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#gyan ganga #santrampal mahraj ji #सत_भक्ति_संदेश ज्यों बच्छा गऊ की नजर में, यूं सांई कूं संत। भक्तों के पीछे फिरे, भक्त वच्छल भगवन्त।। परमात्मा अपने भक्त के ऊपर दृष्टि रखता है। जैसे गाय का बच्चा खेलता-कूदता किसी ओर दौड़ जाता है तो गाय भी उसके पीछे-पीछे उसकी सुरक्षा के लिए दौड़ती है। #GodMorningSaturday
gyan ganga - जी की मृत्यु ईसा असहॅनीय पीड़ासे हुई। मृत्यु से पहले हजरत ईसा जी ने ऊंचे स्वर में कहा - हे मेरे प्रभु ! आपने रक्यों त्याग दिया? मुझे (पवित्र बाईबल मती २७ तथा २८/२० पृष्ट ४५ से ४८)| इससे स्पष्ट है कि यह ब्रह्म ( काल / ज्योति निरंजन ) अपने अवतार को भी समय पर धोखा दे जाता है। अवश्य पढ़ें ` ज्ञान गंगा' ద్డే निःशुल्क पायें पवित्र पुस्तक  अपना नॉम , पूरा पता भेजें ज्ञान गगा +91 7496801825 SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI SUPREMEGOD.ORG @SAINTRAMPALJIM MAHARAJ SAINT RAMPAL Jl जी की मृत्यु ईसा असहॅनीय पीड़ासे हुई। मृत्यु से पहले हजरत ईसा जी ने ऊंचे स्वर में कहा - हे मेरे प्रभु ! आपने रक्यों त्याग दिया? मुझे (पवित्र बाईबल मती २७ तथा २८/२० पृष्ट ४५ से ४८)| इससे स्पष्ट है कि यह ब्रह्म ( काल / ज्योति निरंजन ) अपने अवतार को भी समय पर धोखा दे जाता है। अवश्य पढ़ें ` ज्ञान गंगा' ద్డే निःशुल्क पायें पवित्र पुस्तक  अपना नॉम , पूरा पता भेजें ज्ञान गगा +91 7496801825 SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI SUPREMEGOD.ORG @SAINTRAMPALJIM MAHARAJ SAINT RAMPAL Jl - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningSaturday गुरु की शरण में गुरु बनाकर भक्ति करने से मोक्ष मिलता है गुरु जी की कृपा से यम काल के बंधन कट जाते हैं और अविनाशी परमात्मा सत साहेब मिल जाता है रोजाना अवश्य देखें शाम 7:30 बजे है संत रामपाल जी महाराज द्वारा सत्संग।
gyan ganga - बंदीछोड़ सतगुरू रामपाल जी महाराज  Bசி d ज्यों बच्छा गऊ की नजर में, यूं सांई कूं संत। भक्तों के पीछे फिरे, भक्त वच्छल भगवन्ता[ परमात्मा अपने भक्त के ऊपर दृष्टि रखता है। ফলনা-কমনা কিযী 31়২ जैसे गाय का बच्चा दौड़ जाता है तो गाय भी उसके पीछे-पीछे उसकी दौड़ती है। लिए  सुरक्षा के प्रकार परमात्मा जो भक्तों इसी हितकारी है, अपने भक्तों के का पीछे-पीछे फिरता है। उनकी सुरक्षा e ಹ साथ रहता है। fe SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI @SAINTRAMPALIM SUPREMEGOD ORG SAINT RAMPAL Jl MAHARA] बंदीछोड़ सतगुरू रामपाल जी महाराज  Bசி d ज्यों बच्छा गऊ की नजर में, यूं सांई कूं संत। भक्तों के पीछे फिरे, भक्त वच्छल भगवन्ता[ परमात्मा अपने भक्त के ऊपर दृष्टि रखता है। ফলনা-কমনা কিযী 31়২ जैसे गाय का बच्चा दौड़ जाता है तो गाय भी उसके पीछे-पीछे उसकी दौड़ती है। लिए  सुरक्षा के प्रकार परमात्मा जो भक्तों इसी हितकारी है, अपने भक्तों के का पीछे-पीछे फिरता है। उनकी सुरक्षा e ಹ साथ रहता है। fe SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI @SAINTRAMPALIM SUPREMEGOD ORG SAINT RAMPAL Jl MAHARA] - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningSaturday मनुष्य जीवन का उद्देश्य परमात्मा को प्राप्त करना है और यदि पारमात्मा प्राप्ति नहीं की तो मनुष्य जीवन व्यर्थ ही जानो। आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे।
gyan ganga - सशवलक शभली गुरू की शरण गुरु बनाकर भक्ति करने से मोक्ष मिलता है। गुरु जी की कृपा से यम द्वारा लगाई गई कर्मों का बन्धन रूपी गले की फाँस कट जाती है , अविलम्ब अविनाशी परमात्मा (सत्य साहेब ) मिल जाता है । जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज JagatGuruRampalJi org] SatlokShamliUp Sowsuuu M सशवलक शभली गुरू की शरण गुरु बनाकर भक्ति करने से मोक्ष मिलता है। गुरु जी की कृपा से यम द्वारा लगाई गई कर्मों का बन्धन रूपी गले की फाँस कट जाती है , अविलम्ब अविनाशी परमात्मा (सत्य साहेब ) मिल जाता है । जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज JagatGuruRampalJi org] SatlokShamliUp Sowsuuu M - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #RealKnowledgeOf_Bible जीसस के शरीर में आत्माएँ प्रवेश करके भविष्यवाणियां करती थी। जब जीसस को क्रॉस/सूली पर चढ़ाया गया तब सभी आत्माओं ने यीशु के शरीर को छोड़ दिया। बाईबल 2 कोरिंथियन 2:12-17 पृष्ठ 259-260 में प्रमाण है Sant RampalJi YtChannel
gyan ganga - यीशु ' परमेश्वर हैं? क्या ईसाई त्रिदेवों में, जो पिता , पुत्र व पवित्र आत्मा के बारे में बताते हें कि यीशु परमेश्वर का पुत्र था। मार्क १:११- और आकाश से एक आवाज् आयीः "्तुम मेरे प्यारे पुत्र हो, मैं बहुत प्रसन्न हूँ। ' तुमसे यीशु 1 {థ' परमेश्वर का पुत्र था। हुआ कि अधिक जानकारी के लिए डाउनलोड करें हमारी APP Sant Rampal Ji Maharaj Oficidl GETITON Sant Rampal Ji Maharaj Play Google Satlok Ashram Education 42 MB 50 SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI SUPREMEGOD ORG @SAINTRAMPALJIM SAINT RAMPAL Ji MAHARAJ यीशु ' परमेश्वर हैं? क्या ईसाई त्रिदेवों में, जो पिता , पुत्र व पवित्र आत्मा के बारे में बताते हें कि यीशु परमेश्वर का पुत्र था। मार्क १:११- और आकाश से एक आवाज् आयीः "्तुम मेरे प्यारे पुत्र हो, मैं बहुत प्रसन्न हूँ। ' तुमसे यीशु 1 {థ' परमेश्वर का पुत्र था। हुआ कि अधिक जानकारी के लिए डाउनलोड करें हमारी APP Sant Rampal Ji Maharaj Oficidl GETITON Sant Rampal Ji Maharaj Play Google Satlok Ashram Education 42 MB 50 SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI SUPREMEGOD ORG @SAINTRAMPALJIM SAINT RAMPAL Ji MAHARAJ - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . विष्णु अपने पिता ब्रह्म भगवान की प्राप्ति के लिए प्रस्थान तब विष्णु अपने पिता जी ब्रह्म भगवान का पता करते- करते पाताल लोक में चले गए, जहाँ शेषनाग था। उसने विष्णु को अपनी सीमा में प्रविष्ट होते देख कर क्रोधित हो कर जहर भरा फुंकारा मारा। उसके विष के प्रभाव से विष्णु जी का रंग सांवला हो गया, जैसे स्प्रे पेंट हो जाता है। तब विष्णु ने चाहा कि इस नाग को मजा चखाना चाहिए। तब ज्योति निरंजन ने देखा कि अब विष्णु को शांत करना चाहिए। तब आकाशवाणी हुई कि विष्णु अब तू अपनी माता जी के पास जा और सत्य-सत्य सारा विवरण बता देना तथा जो कष्ट आपको शेषनाग से हुआ है, इसका प्रतिशोध द्वापर युग में लेना। द्वापर युग में आप (विष्णु) तो कृष्ण अवतार धारण करोगे और कालीदह में कालिन्द्री नामक नाग, शेष नाग का अवतार होगा। ऊँच होई के नीच सतावै, ताकर ओएल मोही सों पावै। जो जीव देई पीर पुनी काँहु, हम पुनि ओएल दिवावें ताहूँ।