*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞*
*⛅दिनांक - 16 अप्रैल 2026*
*⛅दिन - गुरुवार*
*⛅विक्रम संवत् - 2083*
*⛅अयन - उत्तरायण*
*⛅ऋतु - वसंत*
*⛅मास - वैशाख*
*⛅पक्ष - कृष्ण*
*⛅तिथि - चतुर्दशी रात्रि 08:11 तक तत्पश्चात् अमावस्या*
*⛅नक्षत्र - उत्तर भाद्रपद दोपहर 01:59 तक तत्पश्चात् रेवती*
*⛅योग - इन्द्र सुबह 10:38 तक तत्पश्चात् वैधृति*
*⛅राहुकाल - दोपहर 02:02 से दोपहर 03:37 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅सूर्योदय - 06:06*
*⛅सूर्यास्त - 06:48 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅दिशा शूल - दक्षिण दिशा में*
*⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:35 से प्रातः 05:20 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12:01 से दोपहर 12:52 (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:04 से मध्यरात्रि 12:49 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*🌥️व्रत पर्व विवरण - सर्वार्थसिद्धि योग (दोपहर 01:59 से प्रातः 06:05 अप्रैल 17 तक)*
*🌥️विशेष - चतुर्दशी, अमावस्या और व्रत के दिन स्त्री सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
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*🔹घर में सुख-शांति के लिए🔹*
#🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #💮आज का पंचांग एवं मुहूर्त💫
*🔸वास्तुशास्त्र के नियमों के उचित पालन से शरीर की जैव-रासायनिक क्रिया को संतुलित रखने में सहायता मिलती है ।*
*🏡 एक घर में होना चाहिए एक मंदिर। एक घर में अलग-अलग पूजाघर बनवाने की बजाए मिल-जुलकर एक मंदिर बनवाए। एक घर में कई मंदिर होने पर वहां के सदस्यों को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।*
*🔸घर या वास्तु के मुख्य दरवाजे में देहरी (दहलीज) लगाने से अनेक अनिष्टकारी शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं व दूर रहती हैं । प्रतिदिन सुबह मुख्य द्वार के सामने हल्दी, कुमकुम व गोमूत्र मिश्रित गोबर से स्वस्तिक, कलश आदि आकारों में रंगोली बनाकर देहरी (दहलीज) एवं रंगोली की पूजा कर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे ईश्वर ! आप मेरे घर व स्वास्थ्य की अनिष्ट शक्तियों से रक्षा करें ।'*
*🔸प्रवेश-द्वार के ऊपर नीम, आम, अशोक आदि के पत्ते का तोरण (बंदनवार) बाँधना मंगलकारी है ।*
*🔸 मुख्य द्वार के सामने भोजन-कक्ष, रसोईघर या खाने की मेज नहीं होनी चाहिए ।*
*🔸मुख्य द्वार के अलावा पूजाघर, भोजन-कक्ष एवं तिजोरी के कमरे के दरवाजे पर भी देहरी (दहलीज) अवश्य लगवानी चाहिए ।*
*🔸भूमि-पूजन, वास्तु-शांति, गृह-प्रवेश आदि सामान्यतः शनिवार एवं मंगलवार को नहीं करने चाहिए ।*
*🔸गृहस्थियों को शयन-कक्ष में सफेद संगमरमर नहीं लगावाना चाहिए । इसे मन्दिर मे लगाना उचित है क्योंकि यह पवित्रता का द्योतक है ।*
