Achary pt sanjay Mishra
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#नीला आसमान 🌌 #😇 चाणक्य नीति #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🤗जया किशोरी जी🕉️
नीला आसमान 🌌 - ShareChat
#😇 चाणक्य नीति #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #नीला आसमान 🌌
😇 चाणक्य नीति - गीता में वर्णित IqG 3II6R(Aahar) (अध्याय १७ , श्लोक 8 १०) सोच, जो आहार हमारी स्वास्थ्य और आचरण को प्रभावित करता है, उसे गीता में - आहार कहा गया है। 3ামাং ক 3 সকাৎ ३. तामसिक आहार 2151 6 31R १. सात्विक आहार (Tamasik Aahar) (Rajasik Aahar) (Sattvik Aahar) बासी , दुर्गंधयुक्त, अत्यधिक कड़वा, खद्दा, आयु, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रीति बढ़ाने वाला नमकीन तीखा, गरम सडा ्गला स्यिर, रसयुक्त, स्निग्ध, अपवित्र , उत्तछ्िष्ट जलाने वाला, उत्तेजक हदयप्रिय शोक और दुःख रोग, जड़ता और आलस्य पौष्टिक, शुद्ध ताजा , देने वाला বনান বালা और हल्का কল: फलः फलः 77, TT; स्वास्थ्य, शांति, दुःख সালম্থ; अशाति पतन प्रसन्नता गीता का संदेश सात्विक आहार से शरीर और मन शुद्ध रहते हैं, और साधना तथा जीवन सफल होता है। गीता में वर्णित IqG 3II6R(Aahar) (अध्याय १७ , श्लोक 8 १०) सोच, जो आहार हमारी स्वास्थ्य और आचरण को प्रभावित करता है, उसे गीता में - आहार कहा गया है। 3ামাং ক 3 সকাৎ ३. तामसिक आहार 2151 6 31R १. सात्विक आहार (Tamasik Aahar) (Rajasik Aahar) (Sattvik Aahar) बासी , दुर्गंधयुक्त, अत्यधिक कड़वा, खद्दा, आयु, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रीति बढ़ाने वाला नमकीन तीखा, गरम सडा ्गला स्यिर, रसयुक्त, स्निग्ध, अपवित्र , उत्तछ्िष्ट जलाने वाला, उत्तेजक हदयप्रिय शोक और दुःख रोग, जड़ता और आलस्य पौष्टिक, शुद्ध ताजा , देने वाला বনান বালা और हल्का কল: फलः फलः 77, TT; स्वास्थ्य, शांति, दुःख সালম্থ; अशाति पतन प्रसन्नता गीता का संदेश सात्विक आहार से शरीर और मन शुद्ध रहते हैं, और साधना तथा जीवन सफल होता है। - ShareChat
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #नीला आसमान 🌌 #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #😇 चाणक्य नीति
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - भगवद् गीता में वर्णित श्रद्धा (Shraddha) (সংযায 17, হলীক 1-3) जिसमें जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही बनता है। के अनुसार होती है। श्रद्धा मनुष्य की प्रकृति ঋলা ক 3 সকাৎ ३. तामसिक श्रद्घा १. सात्विक श्रद्घा २. राजसिक श्रद्घा (Rajasik Shraddha) (Tamasik Shraddha) (Sattvik Shraddha) भूत- प्रेत , अंधविश्घास, देवताओं और ईष्वर में श्रद्वा यक्ष, राक्षस, शल्तिों में श्रद्घा टोटके आदि में श्रद्घा सत्य, धर्म और सदाचार र्मे श्रद्ा की इच्छा से पूजा  কল अज्ञान और भम से प्रेरित शास्त्रों और सदगुरु में विश्वास  मान सम्मान, ऐश्वर्य और शुद्ध और कल्याणकारी कार्यी  हानिकारक और हिंसात्मक लिए लाभ के में विश्वास कमौं में विश्वास फलः फलः फलः उन्नति, शांति, अस्थायी फल, পনন; সময असंतोष "ಞಸ अज्ञान गीता का संदेश श्रद्घा जैसी होती है, जीवन वैसा ही बनता