तब विष्णु जी माता जी के पास आए तथा सत्य-सत्य कह दिया कि मुझे पिता के दर्शन नहीं हुए। इस बात से माता बहुत प्रसन्न हुई और कहा कि पुत्र तू सत्यवादी है। अब मैं अपनी शक्ति से आपको तेरे पिता से मिलाती हूँ तथा तेरे मन का संशय खत्म करती हूँ। कबीर देख पुत्र तोहि पिता भीटाऊँ, तौरे मन का धोखा मिटाऊँ। मन स्वरूप कर्ता कह जानों, मन ते दूजा और न मानो। स्वर्ग पाताल दौर मन केरा, मन अस्थीर मन अहै अनेरा। निंरकार मन ही को कहिए, मन की आस निश दिन रहिए। देख हूँ पलटि सुन्य मह ज्योति, जहाँ पर झिलमिल झालर होती।। इस प्रकार माता ने विष्णु से कहा कि मन ही जग का कर्ता है, यही ज्योति निरंजन है। ध्यान में जो एक हजार ज्योतियाँ नजर आती हैं वही उसका रूप है। जो शंख, घण्टा आदि का बाजा सुना, यह महास्वर्ग में निरंजन का ही बज रहा है। तब माता ने कहा कि हे पुत्र तुम सब देवों के सरताज हो और तेरी हर कामना व कार्य मैं पूर्ण करूंगी। तेरी पूजा सर्व जग में होगी। आपने मुझे सच- सच बताया है। काल के इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों के प्राणियों की विशेष आदत है कि अपनी व्यर्थ महिमा बनाता है। जैसे दुर्गा जी श्री विष्णु जी को कह रही है कि तेरी पूजा जग में होगी। मैंने तुझे तेरे पिता के दर्शन करा दिए। दुर्गा ने केवल प्रकाश दिखा कर श्री विष्णु जी को बहका दिया। श्री विष्णु जी भी प्रभु की यही स्थिति अपने अनुयाइयों को समझाने लगे कि परमात्मा का केवल प्रकाश दिखाई देता है। परमात्मा निराकार है। इसके बाद आदि भवानी रूद्र(महेश जी) के पास गई तथा कहा कि महेश तू भी कर ले अपने पिता की खोज तेरे दोनों भाइयों को तो तुम्हारे पिता के दर्शन नहीं हुए उनको जो देना था वह प्रदान कर दिया है अब आप माँगो जो माँगना है। तब महेश ने कहा कि हे जननी ! मेरे दोनों बड़े भाईयों को पिता के दर्शन नहीं हुए फिर प्रयत्न करना व्यर्थ है। कृपा मुझे ऐसा वर दो कि मैं अमर (मृत्युंजय) हो जाऊँ। तब माता ने कहा कि यह मैं नहीं कर सकती। हाँ युक्ति बता सकती हूँ, जिससे तेरी आयु सबसे लम्बी बनी रहेगी। विधि योग समाधि है (इसलिए महादेव जी ज्यादातर समाधि में ही रहते हैं)। इस प्रकार माता ने तीनों पुत्रों को विभाग बांट दिए। भगवान ब्रह्मा जी को काल लोक में लख चैरासी के चोले (शरीर) रचने (बनाने) का अर्थात् रजोगुण प्रभावित करके संतान उत्पत्ति के लिए विवश करके जीव उत्पत्ति कराने का विभाग प्रदान किया। भगवान विष्णु जी को इन जीवों के पालन पोषण (कर्मानुसार) करने, तथा मोह-ममता उत्पन्न करके स्थिति बनाए रखने का विभाग दिया। भगवान शिव शंकर (महादेव) को संहार करने का विभाग प्रदान किया। क्योंकि इनके पिता निरंजन को एक लाख मानव शरीर धारी जीव प्रतिदिन खाने पड़ते हैं। यहां पर मन में एक प्रश्न उत्पन्न होगा कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर जी से उत्पत्ति, स्थिति और संहार कैसे होता है। ये तोनों अपने-2 लोक में रहते हैं। जैसे आजकल संचार प्रणाली को चलाने के लिए उपग्रहों को ऊपर आसमान में छोड़ा जाता है और वे नीचे पृथ्वी पर संचार प्रणाली को चलाते हैं। ठीक इसी प्रकार ये तीनों देव जहां भी रहते हैं इनके शरीर से निकलने वाले सूक्ष्म गुण की तरंगें तीनों लोकों में अपने आप हर प्राणी पर प्रभाव बनाए रहती है। परन्तु क्षर पुरूष (काल) स्वयं व्यक्त अर्थात् वास्तविक शरीर रूप में सबके सामने नहीं आता। उसी को प्राप्त करने के लिए तीनों देवों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी,शिव जी) को वेदों में वर्णित विधि अनुसार भरसक साधना करने पर भी ब्रह्म (काल) के दर्शन नहीं हुए। बाद में ऋषियों ने वेदों को पढ़ा। उसमें लिखा है कि ‘अग्नेः तनूर् असि‘ (पवित्र यजुर्वेद अ. 1 मंत्र 15) परमेश्वर सशरीर है तथा पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 1 में लिखा है कि ‘अग्नेः तनूर् असि विष्णवे त्वा सोमस्य तनूर् असि‘। इस मंत्र में दो बार वेद गवाही दे रहा है कि सर्वव्यापक, सर्वपालन कर्ता सतपुरुष सशरीर है। पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 8 में कहा है कि (कविर् मनिषी) जिस परमेश्वर की सर्व प्राणियों को चाह है, वह कविर् अर्थात् कबीर है। उसका शरीर बिना नाड़ी (अस्नाविरम्) का है, (शुक्रम्) वीर्य से बनी पाँच तत्व से बनी भौतिक (अकायम्) काया रहित है। वह सर्व का मालिक सर्वोपरि सत्यलोक में विराजमान है, उस परमेश्वर का तेजपुंज का (स्वज्र्योति) स्वयं प्रकाशित शरीर है जो शब्द रूप अर्थात् अविनाशी है। वही कविर्देव (कबीर परमेश्वर) है जो सर्व ब्रह्मण्डों की रचना करने वाला (व्यदधाता) सर्व ब्रह्मण्डों का रचनहार (स्वयम्भूः) स्वयं प्रकट होने वाला (यथा तथ्य अर्थान्) वास्तव में (शाश्वत्) अविनाशी है (गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी प्रमाण है।) भावार्थ है कि पूर्ण ब्रह्म का शरीर का नाम कबीर (कविर देव) है। उस परमेश्वर का शरीर नूर तत्व से बना है। परमात्मा का शरीर अति सूक्ष्म है जो उस साधक को दिखाई देता है जिसकी दिव्य दृष्टि खुल चुकी है। इस प्रकार जीव का भी सुक्ष्म शरीर है जिसके ऊपर पाँच तत्व का खोल (कवर) अर्थात् पाँच तत्व की काया चढ़ी होती है जो माता-पिता के संयोग से (शुक्रम) वीर्य से बनी है। शरीर त्यागने के पश्चात् भी जीव का सुक्ष्म शरीर साथ रहता है। वह शरीर उसी साधक को दिखाई देता है जिसकी दिव्य दृष्टि खुल चुकी है। इस प्रकार परमात्मा व जीव की स्थिति को समझें। वेदों में ओ3म् नाम के स्मरण का प्रमाण है जो केवल ब्रह्म साधना है। इस उद्देश्य से ओ3म् नाम के जाप को पूर्ण ब्रह्म का मान कर ऋषियों ने भी हजारों वर्ष हठयोग (समाधि लगा कर) करके प्रभु प्राप्ति की चेष्टा की, परन्तु प्रभु दर्शन नहीं हुए, सिद्धियाँ प्राप्त हो गई। उन्हीं सिद्धी रूपी खिलौनों से खेल कर ऋषि भी जन्म-मृत्यु के चक्र में ही रह गए तथा अपने अनुभव के शास्त्रों में परमात्मा को निराकार लिख दिया। ब्रह्म (काल) ने कसम खाई है कि मैं अपने वास्तविक रूप में किसी को दर्शन नहीं दूँगा। मुझे अव्यक्त जाना करेंगे (अव्यक्त का भावार्थ है कि कोई आकार में है परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्थूल रूप में दर्शन नहीं देता। जैसे आकाश में बादल छा जाने पर दिन के समय सूर्य अदृश हो जाता है। वह दृश्यमान नहीं है, परन्तु वास्तव में बादलों के पार ज्यों का त्यों है, इस अवस्था को अव्यक्त कहते हैं।)