*🔸कार्यालय के कामकाज, अध्ययन आदि के लिए बैठने का स्थान छत की बीम के नीचे नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक दबाव रहता है ।*
*🔸बीम के नीचे वाले स्थान में भोजन बनाना व करना नहीं चाहिए । इससे आर्थिक हानि हो सकती है । बीम के नीचे सोने से स्वास्थ्य में गड़बड़ होती है तथा नींद ठीक से नहीं आती ।*
*🔸घर की रसोई हमेशा अग्नि कोण में हो, गैस चूल्हा भी अग्नि कोण (साऊथ ईस्ट) में, खाना पूर्व की ओर मुंह करके बनाएं, शैंक (बर्तन धोने वाला) हमेशा नार्थ ईस्ट (ईशान कोण) में रखें । शयन कक्ष या रसोई में रात को झूठे बर्तन मत छोड़ें । हमेशा धो-मांज कर रखें ।*
*🔹घर में बरकत नहीं हो तो🔹*
*💵 घर में बरकत नहीं होती तो खडी हल्दी की सात गाँठे और खड़ा नमक कपडे में बांध लें और कटोरी में रख दें घर के किसी भी कोने में, बरकत होगी |*
*🔹कार्यों में सफलता-प्राप्ति हेतु🔹*
*🔸जो व्यक्ति बार-बार प्रयत्नों के बावजूद सफलता प्राप्त न कर पा रहा हो अथवा सफलता-प्राप्ति के प्रति पूर्णतया निराश हो चुका हो, उसे प्रत्येक सोमवार को पीपल वृक्ष के नीचे सायंकाल के समय एक दीपक जला के उस वृक्ष की ५ परिक्रमा करनी चाहिए । इस प्रयोग को कुछ ही दिनों तक सम्पन्न करनेवाले को उसके कार्यों में धीरे-धीरे सफलता प्राप्त होने लगती है ।*
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*वैशाख मास माहात्म्य: जानें वैशाख मास माहात्म्य अध्याय 11*
वैशाखमास-माहात्म्य अध्याय 11 इस अध्याय में:- धर्मवर्ण की कथा, कलि की अवस्था का वर्णन, धर्मवर्ण और पितरों का संवाद एवं वैशाख की अमावास्या की श्रेष्ठता #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स
https://www.radheradheje.com/vaishakh-month-mahatmya-vaishakh-month-mahatmya-chapter-11/
*वैशाख मास माहात्म्य: जानें वैशाख मास माहात्म्य अध्याय 10
वैशाखमास-माहात्म्य अध्याय 10 इस अध्याय में:- वैशाख मास के माहात्म्य-श्रवण से सर्प के उद्धार और एक वैशाख धर्म के पालन तथा रामनाम-जप से व्याध का वाल्मीकि होना #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय
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एक आदमी ने बहुत ही सुंदर लड़की से ब्याह किया। वो उसे बहुत प्यार करता था। अचानक उस लड़की को चर्मरोग हो गया कारण वश उसकी सुंदरता कुरूपता में परिवर्तित होने लगी। अचानक एक दिन सफर में दुर्घटना से उस व्यक्ति के आँखों की रौशनी चली गई।
दोनों पति-पत्नी की जिंदगी तकलीफों के बावजूद भी एक दूसरे के साथ प्रेम पूर्वक चल रही थी।
दिन ब दिन पत्नी अपनी सुंदरता खो रही थी पर पति के देख न पाने के कारण उनके प्यार में कोई कमी नही आ रही थी ।
दोनों का दाम्पत्य जीवन बड़े प्यार से चल रहा था।
रोग के बढ़ते रहने के कारण पत्नी की मृत्यु हो गई।
पति को बहुत दुःख हुआ और उसने उसकी यादों के साथ जुड़ा होने के कारण उस शहर को छोड़ देने का विचार किया।
उसके एक मित्र ने कहा अब तुम पत्नी के बिना सहारे अंजान जगह अकेले कैसे चल फिर पाओगे ?
