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#🙏गुरु महिमा😇 परमात्मा कहते हैं कि यह परंपराएं तो हम इंसानों ने बना रखे हैं हम परमात्मा के विधान से चलेंगे तो यह बेफिजूल के खर्चे बचेंगे संत रामपाल जी महाराज दहेज मुक्त विभाग अभियान चला रखा है जिसमें ना ₹1 लेना ना ₹1 देना
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00:51
#🙏गुरु महिमा😇
🙏गुरु महिमा😇 - धनाना धाम संत रामपाल जी महाराज की पावन उपस्थिति में आयोजित "विश्व शांति महा- अनुष्ठान" ]8 के अवसर पर सतलोक आश्रम धनाना धाम (हरियाणा ) में ३२२ ' ؟٤ रक्तदान हुआ। धनाना धाम संत रामपाल जी महाराज की पावन उपस्थिति में आयोजित "विश्व शांति महा- अनुष्ठान" ]8 के अवसर पर सतलोक आश्रम धनाना धाम (हरियाणा ) में ३२२ ' ؟٤ रक्तदान हुआ। - ShareChat
#🙏गुरु महिमा😇
🙏गुरु महिमा😇 - सीवतदीयाववता काशखववाढा L೫cz Ua1la ೭೭೭ सतलोक आश्रम सोजत में १७० ने किया रक्तदान यह ऐतिहासिक कार्य अनुयायियों संत रामपाल जी महाराज की पावन उपस्थिति में विश्व शांति महा अनुष्ठान 0ೆ  के अंतर्गत किया गया। SANews Channel Yolluhe सीवतदीयाववता काशखववाढा L೫cz Ua1la ೭೭೭ सतलोक आश्रम सोजत में १७० ने किया रक्तदान यह ऐतिहासिक कार्य अनुयायियों संत रामपाल जी महाराज की पावन उपस्थिति में विश्व शांति महा अनुष्ठान 0ೆ  के अंतर्गत किया गया। SANews Channel Yolluhe - ShareChat
https://youtube.com/watch?v=V5K_5K4P7dE&si=stIUbj9vVCH6NMHz #🙏गुरु महिमा😇 संत रामपाल जी महाराज पूरे विश्व में एकता और भाईचारा करवा रहे हैं हमें उनके साथ खड़े होना चाहिए इससे विश्व में शांति का प्रतीक होता है
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#🙏गुरु महिमा😇
🙏गुरु महिमा😇 - साधु  पुरुषाका ) ೧H दाम्भिक   पुरुष आदिसे युक्त करते हैँ ।l ६३ ।। और लोगोंको भी भ्रमित  कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टं ब्ह्मज्ञोउस्मीति त्यजदन्त्यज यथा।| ६४ । संसारजसुखासक्तं वादिनम चरन्ति गर्दभाद्याश्च विरक्तास्ते भवन्ति किम्।। ६५ ।१  गतव्रीडा गृहारण्यसमालोके faa: मृद्भस्मवासी नित्यं श्वा सः किं मुक्तो भविष्यति १ ६६ ११  स्युर्यदि मृद्भस्मोद्धूलनादेव मुक्ताः मानवाः तृणपर्णोदकाहाराः जम्बुकाउउखुमृगाद्याश्च तापसास्ते भवन्ति किम्।  731 মনল নননামিন: गङ्गादितटिनीस्थिताः मण्डूकमत्स्यप्रमुखा योगिनस्ते भवन्ति किम्।१ ६८ ।