है। सात्विक श्रद्वा अपनाकर जीवन को श्रेष्ठ बनाएं। भगवद् गीता में वर्णित श्रद्धा (Shraddha) (সংযায 17, হলীক 1-3) जिसमें जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही बनता है। के अनुसार होती है। श्रद्धा मनुष्य की प्रकृति ঋলা ক 3 সকাৎ ३. तामसिक श्रद्घा १. सात्विक श्रद्घा २. राजसिक श्रद्घा (Rajasik Shraddha) (Tamasik Shraddha) (Sattvik Shraddha) भूत- प्रेत , अंधविश्घास, देवताओं और ईष्वर में श्रद्वा यक्ष, राक्षस, शल्तिों में श्रद्घा टोटके आदि में श्रद्घा सत्य, धर्म और सदाचार र्मे श्रद्ा की इच्छा से पूजा  কল अज्ञान और भम से प्रेरित शास्त्रों और सदगुरु में विश्वास  मान सम्मान, ऐश्वर्य और शुद्ध और कल्याणकारी कार्यी  हानिकारक और हिंसात्मक लिए लाभ के में विश्वास कमौं में विश्वास फलः फलः फलः उन्नति, शांति, अस्थायी फल, পনন; সময असंतोष "ಞಸ अज्ञान गीता का संदेश श्रद्घा जैसी होती है, जीवन वैसा ही बनता है। सात्विक श्रद्वा अपनाकर जीवन को श्रेष्ठ बनाएं। - ShareChat
#🤗जया किशोरी जी🕉️ #नीला आसमान 🌌 #😇 चाणक्य नीति #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🤗जया किशोरी जी🕉️ - भगवद् गीता में वर्णित যন (Yajna) (अध्याय ४, १०, १७) कर्तव्य भाव से, वेद विधि के अनुसार , लोक कल्याण और ईश्वर की प्राप्ति के लिए किया गया त्याग ही यज्ञ है। यज्ञ के 3 प्रकार ३. तामसिक यज्ञ 1. মারিক যচা २. राजसिक यज्ञ (Sattvik Yajna) | (Rajasik Yajna) (Tamasik Yajna) fff f# की इच्छा से किया जाए कर्तव्य समझकर किया जाए फल किया जाए दिखावे या नाम के लिए विधि-विधान से किया जाए श्रद्वा रहित हो किया जाए विना फल की इच्छा के धन , मान और ऐश्वर्य ओर अयोम्य द्रव्य या श्रद्धा और शुद्ध भावना से लिए কী সাদি ক अशुद्घ भाव से किया जाए किया जाए फलः फलः কল: g, ifಸ, अस्थायी लाभ , हानि, पाप সমনীম कल्याण 357 गीता का संदेश यज्ञ से चित्त शुद्घ होता है और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। सात्विक यज्ञ ही श्रेष्ठ है। भगवद् गीता में वर्णित যন (Yajna) (अध्याय ४, १०, १७) कर्तव्य भाव से, वेद विधि के अनुसार , लोक कल्याण और ईश्वर की प्राप्ति के लिए किया गया त्याग ही यज्ञ है। यज्ञ के 3 प्रकार ३. तामसिक यज्ञ 1. মারিক যচা २. राजसिक यज्ञ (Sattvik Yajna) | (Rajasik Yajna) (Tamasik Yajna) fff f# की इच्छा से किया जाए कर्तव्य समझकर किया जाए फल किया जाए दिखावे या नाम के लिए विधि-विधान से किया जाए श्रद्वा रहित हो किया जाए विना फल की इच्छा के धन , मान और ऐश्वर्य ओर अयोम्य द्रव्य या श्रद्धा और शुद्ध भावना से लिए কী সাদি ক अशुद्घ भाव से किया जाए किया जाए फलः फलः কল: g, ifಸ, अस्थायी लाभ , हानि, पाप সমনীম कल्याण 357 गीता का संदेश यज्ञ से चित्त शुद्घ होता है और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। सात्विक यज्ञ ही श्रेष्ठ है। - ShareChat
#नीला आसमान 🌌 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #😇 चाणक्य नीति