। (प्रमाण के लिए गीता अध्याय 7 श्लोक 24-25, अध्याय 11 श्लोक 48 तथा 32) पवित्र गीता जी बोलने वाला ब्रह्म (काल) श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके कह रहा है कि अर्जुन मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सर्व को खाने के लिए आया हूँ। यह मेरा वास्तविक रूप है, इसको तेरे अतिरिक्त न तो कोई पहले देख सका तथा न कोई आगे देख सकता है अर्थात् वेदों में वर्णित यज्ञ-जप-तप तथा ओ3म् नाम आदि की विधि से मेरे इस वास्तविक स्वरूप के दर्शन नहीं हो सकते। गीता अध्याय 11 श्लोक नं 48 मैं कृष्ण नहीं हूँ, ये मूर्ख लोग कृष्ण रूप में मुझ अव्यक्त को व्यक्त (मनुष्य रूप) मान रहे हैं। क्योंकि ये मेरे घटिया नियम से अपरिचित हैं कि मैं कभी वास्तविक इस काल रूप में सबके सामने नहीं आता। अपनी योग माया से छुपा रहता हूँ (गीता अध्याय 7 श्लोक नं. 24.25) विचार करें:- अपने छुपे रहने वाले विधान को स्वयं अश्रेष्ठ (अनुत्तम) क्यों कह रहे हैं? यदि पिता अपनी सन्तान को भी दर्शन नहीं देता तो उसमें कोई त्रुटि है जिस कारण से छुपा है तथा सुविधाएं भी प्रदान कर रहा है। काल (ब्रह्म) को शापवश एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों का आहार करना पड़ता है तथा 25 प्रतिशत प्रतिदिन जो ज्यादा उत्पन्न होते हैं उन्हें ठिकाने लगाने के लिए तथा कर्म भोग का दण्ड देने के लिए चैरासी लाख योनियों की रचना की हुई है। यदि सबके सामने बैठ कर किसी की पुत्री, किसी की पत्नी, किसी के पुत्र, माता-पिता को खाए तो सर्व को ब्रह्म से घृणा हो जाए तथा जब भी कभी पूर्ण परमात्मा कविरग्नि (कबीर परमेश्वर) स्वयं आए या अपना कोई संदेशवाहक (दूत) भेंजे तो सर्व प्राणी सत्यभक्ति करके काल के जाल से निकल जाएं। इसलिए धोखा देकर रखता है तथा पवित्र गीता अध्याय 7 श्लोक 18,24,25 में अपनी साधना से होने वाली मुक्ति (गति) को भी (अनुत्तमाम्) अति अश्रेष्ठ कहा है तथा अपने विधान (नियम)को भी (अनुत्तम) अश्रेष्ठ कहा है। प्रत्येक ब्रह्मण्ड में बने ब्रह्मलोक में एक महास्वर्ग बनाया है। महास्वर्ग में एक स्थान पर नकली सतलोक - नकली अलख लोक - नकली अगम लोक तथा नकली अनामी लोक की रचना प्राणियों को धोखा देने के लिए प्रकृति (दुर्गा/आदि माया) द्वारा करवा रखी है। कबीर साहेब का एक शब्द है ‘कर नैनों दीदार महल में प्यारा है‘ में वाणी है कि ‘काया भेद किया निरवारा, यह सब रचना पिण्ड मंझारा है। माया अविगत जाल पसारा, सो कारीगर भारा है। आदि माया किन्ही चतुराई, झूठी बाजी पिण्ड दिखाई, अविगत रचना रचि अण्ड माहि वाका प्रतिबिम्ब डारा है।‘ एक ब्रह्मण्ड में अन्य लोकों की भी रचना है, जैसे श्री ब्रह्मा जी का लोक, श्री विष्णु जी का लोक, श्री शिव जी का लोक। जहाँ पर बैठकर तीनों प्रभु नीचे के तीन लोकों (स्वर्गलोक अर्थात् इन्द्र का लोक - पृथ्वी लोक तथा पाताल लोक) पर एक – एक विभाग के मालिक बन कर प्रभुता करते हैं तथा अपने पिता काल के खाने के लिए प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार का कार्यभार संभालते हैं। तीनों प्रभुओं की भी जन्म व मृत्यु होती है। तब काल इन्हें भी खाता है। इसी ब्रह्मण्ड {इसे अण्ड भी कहते हैं क्योंकि ब्रह्मण्ड की बनावट अण्डाकार है, इसे पिण्ड भी कहते हैं क्योंकि शरीर (पिण्ड) में एक ब्रह्मण्ड की रचना कमलों में टी.वी. की तरह देखी जाती है} में एक मानसरोवर तथा धर्मराय (न्यायधीश) का भी लोक है तथा एक गुप्त स्थान पर पूर्ण परमात्मा अन्य रूप धारण करके रहता है जैसे प्रत्येक देश का राजदूत भवन होता है। वहाँ पर कोई नहीं जा सकता। वहाँ पर वे आत्माऐं रहती हैं जिनकी सत्यलोक की भक्ति अधूरी रहती है। जब भक्ति युग आता है तो उस समय परमेश्वर कबीर जी अपना प्रतिनिधी पूर्ण संत सतगुरु भेजते हैं। इन पुण्यात्माओं को पृथ्वी पर उस समय मानव शरीर प्राप्त होता है तथा ये शीघ्र ही सत भक्ति पर लग जाते हैं तथा सतगुरु से दीक्षा प्राप्त करके पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर जाते हैं। उस स्थान पर रहने वाले हंस आत्माओं की निजी भक्ति कमाई खर्च नहीं होती। परमात्मा के भण्डार से सर्व सुविधाऐं उपलब्ध होती हैं। ब्रह्म (काल) के उपासकों की भक्ति कमाई स्वर्ग-महा स्वर्ग में समाप्त हो जाती है क्योंकि इस काल लोक (ब्रह्म लोक) तथा परब्रह्म लोक में प्राणियों को अपना किया कर्मफल ही मिलता है। क्षर पुरुष (ब्रह्म) ने अपने 20 ब्रह्मण्डों को चार महाब्रह्मण्डों में विभाजित किया है। एक महाब्रह्मण्ड में पाँच ब्रह्मण्डों का समूह बनाया है तथा चारों ओर से अण्डाकार गोलाई (परिधि) में रोका है तथा चारों महा ब्रह्मण्डों को भी फिर अण्डाकार गोलाई (परिधि) में रोका है। इक्कीसवें ब्रह्मण्ड की रचना एक महाब्रह्मण्ड जितना स्थान लेकर की है। इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में प्रवेश होते ही तीन रास्ते बनाए हैं। इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में भी बांई तरफ नकली सतलोक, नकली अलख लोक, नकली अगम लोक, नकली अनामी लोक की रचना प्राणियों को धोखे में रखने के लिए आदि माया से करवाई है तथा दांई तरफ बारह सर्व श्रेष्ठ ब्रह्म साधकों रखता है। फिर प्रत्येक युग में उन्हें अपने संदेश वाहक बनाकर पृथ्वी पर भेजता है, जो शास्त्र विधि रहित साधना व ज्ञान बताते हैं तथा स्वयं भी भक्तिहीन हो जाते हैं तथा अनुयाइयों को भी काल जाल में फंसा जाते हैं। फिर वे गुरु जी तथा अनुयाई दोनों ही नरक में जाते हैं। फिर सामने एक ताला लगा रखा है। वह रास्ता काल (ब्रह्म) के निज लोक में जाता है। जहाँ पर यह ब्रह्म (काल) अपने वास्तविक मानव सदृश काल रूप में रहता है। इसी स्थान पर एक पत्थर की टुकड़ी तवे के आकार की (चपाती पकाने की लोहे की गोल प्लेट सी होती है) स्वतः गर्म रहती है। जिस पर एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को भूनकर उनमें से गंदगी निकाल कर खाता है। उस समय सर्व प्राणी बहुत पीड़ा अनुभव करते हैं तथा हाहाकार मच जाती है। फिर कुछ समय उपरान्त वे बेहोश हो जाते हैं। जीव मरता नहीं। फिर धर्मराय के लोक में जाकर कर्माधार से अन्य जन्म प्राप्त करते हैं तथा जन्म-मृत्यु का चक्कर बना रहता है। उपरोक्त सामने लगा ताला ब्रह्म (काल) केवल अपने आहार वाले प्राणियों के लिए कुछ क्षण के लिए खोलता है। पूर्ण परमात्मा के सत्यनाम व सारनाम से यह ताला स्वयं खुल जाता है। ऐसे काल का जाल पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर साहेब) ने स्वयं ही अपने निजी भक्त धर्मदास जी को समझाया। Factful Debates YouTube