उसने कहा मैं अँधा होने का नाटक कर रहा था,क्यों की अगर मेरी पत्नी को ये पता चल जाता की मैं देख सकता हूँ तो उसे अपने रोग से ज्यादा कुरूपता पर दुःख होता और में उसे इतना प्यार करता था,की किसी भी हालत में उसे दुखी नही देख सकता था।
वो एक बहुत ही अच्छी पत्नी थी और मैं उसे हमेशा खुश देखना चाहता था।
सीख ::
कभी कभी हमारे लिए भी अच्छा है कि हम कुछ मामलों में अंधे बने रहें, वही हमारी ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण होगा।
बहुत बार दांत जीभ को काट लेते हैं फिर भी मुंह में एक साथ रहते हैं, यही माफ़ कर देने का सबसे बड़ा उदाहरण है।
मानवीय रिश्ते बिना एक दूसरे के हमेशा अधूरे हैं ,इसलिए हमेशा जुड़े रहें।
हमारे जीवन में सब की अपनी अपनी अलग प्रधानता है, जैसे हम एक तेज धार दार ब्लेड से पेड़ नही काट सकते और एक मजबूत कुल्हाड़ी से बाल नही काट सकते।
जो जैसा है कमोबेश सदा जुड़े रहें। यही जीवन की सफलता का राज है।
🌹🙏 #☝आज का ज्ञान
*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞*
*⛅दिनांक - 15 अप्रैल 2026*
*⛅दिन - बुधवार*
*⛅विक्रम संवत् - 2083*
*⛅अयन - उत्तरायण*
*⛅ऋतु - वसंत*
*⛅मास - वैशाख*
*⛅पक्ष - कृष्ण*
*⛅तिथि - त्रयोदशी रात्रि 10:31 तक तत्पश्चात् चतुर्दशी*
*⛅नक्षत्र - पूर्व भाद्रपद दोपहर 03:22 तक तत्पश्चात् उत्तर भाद्रपद*
*⛅योग - ब्रह्म दोपहर 01:25 तक तत्पश्चात् इन्द्र*
*⛅राहुकाल - दोपहर 12:27 से दोपहर 02:02 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅सूर्योदय - 06:06*
*⛅सूर्यास्त - 06:48 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅दिशा शूल - उत्तर दिशा में*
*⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:36 से प्रातः 05:21 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅अभिजीत मुहूर्त - कोई नहीं*
*⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:04 से मध्यरात्रि 12:49 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*🌥️व्रत पर्व विवरण - मासिक शिवरात्रि, प्रदोष व्रत*
*🌥️विशेष - त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
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*🌱गर्मियों में विशेष उपयोगी-पुदीना🌱*
#🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #💮आज का पंचांग एवं मुहूर्त💫 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय
*🔹पुदीना गर्मियों में विशेष उपयोगी एक सुगंधित औषध है यह रुचिकर, पचने में हलका, तीक्ष्ण, ह्रदय-उत्तेजक, विकृत कफ को बाहर लानेवाला, गर्भाशय-संकोचक , चित्त को प्रसन्न करनेवाला हैं ।*
*🔹पुदीने के सेवन से भूख खुलकर लगती है और वायु का शमन होता हैं । यह पेट के विकारों में विशेष लाभकारी है । श्वास, मुत्राल्पता तथा त्वचा के रोगों में भी यह उपयुक्त है ।*
*🔹औषधि प्रयोग🔹*
*१] पेट के रोग : अपच, अजीर्ण, अरुचि, मंदाग्नि, अफरा, पेचिश, पेट में मरोड़, अतिसार, उलटियाँ, खट्टी डकारें आदि में पुदीने के रस में जीरे का चूर्ण व आधे नींबू का रस मिलाकर पीने से लाभ होता है ।*
*२] मासिक धर्म : पुदीने को उबालकर पीने से मासिक धर्म की पीड़ा तथा अल्प मासिक स्राव में लाभ होता है । अधिक मासिक स्त्राव में यह प्रयोग न करें ।*
*३] गर्मियों में : गर्मी के कारण व्याकुलता बढ़ने पर एक गिलास ठंडे पानी में पुदीने का रस तथा मिश्री मिलाकर पीने से शीतलता आती है ।*