१  সাতনমতোোল तथा ছুঁ' করমসা  जो व्यक्ति ब्रह्मज्ञानो  एसा कहता वह [auuTfaFT)-# आसक्त सांसारिक सुख चाण्डालकी भाँति छोड़ देना चाहिये ।। ६४I संसारमें घरमे ब्रह्मज्ञानमार्ग - दोनों मार्गोंसे ತರ भ्रष्ट हो जाता है, 6 7 54 নসা भी   विचरण होकर गर्दभ आदि पशु करत त्यागकर   समानरूपसे मनुष्य और अरण्यमें लज्जा करनेमात्रसे और ٤? ١١ ٤٦ ١١ ٦٢٤ धारण H विरक्त हो जाते संसारसे ) प्राप्त कर लेेगा ? ११ ६६ ।। घास आचरण ) -सेवे शयन करनेवाला वह कुत्ता भी क्या मुक्ति সল आदि पशु भस्ममें मुक्त हो जाय तो मिट्टी और जंगलमें निवास करनेवाले शृगाल, चूहे तथा मृगमें 4 करनेवाले तथा निरन्तर निवास छोड़कर वनमें रहनेमात्रसे आहार जाते हैं अर्थात् अन्न छोड़ देने ग्राम या नगरमें पात और जलका मृत्युपर्यंन्त  जीव जन्मसे लेकर तपस्वी - योगी हो मेढक ) और मत्स्य आदि जलचर  भो क्या संन्यासी नहीं हो जाता ।I ६७ ।। मण्डूक Soton Ona%lue చId గ్లే? II 6డ I योगी हो 5 নী  নযা ন साधु  पुरुषाका ) ೧H दाम्भिक   पुरुष आदिसे युक्त करते हैँ ।l ६३ ।। और लोगोंको भी भ्रमित  कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टं ब्ह्मज्ञोउस्मीति त्यजदन्त्यज यथा।| ६४ । संसारजसुखासक्तं वादिनम चरन्ति गर्दभाद्याश्च विरक्तास्ते भवन्ति किम्।। ६५ ।१  गतव्रीडा गृहारण्यसमालोके faa: मृद्भस्मवासी नित्यं श्वा सः किं मुक्तो भविष्यति १ ६६ ११  स्युर्यदि मृद्भस्मोद्धूलनादेव मुक्ताः मानवाः तृणपर्णोदकाहाराः जम्बुकाउउखुमृगाद्याश्च तापसास्ते भवन्ति किम्।  731 মনল নননামিন: गङ्गादितटिनीस्थिताः मण्डूकमत्स्यप्रमुखा योगिनस्ते भवन्ति किम्।१ ६८ ।१  সাতনমতোোল तथा ছুঁ' করমসা  जो व्यक्ति ब्रह्मज्ञानो  एसा कहता वह [auuTfaFT)-# आसक्त सांसारिक सुख चाण्डालकी भाँति छोड़ देना चाहिये ।। ६४I संसारमें घरमे ब्रह्मज्ञानमार्ग - दोनों मार्गोंसे ತರ भ्रष्ट हो जाता है, 6 7 54 নসা भी   विचरण होकर गर्दभ आदि पशु करत त्यागकर   समानरूपसे मनुष्य और अरण्यमें लज्जा करनेमात्रसे और ٤? ١١ ٤٦ ١١ ٦٢٤ धारण H विरक्त हो जाते संसारसे ) प्राप्त कर लेेगा ? ११ ६६ ।। घास आचरण ) -सेवे शयन करनेवाला वह कुत्ता भी क्या मुक्ति সল आदि पशु भस्ममें मुक्त हो जाय तो मिट्टी और जंगलमें निवास करनेवाले शृगाल, चूहे तथा मृगमें 4 करनेवाले तथा निरन्तर निवास छोड़कर वनमें रहनेमात्रसे आहार जाते हैं अर्थात् अन्न छोड़ देने ग्राम या नगरमें पात और जलका मृत्युपर्यंन्त  जीव जन्मसे लेकर तपस्वी - योगी हो मेढक ) और मत्स्य आदि जलचर  भो क्या संन्यासी नहीं हो जाता ।I ६७ ।। मण्डूक Soton Ona%lue చId గ్లే? II 6డ I योगी हो 5 নী  নযা ন - ShareChat
#🙏गुरु महिमा😇
