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🔥 क्या महर्षि दयानंद सरस्वती ने वेदों को सही समझा था?
सदियों से लाखों लोग सत्यार्थ प्रकाश को वैदिक ज्ञान का आधार मानते आए हैं। लेकिन क्या इसकी सभी शिक्षाएँ वास्तव में वेदों से प्रमाणित हैं?
📖 क्या वेद परमात्मा को निराकार बताते हैं?
📖 क्या वेदों में परमात्मा का स्वरूप वर्णित है?
📖 क्या महर्षि दयानंद सरस्वती की व्याख्याएँ शास्त्रों के अनुरूप हैं?
📖 और क्या वेदों में छिपे कुछ ऐसे रहस्य हैं जिन्हें आज तक अधिकांश लोग नहीं जान पाए?
🚨 भाग – 04
"दयानंद सरस्वती के अज्ञान की पोल"
इस विशेष शोधपरक श्रृंखला में संत रामपाल जी महाराज वेदों, गीता और अन्य सद्ग्रंथों के प्रमाणों के आधार पर उन प्रश्नों का उत्तर देंगे जो वर्षों से चर्चा का विषय रहे हैं।
⚡ प्रमाणों के साथ जानिए:
✅ निराकार या साकार परमात्मा?
✅ वेदों का वास्तविक ज्ञान
✅ सत्यार्थ प्रकाश की प्रमुख मान्यताओं का विश्लेषण
✅ वेदों के गुप्त रहस्य
📅 14 June 2026
⏰ 11:00 AM
सत्य को जानने के लिए अवश्य जुड़ें।
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परमेश्वर कबीर साहेब जी का 629वाँ प्रकट दिवस
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. गोपीचंद और भरथरी ने अलवर के किले पत्थर ढोये।
एक समय श्री गोरखनाथ जी से गोपीचंद तथा भरथरी जी ने कहा कि गुरूदेव! हमारा मोक्ष इसी जन्म में हो, ऐसी कृपा करें। आप जो भी साधना बताओगे, हम करेंगे। श्री गोरखनाथ जी ने कहा कि राजस्थान प्रान्त में एक अलवर शहर है। वहाँ का राजा अपने किले का निर्माण करवा रहा है। तुम दोनों उस राजा के किले का निर्माण पूरा होने तक उसमें पत्थर ढ़ोने का निःशुल्क कार्य करो। अपने खाने के लिए कोई अन्य मजदूरी सुबह-शाम करो।
उसी दिन दोनों भक्त आत्मा गुरू जी का आशीर्वाद लेकर चल पड़े। उस किले का निर्माण बारह वर्ष तक चला। कोई मेहनताना का रूपया-पैसा नहीं लिया। अपने भोजन के लिए उसी नगरी के एक कुम्हार के पास उसकी मिट्टी खोदने तथा उसके मटके बनाने योग्य गारा तैयार करने लगे। उसके बदले में सुबह-शाम केवल रोटी खाते थे।
कुम्हार की धर्मपत्नी अच्छे संस्कारों की नहीं थी। कुम्हार ने कहा कि दो व्यक्ति बेघर घूम रहे थे। वे मेरे पास मिट्टी खोदते तथा गारा तैयार करते हैं। केवल रोटी-रोटी की मजदूरी लेंगे। आज तीन व्यक्तियों का भोजन लेकर आना। मटके बनाने तथा पकाने वाला स्थान नगर से कुछ दूरी पर जंगल में था। कुम्हारी दो व्यक्तियों की रोटी लेकर गई और बोली कि इससे अधिक नहीं मिलेगी।
भोजन रखकर घर लौट आई। कुम्हार ने कहा कि बेटा! इन्हीं में काम चलाना पड़ेगा। तीनों ने बाँटकर रोटी खाई। कई वर्ष ऐसा चला। अंत के वर्ष में तो केवल एक व्यक्ति का भोजन भेजने लगी। तीनों उसी में संतोष कर लेते थे। किले का कार्य बारह वर्ष चला। कुम्हार ने अपने घड़े पकाने के लिए आवे में रख दिए। अंत के वर्ष की बात है।*
गोपीचंद तथा भरथरी ने कुम्हार से आज्ञा ली कि पिता जी! हमारी साधना पूरी हुई। अब हम अपने गुरू श्री गोरखनाथ जी के पास वापिस जा रहे हैं। मेरा नाम गोपीचंद है। इनका नाम भरथरी है। उस समय कुम्हार की पत्नी भी उपस्थित थी। मटकों की ओर एक हाथ से आशीर्वाद देते हुए दोनों ने एक साथ कहा
पिता का हेत माता का कुहेत। आधा कंचन आधा रेत।।