*४] पाचक चटनी : ताजा पुदीना, काली मिर्च, अदरक, सेंधा नमक, काली द्राक्ष और जीरा – इन सबकी चटनी बनाकर उसमें नींबू का रस निचोड़ कर खाने ने रूचि उत्पन्न होती है, वायु दूर होकर पाचनशक्ति तेज होती है । पेट के अन्य रोगों में भी लाभकारी है ।*
*५] उलटी-दस्त, हैजा : पुदीने के रस में नींबू का रस, अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।*
*६] सिरदर्द : पुदीना पीसकर ललाट पर लेप करें तथा पुदीने का शरबत पिएं ।*
*७] ज्वर आदि : गर्मी में जुकाम, खाँसी व ज्वर होने पर पुदीना उबाल के पीने से लाभ होता है ।*
*८] नकसीर : नाक में पुदीने के रस की ३ बूँद डालने से रक्तस्त्राव बंद हो जाता है ।*
*९] मूत्र-अवरोध : पुदीने के पत्ते और मिश्री पीसकर १ गिलास ठंडे पानी में मिलाकर पिएं ।*
*१०] गर्मी की फुंसियाँ : समान मात्रा में सूखा पुदीना एंव मिश्री पीसकर रख लें । रोज प्रात: आधा गिलास पानी में ४ चम्मच मिलाकर पिएं ।*
*११] हिचकी : पुदीने या नींबू के रस-सेवन से राहत मिलती है ।*
*🔹विशेषः पुदीने का ताजा रस लेने की मात्रा है 5 से 20 ग्राम । पत्तों का चूर्ण लेने की मात्रा 3 से 6 ग्राम । काढ़ा लेने की मात्रा 20 से 40 ग्राम । अर्क लेने की मात्रा 20 से 40 ग्राम । बीज का तेल लेने की मात्रा आधी बूँद से 3 बूँद ।*
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#BudhPradoshVrat2026 बुध प्रदोष व्रत पूजा विधि, व्रत कथा और आरती
त्रयोदशी तिथि का आरंभ 15 अप्रैल को सुबह 12 बजकर 12 मिनट पर होगा। त्रयोदशी तिथि का समापन 15 अप्रैल को रात 10 बजकर 31 मिनट पर होगा। बुध प्रदोष पूजा मुहूर्त 15 अप्रैल 2026 को शाम 6 बजकर 56 मिनट से रात 9 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स
https://www.radheradheje.com/budh-pradosh-vrat/
क्या रावण अंगद का पैर उठा सकता था?
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राम की सेना में सुग्रीव के साथ वानर राज बालि और अप्सरा तारा का पुत्र अंगद भी था। राम और रावण युद्ध के पूर्व भगवान श्रीराम ने अंगद को अपना दूत बनाकर लंका भेजा था। लेकिन वहां पर रावण ने अंगद का अपमान किया। अंगद ने तब अपनी शक्ति का परिचय देकर रावण को उपदेश दिया और पुन: राम के शिविर में लौट आए।
अब सवाल यह उठता है कि अंगद में इतनी शक्ति कैसे आई की कोई भी असुर, राक्षस आदि उनका पैर हटाना तो दूर हिला भी नहीं पाए?
दरअसल, हनुमान, जामवंत और अंगद तीनों ही प्राण विद्या में पारंगत थे। इस प्राण विद्या के बल पर ही वे जो चाहे कर सकते थे। अंगद जब रावण की सभा में गए तो उन्होंने इसी प्राण विद्या के बल पर अपना शरीर बलिष्ठ और पैरों को इतना दृढ़ कर लिया था कि उसे हिलाना किसी के भी बस की बात नहीं थी। यह प्राणा विद्या का ही कमाल था।
श्रीराम द्वारा अंगद के पिता का वध करने बाद भी अंगद राम की सेना में कैसे?
अंगद के पिता बालि का प्रभु श्रीराम ने वध कर दिया था। जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान की मुख्यत: तीन बातें बताई थीं। पहली देश काल और परिस्थितियों को समझो। दूसरी किसके साथ कब, कहां और कैसा व्यवहार करें, इसका सही निर्णय लेना चाहिए और तीसरी पसंद-नापसंद, सुख-दु:ख को सहन करना चाहिए और क्षमाभाव के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए। बालि ने अपने पुत्र अंगद से ये बातें ध्यान रखते हुए कहा कि अब से तुम सुग्रीव के साथ रहो।
अंगद को ही क्यों भेजा दूत बनाकर?