नीला आसमान 🌌 - भगवद गीता में वर्णित तप (Tap) (अध्याय १७, श्लोक १४ १९) शरीर , वाणी और मन को शुद्घ करके , ईश्वर की लिए সাদি ক किया गया अथ्यास ही तप है। तप के 3 प्रकार १. सात्विक तप २. राजसिक तप 3. নাসমিক নত (Sattvik Tap) (Rajasik Tap) (Tamasik Tap) সভ্ান, মুরনা যা ৪০ ম कर्तव्य समझकर किया जाए मान सम्मान याफल की इच्छा से किया जाए किया जाए विना फल की इच्छा के दिखावे के लिए किया जाए शरीर या मन को कष्ट श्रद्घा और श्रद्धा के साथ देकर किया जाए शरीर , वाणी और मन अहंकार और प्रदर्शन को हानि पहुँचाने के लिए किया जाए को शुद्घ दूसरों  करने वाला वाला तप फलः কল: फलः शुद्धि, शांति, दुःख, असंतोष, अज्ञान , हानि, आत्मिक उन्नति थकावट पतन गीता का संदेश तप का उद्नेश्य   आत्मशुद्धि और ईश्वर की प्राप्ति होना चाहिए, न कि दिखावा , अहंकार या க&4II दूसरों भगवद गीता में वर्णित तप (Tap) (अध्याय १७, श्लोक १४ १९) शरीर , वाणी और मन को शुद्घ करके , ईश्वर की लिए সাদি ক किया गया अथ्यास ही तप है। तप के 3 प्रकार १. सात्विक तप २. राजसिक तप 3. নাসমিক নত (Sattvik Tap) (Rajasik Tap) (Tamasik Tap) সভ্ান, মুরনা যা ৪০ ম कर्तव्य समझकर किया जाए मान सम्मान याफल की इच्छा से किया जाए किया जाए विना फल की इच्छा के दिखावे के लिए किया जाए शरीर या मन को कष्ट श्रद्घा और श्रद्धा के साथ देकर किया जाए शरीर , वाणी और मन अहंकार और प्रदर्शन को हानि पहुँचाने के लिए किया जाए को शुद्घ दूसरों  करने वाला वाला तप फलः কল: फलः शुद्धि, शांति, दुःख, असंतोष, अज्ञान , हानि, आत्मिक उन्नति थकावट पतन गीता का संदेश तप का उद्नेश्य   आत्मशुद्धि और ईश्वर की प्राप्ति होना चाहिए, न कि दिखावा , अहंकार या க&4II दूसरों - ShareChat
#🙏कर्म क्या है❓ #😇 चाणक्य नीति #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #नीला आसमान 🌌
🙏कर्म क्या है❓ - भगवद् गीता में वर्णित 10 (Jap) भगवद गीता में यज्ञ जप को गीता (पुजा ) का एक श्रेष्ठ रूप माना गया हे। যন্ানা সপযন্ীৎস্সি श्लाक (সংয়ায 10, হলাক 25) अर्थः भगवान कहते हैं ~ मैं यज्ञों में जप यज्ञ हूँ । जप क्या है? भगवान के नाम , मंत्र या शब्द का बार-बार स्मरण करना जप कहलाता है।  यह मन, वाणी या ध्यान से किया जाता है।  जप के 3 प्रकार उपांशु  वाचिक जप মানমিক সপ 3 2 जप जो केवल मन में ही जो उच्चारण करके जो धीरे-्धीरे होठों से (बोलकर ) किया जाए। किया जाए। (बिना आवाज़ ) किया जाए। 3் जैसेः "ऊँ नमः शिवाय  "हरे কৃষ্ডা" : लाभः लाभः मन ओर अधिक शांत गहरी एकाग्रता और मन को एकाग्र करता है। होता है। आत्मिक उन्नति। गीता का संदेश அ মযনন 98 जप एक सरल और साधना है। 9 निरंतर जप करने से मन शुद्ध और शांत होता है।  जप से चित्त की चंचलता समाप्त होती है और भगवान की प्राति होती है। निष्कर्ष मानसिक जप सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जप से मन, बुद्धि और आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में शांति, सुख और सफलता मिलती है। भगवद् गीता में वर्णित 10 (Jap) भगवद गीता में यज्ञ जप को गीता (पुजा ) का एक श्रेष्ठ रूप माना गया हे। যন্ানা সপযন্ীৎস্সি श्लाक (সংয়ায 10, হলাক 25) अर्थः भगवान कहते हैं ~ मैं यज्ञों में जप यज्ञ हूँ । जप क्या है? भगवान के नाम , मंत्र या शब्द का बार-बार स्मरण करना जप कहलाता है।  यह मन, वाणी या ध्यान से किया जाता है।  