यह वचन बोलकर दोनों चले गए। जिस समय मटके निकालने लगे तो कुम्हार तथा कुम्हारी दोनों निकाल रहे थे। देखा तो प्रत्येक मटका आधा सोने का था, आधा कच्चा था। हाथ लगते ही रेत बनने लगा। कुम्हार ने कहा, भाग्यवान! वे तो कोई देवता थे। तेरी त्रुटी के कारण आधा मटका रेत रह गया। मिट्टी की मिट्टी रह गई। आधा स्वर्ण का हो गया। कुम्हारी को अपनी कृतघ्नता का अहसास हुआ तथा रोने लगी। बोली कि मुझे पता होता तो उनकी बहुत सेवा करती।
कबीर, करता था तब क्यों किया, करके क्यों पछताय।
बोवे पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय।।
इस प्रकार गोपीचंद और भरथरी जी अपने गुरू जी के वचन का पालन करके सफल हुए। जो अमरत्व उस साधना से मिलना था, वह भी अटल विश्वास करके साधना करने से हुआ। यदि विवेकहीन तथा विश्वासहीन होते तो विचार करते कि यह कैसी भक्ति? यह कार्य तो सारा संसार कर रहा है। मोक्ष के लिए तो तपस्या करते हैं या अन्य कठिन व्रत करते हैं। परंतु उन्होंने गुरू जी को गुरू मानकर प्रत्येक साधना की।
गुरू जी के कार्य या आदेश में दोष नहीं निकाला तो सफल हुए। गोरखनाथ जी ने उनको जो नाम जाप करने का मंत्रा दे रखा था, उसका जाप वे दोनों पत्थर उठाकर निर्माण स्थान तक ले जाते तथा लौटकर पत्थरों को तरास (काँट-छाँट करके सीधा कर) रहे थे, वहाँ तक आते समय करते रहते थे। दोनों युवा थे। कार्य के परिश्रम तथा पूरा पेट न भरने के कारण मन में स्त्री के प्रति विकार नहीं आया और सफलता पाई।
गुरू एक वैद्य होता है। उसे पता होता है कि किस रोगी को क्या परहेज देना है? क्या खाने को बताना है? यानि पथ्य-अपथ्य डॉक्टर ही जानता है। रोगी यदि उसका पालन करता है तथा औषधि सेवन अथार्त भक्त नाम जाप करता है तो स्वस्थ हो जाता है यानि मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार गोपीचंद तथा भरथरी जी ने अपने गुरू जी के आदेश का पालन करके जीवन सफल किया। इसी प्रकार साधक को सफल होने के लिए गुरु के प्रत्येक आदेश को मन-कर्म-वचन से मानकर साधना करनी चाहिए। तभी पूर्ण मोक्ष शाश्वत धाम सतलोक प्राप्त होगा।
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. जीव हमारी जाती है, मानव धर्म हमारा
आज हम भारत जैसे स्वतंत्र देश में रहते हैं किन्तु हमारी मानसिकता हमारे सोचने की क्षमता आज भी हिंदू और मुस्लिम होने की बेढीयो मे कैद है। आज लोग एक दूसरे का खून बहाने को तैयार है। अरे भाई क्या कभी सोचा क्या फर्क है एक हिंदू और एक मुस्लिम मे हमारा खून एक है हम एक है फिर अलग क्या है जो आप लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो?
बेशक आप आज एक दूसरे का जान लेने व खून बहाने को तैयार हो लेकिन जब बात खुद पर आती है तब यह सब क्यों नहीं सोचते यदि कभी आप को अपनी जान बचाने के लिए किसी हिंदू या मुस्लिम भाई के खून की जरूरत पड़े तो उस समय आप सब भूल जाते हो फिर क्यों लड़ रहे हो?
आज हम हिन्दू है कल मर जाते है और परमात्मा हमे अगला जन्म मुस्लिम के घर होता है तो तब हम क्या करेगे। हमारा भगवान एक है। आज से ठीक पचीसौ साल पहले एक मानव धर्म था। आज कश्मीर जैसे छोटे टुकड़े के लिए ना जाने हमारे कितने जवान व कितने माँ के लाल मर रहे हैं क्यो बस हमारी छोटी सोच के कारण क्योंकि पाकिस्तान चाहता है कश्मीर हमारा हो और भारत चाहता है कश्मीर उनका हो।
क्यों उस खूबसूरत जगह को मौत का अड्डा बना रखा है हिंदू कहते हैं मुस्लिम आतंकवादी होते है लेकिन क्या यह जरूरी है?अरे आतंक वादी तो वह है जो हिंदू, मुस्लिम होने पर लड़ रहा है!!