🙏गुरु महिमा😇 - रसका सागर शरीरस्थ रसमें और दधिसागर रक्तमें स्थित समझना चाहिये स्वादूदकसगरक र्लञ्ऋर ( ऊच लटकते हुए भाग अथवा उपजिह्वा या काकल ) - में समझना चाहिये ।। ६४ ६५ । नादचक्रमें सूर्य  ==-==== नेत्रोंनें मंगल और हृदयमें बुधको स्थित समझना चाहिये। विष्णुस्थान अर्थात् नाभिमें स्थिन मपिपूरकचक्र्े ऋृर्ट  शुक्र स्थित हैँ, नाभिस्थान नाभि ( गोलक) में शनैश्चर स्थित है और मुखमें रहु स्थ्टि ऱ्हा रञच ह। যুঙ্গন तथ इस प्रकार समस्त ग्रहमण्डल इस पारमार्थिक शरीरमें विद्यमान है वायुस्थानमें केतु स्थित है ೯73 . । प्रभातकालमें सदा पद्मासनमें स्थित होकर पट्च्क्रो शररमें समस्त ब्रह्माण्डका चिन्तन करना चाहिये ।I ६६  ६८ चित्तन करे और यथोक्त क्रमसे अजपा-जप करे ।I ६९ ।१ संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।I ७० ।१  मोक्षदायिनी সুলীনা FII गायत्री अजपानाम यं कृत्वा सर्वदा जीवो जीवभावं विमुञ्चति ११ ७१ ११  प्रवक्ष्येषहमजपाक्रममुत्तमम् तार्ष्ष्य विशुद्धाख्यमाज्ञाषट्चक्रमुच्यते  Il9? I^ श्रण अनाहत मणिपूरकमेव स्वाधिष्ठानं fಿಗಾdIl 93 Il मूलाधारः ब्रह्मरन्ध्रे क्रमाच्चकाणि श्रुवोर्मध्ये कण्ठगे हृदि লিত্ত্ববড়ী  स्वाधिष्ठानमपि प्रभाकरसमं बालान्तषट्पत्रकम्। नाश्या मूलाधारे स्वनाहतपुरं हैमं कठान्तावृतम् ।१ ७४ I१ নরামালনতাসিত फकारान्तकं पत्रै्द्वादशभिः ববুবলাবলমম  आद्यारंतु डाद्य সতিপুন্ধে दशदलं 75 ೩3ದ FR पापास ధAT Shot on Oneplus जोवभावर ಗ೩೯ 31e सकल्पमानस कानम రగ Hdd n रसका सागर शरीरस्थ रसमें और दधिसागर रक्तमें स्थित समझना चाहिये स्वादूदकसगरक र्लञ्ऋर ( ऊच लटकते हुए भाग अथवा उपजिह्वा या काकल ) - में समझना चाहिये ।। ६४ ६५ । नादचक्रमें सूर्य  ==-==== नेत्रोंनें मंगल और हृदयमें बुधको स्थित समझना चाहिये। विष्णुस्थान अर्थात् नाभिमें स्थिन मपिपूरकचक्र्े ऋृर्ट  शुक्र स्थित हैँ, नाभिस्थान नाभि ( गोलक) में शनैश्चर स्थित है और मुखमें रहु स्थ्टि ऱ्हा रञच ह। যুঙ্গন तथ इस प्रकार समस्त ग्रहमण्डल इस पारमार्थिक शरीरमें विद्यमान है वायुस्थानमें केतु स्थित है ೯73 . । प्रभातकालमें सदा पद्मासनमें स्थित होकर पट्च्क्रो शररमें समस्त ब्रह्माण्डका चिन्तन करना चाहिये ।I ६६  ६८ चित्तन करे और यथोक्त क्रमसे अजपा-जप करे ।I ६९ ।१ संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।I ७० ।१  मोक्षदायिनी সুলীনা FII गायत्री अजपानाम यं कृत्वा सर्वदा जीवो जीवभावं विमुञ्चति ११ ७१ ११  प्रवक्ष्येषहमजपाक्रममुत्तमम् तार्ष्ष्य विशुद्धाख्यमाज्ञाषट्चक्रमुच्यते  Il9? I^ श्रण अनाहत मणिपूरकमेव स्वाधिष्ठानं fಿಗಾdIl 93 Il मूलाधारः ब्रह्मरन्ध्रे क्रमाच्चकाणि श्रुवोर्मध्ये कण्ठगे हृदि লিত্ত্ববড়ী  स्वाधिष्ठानमपि प्रभाकरसमं बालान्तषट्पत्रकम्। नाश्या मूलाधारे स्वनाहतपुरं हैमं कठान्तावृतम् ।१ ७४ I१ নরামালনতাসিত फकारान्तकं पत्रै्द्वादशभिः ববুবলাবলমম  आद्यारंतु डाद्य সতিপুন্ধে दशदलं 75 ೩3ದ FR पापास ధAT Shot on Oneplus जोवभावर ಗ೩೯ 31e सकल्पमानस कानम రగ Hdd n - ShareChat
#🙏गुरु महिमा😇