जप के 3 प्रकार उपांशु  वाचिक जप মানমিক সপ 3 2 जप जो केवल मन में ही जो उच्चारण करके जो धीरे-्धीरे होठों से (बोलकर ) किया जाए। किया जाए। (बिना आवाज़ ) किया जाए। 3் जैसेः "ऊँ नमः शिवाय  "हरे কৃষ্ডা" : लाभः लाभः मन ओर अधिक शांत गहरी एकाग्रता और मन को एकाग्र करता है। होता है। आत्मिक उन्नति। गीता का संदेश அ মযনন 98 जप एक सरल और साधना है। 9 निरंतर जप करने से मन शुद्ध और शांत होता है।  जप से चित्त की चंचलता समाप्त होती है और भगवान की प्राति होती है। निष्कर्ष मानसिक जप सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जप से मन, बुद्धि और आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में शांति, सुख और सफलता मिलती है। - ShareChat
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🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - भगवद् गीता में वर्णित दान (Daan) भगवद ரிள (अध्याय १७ , श्लोक २० २२)  श्रीकृष्ण ने दान के तीन प्रकार बताए हैं भगवान साल्विक , राजसिक और तामसिक | साल्विक दान तामसिक दान राजसिक दान 3 2 (Sattvik Daan) (Rajasik Daan) (Tamasik Daan) दान महोत्सव जो फल या बदले की इच्छा से जो कर्तव्य समझकर दिया जाए। जो अयोग्य व्यक्ति को दिया जाए। दिया जाए। योग्य व्यलि (सुपात्र) को दिया जाए। बिना सम्मान , अपमान के साथ दिया जाए। दिखावे या नाम कमाने के लिए दिया जाए। बिना किसी फल की इच्छा के दिया जाए। गलत समय या गलत उददेश्य से दिया जाए। सही समय और स्थान पर दिया जाए मन में अहंकार या अपेक्षा 84 रहती लापरवाही , तिरस्कार या क्रोध में दिया जाए। বিনসনা सम्मान और के साथ दिया जाए। देने में खुशी कम , पाने की चाह अधिक | फलः ud: फलः अस्थायी लाभ पुण्य , शांति, आत्मिक उन्नति हानि, पाप, अज्ञान संतोष नहीं गीता का संदेश दान हमेशा शुद्ध भावना से करना चाहिए। सही व्यक्ति॰ सही समय और बिना अहंकार के किया गया दान ही श्रेष्ठ है। दान का मूल्य वस्तु से नहीं , बल्कि भावना से होता है। निष्कर्ष साल्विक दान सबसे श्रेष्ठ है। बढ़ती हैं। दान से धन कम नहीं होता, बल्कि पुण्य और खुशियों भगवद् गीता में वर्णित दान (Daan) भगवद ரிள (अध्याय १७ , श्लोक २० २२)  श्रीकृष्ण ने दान के तीन प्रकार बताए हैं भगवान साल्विक , राजसिक और तामसिक | साल्विक दान तामसिक दान राजसिक दान 3 2 (Sattvik Daan) (Rajasik Daan) (Tamasik Daan) दान महोत्सव जो फल या बदले की इच्छा से जो कर्तव्य समझकर दिया जाए। जो अयोग्य व्यक्ति को दिया जाए। दिया जाए। योग्य व्यलि (सुपात्र) को दिया जाए। बिना सम्मान , अपमान के साथ दिया जाए। दिखावे या नाम कमाने के लिए दिया जाए। बिना किसी फल की इच्छा के दिया जाए। गलत समय या गलत उददेश्य से दिया जाए। सही समय और स्थान पर दिया जाए मन में अहंकार या अपेक्षा 84 रहती लापरवाही , तिरस्कार या क्रोध में दिया जाए। বিনসনা सम्मान और के साथ दिया जाए। देने में खुशी कम , पाने की चाह अधिक | फलः ud: फलः अस्थायी लाभ पुण्य , शांति, आत्मिक उन्नति हानि, पाप, अज्ञान संतोष नहीं गीता का संदेश दान हमेशा शुद्ध भावना से करना चाहिए। सही व्यक्ति॰ सही समय और बिना अहंकार के किया गया दान ही श्रेष्ठ है। दान का मूल्य वस्तु से नहीं , बल्कि भावना से होता है। निष्कर्ष साल्विक दान सबसे श्रेष्ठ है। बढ़ती हैं। दान से धन कम नहीं होता, बल्कि पुण्य और खुशियों - ShareChat