आखिर क्या हम सब भाई बहन कि तरह नही रह सकते ? कब तक हिंदू मुस्लिम के नाम पर लडते रहोगे ? मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे मे बाँट दिया भगवान को, धरती बाँटा , अमन बाँटा मत बाँटो इंसान को!!
ना हिंदू बन मेरे भाई ना मुसलमान बन!
इंसान की औलाद है पहले इंसान तो बन।
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. परमात्मा की शक्ति
जब तक हमारे अन्दर काम, क्रोध, मोह लोभ और अंहकार है तब तक हम परमात्मा से काफी दुर है। जब जब भगती (मंत्र जाप) करते है तो पाँचो अवगुण कम होते जाते है और हम परमात्मा के नजदिक होते जाते है।
एक आदमी रात को झोपड़ी में बैठकर एक छोटे से दीये को जलाकर कोई शास्त्र पढ़ रहा था। आधी रात बीत गई। जब वह थक गया तो फूंक मार कर उसने दीया बुझा दिया। लेकिन वह यह देख कर हैरान हो गया कि जब तक दीया जल रहा था, पूर्णिमा का चांद बाहर खड़ा रहा।लेकिन जैसे ही दीया बुझ गया तो चांद की किरणें उस कमरे में फैल गई। वह आदमी बहुत हैरान हुआ यह देख कर कि एक छोटे से दीए ने इतने बड़े चांद को बाहर रोक कर रक्खा।
इसी तरह हमने भी अपने जीवन में पाच महाविकार काम, क्रोध, मोह लोभ और अहंकार के बहुत छोटे-छोटे दीए जला रखे हैं, जिसके कारण परमात्मा का चांद बाहर ही खड़ा रह जाता है। जब तक हमारे महाविकार शांत नही होगे तब तक परमात्मा की नजदिकी महशुस नही कर सकते। और तब तक मन शांत नहीं होगा। मन शांत होगा तभी ईश्वर की उपस्थिति महसूस होगी।
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. भक्ति व साधना
राजा बीर सिंह की एक छोटी रानी सुंदरदेई थी। उसने भी परमेश्वर कबीर जी से दीक्षा ले रखी थी। उसने सत्संग बहुत सुने थे। विश्वास कम था, नाम की कमाई यानि साधना नहीं करती थी। जब रानी का अंतिम समय आया तो यम के दूत राजभवन में प्रवेश कर गए। फिर यमदूत रानी के शरीर में प्रवेश कर गए और अंतिम श्वांस का इंतजार करने लगे। उस समय रानी सुंदरदेई के शरीर में बेचैनी हो गई। यमदूत दिखाई देने लगे। राजा ने रानी से पूछा कि क्या बात है? रानी ने कहा कि मुझे राजपाट, महल, आभूषण, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है।
रानी ने कहा कि साधु-भक्तों को बुलाकर परमात्मा की चर्चा कराओ। साधु तथा भक्त आकर परमात्मा की चर्चा तथा भक्ति करने लगे। उससे कोई लाभ नहीं हुआ। रानी के शरीर में कष्ट और बढ़ गया। अर्ध-अर्ध यानि आधा श्वांस चलने लगा। श्वांस खींच-खींचकर आने-जाने लगा। हृदय कमल को त्यागकर जीव भयभीत होकर त्रिकुटी की ओर भागा। यम दूतों ने चारों ओर से घेर लिया। चारों यमदूतों ने जीव को घेरकर कहा कि आप चलो!