gyan ganga - विष्णु का अपने पिता ( काल ब्रह्म ) की भगवान ' प्राप्ति के लिए प्रस्थान व माता का आशीर्वाद पाना | विष्णु f 97 विष्णु ন কমা अपने पिता का पता लगा ले। तब # 3147 নু গী সকৃনি पिता जी काल (ब्रह्म) का पता करते करते पाताल लोक में चले गए जहाँ शेषनाग था। विष्णु को अपनी सीमा में प्रविष्ट होते देख कर क्रोधित हा कर जहर भरा फुंकारा उसने विष्णु जी का रंग सांवला हा गया॰ जैसे स्प्रे पेंट हा मारा। उसके विष क प्रभाव से विष्णु कि इस नाग को मजा चखाना चाहिए। जाता है। तब নামা विष्णु तब ज्योति निरंजन (काल) ने देखा कि अब को शांत करना चाहिए। तब विष्णु अब तू अपनी माता जी के पास जा और सत्य सत्य सारा आकाशवाणी हुई कि विवरण बता देना तथा जो कष्ट आपको शेषनाग से हुआ है इसका प्रतिशोध द्वापर युग में लेना। द्वापर युग में आप (विष्णु) तो कृष्ण अवतार धारण करोगे और कालीदह में कालिन्द्री का अवतार होगा | शेष नसक 'IM, f @ SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Jl @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGODORG SAINT RAMPAL Jl MAHARAJ विष्णु का अपने पिता ( काल ब्रह्म ) की भगवान ' प्राप्ति के लिए प्रस्थान व माता का आशीर्वाद पाना | विष्णु f 97 विष्णु ন কমা अपने पिता का पता लगा ले। तब # 3147 নু গী সকৃনি पिता जी काल (ब्रह्म) का पता करते करते पाताल लोक में चले गए जहाँ शेषनाग था। विष्णु को अपनी सीमा में प्रविष्ट होते देख कर क्रोधित हा कर जहर भरा फुंकारा उसने विष्णु जी का रंग सांवला हा गया॰ जैसे स्प्रे पेंट हा मारा। उसके विष क प्रभाव से विष्णु कि इस नाग को मजा चखाना चाहिए। जाता है। तब নামা विष्णु तब ज्योति निरंजन (काल) ने देखा कि अब को शांत करना चाहिए। तब विष्णु अब तू अपनी माता जी के पास जा और सत्य सत्य सारा आकाशवाणी हुई कि विवरण बता देना तथा जो कष्ट आपको शेषनाग से हुआ है इसका प्रतिशोध द्वापर युग में लेना। द्वापर युग में आप (विष्णु) तो कृष्ण अवतार धारण करोगे और कालीदह में कालिन्द्री का अवतार होगा | शेष नसक 'IM, f @ SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Jl @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGODORG SAINT RAMPAL Jl MAHARAJ - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . पूज्य कबीर परमेश्वर जी की अमृतवाणी में सृष्टी रचना निम्न अमृतवाणी सन् 1403 से कबीर परमेश्वर लीलामय शरीर में पाँच वर्ष के हुए} सन् 1518 जब कविर्देव के बीच में लगभग 600 वर्ष पूर्व परम पूज्य कबीर परमेश्वर जी द्वारा अपने निजी सेवक आदरणीय धर्मदास साहेब जी को सुनाई थी तथा धनी धर्मदास साहेब जी ने लिपिबद्ध की थी। परन्तु उस समय के पवित्र हिन्दुओं तथा पवित्र मुसलमानों के नादान गुरुओं ने कहा कि यह धाणक कबीर झूठा है। किसी भी सद् ग्रन्थ में श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी के माता-पिता का नाम नहीं है। ये तीनों प्रभु अविनाशी हैं इनका जन्म मृत्यु नहीं होता। न ही पवित्र वेदों व पवित्र कुरान शरीफ आदि में कबीर परमेश्वर का प्रमाण है तथा परमात्मा को निराकार लिखा है। हम प्रतिदिन पढ़ते हैं। भोली आत्माओं ने उन विचक्षणों पर विश्वास कर लिया कि सचमुच यह कबीर धाणक तो अशिक्षित है तथा गुरु जी शिक्षित हैं, सत्य कह रहे होंगे। आज वही सच्चाई प्रकाश में आ रही है तथा अपने सर्व पवित्र धर्मों के पवित्र सद्ग्रन्थ साक्षी हैं। इससे सिद्ध है कि पूर्ण परमेश्वर, सर्व सृष्टी रचनहार, कुल करतार तथा सर्वज्ञ कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ही है जो काशी (बनारस) में कमल के फूल पर प्रकट हुए तथा 120 वर्ष तक वास्तविक तेजोमय शरीर के ऊपर मानव सदृश शरीर हल्के तेज का बना कर रहे तथा अपने द्वारा रची सृष्टी का ठीक-ठीक (वास्तविक तत्व) ज्ञान देकर सशरीर सतलोक चले गए। कृपा प्रेमी पाठक पढ़ें निम्न अमृतवाणी परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा उच्चारित :- धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।। यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो राम नियारा।। यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भर्म नशाओ। अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रायदेवनकी उत्पति भाई।। कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।। भर्म गये जग वेद पुराना। आदि रामका का भेद न जाना।। राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने। ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।। माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।। पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।। माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।। कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।। पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।। टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।। सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि। माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई। अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।। धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा। धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। माया को रही तब आसा।। तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।। तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।। पुरुष गम्य कैसे को पावै। काल निरंजन जग भरमावै।। तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।। अलख निरंजन सुन्न ठिकाना। ब्रह्मा विष्णु शिव भेदन जाना तीन देव सो उनको धावें। निरंजन का वे पार ना पावें।। अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।। ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये। तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।। अकाल पुरुष काहू नहिं चीन्हां। काल पाय सबही गह लीन्हां। ब्रह्म काल सकल जग जाने। आदि ब्रह्मको ना पहिचाने।। तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।। तीनों गुणका यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।। गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार। कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरैं पार।। उपरोक्त अमृतवाणी में परमेश्वर कबीर साहेब जी अपने निजी सेवक श्री धर्मदास साहेब जी को कह रहे हैं कि धर्मदास यह सर्व संसार तत्वज्ञान के अभाव से विचलित है। किसी को पूर्ण मोक्ष मार्ग तथा पूर्ण सृष्टी रचना का ज्ञान नहीं है। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा रची सृष्टी की कथा सुनाता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति तो तुरंत समझ जायेंगे। परन्तु जो सर्व प्रमाणों को देखकर भी नहीं मानेंगे तो वे नादान प्राणी काल प्रभाव से प्रभावित हैं, वे भक्ति योग्य नहीं। अब मैं बताता हूँ तीनों भगवानों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी) की उत्पत्ति कैसे हुई? इनकी माता जी तो अष्टंगी (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति निरंजन (ब्रह्म, काल) है। पहले ब्रह्म की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की उत्पत्ति हुई। दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल (ब्रह्म) ने गलती (छेड़-छाड़) की, तब दुर्गा (प्रकृति) ने इसके पेट में शरण ली। मैं वहाँ गया जहाँ ज्योति निरंजन काल था। तब भवानी को ब्रह्म के उदर से निकाल कर इक्कीस ब्रह्मण्ड समेत 16 संख कोस की दूरी पर भेज दिया। ज्योति निरंजन (धर्मराय) ने प्रकृति देवी (दुर्गा) के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के संयोग से तीनों गुणों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) की उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक वास्तविक मंत्र नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष कैसे होगा? प्रिय पाठक विचार करें कि श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी तथ श्री शिव जी की स्थिति अविनाशी बताई गई थी। सर्व हिन्दु समाज अभी तक तीनों परमात्माओं को अजर, अमर व जन्म-मृत्यु रहित मानते रहे जबकि ये तीनों नाश्वान हैं। इन के पिता काल रूपी ब्रह्म तथा माता दुर्गा (प्रकृति/अष्टांगी) हैं जैसा आप ने पूर्व प्रमाणों में पढ़ा यह ज्ञान अपने शास्त्रों में भी विद्यमान है परन्तु हिन्दु समाज के कलयुगी गुरूओं, ऋषियों, सन्तों को ज्ञान नहीं। जो अध्यापक पाठ्यक्रम (सलेबस) से ही अपरिचित है वह अध्यापक ठीक नहीं (विद्वान नही) है, विद्यार्थियों के भविष्य का शत्रु है। इसी प्रकार जिन गुरूओं को अभी तक यह नहीं पता कि श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी के माता-पिता कौन हैं? तो वे गुरू, ऋषि,सन्त ज्ञान हीन हैं। जिस कारण से सर्व भक्त समाज को शास्त्र विरूद्ध ज्ञान (लोक वेद अर्थात् दन्त कथा) सुना कर अज्ञान से परिपूर्ण कर दिया। शास्त्राविधि विरूद्ध भक्तिसाधना करा के परमात्मा के वास्तविक लाभ (पूर्ण मोक्ष) से वंचित रखा सबका मानव जन्म नष्ट करा दिया क्योंकि श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23.24 में यही प्रमाण है कि जो शास्त्राविधि त्यागकर मनमाना आचरण पूजा करता है। उसे कोई लाभ नहीं होता पूर्ण परमात्मा कबीर जी ने सन् 1403 से ही सर्व शास्त्रों युक्त ज्ञान अपनी अमृतवाणी (कविरवाणी) में बताना प्रारम्भ किया था। परन्तु उन अज्ञानी गुरूओं ने यह ज्ञान भक्त समाज तक नहीं जाने दिया। जो वर्तमान में स्पष्ट हो रहा है इससे सिद्ध है कि कर्विदेव (कबीर प्रभु) तत्वदर्शी सन्त रूप में स्वयं पूर्ण परमात्मा ही आए थे। Factful Debates YouTube
gyan ganga - Xಣus ಹ[ಕಾೊಿಂಹ  ಕ? सभी पवित्र धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मांड के निर्माता यानी रचयिता सर्वोच्च और शक्तिशाली परमात्मा कबीर साहेब जी हैं। वह अविनाशी हैं, उनका मनुष्य जैसा रूप है और उनकी शक्तियां असीमित हैं। { SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Il @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGODORG SAINT RAMPAL Il MAHARAJ Xಣus ಹ[ಕಾೊಿಂಹ  ಕ? सभी पवित्र धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मांड के निर्माता यानी रचयिता सर्वोच्च और शक्तिशाली परमात्मा कबीर साहेब जी हैं। वह अविनाशी हैं, उनका मनुष्य जैसा रूप है और उनकी शक्तियां असीमित हैं। { SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Il @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGODORG SAINT RAMPAL Il MAHARAJ - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . तीनों गुणों के पुजारी की राक्षसी स्वभाव के! एक समय आज से लगभग 350 वर्ष पूर्व हरिद्वार में हर की पैड़ियों पर (शास्त्र विधि रहित साधना करने वालों के) कुम्भ पर्व की प्रभी का संयोग हुआ। वहाँ पर सर्व (त्रिगुण उपासक) महात्मा जन स्नानार्थ पहुँचे। गिरी, पुरी, नाथ, नागा आदि भगवान श्री शिव जी (तमोगुण) के उपासक तथा वैष्णों भगवान श्री विष्णु जी (सतोगुण) के उपासक हैं। गंगा नदी में प्रभी के समय प्रथम स्नान करने के हठ के कारण नागा तथा वैष्णों साधुओं में घोर युद्ध हो गया। लगभग 25000 (पच्चीस हजार) त्रिगुण उपासक मत्यु को प्राप्त हुए। जो व्यक्ति जरा-सी बात पर कत्ले आम कर देता है वह साधु है या राक्षस स्वयं विचार करें। आम व्यक्ति भी कहीं स्नान कर रहे हों और कोई व्यक्ति आ कर कहे कि मुझे भी कुछ स्थान स्नान के लिए देने की कप्या करें। शिष्टाचार के नाते कहते हैं कि आओ आप भी स्नान कर लो। इधर-उधर हो कर आने वाले को स्थान दे देते हैं। इसलिए पवित्र गीता जी अध्याय 7 श्लोक 15 में कहा है कि जिनका मेरी त्रिगुणमई माया (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) की पूजा के द्वारा ज्ञान हरा जा चुका है, वे केवल मान बड़ाई के भूखे राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच अर्थात् आम व्यक्ति से भी पतित स्वभाव वाले, दुष्कर्म करने वाले मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते। गीता अध्याय 7 श्लोक 16 से 18 तक पवित्र गीता जी के बोलने वाला ब्रह्म प्रभु कह रहा है कि मेरी भक्ति ब्रह्म साधना भी चार प्रकार के साधक करते हैं। एक तो अर्थार्थी धन लाभ चाहने वाले जो वेद मंत्रों से ही जंत्र- मंत्र, हवन आदि करते रहते हैं। दूसरे आर्त्त संकट निवार्ण के लिए वेदों के मंत्रों का जन्त्र-मंत्र हवन आदि करते रहते हैं तीसरे जिज्ञासु जो परमात्मा के ज्ञान को जानने की इच्छा रखने वाले केवल ज्ञान संग्रह करके वक्ता बन जाते हैं तथा दूसरों में ज्ञान श्रेष्ठता के आधार पर उत्तम बन कर ज्ञानवान बनकर अभिमानवश भक्ति हीन हो जाते हैं, चौथे ज्ञानी हैं ये वे साधक जिनको यह ज्ञान हो गया कि मानव शरीर बार-बार नहीं मिलता, प्रभु साधना नहीं बन पाई तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा। फिर वेदों को पढ़ा, जिनसे