#🙏गुरु महिमा😇 #नीला आसमान 🌌 #🤗जया किशोरी जी🕉️ #😇 चाणक्य नीति #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏गुरु महिमा😇 - भगवद् गीता में वर्णित da योग ' कर्म ' अध्याय १८) (अध्याय 3 गीता में कर्म का बहुत गहरा महत्व बताया गया है। कर्म ही मनुष्य का कर्तव्य है और वही उसकी उन्नति का मार्ग है। कर्म के 3 मुख्य प्रकार सत्कर्म राजसिक कर्म तामसिक कर्म 2 3 (सात्विक कर्म) जो फल की इच्छा से किया जाए जो धर्म और कर्तव्य के अनुसार किया जाए जो अज्ञान और मोह में किया जाए बिना सोचे समज्े या दूसरों को नुकसान  अहंकार , स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा से प्रेरित  बिना किसी स्वार्थ और फल की इच्छा के पहुंचाने वाला  के हित और भलाई के लिए बहुत मेहनत होती है, पर मन अशांत रहता है द्रूसरों आलस्य , लापरवाही और प्रमाद से किया  गया शुद्घ मन और सही भावना से किया गया प्रशंसा , लाभ और सफलता की चाह गलत निर्णय ओर अधर्म का कारण  फलः ம Ud: शांति, पुण्य, आत्मिक उन्नति दुःख, तनाव , असंतोष अज्ञान , हानि, पतन गीता का मुख्य संदेश (कर्म योग) " कर्मण्येवाधिकारस्ते भगवदू तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। फलेषु कदाचन  गीता मा की चिंत्ता কিয নিনা সপনা কনন্স কমী | फल कर्मफलहेतु र्भुर्मा  ते সা कर्म करते हुए भी आसक्ति और अहंकार त्याग दो। মহাী $মবকর্মতি Il"  कर्म ही योग है और यही मुक्ति का मार्ग है। ऐसा (अध्याय २, श्लोक ४७) বিহীণ নান নিষ্কর্ণ கசி हर कर्म का फल निशित है। सत्कर्म करें ओर फल की इच्छा त्याग दें। पूजा है, जैसा कर्म करेंगे , वैसा ही फल मिलेगा। यही जीवन को सफल , शांत और सार्थक बनाता है। কর্ম ৪ী निस्वार्थ, कर्तव्य भावना से किया गया कर्म ही श्रेष्ठ है। कर्म करते हुए ईश्वर को समर्पित रहना ही योग है। कर्म से भागना नही, बल्फि सही भाव से करना हे। गीता का कर्म योग हे। भगवद् गीता में वर्णित da योग ' कर्म ' अध्याय १८) (अध्याय 3 गीता में कर्म का बहुत गहरा महत्व बताया गया है। कर्म ही मनुष्य का कर्तव्य है और वही उसकी उन्नति का मार्ग है। कर्म के 3 मुख्य प्रकार सत्कर्म राजसिक कर्म तामसिक कर्म 2 3 (सात्विक कर्म) जो फल की इच्छा से किया जाए जो धर्म और कर्तव्य के अनुसार किया जाए जो अज्ञान और मोह में किया जाए बिना सोचे समज्े या दूसरों को नुकसान  अहंकार , स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा से प्रेरित  बिना किसी स्वार्थ और फल की इच्छा के पहुंचाने वाला  के हित और भलाई के लिए बहुत मेहनत होती है, पर मन अशांत रहता है द्रूसरों आलस्य , लापरवाही और प्रमाद से किया  गया शुद्घ मन और सही भावना से किया गया प्रशंसा , लाभ और सफलता की चाह गलत निर्णय ओर अधर्म का कारण  फलः ம Ud: शांति, पुण्य, आत्मिक उन्नति दुःख, तनाव , असंतोष अज्ञान , हानि, पतन गीता का मुख्य संदेश (कर्म योग) " कर्मण्येवाधिकारस्ते भगवदू तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। फलेषु कदाचन  गीता मा की चिंत्ता কিয নিনা