हरि ने तुम्हें बुलाया है। तब रानी के जीव को सत्संग वचन याद आए। उसने यमदूतों से कहा कि हे बटपार! हे जालिमों! तुम यहाँ कैसे आ गए? हमारा सतगुरू हमारा मालिक है। आप हमें नहीं ले जा सकते। मेरे सतगुरू धनी ने मुझे नाम दिया है। मेरे गुरूजी आएंगे तो मैं जाऊँगी। यह बात सुनकर यम के दूत बोले कि यदि आपका कोई खसम है तो उसको बुलाओ, नहीं तो हमारे साथ परमात्मा के दरबार में चलो। जीव ने कहा कि :-
धरनी आकाश से नगर नियारा। तहाँ निवाजै धनी हमारा।।
अगम शब्द जब भाखै नाऊं। तब यम जीव के निकट नहीं आऊं।
पहले तो रानी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो सतगुरू जी सत्संग में ज्ञान सुना रहे हैं, वह सत्य है। वह सोचती थी कि यह केवल कहानी है क्योंकि सब नौकर-नौकरानी आज्ञा मिलते ही दौड़े आते थे। मनमर्जी का खाना खाती थी, सुंदर वस्त्र, आभूषण पहनती थी। उसने सोचा था कि ऐसे ही आनन्द बना रहेगा। यह तो पूर्व जन्म की बैटरी चार्ज थी। वर्तमान में चार्जर मिला (नाम मिला) तो चालू नहीं किया यानि साधना नहीं की।
जब बैटरी की चार्जिंग समाप्त हो जाती है, बैटरी डाउन हो जाती है तो सर्व सुविधाऐं बंद हो जाती हैं। फिर न पंखा चलता है, न बल्ब जगता है। बटन दबाते रहो, कोई क्रिया नहीं होती। इसी प्रकार जीव का पूर्व जन्म की भक्ति का धन यानि चार्जिंग समाप्त हो जाती है तो सर्व सुविधाऐं छीन ली जाती हैं। जीव को नरक में डाल दिया जाता है, तब उसको अक्ल आती है। उस समय वक्त हाथ से निकल चुका होता है।
केवल पश्चाताप और रोना शेष रह जाता है। रानी सुंदरदेई ने सत्संग सुन रखा था। पूर्ण सतगुरू से दीक्षा ले रखी थी। नाम की कमाई नहीं की थी। वह गुरूद्रोही नहीं हुई थी। गुरू निंदा नहीं करती थी। रानी ने सतगुरू को याद किया कि हे सतगुरू! हे मेरे धनी! मेरे को यमदूतों ने घेर रखा है। मुझ दासी को छुड़ावो। मैंने आपकी दीक्षा ले रखी है। आज मुझे पता चला कि ऐसी आपत्ति में न पति, न पत्नी, ने बेटा-बेटी, भाई-बहन, राजा-प्रजा कोई सहायक नहीं होता।
रानी के जीव ने हृदय से सतगुरू को पुकारा। तुरंत सतगुरू कबीर जी वहाँ उपस्थित हुए। रानी ने दौड़कर सतगुरू देव जी के चरण लिए। उसी समय यमदूत भागकर हरि यानि धर्मराज के पास गए और बताया कि उसका सतगुरू आया तो वहाँ पर प्रकाश हो गया। जीव ने सत सुकृत नाम जपा था। उसको इतना ही याद था। इस कारण से उसको यमदूतों से छुड़वाया तथा पुनः जीवन बढ़ाया। तब रानी ने दिल से भक्ति की। फिर सतगुरू कबीर जी ने पुनः सतनाम, सारनाम दिया, उसकी कमाई की। संसार असार दिखाई देने लगा। राज, धन, परिवार पराया दिखाई दे रहा था।
जाने का समय निकट लग रहा था। इस कारण से रानी ने तन-मन-धन सतगुरू चरणों में समर्पित करके भक्ति की तो सत्यलोक में गई। वहाँ परमेश्वर (सत्य पुरूष) ने रानी के जीव के सामने अपने ही दूसरे रूप सतगुरू से प्रश्न किया कि हे कडि़हार! (तारणहार) मेरे जीव को यमदूतों ने कैसे रोक लिया? सतगुरू रूप में कबीर जी ने कहा कि हे परमेश्वर!