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🙏गुरु महिमा😇 - 0-344)4 गरुडपुराण साराद्ार  २५६ मन्त्रोच्चारणहोमाद्दैर्भ्रामिताः  क्रतुविस्तरैः Il ६० ।१  कर्मकाण्डरता नराः संतुष्टाः নামপান্তা मूढाः परोक्षमिच्छन्ति मम मायाविमोहिताः I१ ६१ ११  कायशोषणैः एकभुक्तोपवासाद्यैर्नियमैः उपवास) आदिमें प्रयत्न करते हैं और कुछ 377 (Ta; क्रियाओँको   करनेका সব্ধাব্ধৌ विचरण करते हैं Il ५९ ।I कर्मकाण्डमें अनक लोग कुछ ढोंगी आवृत आत्मावाले कुछ लोग बनकर मन्त्रोच्चारण और होमादि 3TN संलग्न रहते हैं, संतुष्ट करक फलश्रुतियोंसे मनुष्य शास्त्रबोधित नाममात्रकी हैँ, उन्हीँमें उलझे रहते हैँ ।l ६० । मेरी मायासे विमोहित आस्था   रखनेवाले हाकर तथा यज्ञसे विस्तृत विधानोंसे भ्रान्त रहते परमगति ) -को प्राप्त करके   परोक्ष कृत्योंसे उपवास आदि व्रतोंका आचरण एकभुक्त, मूर्खलोग शरीरको सुखानेवाले कुत्र   महोरगः I१ ६२ ।१  वल्मीकताडनादेव   मृतः करना चाहते हैं ।l ६१ Il मुक्तरविवेक्कनामः | बल्मीैक =ஈரம= "7 #ামমলি देहदण्डनमात्रेण का ज्ञानिवल्लोके प्राप्त हो सकती है ? वल्मीक दाम्भिका जटाभाराजिनैर्युक्ता और मृगचर्म  मुक्ति ढोनेवाले पुरुषोंको সনিনকী भारको देनेमात्रसे क्या जटाओंके भ्रमण करते हैं लम्बी है ? II ६२ II बड़ी शररको लोकमें Shot on One दण्ड मृत्यु होती ఖifd   శైౌ ज्ञानीकी मद्यासर्पकी करक 0-344)4 गरुडपुराण साराद्ार  २५६ मन्त्रोच्चारणहोमाद्दैर्भ्रामिताः  क्रतुविस्तरैः Il ६० ।१  कर्मकाण्डरता नराः संतुष्टाः নামপান্তা मूढाः परोक्षमिच्छन्ति मम मायाविमोहिताः I१ ६१ ११  कायशोषणैः एकभुक्तोपवासाद्यैर्नियमैः उपवास) आदिमें प्रयत्न करते हैं और कुछ 377 (Ta; क्रियाओँको   करनेका সব্ধাব্ধৌ विचरण करते हैं Il ५९ ।I कर्मकाण्डमें अनक लोग कुछ ढोंगी आवृत आत्मावाले कुछ लोग बनकर मन्त्रोच्चारण और होमादि 3TN संलग्न रहते हैं, संतुष्ट करक फलश्रुतियोंसे मनुष्य शास्त्रबोधित नाममात्रकी हैँ, उन्हीँमें उलझे रहते हैँ ।l ६० । मेरी मायासे विमोहित आस्था   रखनेवाले हाकर तथा यज्ञसे विस्तृत विधानोंसे भ्रान्त रहते परमगति ) -को प्राप्त करके   परोक्ष कृत्योंसे उपवास आदि व्रतोंका आचरण एकभुक्त, मूर्खलोग शरीरको सुखानेवाले कुत्र   महोरगः I१ ६२ ।१  वल्मीकताडनादेव   मृतः करना चाहते हैं ।l ६१ Il मुक्तरविवेक्कनामः | बल्मीैक =ஈரம= "7 #ামমলি देहदण्डनमात्रेण का ज्ञानिवल्लोके प्राप्त हो सकती है ? वल्मीक दाम्भिका जटाभाराजिनैर्युक्ता और मृगचर्म  मुक्ति ढोनेवाले पुरुषोंको সনিনকী भारको देनेमात्रसे क्या जटाओंके भ्रमण करते हैं लम्बी है ? II ६२ II बड़ी शररको लोकमें Shot on One दण्ड मृत्यु होती ఖifd   శైౌ ज्ञानीकी मद्यासर्पकी करक - ShareChat
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