সপনা কনন্স কমী | फल कर्मफलहेतु र्भुर्मा  ते সা कर्म करते हुए भी आसक्ति और अहंकार त्याग दो। মহাী $মবকর্মতি Il"  कर्म ही योग है और यही मुक्ति का मार्ग है। ऐसा (अध्याय २, श्लोक ४७) বিহীণ নান নিষ্কর্ণ கசி हर कर्म का फल निशित है। सत्कर्म करें ओर फल की इच्छा त्याग दें। पूजा है, जैसा कर्म करेंगे , वैसा ही फल मिलेगा। यही जीवन को सफल , शांत और सार्थक बनाता है। কর্ম ৪ী निस्वार्थ, कर्तव्य भावना से किया गया कर्म ही श्रेष्ठ है। कर्म करते हुए ईश्वर को समर्पित रहना ही योग है। कर्म से भागना नही, बल्फि सही भाव से करना हे। गीता का कर्म योग हे। - ShareChat
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🤗जया किशोरी जी🕉️ - भगवद गीता में वर्णित श्रीमद्रूभगवदनीता गुण (३ गुण) (अध्याय १४) श्रीकृष्ण ने प्रक्नति के तीन मुख्य गुण बताए हैं। भगवान प्रकृतिसंभवाः।।  सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः रजोगुण तमोगुण सत्त्व गुण 2 3 (Rajas) (Tamas) (Sattva) क्रिया, इच्छा और आसक्ति का गुण शुद्धता , प्रकाश ओर ज्ञान का गुण अज्ञान , आलस्य और अंधकार का गुण मन को शांत और स्थिर बनाता है हमेशा कुछ करने और पाने की चाह भ्रम , निद्वा और लापरवाही धर्म, और संतुलन की लाल्च, कामना और बेचैनी गलत निर्णय और अधर्म की सत्य ओर ले जाता है पैदा करता है ओर ले जाता है কলঃ কলঃ फल8 5I, ?iifa ga दुःख , असंतोष अज्ञान , मोह বিহীণ নান हर व्यक्ति में ये तीनों गुण मौजूद होते हैं। लेकिन किसी एक गुण का प्रभाव अधिक होता है। लक्ष्यः सत्त्व गुण को बढ़ाना और अंत में तीनों गुणों से ऊपर उठना । निष्कर्ष तमोगुण रजोगुण  सत्त्व गुण बॉंधता है नीचे गिराता है ऊँचा उठाता है (कर्म ओर फल की आसक्ति (अज्ञान ओर अधर्म की ओर (ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता हे) স বাঁধনা ৪) సకాIగౌడ) सत्त्व को बढ़ाएं, रजस को नियंत्रित करें, तमस को त्यागें और गुणों से ऊपर उठें भगवद गीता में वर्णित श्रीमद्रूभगवदनीता गुण (३ गुण) (अध्याय १४) श्रीकृष्ण ने प्रक्नति के तीन मुख्य गुण बताए हैं। भगवान प्रकृतिसंभवाः।।  सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः रजोगुण तमोगुण सत्त्व गुण 2 3 (Rajas) (Tamas) (Sattva) क्रिया, इच्छा और आसक्ति का गुण शुद्धता , प्रकाश ओर ज्ञान का गुण अज्ञान , आलस्य और अंधकार का गुण मन को शांत और स्थिर बनाता है हमेशा कुछ करने और पाने की चाह भ्रम , निद्वा और लापरवाही धर्म, और संतुलन की लाल्च, कामना और बेचैनी गलत निर्णय और अधर्म की सत्य ओर ले जाता है पैदा करता है ओर ले जाता है কলঃ কলঃ फल8 5I, ?iifa ga दुःख , असंतोष अज्ञान , मोह বিহীণ নান हर व्यक्ति में ये तीनों गुण मौजूद होते हैं। लेकिन किसी एक गुण का प्रभाव अधिक होता है। लक्ष्यः सत्त्व गुण को बढ़ाना और अंत में तीनों गुणों से ऊपर उठना । निष्कर्ष तमोगुण रजोगुण  सत्त्व गुण बॉंधता है नीचे गिराता है ऊँचा उठाता है (कर्म ओर फल की आसक्ति (अज्ञान ओर अधर्म की ओर (ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता हे) স বাঁধনা ৪) సకాIగౌడ) सत्त्व को बढ़ाएं, रजस को नियंत्रित करें, तमस को त्यागें और गुणों से ऊपर उठें - ShareChat