ज्ञान हुआ कि ब्रह्मा- विष्णु- शिवजी तीनों गुणों व ब्रह्म (क्षर पुरुष) तथा परब्रह्म (अक्षर पुरुष) से ऊपर पूर्ण ब्रह्म की ही भक्ति करनी चाहिए, अन्य देवताओं की नहीं। उन ज्ञानी उदार आत्माओं को मैं अच्छा लगता हूँ तथा मुझे वे इसलिए अच्छे लगते हैं कि वे तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिवजी) से ऊपर उठ कर मेरी (ब्रह्म) साधना तो करने लगे जो अन्य देवताओं से अच्छी है परन्तु वेदों में 'ओ३म्' नाम जो केवल ब्रह्म की साधना का मंत्र है उसी को आप ही विचार विमर्श करके पूर्ण ब्रह्म का मंत्र जान कर वर्षों तक साधना करते रहे। प्रभु प्राप्ति हुई नहीं। अन्य सिद्धियाँ प्राप्त हो गई। क्योंकि पवित्र गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 10 व 13 में वर्णित तत्वदर्शी संत नहीं मिला, जो पूर्ण ब्रह्म की साधना तीन मंत्र से बताता है, इसलिए ज्ञानी भी ब्रह्म काल साधना करके जन्म-मत्यु के चक्र में ही रह गए। इसलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में गीता ज्ञान दाता ने अपनी गति को भी अनुत्तम कहा है। एक ज्ञानी उदारात्मा महर्षि चुणक जी ने वेदों को पढ़ा तथा एक पूर्ण प्रभु की भक्ति का मंत्र ओ३म् जान कर इसी नाम के जाप से वर्षों तक साधना की। एक मानधाता चक्रवर्ती राजा था। चक्रवर्ती राजा उसे कहते हैं जिसका पूरी पथ्वी पर शासन हो।) उसने अपने अन्तर्गत राजाओं को युद्ध के लिए ललकारा, एक घोड़े के गले में पत्र बांध कर सारे राज्य में घुमाया। शर्त थी कि जिसे राजा मानधाता की आधीनता स्वीकार नहीं है वह इस घोड़े को पकड़ कर बांध ले तथा युद्ध के लिए तैयार रहे। किसी ने घोड़ा नहीं पकड़ा। महर्षि चुणक जी को इस बात का पता चला कि राजा बहुत अभिमानी हो गया है। कहा कि मैं इस राजा के युद्ध को स्वीकार करता हूँ युद्ध शुरू हुआ। मानधाता राजा के पास 72 करोड़ सेना थी। उसके चार भाग करके एक-एक भाग (18 करोड़) सेना से चार बार महर्षि चुणक पर आक्रमण कर दिया। दूसरी ओर महर्षि चुणक जी ने अपनी साधना की कमाई से चार पूतलियाँ (बम्ब) बनाई तथा राजा की चारों भाग सेना का विनाश कर दिया। श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी तथा ब्रह्ना व परब्रह्म की भक्ति से पाप तथा पुण्य दोनों का फल भोगना पड़ता है, पुण्य स्वर्ग में तथा पाप नरक में व चौरासी लाख प्राणियों के शरीर में भिन्न-2 यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। जैसे ज्ञानी आत्मा श्री चुणक जी ने जो ओ३म् नाम के जाप की कमाई की उससे कुछ तो सिद्धि शक्ति (चार पुतलियों बनाकर) में समाप्त कर दिया जिससे भोले व्यक्तियों में महर्षि कहलाया। कुछ साधना फल को महास्वर्ग में भोग कर फिर नरक में जाएगा तथा फिर चौरासी लाख प्राणियों के शरीर धारण करके कष्ट पर कष्ट सहन करेगा। जो 72 करोड़ प्राणियों (सैनिकों) का संहार वचन से तैयार की गई पुतलियों से किया था, उसका भोग भी भोगना होगा। चाहे कोई हथियार से हत्या करे, चाहे वचन रूपी तलवार से उन दोनों को समान दण्ड प्रभु देता है। जब उस महर्षि चुणक जी का जीव कुत्ते के शरीर में होगा उसके सिर में जख्म होगा, उसमें कीड़े बनकर उन सैनिकों के जीव अपना प्रतिशोध लेंगे। कभी टांग टूटेगी, कभी पिछले पैरों से अर्धग हो कर केवल अगले पैरों से घिसड़ कर चलेगा तथा गर्मी सर्दी का कष्ट असहनीय पीड़ा नाना प्रकार से भोगनी ही पड़ेगी। इसलिए पवित्र गीता जी बोलने वाला ब्रह्म (काल) गीता अ. 7 श्लोक 18 में स्वयं कह रहा है कि ये सर्व ज्ञानी आत्माएँ हैं तो उदार (नेक)। परन्तु पूर्ण परमात्मा की तीन मंत्र की वास्तविक साधना बताने वाला तत्वदर्शी सन्त न मिलने के कारण ये सब मेरी ही (अनुत्तमाम्) अति अश्रेष्ठ मुक्ति (गती) की आस में ही आश्रित रहे अर्थात् मेरी साधना भी अश्रेष्ठ है। इसलिए पवित्र गीता जी अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे अर्जुन ! तू सर्व भाव से उस पूर्ण परमात्मा की शरण में चला जा। जिसकी कप्या से ही तू परम शान्ति तथा सनातन परम धाम (सत्यलोक) को प्राप्त होगा। पवित्र गीता जी को श्री कष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके काल ब्रह्म ने बोला, फिर कई वर्षों उपरांत पवित्र गीता जी तथा पवित्र चारों वेदों को महर्षि व्यास जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके काल ब्रह्म (क्षर पुरुष) द्वारा लिपिबद्ध किए हैं। इनमें परमात्मा कैसा है, कैसे उसकी भक्ति करनी है तथा क्या उपलब्धि होगी, ज्ञान तो पूर्ण है परन्तु सांकेतिक है तथा पूजा की विधि केवल ब्रह्म (क्षर पुरुष) अर्थात् ज्योति निरंजन तक की ही है। पूर्ण ब्रह्म की भक्ति के लिए पवित्र गीता अ. 4 श्लोक 34 में पवित्र गीता बोलने वाला (ब्रह्म) प्रभु स्वयं कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति व प्राप्ति के लिए किसी तत्वज्ञानी सन्त की खोज कर फिर जैसे वह विधि बताएं वैसे कर। पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा का पूर्ण ज्ञान व भक्ति विधि मैं नहीं जानता। अपनी साधना के बारे में गीता अ. 8 के श्लोक 13 में कहा है कि मेरी भक्ति का तो केवल एक ओ३म् अक्षर है जिसका उच्चारण करके अन्तिम स्वांस (त्यजन् देहम्) तक जाप करने से मेरी वाली परमगति को प्राप्त होगा। फिर गीता अ. 7 श्लोक 18 में कहा है कि जिन प्रभु चाहने वाली आत्माओं को तत्वदर्शी सन्त नहीं मिला जो पूर्ण ब्रह्म की साधना जानता हो, इसलिए वे उदारात्माएँ मेरे वाली (अनुत्तमाम्) अति अनुत्तम परमगति में ही आश्रित हैं। (पवित्र गीता जी बोलने वाला प्रभु स्वयं कह रहा है कि मेरी साधना से होने वाली गति अर्थात् मुक्ति भी अति अश्रेष्ठ है।) गीता अ. 15 श्लोक 1 से 4 तक में कहा है कि यह उल्टा लटका हुआ संसार रूपी वक्ष है, जिसकी मूल (जड़ें) तो पूर्ण ब्रह्म अर्थात् आदि पुरुष परमेश्वर है तथा नीचे तीनों गुण (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) रूपी शाखाएँ हैं। इस सष्टि रचना के पूर्ण ज्ञान को (श्री कष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश ब्रह्म कह रहा है कि) मैं नहीं जानता। इसलिए यहाँ विचार काल में अर्थात् इस गीता संवाद में मुझे पूर्ण जानकारी नहीं है। जो संत उपरोक्त संसार रूपी वक्ष अर्थात् सष्टि की रचना के विषय का पूर्ण ज्ञानी होगा, वह मूल, तना, डार तथा टहनियों का भिन्न-भिन्न वर्णन करेगा उसे (वेदवित्) तत्वदर्शी जानना। फिर उस पूर्ण ज्ञानी (तत्वदर्शी) सन्त से उपदेश लेकर परमेश्वर के उस परम पद को भली प्रकार खोजना चाहिए। जहाँ जाने के उपरान्त लौटकर संसार में नहीं आते भावार्थ है कि साधकों