जब श्रीराम जी लंका पहुंच गए तब उन्होंने रावण के पास अपना दूत भेजने का विचार किया। सभा में सभी ने प्रस्ताव किया कि हनुमानजी को ही दूत बनाकर भेजना चाहिए। लेकिन राम जी ने यह कहा कि अगर रावण के पास फिर से हनुमान जी को भेजा गया तो यह संदेश जाएगा कि राम की सेना में अकेले हनुमान ही महावीर हैं। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को दूत बनाकर भेजा जाना चहिए जो हनुमान की तरह पराक्रमी और बुद्धिमान हो। ऐसे में प्रभु श्री राम की नजर अंगद पर जा टिकी। अंगद ने भी प्रभु श्री राम के द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्व को बखूबी संभाला।
रावण की सभा में अंगद :
युद्ध करने के पूर्व प्रभु श्रीराम ने अंगद को रावण की सभा में अपना दूत बनाकर सुलह करने के लिए भेजा था। प्रभु श्रीराम ने अंगद से कहा कि हे अंगद! रावण के द्वार जाओ। कुछ सुलह हो जाए, उनके और हमारे विचारों में एकता आ जाए, जाओ तुम उनको शिक्षा दो।
जब अंगद रावण की सभा में पहुंचे तो वहां नाना प्रकार के वैज्ञानिक भी विराजमान थे, वण और उनके सभी पुत्र विराजमान थे। रावण ने कहा कि आओ! तुम्हारा आगमन कैसे हुआ? अंगद ने कहा कि प्रभु मैं इसलिए आया हूं कि राम और तुम्हारे दोनों के विचारों में एकता आ जाए। तुम्हारे यहां संस्कृति के प्रसार में अभाव आ गया है, अब मैं उस अभाव को शांत करने आया हूं। चरित्र की स्थापना करना राजा का कर्त्तव्य होता है, तुम्हारे राष्ट्र में चरित्र हीनता आ गई है, तुम्हारा राष्ट्र उत्तम प्रतीत नहीं हो रहा है इसलिए मैं आज यहां आया हूं। रावण ने कहा कि यह तो तुम्हारा विचार यथार्थ है परन्तु मेरे यहां क्या सूक्ष्मता है?
अब अंगद बोले तुम्हारे यहां चरित्र की सूक्ष्मता है। राजा के राष्ट्र में जब चरित्र नहीं होता तो संस्कृति का विनाश हो जाता है। संस्कृति का विनाश नहीं होना चाहिए, संस्कृति का उत्थान करना है। संस्कृति यही कहती है कि मानव के आचार व्यव्हार को सुन्दर बनाया जाए, महत्ता में लाया जाए, एक दूसरे की पुत्री की रक्षा होनी चाहिए। वह राजा के राष्ट्र की पद्धति कहलाती है।
रावण ने पूछा क्या मेरे राष्ट्र में विज्ञान नहीं? अंगद बोले कि हे रावण! तुम्हारे राष्ट्र में विज्ञान है परन्तु विज्ञान का क्या बनता है? एक मंगल की यात्रा कर रहा है परन्तु मंगल की यात्रा का क्या बनेगा, जब तुम्हारे राष्ट्र में अग्निकांड हो रहे हैं। हे रावण! तुम सूर्य मंडल की यात्रा कर रहे हो, उस सूर्य की यात्रा करने से क्या बनेगा, जब तुम्हारे राष्ट्र में एक कन्या का जीवन सुरक्षित नहीं। तुम्हारे राष्ट्र का क्या बनेगा?
