
Vaishali Thakur,High school Teacher
@606408097
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बहार… ओसरल्यानंतरही उभं राहणं
बहार… ढलने के बाद भी खड़े रहना
Standing Tall… Even After the Bloom Fades
With seasons…
ऋतूनुसार…
वयानुसार…
कर्तृत्वाचा…
प्रसिद्धीचा…
शरीरातील शक्तीचा…
बहार प्रत्येकाचा एक दिवस संपतोच.
वसंतात झाडं फुलांनी डवरलेली असतात.
लोक सावलीत बसतात.
फुलांचं कौतुक करतात.
फळांची चव घेतात.
माणसाचंही तसंच असतं—
तरुणाई, यश, प्रसिद्धी, कर्तृत्व…
टाळ्यांचा आवाज, नावाची चर्चा,
गरज म्हणून आठवण.
पण…
एक दिवस बहार ओसरतो.
टाळ्या मंदावतात.
गर्दी विरते.
फोन कमी वाजतात.
आणि आरशात दिसणारं रूपही बदलतं.
तेव्हा दुर्लक्ष सुरू होतं.
ज्यांनी कालपर्यंत उंचावर बसवलं,
तेच आज पुढे निघून जातात.
मागे राहते एक मरगळ… एक उदासी…
आणि एक बोचरा प्रश्न—
“आता आपण कोणासाठी?”
हीच खरी परीक्षा असते.
ही परीक्षा मी दरवर्षी झाडांना देताना पाहते.
पानगळ झाली तरी
झाड कोसळत नाही.
फुलं-फळांचा बहार ओसरला तरी
ते ताठ उभं असतं.
त्याला ठाऊक असतं—
बहार असताना सावलीत बसणारे
बहार ओसरला की विचारणार नाहीत.
तरीही ते रुसत नाही.
स्वतःवर दया करत नाही.
ते शांतपणे आत तयारी करत राहतं—
पुढच्या बहारासाठी.
मुळांना अधिक खोल नेतं.
आत शक्ती साठवतं.
शांततेत स्वतःला घडवतं.
कारण त्याला समजलेलं असतं—
बहार हा तात्पुरता असतो,
पण उभं राहणं हा स्वभाव असतो.
माणसाचंही तसंच आहे.
ज्यांचा बहार फक्त रूपाचा होता,
त्यांना सुरकुत्यांची भीती वाटते.
ज्यांचा बहार फक्त शक्तीचा होता,
त्यांना अशक्तपणाचं ओझं जाणवतं.
ज्यांचा बहार प्रसिद्धीचा होता,
त्यांना शांततेचा आवाज असह्य होतो.
पण ज्यांनी बहार असतानाच
माणुसकी साठवली,
नाती जपली,
स्वतःला आतून घडवलं—
त्यांचा बहार कधीच संपत नाही.
तो फक्त रूप बदलतो.
फुलं गळतात,
पण बीजं तयार होतात.
टाळ्या थांबतात,
पण अनुभव बोलायला लागतो.
शरीर थकतं,
पण विचार परिपक्व होतात.
पानगळ म्हणजे अंत नाही,
ती पुढच्या वसंताची पूर्वतयारी असते.
आणि म्हणून—
निसर्गाचं ऋण फक्त देण्याचं नाही,
तर कसं जगायचं हे शिकवण्यातही आहे.
बहार असताना नम्र राहणं,
बहार ओसरला तरी ताठ उभं राहणं,
दुर्लक्षित झाल्यावरही स्वतःची किंमत न विसरणं—
हा धडा झाड दरवर्षी देतं.
कारण शेवटी…
वसंतावर सगळे प्रेम करतात,
पण शिशिरातही जो उभा राहतो
तोच खरा मजबूत असतो.
बहार संपणं अपरिहार्य आहे—
पण बहारानंतरही
स्वतःची ऊब जपणं
हेचं खरं जिंकण आहे.