की जन्म-मत्यु कभी नहीं होती अर्थात् अनादि मोक्ष प्राप्त होता है तथा मैं (गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है) भी उसी आदि परम पुरुष परमेश्वर की शरण (आधीन) हूँ। इसलिए दढ़ विश्वास के साथ उसी पूर्ण परमात्मा (सतपुरुष) का ही सुमरण करना चाहिए। पवित्र गीता अ. 4 श्लोक 5 तथा 9 में गीता बोलने वाला प्रभु (ब्रह्म) कह रहा है कि हे अर्जुन ! मेरे तथा तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। गीता अध्याय 2 श्लोक 12 में यही प्रमाण है कहा है कि हे अर्जुन ! तू मैं तथा यह सर्व सैनिक पहले भी जन्में थे, आगे भी जन्मेंगें। गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में भी गीता ज्ञान दाता के जन्म का प्रमाण है कहा है कि मेरे जन्म को ऋषि व देवता नहीं जानते क्योंकि वे सब मेरे से उत्पन्न हुए हैं। इससे सिद्ध है कि गीता ज्ञान दाता का जन्म तो हुआ है। जिसे उसकी सन्तान नहीं जानती। पिता की उत्पति को दादा जी बताते हैं। इसलिए गीता अ. 15 श्लोक 16 में तीन प्रभुओं की भिन्न-भिन्न व्याख्या है दो प्रभु, हैं क्षर पुरुष (नाशवान भगवान अर्थात् ब्रह्म) तथा अक्षर पुरुष (अविनाशी प्रभु अर्थात् अक्षर ब्रह्म) हैं, गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है परन्तु वास्तव में अविनाशी तो इन दोनों से अन्य प्रभु है जो वास्तव में अविनाशी परमात्मा परमेश्वर कहलाता है। जैसे एक मिट्टी का सफेद प्याला जो बिल्कुल अस्थाई है, ऐसे ब्रह्म (क्षर पुरुष) तथा इसके इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणी नाशवान हैं। दूसरा प्याला इस्पात (स्टील) का है। इस्पात को भी जंग लगता है और विनाश हो जाता है। सफेद मिट्टी के प्याले की तुलना में इस्पात का प्याला अधिक स्थाई है परन्तु है नाशवान इसलिए इतना अविनाशी इस्पात (स्टील) का प्याला है ऐसे अक्षर पुरुष (परब्रह्म) तथा इसके सात संख ब्रह्मण्डों के प्राणी अविनाशी जैसे लगते हुए भी नाशवान हैं अर्थात् वास्तव में अविनाशी नहीं हैं। तीसरा प्याला स्वर्ण (गोल्ड) का है जो वास्तव में अविनाशी धातु से बना है। जिसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। ऐसे पूर्ण ब्रह्म (परम अक्षर पुरुष) तथा उसके असंख ब्रह्मण्डों में रहने वाले हंसात्माएँ (देवा) वास्तव में अविनाशी है तथा वही तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का पालन-पोषण करता है। कविर्देव अर्थात् कबीर प्रभु ने अपने द्वारा रची सष्टि को स्वयं बताया है। कबीर अक्षर पुरुष एक पेड़ है, ज्योति निरंजन वाकी डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार ।। अक्षर पुरुष (परब्रह्म) तो उलटे लटके पेड़ का तना है तथा मोटी डार ज्योति निरंजन (क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म) है तथा उस डार से आगे तीनों शाखाएँ तीनों गुण (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) हैं। परन्तु मूल (जड़) पूर्ण पुरुष (परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् सतपुरुष) है। पेड़ को जड़ (मूल) से अर्थात् पूर्ण ब्रह्म से आहार प्राप्त होता है। इसलिए कुल का पालनहार वही परम अक्षर ब्रह्म है जिसका प्रमाण गीता अ. 8 के श्लोक 1 व 3 में दिया है। अर्जुन ने पूछा- हे प्रभु! वह तत् ब्रह्म कौन है, जिसके विषय में आपने गीता अ. 7 श्लोक 29 में कहा है कि तत्ब्रह्म (उस पूर्ण परमात्मा) को तथा पूरे अध्यात्म ज्ञान (तत्वज्ञान) को जानने के बाद तो साधक जरा-मरण से छूटने का ही प्रयत्न करता है। पवित्र गीता बोलने वाले (ब्रह्ना) ने गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में उत्तर दिया कि वह परम अक्षर ब्रह्म (पूर्ण ब्रह्म) है। गीता अ. 8 श्लोक 6, में कहा है कि यह विधान है कि अन्त समय में जो साधक जिस भी प्रभु (ब्रह्म, परब्रह्म, पूर्णब्रह्म) का स्मरण करता हुआ प्राण त्याग कर जाता है तो उसी को प्राप्त होता है। Factful Debates YouTube
gyan ganga - कविर्देव अर्थात् कबीर प्रभु ने अपने द्वारा  रची सष्टि को स्चयं बताया है गीता अध्याय १५ के श्लोक १,३ कहा है कि संसार रूपी वृक्ष का तना तो अक्षर पुरूष है जो सात संख का प्रभु स्वामी) है। मोटी डार ब्रह्मांडों पुरूष है जिसें काल ब्रह्म ज्योति 8 निरंजन) भी कहा है जो इक्कीस  ब्रह्मांडों का प्रभु है। तीनों देवता (रजगुण ब्रह्मा,  ٥     विष्णु  ee तथा तमगुण शिव) उस सतगुण वृक्ष की शाखा जानो, पत्तों को संसार a ব [ মমসা | [ +1 -- ح  उस संसार रूप वृक्ष की मूल स्वयं 7 कबीर परमेश्वर है जिसे गीता अध्याय 3 & ৪  হলাক परम अक्षर ब्रह्म &&I शासत्रविरुद মামনা अथात उल्टा चीज ifl Fಗ Hitl 531 f SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Ji @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGOD ORG SAINT RAMPAL Ji MAHARAJ कविर्देव अर्थात् कबीर प्रभु ने अपने द्वारा  रची सष्टि को स्चयं बताया है गीता अध्याय १५ के श्लोक १,३ कहा है कि संसार रूपी वृक्ष का तना तो अक्षर पुरूष है जो सात संख का प्रभु स्वामी) है। मोटी डार ब्रह्मांडों पुरूष है जिसें काल ब्रह्म ज्योति 8 निरंजन) भी कहा है जो इक्कीस  ब्रह्मांडों का प्रभु है। तीनों देवता (रजगुण ब्रह्मा,  ٥     विष्णु  ee तथा तमगुण शिव) उस सतगुण वृक्ष की शाखा जानो, पत्तों को संसार a ব [ মমসা | [ +1 -- ح  उस संसार रूप वृक्ष की मूल स्वयं 7 कबीर परमेश्वर है जिसे गीता अध्याय 3 & ৪  হলাক परम अक्षर ब्रह्म &&I शासत्रविरुद মামনা अथात उल्टा चीज ifl Fಗ Hitl 531 f SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Ji @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGOD ORG SAINT RAMPAL Ji MAHARAJ - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . ‌‌ #Origin_Of_Tridev सुखसंमवेद में लिखा है 3 पुत्र अष्टांगी जाए ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराए तीन देव विस्तार चलावे इनमें यह जग धोखा खावे यह तीनों देवा बटपारी सिरजे पुरुष और सिरजी नारी काली भगवान और दुर्गा के पुत्र है ब्रह्मा विष्णु महेश शैतान गीता बोलते समय कहता है अर्जुन तुम तत्वदर्शी संत की शरण में जाओ और फिर परमात्मा को जानो उसकी भक्ति करो यही कुरान में कहता है। ये मोहम्मद तुंम् बाखबर की तलाश करो वही बताएगा कबीर अल्लाह जिंदा कौन है और सच्ची इबादत क्या है काल इक्कीस ब्रह्मण्ड के शरीरधारी प्राणियों को तप्तशिला पर भून कर खाता है ओर उस जीव आत्मा को फिर से जन्म-मृत्यु के लिए छोड़ देता है तथा अपने तीनो पुत्रो रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से उत्पत्ति, पालन तथा संहार करवाकर अपना आहार तैयार करवाता है। Factful Debates YouTube