रावण ने कहा कि यह तुम क्या उच्चारण कर रहे हो, तुम अपने पिता की परंपरा शांत कर गए हो। अंगद ने कहा कदापि नहीं, में इसलिए आया हूं कि तुम्हारे राष्ट्र और अयोध्या दोनों का समन्वय हो जाए। इस पर रावण मौन हो गया। नरायान्तक बोले कि भगवन! इसको विचारा जाए, यह दूत है, यह क्या कहता है? अंगद बोले दिया भगवन! राम से तुम अपने विचारों का समन्वय कर लोगे तो राम माता सीता को लेकर चले जाएंगे।
रावण ने कहा कि यह क्या उच्चारण कर रहा है? मैं धृष्ट नहीं हूं। अंगद बोले यही धृष्टता है संसार में, किसी दूसरे की कन्या को हरण करके लाना एक महान धृष्टता है। तुम्हारी यह धृष्टता है कि राजा होकर भी परस्त्रीगामी बन गए हो। जो राजा किसी स्त्री का अपमान करता है उस राजा के राष्ट्र में अग्निकाण्ड हो जाते हैं।
तब अंगद ने अपना पैर जमा दिया
रावण ने कहा कि यह कटु उच्चारण कर रहा है। अंगद ने कहा कि मैं तुम्हें प्राण की एक क्रिया निश्चित कर रहा हूं, यदि चरित्र की उज्ज्वलता है तो मेरा यह पग है इस पग को यदि कोई एक क्षण भी अपने स्थान से दूर कर देगा तो मैं उस समय में माता सीता को त्याग करके राम को अयोध्या ले जाऊंगा। अंगद ने प्राण की क्रिया की और उनका शरीर विशाल एवं बलिष्ठ बन गया। तब उन्होंने भूमि पर अपना पैर स्थिर कर दिया।
राजसभा में कोई ऐसा बलिष्ठ नहीं था जो उसके पग को एक क्षण भर भी अपनी स्थिति से दूर कर सके। अंगद का पग जब एक क्षण भर दूर नहीं हुआ तो रावण उस समय स्वतः चला परन्तु रावण के आते ही उन्होंने कहा कि यह अधिराज है, अधिराजों से पग उठवाना सुन्दर नहीं है। उन्होंने अपने पग को अपनी स्थली में नियुक्त कर दिया और कहा कि हे रावण! तुम्हें मेरे चरणों को स्पर्श करना निरर्थक है। यदि तुम राम के चरणों को स्पर्श करो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है। रावण मौन होकर अपने स्थल पर विराजमान हो गया।
सरल भाषा में अंत में रावण जब खुद अंगद के पांव उठाने आया तो अंगद ने कहा कि मेरे पांव क्यों पकड़ते हो पकड़ना है तो मेरे स्वामी राम के चरण पकड़ लो वह दयालु और शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरण में जाओ तो प्राण बच जाएंगे अन्यथा युद्घ में बंधु-बांधवों समेत मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। यह सुनकर रावण ने अपनी इज्जत बचाने में ही अपनी भलाई समझी।
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #☝आज का ज्ञान
क्यो नहीं लाए थे हनुमान लंका से सीता को
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हनुमान ने एक ही छलांग में समुद्र को पार कर लिया था। जब अहिरावण पाताल लोक में राम-लक्ष्मण का अपहरण करके ले गया था, तब हनुमानजी ने पाताल लोक जाकर अहिरावण का वध कर राम और लक्ष्मण को मुक्त कराया था।
पाताल लोक से पुन: लंका आने के लिए उन्होंने राम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठा लिया था और आकाश में उड़ते हुए सैकड़ों किलोमीटर का सफर चंद मिनटों में तय कर लिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब वे लंका में राम का संदेश लेकर सीता माता के पास गए थे तो वे सीता को कंधे पर बैठाकर लंका से वापस नहीं ला सकते थे? जबकि उन्होंने इस दौरान वहां रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मारा, मेघनाद से युद्ध किया, रावण का घमंड तोड़ा और लंकादहन कर रावण को खुली चुनौती देकर वापस भारत आ गए थे तो क्यों नहीं सीता माता को लेकर आए।
सीताजी को अशोक वाटिका में दुखी और प्रताड़ित बैठे देखकर हनुमानजी के मन में दु:ख उत्पन्न हुआ। उन्होंने सीता माता के समक्ष लघु रूप में उपस्थित होकर नमन किया और श्रीराम की अंगूठी रखी और कहा- 'हे माता जानकी, मैं श्रीरामजी का दूत हूं। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूं, यह अंगूठी मैं ही लाया हूं। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (निशानी या पहचान) दी है।'
हनुमानजी के प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह अंगूठी नकली नहीं है और यह नन्हा-सा वानर कोई राक्षसरूप नहीं है। उन्होंने जान लिया कि यह वानर मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है, लेकिन न मालूम कि यह यहां कैसे आ गया? इसे तनिक भी डर नहीं है राक्षसों का क्या?
