्यक्ष णरत घाव बनना या दरसे भरना ச1 कहा जाता हे। यः्स तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लें। सीटीोवीएस विभाग एसएमएस अब बड़ी संख्या में युवा भी आ रहे वेरिकोज की चपेट में वेन्स healthalert जवानी में जाम हो रही नसें, लंबे समय खड़े रहने, बैठने की आदतें भारी एक्सपर्ट व्यू पत्रिकी  न्यू्ज नेटवक  पदाकी थकान समझकर नजरअंदाज करना गलत patrika com; समय पर ध्यान नहीं जयपुर   बदलती जोयनशैली और विशेषद् यताते ऐ कि मोटाप नसों रहने की आदत जोखिम बढा देती कामकाज के तरीके के कारण नर्सो से दिया तो गंभीर के वाल्च का कमजोर होना धूमपान  ऐे। युवा परां मे दर्द या नारानन को खतरा जुडी बीमारी बेरिकोज बेन्स के मामले  पानी की कमी कब्ज आर शरार थकान समझकर नजरअदाज कर तेजी से बढ़ रहे हे। पहले यह समस्या देते हें॰ जिससे बीमारी बढ़ जाती है 9!69 गी इस बीमारी के प्रमुख कारण र रिकोज बन्स की समस्या अब  अधिकतर बजुगों और महिलाओं में लबे समय तक एक ही स्थिति में॰ और उपचार कठिन हा जाता हे। युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही हे । देखने को मिलती थी लाकन अनदेखा के कारण देरसे कइ गराज अंग हटाने तक की नौबत लक्षण कैसे पहचानें बड़ो संख्या में युवा भो॰ इसको  चपट अस्पताल पहुचते है जिससे उन्हे म आ रहे हे। एसएमएस में गंभार परिणाम भुगतने पड़ते हे। ०पैरों की नसों का उभरना  विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय पर ٧ ٧ ٥٧  अस्पताल संक्रमण या अल्सर बनने को स्थिति में रोजाना 8 से सीटीवीएस ओपीडी में रोजाना 8 से १० उपचार नहीं कराया जाएतो स्थिति रार्जरी कर अंग हटाने तक को नाबत ० पैरों में दर्द और मारीपन १० ऐसे नए নিনপ ম2 ম गंभीर हो सकती है। कई मामलों  नए गराज पहुच रह आ सकती हे। समय पर ध्यान न देने को सर्जरी की जरूरत पड़ रहो ह। नसों का मुड़ना फूलना खुजली  संफ्रमण बढने परअंगुली या अंगूठा  मरीज पर यह बीमारी डीप चैन थोम्बोसिस का चिकित्सर्कों के अनसार आने बाले हटाने तक की नौवत आ जाती हे खड़े रहने पर पेरों मे सूजन  रूपल सफती जसम गसा फ मरीजों मे करीय ३५ से ४० प्रतिशत २ से 3 मरीजों बचाव क उपायः लब समय तक अदर सून का थक्का जम जाता ई रात मे परों नं ऐंठन बेटने या खड़ रहने वाले लोग बीचर  युवा शामिल ह जाचिता का विषय और यद फेफड़ों तक पहुच जाए तो को सर्जरी की का कहना है कि पैरों को हें। विशेषज्ञों बाच  चलत रहे। पर्यप्त पाना पिए जानलेवा भी हो सकता हे। - डौं॰ राम गसी की नील दिखन नसें फूलकर उभरने लगती हे, इसे ही  ओर वजन नियंन्रित रखें लक्षण दिखे गोपाल यादव विगागाध्यक्ष णरत घाव बनना या दरसे भरना ச1 कहा जाता हे। यः्स तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लें। सीटीोवीएस विभाग एसएमएस - ShareChat
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