Akash thakur
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Akash thakur
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❣️❣️मेरी राधे मेरी दुनिया❣️❣️ 💯🌼Aakash 🌼💯
#🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏 वृंदावन धाम #🌸 बोलो राधे राधे #🙏 राधा रानी #🌞 Good Morning🌞
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00:19
#🙏 वृंदावन धाम #🙏 राधा रानी #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🌞 Good Morning🌞 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
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00:16
भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं-❤️❤️❤️ जब सब तुम्हारा साथ छोड़ दें और कोई सहारा न हो तब मुझे याद करना मैं तुम्हारी मदद किसी न किसी रूप में जरूर करूँगा। मैं तुम्हारे भीतर ही हूँ। राधे राधे🙏 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌞 Good Morning🌞 #🙏 वृंदावन धाम #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🌸 बोलो राधे राधे
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स्वभाव भी इंसान की अपनी कमाई हुईं सबसे बड़ी दौलत है कितना भी किसी से दूर हों पर अच्छे स्वभाव के कारण आप किसी न किसी पल यादों में आ ही जाते हो….🌻 #🙏 राधा रानी #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏 वृंदावन धाम #🌸 बोलो राधे राधे *🌹🇬⭕⭕🇩🌹 ​〽⭕➰𝙉̌𝙄̨𝙉̌𝙂̆💐🌻*
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स्वभाव भी इंसान की अपनी कमाई हुईं सबसे बड़ी दौलत है. #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌸 बोलो राधे राधे #🙏 राधा रानी #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 कितना भी किसी से दूर हों पर अच्छे स्वभाव के कारण आप किसी न किसी पल यादों में आ ही जाते हो….🌻 *🌹🇬⭕⭕🇩🌹 ​〽⭕➰𝙉̌𝙄̨𝙉̌𝙂̆💐🌻*
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#🙏 राधा रानी #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏 वृंदावन धाम #🌸 बोलो राधे राधे #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स
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00:15
#🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌞 Good Morning🌞
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01:00
🌸जब प्रेम और परिणय मिले: राधा और रुक्मिणी का महा-मिलन🌸 #🙏 वृंदावन धाम #🌞 Good Morning🌞 भक्त शिरोमणि सूरदास की बंद आँखों ने एक बार एक ऐसा स्वप्न देखा, जो इतिहास के पन्नों में कहीं दर्ज नहीं था, किंतु भावों के जगत में वह सत्य से भी अधिक गहरा था। स्वप्न में... द्वारका की महारानी रुक्मिणी और वृंदावन की अधीश्वरी राधिका का मिलन हुआ। कल्पना कीजिए उस क्षण की! एक तरफ महलों का तेज, दूसरी तरफ ब्रज की मिट्टी की सौंधी महक। दोनों एक-दूसरे को देख रही थीं और देखते ही एक-दूसरे पर न्योछावर हुई जा रही थीं। दोनों की आँखों में एक ही छवि थी—कृष्ण की। लेकिन विडंबना देखिए, दोनों के कृष्ण अलग-अलग थे। दो अलग कृष्ण, दो अलग पीड़ा रुक्मिणी ने राधा के साधारण वस्त्रों को छूकर देखा। वे शायद उन वस्त्रों में माखन की गंध ढूंढ रही थीं। वे उस 'कन्हैया' को महसूस करना चाहती थीं जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा। रुक्मिणी के हिस्से में 'यदुवंशी कृष्ण' आए थे—वे जो राजनीति के महानायक थे, जिनके हाथों में सुदर्शन चक्र था, और कंधों पर महाभारत के युद्ध का भार। रुक्मिणी ने उस 'द्वारकाधीश' से विवाह किया था जो