हनुमान ने कहा- 'हे माता, मेरे लिए राक्षस और दानवों का कोई मूल्य नहीं। मैं चाहूं तो आपको अभी तत्क्षण राम के समक्ष ले चलूं लेकिन मुझे इसकी आज्ञा नहीं है।'
'हे माता! मैं आपको अभी यहां से लिवा ले जाऊं, पर श्रीरामचन्द्रजी की शपथ है। मुझे प्रभु (राम) की आज्ञा नहीं है। अतः हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहां आएंगे।
हनुमानजी ने कहा- श्रीरामचन्द्रजी यहां आएंगे और राक्षसों को मारकर आपको ले जाएंगे। नारद आदि (ऋषि-मुनि) तीनों लोकों में उनका यश गाएंगे। तब सीताजी ने कहा- 'हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान नन्हे-नन्हे-से होंगे। राक्षस तो बड़े बलवान, शक्तिशाली, मायावी और योद्धा हैं, तो यह कैसे होगा संभव?'
सीताजी ने कहा- 'हे वानर पुत्र, मेरे हृदय में बड़ा भारी संदेह होता है कि तुम जैसे बंदर कैसे समुद्र पार करेंगे और कैसे राक्षसों को हरा पाएंगे?'
यह सुनकर हनुमानजी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का अत्यंत विशाल शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान और वीर था।
तब विराट रूप को देखकर सीताजी के मन में विश्वास हुआ। हनुमानजी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया और सीता माता ने अजर अमर होने का वरदान ओर फल खाने की आज्ञा दी।
*अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
भावार्थ:-हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए॥
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 #☝आज का ज्ञान #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स
*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞*
*⛅दिनांक - 14 अप्रैल 2026*
*⛅दिन - मंगलवार*
*⛅विक्रम संवत् - 2083*
*⛅अयन - उत्तरायण*
*⛅ऋतु - वसंत*
*⛅मास - वैशाख*
*⛅पक्ष - कृष्ण*
*⛅तिथि - द्वादशी मध्यरात्रि 12:12 तक तत्पश्चात् त्रयोदशी*
*⛅नक्षत्र - शतभिषा शाम 04:06 तक तत्पश्चात् पूर्व भाद्रपद*
*⛅योग - शुक्ल दोपहर 03:40 तक तत्पश्चात् ब्रह्म*
*⛅राहुकाल - दोपहर 03:37 से शाम 05:11 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅सूर्योदय - 06:07*
*⛅सूर्यास्त - 06:47 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅दिशा शूल - उत्तर दिशा में*
*⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:37 से प्रातः 05:22 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12:02 से दोपहर 12:53 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:04 से मध्यरात्रि 12:50 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
*🌥️व्रत पर्व विवरण - मेष संक्रांति (पुण्यकाल : सूर्योदय से दोपहर 01:52 तक), त्रिपुष्कर योग (शाम 04:06 से मध्यरात्रि 12:12 तक), वैशाखी, डॉ आंबेडकर जयंती,*
*🌥️विशेष - द्वादशी को पूतिका(पोई) खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
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*🔹स्वास्थ्य प्रदायक स्नान विधि 🔹*