इसने दीक्षा लेकर भक्ति नहीं की। इस कारण से इसको यमदूतों ने घेर लिया था। मैंने छुड़वाया। परमेश्वर कबीर जी ने जीव से कहा कि आपने भक्ति क्यों नहीं की? सत्यलोक में कैसे आ गई? सिर नीचा करके जीव ने कहा कि पहले मुझे विश्वास नहीं था। फिर यमदूतों की यातना देखकर मुझे आपकी याद आई। आपका ज्ञान सत्य लगा। आपको पुकारा। आपने मेरी रक्षा की।
फिर मेरे को वापिस जीवन दिया गया। तब मैंने दिलोजान से आपकी भक्ति की। पूर्ण दीक्षा प्राप्त करके आपकी ही कृपा से गुरू जी के सहयोग से मैं यहाँ आपके चरणों में पहुँच पाई हूँ। सत्यलोक में जाकर भक्त अन्य भक्तों के पास भेज दिया जाता है। सुंदर अमर शरीर मिलता है। बहुत बड़ा आवास महल मिलता है। विमान आँगन में खड़ा है। सिद्धियां आदेश का इंतजार करती हैं। तुरंत विद्युत की तरह सक्रिय होती हैं जैसे बिजली का बटन दबाते ही बिजली से चलने वाला यंत्र तुरंत कार्य करने लगता है। ऐसे वहाँ पर वचन का बटन हैं। जो वस्तु चाहिए बोलिये। वस्तु-पदार्थ आपके पास उपस्थित होगा।
जैसे भोजन खाने की इच्छा होते ही आपके भोजनस्थल पर गतिविधि प्रारम्भ हो जाएंगी, थाली-गिलास रखे जाएंगे। कुछ देर में खाने की इच्छा बनी तो सिद्धि से उठकर रसोई में रखे जाएंगे। मिनट पश्चात् इच्छा हुई तो भी उसी समय व्यवस्था हो जाएगी। घूमने की इच्छा हुई तो विमान में गतिविधि महसूस होगी। विमान के निकट जाते ही द्वार खुल जाएगा। विमान स्टार्ट हो जाएगा। जहाँ जिस द्वीप में जाने की इच्छा होगी, विचार करने पर विमान उसी ओर उड़ चलेगा। इच्छा करते ही ताजे-ताजे फल वृक्षों से तोड़कर लाकर आपके समक्ष रख दिए जाएंगे। सत्यलोक की नकल यह काल लोक है। इसी तरह स्त्री-पुरूष परिवार हैं।
सत्यलोक में दो तरह से संतानों की उत्पत्ति होती है। शब्द से तथा मैथुन से। वह हंस पर निर्भर करता है। वचन से संतानोपत्ति वाला क्षेत्र सतपुरूष के सिंहासन के चारों ओर है। नर-नारी से परिवार वाला क्षेत्र उसके बाद में है। वचन से संतान उत्पन्न करने वाले केवल नर ही उत्पन्न करते हैं। सत्यलोक में वृद्धावस्था नहीं है। नर-नारी वाले क्षेत्र में लड़के तथा लड़कियां दोनों उत्पन्न करते हैं। विवाह करते हैं केवल वचन से। जो बच्चे उत्पन्न होते हैं, वे काल लोक से मुक्त होकर गए जीव जन्म लेते हैं। फिर कभी नहीं मरते, न वृद्ध होते।
जो सत्यलोक में मुक्त होकर जाते हैं, उनको सर्वप्रथम सत्यपुरूष जी के दर्शन कराए जाते हैं। उस समय उसका वही स्वरूप रहता है जैसा पृथ्वी से आता है, परंतु वृद्ध नीचे से गया तो वहाँ सतपुरूष के सामने उसी अवस्था व स्वरूप में जाता है। उसका प्रकाश सोलह सूर्यों के प्रकाश जितना हो जाता है। उसके पश्चात् उसको उस स्थान पर भेजा जाता है जो सबसे भिन्न है। वहाँ जाते ही उसका स्वरूप तो वैसा ही रहता है, लेकिन उसके शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों जैसा हो जाता है, परंतु यदि वृद्ध नीचे से गया है तो युवा अवस्था हो जाती है। जवान है तो जवान ही रहता है, बालक है तो बालक ही रहता है। वहाँ पर कुछ को सत्य पुरूष के वचन से स्त्री-पुरूष का शरीर मिलता है। कुछ बीज रूप में सतपुरूष द्वारा बनाए जाते हैं जिनका फिर एक बार किसी के घर सत्यलोक में जन्म होगा, परिवार बनेगा।
उस स्थान पर वे हंस एक बार जन्म लेंगे जो काल लोक तथा अक्षर लोक से मुक्त होकर जाते हैं। एकान्त स्थान पर रखे जाते हैं। वे दोनों क्षेत्रों में जन्म लेते हैं। (वचन से उत्पन्न होने वाले तथा स्त्री-पुरूष से जन्म लेने वाले में) स्त्री-पुरूष से उत्पत्ति की औसत अधिक होती है। यह औसत 10-90 होती है। यह 10ः वचन से उत्पत्ति, 90ः विवाह रीति से उत्पत्ति होती है।