— संजीवनी क्षीरसागर मांडे
१७ फेब्रुवारी २०२६
बहार… ढलने के बाद भी खड़े रहना
ऋतुओं के अनुसार…
उम्र केअनुसार,कर्तृत्व, प्रसिद्धि,और शरीर की शक्ति के अनुसार…हर किसी की बहार एक दिन ढलती ही है।वसंत में पेड़ फूलों से लदे होते हैं।लोग उनकी छाँव में बैठते हैं।फूलों की प्रशंसा करते हैं,फलों का स्वाद लेते हैं।इंसान भी ऐसा ही होता है—यौवन, सफलता, प्रसिद्धि, उपलब्धियाँ…तालियों की गूंज, नाम की चर्चा,ज़रूरत पड़ने पर याद किया जाना।
लेकिन…एक दिन बहार ढलती है।तालियाँ धीमी पड़ती हैं।भीड़ छँट जाती है।फोन कम बजते हैं।आईने में दिखता चेहरा भी बदल जाता है।तब शुरू होता है उपेक्षा का दौर।जो कल तक ऊँचाई पर बिठाते थे,वही आगे बढ़ जाते हैं।पीछे रह जाती है एक थकान… एक उदासी…और एक चुभता हुआ सवाल—“अब हम किसके लिए?”यही असली परीक्षा है।मैं यह परीक्षा हर साल पेड़ों को देते देखती हूँ।
पत्ते झड़ जाएँ, फिर भी पेड़ गिरता नहीं।
फूल-फल का मौसम चला जाए,फिर भी वह अडिग खड़ा रहता है।
उसे पता होता है—
जो बहार में छाँव लेते हैं,वे पतझड़ में पूछने नहीं आएँगे।फिर भी वह रूठता नहीं।खुद पर दया नहीं करता।वह शांत रहकर भीतर तैयारी करता है—
अगली बहार के लिए।
जड़ों को और गहरा करता है।अंदर शक्ति संजोता है।खामोशी में खुद को गढ़ता है।क्योंकि उसे समझ है,बहार अस्थायी है,पर खड़े रहना स्वभाव है।इंसान के साथ भी यही है।जिसकी बहार सिर्फ रूप की थी,उसे झुर्रियों से डर लगता है।जिसकी बहार शक्ति की थी,उसे कमजोरी बोझ लगती है।जिसकी बहार प्रसिद्धि की थी,उसे सन्नाटा असह्य लगता है।लेकिन जिन्होंने बहार में ही,मानवता संजो ली,रिश्ते बचाए,खुद को भीतर से मजबूत किया,उनकी बहार कभी खत्म नहीं होती।
वह सिर्फ रूप बदलती है।फूल झड़ते हैं,पर बीज तैयार होते हैं।
तालियाँ रुकती हैं,
पर अनुभव बोलने लगता है।शरीर थकता है,पर विचार परिपक्व होते हैं।पतझड़ अंत नहीं,अगले वसंत की तैयारी है.इसलिए,बहार में विनम्र रहना,बहार ढलने पर भी अडिग रहना,उपेक्षा में भी अपनी कीमत न भूलना,यही जीवन का सत्य है।क्योंकि अंत में…वसंत से सब प्रेम करते हैं,पर जो शिशिर में भी खड़ा रहता है,वही सच में मजबूत होता है।बहार का समाप्त होना निश्चित है,पर बहार के बाद भी,अपनी ऊष्मा बचाए रखना,यही सच्ची जीत है। #🙂सत्य वचन #🙂Motivation #👍लाईफ कोट्स #meri jindagi #💭माझे विचार
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क्युँकि शब्द केवल ध्वनि नहीं होते बल्कि वे सीधे किसी के हृदय पर प्रहार करने वाली अदृश्य धार होते है-- तुम जो कह देते हो-वो तुम्हारे लिए क्षणिक हो सकता है पर सामने वाले के भीतर वही वाक्य वर्षों तक गूंजता रहता है- जीभ से निकला एक कठोर शब्द, आत्मा पर वैसा ही घाव छोड़ देता है जैसा कोई नुकीला औज़ार देह पर देता है-- अंतर बस इतना है कि देह के घाव दिख जाते है, हृदय के नही और विडम्बना देखो-- लोग अपने शब्दों की जिम्मेदारी से बच जाते है पर सुनने वाला उन्हें जीवन भर ढोता है!-कभी-कभी हम क्रोध, अहंकार या क्षणिक आवेश मे वो कह जाते है जो वास्तव में कहना नहीं चाहते थे --पर जो कह दिया वो लौटता नहीं-- शब्दों का कोई “Undo” नहीं होता-- एक बार बोला गया वाक्य सामने वाले की चेतना में अपना घर बना लेता है!इसलिए बोलो पर ठहरकर; कहो पर करुणा के साथ; व्यक्त करो पर संवेदना के स्पर्श से क्युँकि संबंध संवाद से बनते है और असावधानी से टूट भी जाते है-- सबसे पहले विचारों को परिष्कृत करो-- फिर उन्हें शब्द दो वरना तुम्हारी वाणी ही तुम्हारे अपने प्रियजनों के हृदय पर पट्टियाँ चिपकाने की नौबत ला देगी!--हम सभी कुछ भी कह देते है - ऐसा समझ कर की हमे क्या - वो सामने वाली की परेशानी है - पर वास्तव मे समझना चाहिए की शब्द का चयन कैसा हो- इसलिए मै हमेशा ओवरथिंकर लोग के फेवर मे ही लिखती हूँ..कई चीजें जो वे समझकर कहेंगे वो लगभग सत्य हो ही जाती है!- तकलीफ सभी को होती है इसलिए कहने से पहले सोचिए -- हाँ! ये मुझपर भी लागू होता ही है!- #🙂सत्य वचन #👍लाईफ कोट्स #🙂Motivation #💭माझे विचार #meri jindagi
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आज परीक्षेची तयारी करणाऱ्या लेकीला विचारलं, "तुला माहिती आहे ना, या परीक्षेपेक्षा आमच्यासाठी महत्त्वाचे काय आहे?" ती म्हणाली, "हो."सरळ साधं समजावणं असतं आपलं! परीक्षेपेक्षा लेकरं महत्त्वाची....❤️🌈👍😍 ✍🏻 #meri jindagi #👍लाईफ कोट्स #💭माझे विचार #🙂सत्य वचन #🙂Motivation
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Different world but same story 🥺
एक ने सब कुछ त्यागना सिखाया 🐧, और एक ने सब कुछ खोकर जीना...🐒 #🙂सत्य वचन #💭माझे विचार #🙂Motivation #👍लाईफ कोट्स #meri jindagi