गंभीर थे, जो जगत के रक्षक थे। पर रुक्मिणी का मन आज राधा को देखकर तड़प उठा— "हे राधे! तुमने उस बाल-गोपाल को पाया, जो नंगे पैर गायों के पीछे दौड़ता था। तुमने उस छलिया को पाया जो मटकी फोड़ता था और बांसुरी की धुन पर नचाता था। मेरे महल की दीवारों ने कभी बांसुरी की वह तान नहीं सुनी।" दूसरी ओर, राधा ने रुक्मिणी के भारी आभूषणों और राजसी ठाठ को देखा। उन्होंने रुक्मिणी के माथे की शोभा में कृष्ण का 'वैभव' तलाशा। राधा सोच रही थीं— "हे रुक्मिणी! तुम कितनी भाग्यशाली हो। तुमने कृष्ण को 'विश्व-विजेता' बनते देखा। तुमने उसे अधर्म का नाश करते और राजाओं को झुकाते देखा। मेरा कन्हैया तो बस एक ग्वाला था... मुझे क्या पता था कि मेरा छोटा-सा सखा एक दिन त्रिभुवन का स्वामी बन जाएगा।" 'आप' से 'तुम' की अधूरी यात्रा रुक्मिणी और राधा के बीच सबसे बड़ा अंतर मर्यादा और अधिकार का था। रुक्मिणी पत्नी थीं, पटरानी थीं। उनका संबंध विधि-विधान और मंत्रों से जुड़ा था। लेकिन इस औपचारिक रिश्ते में एक अदृश्य दीवार थी। रुक्मिणी जीवन भर कृष्ण को "स्वामी" या "आप" ही कहती रहीं। प्रेम की सर्वोच्च अवस्था तब होती है जब 'आप' का आदर पिघलकर 'तुम' के अधिकार में बदल जाए। रुक्मिणी महलों में रहकर भी इस यात्रा को पूरी न कर सकीं। और राधा? राधा की तो यात्रा ही "तुम" से शुरू हुई थी। उन्होंने कृष्ण को भगवान माना ही नहीं, उन्होंने तो सखा माना। उन्होंने प्रेम का आरंभ ही उस 'चरम' से किया जहाँ कोई औपचारिकता नहीं थी। शायद इसीलिए उन्हें भौतिक रूप में कृष्ण नहीं मिले। जिसने पहले ही परमात्मा को 'अपना' मान लिया हो, उसे विवाह के बंधन की क्या आवश्यकता? संसार का नियम बड़ा विचित्र है। रुक्मिणी ने कृष्ण को पाया, विवाह किया, साथ रहीं—फिर भी इतिहास उन्हें 'रुक्मिणी-कृष्ण' के नाम से कम ही पुकारता है। राधा को कृष्ण नहीं मिले, विवाह नहीं हुआ, विरह में तड़पीं—फिर भी युगों-युगों से मंदिर में 'राधे-कृष्ण' ही गूंजता है। कृष्ण का सत्य यही है: जिसे वे मिले (रुक्मिणी, सत्यभामा), उसे वे पूरी तरह कभी नहीं मिले। और जिसे वे नहीं मिले (राधा, गोपियाँ), वे आज तक उसी के हैं। इसलिए संतों ने कहा है— "कृष्ण को पाने का हठ मत करो। मुट्ठी बंद करोगे तो वे रेत की तरह फिसल जाएंगे। बस प्रेम करके हाथ खोल दो, वे सदैव तुम्हारी हथेली पर रहेंगे।" अंत में, दोनों देवियाँ इस सत्य पर मौन हो गई होंगी कि पूर्णता तो किसी को नहीं मिलती। कुछ न कुछ तो छूट ही जाता है। परंतु, सबसे अधिक यदि किसी का कुछ 'छूटा', तो वे स्वयं कृष्ण थे। जरा उनके जीवन को देखिए: * जन्मे तो माँ-बाप (देवकी-वसुदेव) छूट गए। * थोड़े बड़े हुए तो गोकुल, नंद और यशोदा छूट गए। * जवानी की दहलीज पर आए तो राधा और सखा छूट गए। * मथुरा भी छूटी, द्वारका बसानी पड़ी। * अंत में अपना वंश और अपनी द्वारका भी डूबती देखनी पड़ी। कृष्ण का पूरा जीवन 'त्याग' की एक लंबी गाथा है। पर क्या आपने कभी कृष्ण को रोते देखा? नहीं। वे कुरुक्षेत्र के रण में भी मुस्कुराते हैं, और जलती द्वारका के बीच भी शांत रहते हैं। हमारी आज की पीढ़ी, जो छोटी-सी नौकरी, कोई वस्तु या किसी व्यक्ति के छूट जाने पर डिप्रेशन (अवसाद) में चली जाती है, उसे कृष्ण को अपना गुरु बनाना चाहिए। कृष्ण सिखाते हैं कि सब कुछ खोकर भी, चेहरे की मुस्कान कैसे बचाए रखनी है। जीवन का नाम ही 'छूटना' है। जो इस सत्य को स्वीकार कर ले और फिर भी आनंद में रहे, वही असली 'कृष्ण भक्त' है। सचमुच, महागुरु था मेरा कन्हैया... 🙏🏻 जय श्री राधे-कृष्ण! 🌼
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