सत्यलोक में स्त्री तथा नर के शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों के प्रकाश के समान होता है। मीनी सतलोक, मानसरोवर पहले हैं। वहाँ दोनों के शरीर का प्रकाश चार सूर्यों के समान होता है। फिर आगे जाते हैं। जब परब्रह्म के लोक में बने अष्ट कमल के पास पहुँचते हैं तो हंस तथा हंसनी यानि नर-नारी के शरीर का प्रकाश 12 सूर्यों के प्रकाश के समान हो जाता है। फिर सत्यलोक में बनी भंवर गुफा में प्रत्येक के शरीर का प्रकाश सोलह सूर्यों के समान हो जाता है।
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. उमर बढाना, जीवत करना
कहते है हमारे भविष्य का लेखा जोखा हमारे जन्म के साथ ही शुरू हो जाते है। हमारा संचित कर्म पाप और पुन्य को मिलाकर हमारा भविष्य बनता है। इस काल के लोक मे कर्म आधार पर जिन्दगी चलती है। परन्तु यदि पुर्ण संत मिल जाता है तो पिछला लेखा जोखा खत्म कर अपने हिसाब से भाग्य बनाता है। पुर्ण संत मरे हुये व्यक्ति को पुन: जीवित करके उसकी उमर सौसाल बढा सकता है।
आज से लगभग 624 साल पहले कबीर साहेब जी इस मृतमण्डल काशी में सशरीर प्रकट हुए थे। तत्वज्ञान प्रचार के साथ अनेकों अद्वितीय चमत्कार भी किए जो केवल पूर्ण परमात्मा ही कर सकता है जैसे मुर्दे को जीवित करना, कटी गर्दन जोडकर पुन: जीवित करना, असाध्य रोग ठीक करना ऐसे-ऐसे हजारों चमत्कार परमेश्वर कबीर साहिब जी ने किए। तब उन्होंने अनेको मरे हुये को जीवित करके करिश्मे दिखाये थे। जैसे स्वामी रामानंद जी महाराज, सेऊ, कमाल व कमाली आदि उधाहरण है।
पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32 में लिखा है कि ‘‘कविरंघारिरसि‘‘ अर्थात् (कविर्) कबीर (अंघारि) पाप का शत्रु (असि) है। फिर इसी पवित्र यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में लिखा है कि परमात्मा (एनसः एनसः) अधर्म के अधर्म अर्थात् पापों के भी पाप घोर पाप को भी समाप्त कर देता है। मुर्दे को जीवित करना का वर्णन ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।
सेऊ को जीवित करना
एक बार कबीर साहेब अपने दो सेवकों कमाल और फरीद के साथ अपने शिष्य सम्मन के घर गए। सम्मन वैसे तो बहुत निर्धन था, लेकिन उसकी आस्था कबीर साहेब में बहुत थी। सम्मन इतना निर्धन था कि बहुत बार तो उसके पास खाने के लिए खाना भी नहीं होता था, उस दिन भी कुछ ऐसा ही था। जब नेकी (सम्मन की पत्नी) ने देखा कि उधार मांगने पर भी कोई आटा उधार नहीं दे रहा तो उसने सेऊ और सम्मन को कहा कि तुम चोरी कर आओ, जब हमारे पास आटा होगा तो हम वापिस कर देंगे। जब सेऊ चोरी करने गया तो पकड़ा गया और सम्मन ने बदनामी के डर से सेऊ की गर्दन काट दी। सुबह होते ही नेकी ने भोजन तैयार किया और कबीर साहेब को एहसास तक नहीं होने दिया कि सेऊ मर चुका है। कबीर साहेब तो परमात्मा थे उन्होंने सिर्फ इतना कहा था
आओ सेऊ जीम लो, यह प्रसाद प्रेम।
शीश कटत हैं चोरों के, साधों के नित्य क्षेम।।
इतना कहते ही सेऊ आ गया और खाना खाने लगा।
स्वामी रामानंद को जीवित करना
जब सिकंदर लोधी के हाथों रामानंद का कत्ल हो गया तो सिकंदर लोधी बहुत उदास हो गया और कबीर साहेब के चरणों में पड़कर रोने लगा। कबीर जी कुटिया के अंदर गए और केवल इतना कहा था कि उठो गुरुदेव आरती का समय हो गया, उसी वक़्त रामानंद जी का शीश धड़ पर जुड़ गया। यह लीला देखकर सिकंदर लोधी और बाकी सब हैरान रह गए।