*🔸 स्नान सूर्योदय से पहले ही करना चाहिए ।*
#🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #✡️ज्योतिष समाधान 🌟
*🔸 मालिश के आधे घंटे बाद शरीर को रगड़-रगड़ कर स्नान करें ।*
*🔸 स्नान करते समय स्तोत्रपाठ, कीर्तन या भगवन्नाम का जप करना चाहिए ।*
*🔸 स्नान करते समय पहले सिर पर पानी डालें फिर पूरे शरीर पर, ताकि सिर आदि शरीर के ऊपरी भागों की गर्मी पैरों से निकल जाय ।*
*🔸 'गले से नीचे के शारीरिक भाग पर गर्म (गुनगुने) पानी से स्नान करने से शक्ति बढ़ती है, किंतु सिर पर गर्म पानी डालकर स्नान करने से बालों तथा नेत्रशक्ति को हानि पहुँचती है ।' (बृहद वाग्भट, सूत्रस्थानः अ.3)*
*🔸 स्नान करते समय मुँह में पानी भरकर आँखों को पानी से भरे पात्र में डुबायें एवं उसी में थोड़ी देर पलके झपकायें या पटपटायें अथवा आँखों पर पानी के छींटे मारें। इससे नेत्रज्योति बढ़ती है ।*
*🔸 निर्वस्त्र होकर स्नान करना निर्लज्जता का द्योतक है तथा इससे जल देवता का निरादर भी होता है ।*
*🔸 किसी नदी, सरोवर, सागर, कुएँ, बावड़ी आदि में स्नान करते समय जल में ही मल-मूत्र का विसर्जन नही करना चाहिए ।*
*🔸 प्रतिदिन स्नान करने से पूर्व दोनों पैरों के अँगूठों में सरसों का शुद्ध तेल लगाने से वृद्धावस्था तक नेत्रों की ज्योति कमजोर नहीं होती ।*
*🔹स्नान के प्रकार - मन:शुद्धि के लिए🔹*
*🔸 ब्रह्म स्नान : ब्राह्ममुहूर्त में ब्रह्म-परमात्मा का चिंतन करते हुए ।*
*🔸 देव स्नान : सूर्योदय के पूर्व देवनदियों में अथवा उनका स्मरण करते हुए ।*
*🔹समयानुसार स्नान🔹*
*🔸 ऋषि स्नान : आकाश में तारे दिखते हों तब ब्राह्ममुहूर्त में ।*
*🔸 मानव स्नान :सूर्योदय के पूर्व ।*
*🔸 दानव स्नान : सूर्योदय के बाद चाय-नाश्ता लेकर 8-9 बजे ।*
*🔸 करने योग्य स्नान : ब्रह्म स्नान एवं देव स्नान युक्त ऋषि स्नान ।*
*🔸 रात्रि में या संध्या के समय स्नान न करें । ग्रहण के समय रात्रि में भी स्नान कर सकते हैं । स्नान के पश्चात तेल आदि की मालिश न करें । भीगे कपड़े न पहनें । (महाभारत, अनुशासन पर्व)*
*🔸 दौड़कर आने पर, पसीना निकलने पर तथा भोजन के तुरंत पहले तथा बाद में स्नान नहीं करना चाहिए । भोजन के तीन घंटे बाद स्नान कर सकते हैं ।*
*🔸 बुखार में एवं अतिसार (बार-बार दस्त लगने की बीमारी) में स्नान नहीं करना चाहिए ।*
*🔸 दूसरे के वस्त्र, तौलिये, साबुन और कंघी का उपयोग नहीं करना चाहिए ।*
*🔸 त्वचा की स्वच्छता के लिए साबुन की जगह उबटन का प्रयोग करें ।*
*🔸 स्नान करते समय कान में पानी न घुसे इसका ध्यान रखना चाहिए ।*
*🔸 स्नान के बाद मोटे तौलिये से पूरे शरीर को खूब रगड़-रगड़ कर पोंछना चाहिए तथा साफ, सूती, धुले हुए वस्त्र पहनने चाहिए । टेरीकॉट, पॉलिएस्टर आदि सिंथेटिक वस्त्र स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं हैं ।*
*🔸 जिस कपड़े को पहन कर शौच जायें या हजामत बनवायें, उसे अवश्य धो डालें और स्नान कर लें ।*