gyan ganga - THE THREE GODS ARE NOT IMMORTAL 0 श्रीमद्ेवीभागवत 1 Shrimad devibhagwat Puran (Gitapress Gorakhpur)    Skand 3, Adhyay 5, page no.123: God Vishnu  prayed to Durga: said that Vishnul, Brohmd, ond Shankar are existing by your grace. We have birth] (davirbhdav) and dedth (tirobhaav) ~Jogofguru Rompol Ji Mohoroj Must Watch To know more; Get Free Sacred Book "Gyan Ganga' 1 [eagl 07:30 pm (IST) Send us your Name, Address & Whatsapp Contact number on our' 91 7496801825 SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGOD.ORG in MAHARAJ SAINT RAMPAL JI THE THREE GODS ARE NOT IMMORTAL 0 श्रीमद्ेवीभागवत 1 Shrimad devibhagwat Puran (Gitapress Gorakhpur)    Skand 3, Adhyay 5, page no.123: God Vishnu  prayed to Durga: said that Vishnul, Brohmd, ond Shankar are existing by your grace. We have birth] (davirbhdav) and dedth (tirobhaav) ~Jogofguru Rompol Ji Mohoroj Must Watch To know more; Get Free Sacred Book "Gyan Ganga' 1 [eagl 07:30 pm (IST) Send us your Name, Address & Whatsapp Contact number on our' 91 7496801825 SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGOD.ORG in MAHARAJ SAINT RAMPAL JI - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #GodNightFriday #रामनवमी_पर_जानें_आदिराम_कौन . !! हंस और काग !! पुराने जमाने में एक शहर में दो ब्राह्मण पुत्र रहते थे, एक गरीब था तो दूसरा अमीर। दोनों पड़ोसी थे। गरीब ब्राह्मण की पत्नी उसे रोज़ ताने देती झगड़ती। एक दिन ग्यारस के दिन गरीब ब्राह्मण पुत्र झगड़ों से तंग आ जंगल की ओर चल पड़ता है ये सोच कर कि जंगल में शेर या कोई मांसाहारी जीव उसे मार कर खा जायेगा, उस जीव का पेट भर जायेगा और मरने से वो रोज की झिक झिक से मुक्त हो जायेगा। जंगल में जाते उसे एक गुफ़ा नज़र आती है। वो गुफ़ा की तरफ़ जाता है। गुफ़ा में एक शेर सोया होता है और शेर की नींद में ख़लल न पड़े इसके लिये हंस का पहरा होता है। हंस ज़ब दूर से ब्राह्मण पुत्र को आता देखता है तो चिंता में पड़ सोचता है... ये ब्राह्मण आयेगा शेर जगेगा और इसे मार कर खा जायेगा... ग्यारस के दिन मुझे पाप लगेगा... इसे बचायें कैसे? उसे उपाय सुझता है और वो शेर के भाग्य की तारीफ़ करते कहता है। ओ जंगल के राजा... उठो, जागो आज आपके भाग्य खुले हैं, ग्यारस के दिन खुद विप्रदेव आपके घर पधारे हैं, जल्दी उठें और इन्हें दक्षिणा दें रवाना करें... आपका मोक्ष हो जायेगा... ये दिन दुबारा आपकी जिंदगी में शायद ही आये, आपको पशु योनी से छुटकारा मिल जायेगा। शेर दहाड़ कर उठता है, हंस की बात उसे सही लगती है और पूर्व में शिकार हुए मनुष्यों के गहने थे, वे सब के सब उस ब्राह्मण के पैरों में रख, शीश नवाता है, जीभ से उनके पैर चाटता है। हंस ब्राह्मण को इशारा करता है, विप्रदेव ये सब गहने उठाओ और जितना जल्द हो सके वापस अपने घर जाओ... ये सिंह है.. कब मन बदल जाय! ब्राह्मण बात समझता है, घर लौट जाता है। पडौसी अमीर ब्राह्मण की पत्नी को जब सब पता चलता है तो वो भी अपने पति को जबरदस्ती अगली ग्यारस को जंगल में उसी शेर की गुफा की ओर भेजती है। अब शेर का पहेरादार बदल जाता है। नया पहरेदार होता है ""कौवा"" जैसे कौवे की प्रवृति होती है वो सोचता है... बढीया है। ब्राह्मण आया.. शेर को जगाऊं.. शेर की नींद में ख़लल पड़ेगी, गुस्साएगा, ब्राह्मण को मारेगा तो कुछ मेरे भी हाथ लगेगा, मेरा पेट भर जायेगा। ये सोच वो कांव.. कांव.. कांव.. चिल्लाता है। शेर गुस्सा हो जगता है। दूसरे ब्राह्मण पर उसकी नज़र पड़ती है, उसे हंस की बात याद आ जाती है.. वो समझ जाता है कौवा क्यूं कांव.. कांव कर रहा है। वो अपने पूर्व में हंस के कहने पर किये गये धर्म को खत्म नहीं करना चाहता.. पर फिर भी नहीं शेर, शेर होता है जंगल का राजा... वो दहाड़ कर ब्राह्मण को कहता है.. "हंस उड़ सरवर गये और अब काग भये प्रधान... थे तो विप्रा थांरे घरे जाओ... मैं किनाइनी जिजमान" अर्थात् हंस जो अच्छी सोच वाले अच्छी मनोवृत्ति वाले थे उड़ के सरोवर यानि तालाब को चले गये हैं और अब कौवा प्रधान पहरेदार है जो मुझे तुम्हें मारने के लिये उकसा रहा है। मेरी बुद्धि घूमें उससे पहले ही.. हे ब्राह्मण, यहां से चले जाओ.. शेर किसी का जजमान नहीं हुआ है.. वो तो हंस था जिसने मुझ शेर से भी पुण्य करवा दिया। दूसरा ब्राह्मण सारी बात समझ जाता है और डर के मारे तुरंत प्राण बचाकर अपने घर की ओर भाग जाता है... शिक्षा:- कोई किसी का दु:ख देख दु:खी होता है और उसका भला सोचता है... वो हंस है और जो किसी को दु:खी देखना चाहता है, किसी का सुख जिसे सहन नहीं होता... वो कौवा है। जो आपस में मिलजुल, भाईचारे से रहना चाहते हैं, वे हंस प्रवृत्ति के हैं। और जो झगड़े कर एक दूजे को मारने लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं, वे कौवे की प्रवृति के हैं। अपने आस पास छुपे बैठे कौवौं को पहचानों, उनसे दूर रहो और जो हंस प्रवृत्ति के हैं, उनका साथ करो... इसी में आपका व हम सब का कल्याण छुपा है..!! Factful Debates YouTube
gyan ganga - हस SA NEWS हिमाचल प्रदेश और 8 @IT SA News Channel Folowus on: SANEWS.in SANewsHimachal Pradesh हस SA NEWS हिमाचल प्रदेश और 8 @IT SA News Channel Folowus on: SANEWS.in SANewsHimachal Pradesh - ShareChat
#gyan ganga #santrampal mahraj ji #रामनवमी_पर_जानें_आदिराम_कौन कबीर सागर में वर्णित ज्ञान क्यों इतना महत्वपूर्ण है? क्या हम परंपराओं के कारण सच्चे ज्ञान से दूर हो गए हैं? जानिए Factful Debates चैनल पर। Factful Debates YouTube https://youtu.be/8DVSmok4ApU?si=mCzzC7Nr7UGMSBzv
gyan ganga - 14 @EGEEIT वह दिन है जिस दिन श्रीरामचन्द्र जी का जन्म हुआ, फिर वह থ कौन है जो न जन्म लेता और न ही उसकी मृत्यु होती ? रहस्य को जानने के लिए अवश्य देखिए इस Sant Rampal Ji Maharaj ঐনল यटय Sant Rampal Ji YOUTUBE Frde Bodka Maharaj CHANNEL 7496001825 | @SainIRnpalJM-huale 14 @EGEEIT वह दिन है जिस दिन श्रीरामचन्द्र जी का जन्म हुआ, फिर वह থ कौन है जो न जन्म लेता और न ही उसकी मृत्यु होती ? रहस्य को जानने के लिए अवश्य देखिए इस Sant Rampal Ji Maharaj ঐনল यटय Sant Rampal Ji YOUTUBE Frde Bodka Maharaj CHANNEL 7496001825 | @SainIRnpalJM-huale - ShareChat