दिल्ली के सम्राट सिकन्दर लोधी ने कबीर साहिब जी के शिष्य बन गये थे। कबीर साहिब जी की बढ़ती महिमा से परेशान बादशाह सिकन्दर लोदी के धार्मिक पीर शेखतकी ने सिकन्दर से कहा कि इस कबीर काफिर को साथ किसलिए रखा है? सिकंदर ने कहा कि ये तो भगवान है। शेखतकी ने कहा कि अच्छा अल्लाह अब आकार में आने लग गया। अल्लाह कैसे है? सिकंदर ने कहा कि पहले तो अल्लाह ऐसे कि मेरा रोग ऐसा था कि किसी से भी ठीक नहीं हो पा रहा था। इस कबीर प्रभु ने हाथ ही लगाया था मैं स्वस्थ हो गया।
शेखतकी ने कहा कि ये जादूगर होते हैं। सिकंदर ने फिर कहा दूसरा भगवान ऐसे है कि मैंने उनके गुरुदेव का सिर काट दिया था और उन्होंने उसे मेरी आँखों के सामने तुरंत जीवित कर दिया। शेखतकी ने कहा कि अगर यह कबीर अल्लाह है तो मैं इसकी परीक्षा लूँगा। यदि कबीर जी मेरे सामने कोई मुर्दा जीवित करे तो इसे अल्लाह मान लूँगा। कबीर साहेब से प्रार्थना हुई तो कबीर साहेब ने कहा ठीक है शेख तकी ढूँढ़ ले कोई मुर्दा।
सुबह एक 10-12 वर्ष की आयु के लड़के का शव पानी में तैरता हुआ आ रहा था। शेखतकी ने कहा कि वह आ रहा है मुर्दा, इसे जिन्दा कर दो। कबीर साहेब ने कहा पहले आप प्रयत्न करो, कहीं फिर पीछे नम्बर बनाओ। उपस्थित मन्त्रियों तथा सैनिकों ने कहा कि पीर जी आप कोशिश करके देख लो।
शेखतकी जन्त्र- जाप करता रहा। इतने में वह मुर्दा तीन फलांग आगे चला गया। कहा कि कहीं मुर्दे जीवित होते हैं? मुर्दे तो कयामत के समय ही जीवित होते हैं। कबीर साहेब बोले महात्मा जी आप बैठ जाओ, शान्ति करो। कबीर साहेब ने उस मुर्दे को हाथ से वापिस आने का संकेत किया। बारह वर्षीय बच्चे का मृत शरीर दरिया के पानी के बहाव के विपरित चलकर कबीर जी के सामने आकर रूक गया।
कबीर साहेब ने कहा कि हे जीवात्मा जहाँ भी है कबीर हुक्म से मुर्दे में प्रवेश कर और बाहर आ। कबीर साहेब ने इतना कहा ही था कि शव में कम्पन हुई तथा जीवित होकर बाहर आ गया। कबीर साहेब के चरणों में दण्डवत् प्रणाम किया।
सर्व उपस्थित जनों ने कहा कि कबीर साहेब ने तो कमाल कर दिया। उस लड़के का नाम कमाल रख दिया। लड़के को अपने साथ रखा। अपने बच्चे की तरह पालन पोषण किया और नाम दिया। सभी को पता चला कि यह लड़का जो इनके साथ है यह परमेश्वर कबीर साहेब ने जीवित किया है। दूर तक बात फैल गई। शेखतकी की तो माँ सी मर गई सोचा यह कबीर अच्छा दुश्मन हुआ। इसकी तो और ज्यादा महिमा हो गई।
शेखतकी की इर्ष्या बढ़ती ही चली गई। उसकी तेरह वर्षीय लड़की को मृत्यु पश्चात् कब्र में जमीन में दबा रखा था। शेखतकी ने कहा यदि कबीर मेरी लड़की को जो कब्र में दफना रखी है। अगर उसको जीवित करेगा तो मैं इसे अल्लाह मान लूँगा।
पूज्य कबीर साहेब से प्रार्थना हुई।कबीर साहेब ने सोचा यह नादान आत्मा ऐसे ही मान जाए।क्योंकि ये सभी जीवात्माऐं कबीर साहेब के बच्चे हैं। यह तो काल ने धर्म का हमारे ऊपर कवर चढ़ा रखा है। एक दूसरे के दुश्मन बना रखे हैं।
शेखतकी ने कहा कि यदि मेरी लड़की को जीवित कर दे तो हम इस कबीर को अल्लाह स्वीकार कर लेंगे और सभी जगह ढिंढ़ोरा पिटवा दूँगा कि यह कबीर जी भगवान है। कबीर साहेब ने कहा कि ठीक है। वह दिन निश्चित हुआ। कबीर साहेब ने कहा कि सभी जगह सूचना दे दो, कहीं फिर किसी को शंका न रह जाए। हजारों की संख्या में वहाँ पर भक्त आत्मा दर्शनार्थ एकत्रित हुई। कबीर साहेब ने कब्र खुदवाई। उसमें एक बारह-तेरह वर्ष की लड़की का शव रखा हुआ था।
कबीर साहेब ने शेखतकी से कहा कि पहले आप जीवित कर लो। सभी उपस्थित जनों ने कहा है कि महाराज जी यदि इसके पास कोई ऐसी शक्ति होती तो अपने बच्चे को कौन मरने देता है? हे दीन दयाल आप कृपा करो। पूज्य कबीर परमेश्वर ने कहा कि हे शेखतकी की लड़की जीवित हो जा। तीन बार कहा लेकिन लड़की जीवित नहीं हुई। शेखतकी ने तो भंगड़ा पा दिया। नाचे कूदे कि देखा न पाखण्डी का पाखंड पकड़ा गया। कबीर साहेब उसको नचाना चाहते थे कि इसको नाचने दे।
कबीर, राज तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह।
मान बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना येह।।
मान-बड़ाई, ईर्ष्या का रोग बहुत भयानक है। अपनी लड़की के जीवित न होने का दुःख नहीं, कबीर साहेब की पराजय की खुशी मना रहा था। कबीर साहेब ने कहा कि बैठ जाओ महात्मा जी, शान्ति रखो। कबीर साहेब ने आदेश दिया कि हे जीवात्मा जहाँ भी है कबीर आदेश से इस शव में प्रवेश करो और बाहर आओ।
कबीर साहेब का कहना ही था कि इतने में शव में कम्पन हुआ और वह लड़की जीवित होकर बाहर आई, कबीर साहेब के चरणों में दण्डवत् प्रणाम किया। उस लड़की ने डेढ घण्टे तक कबीर साहेब की कृपा से प्रवचन किए, कहा! हे भोली जनता ये भगवान आए हुए हैं। पूर्ण ब्रह्म अन्नत कोटि ब्रह्माण्ड के परमेश्वर हैं। क्या तुम इसको एक मामूली जुलाहा मान रहे हो। हे भूले-भटके प्राणियो! ये आपके सामने स्वयं परमेश्वर आए हैं। इनके चरणों में गिरकर अपने जन्म-मरण का दीर्घ रोग कटवाओ और सतलोक चलो। जहाँ पर जाने के बाद जीवात्मा जन्म मरण के चक्कर से बच जाती है। कमाली ने बताया कि इस काल के जाल से बन्दी छोड़ कबीर साहेब के बिना कोई नहीं छुटवा सकता।
कबीर साहेब ने कहा कि बेटी अपने पिता के साथ जाओ। वह लड़की बोली मेरे वास्तविक पिता तो आप हैं। यह तो नकली पिता है। इसने तो मैं मिट्टी में दबा दी थी। मेरा और इसका हिसाब बराबर हो चुका है। सभी उपस्थित व्यक्तियों ने कहा कि कबीर परमेश्वर ने कमाल कर दिया। कबीर साहेब ने लड़की का नाम कमाली रख दिया और अपनी बेटी की तरह रखा और नाम दिया। उपस्थित व्यक्तियों ने हजारों की संख्या में कबीर परमेश्वर से उपदेश ग्रहण किया। कबीर ही पूर्ण परमात्मा जो मुर्दे को जीवित कर दे। ऐसी लीला कबीर परमेश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता।
कबीर साहिब ही पूर्ण परमात्मा है और परमात्मा ही ऐसे अद्वितीय अद्भुत चमत्कार कर सकते हैं। वे प्रारब्ध/भाग्य के दुख रोग को भी समाप्त कर सकते हैं जो कोई नहीं कर सकता। राम कृष्ण जी ने तो केवल निर्धारित चमत्कार किए। कबीर साहिब ने मृतकों को भी जीवित किया और प्रारब्ध को टाला।
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. संगत से मन की वृत्ति
. कबीर संगति साधु, जो करि जाने कोय ।
सकल बिछ चन्दन भये, बांस न चन्दन होय।।
कबीर साहेब जी कहते हैं कि जो कोई साधु की संगत करता है, वही उसके महत्व को जानता है। जैसे चंदन- वृक्ष के पास वाले वृक्ष भी चंदन की भांति गंध वाले हो जाते हैं, परंतु बांस का पेड. चंदन नहीं होता, क्योंकि वह बीच में से पोला और ऊपर से कठोर होता है। इसी प्रकार जो अभिमानी लोग हैं, वे सत्संगत से भी नहीं सुधरते।
जैसे हम अश्लील मूर्तियाँ देखते हैं तो अश्लीलता उत्पन्न होती है क्योंकि उस उत्तेजक मूर्ति ने अंदर चिंगारी लगा दी, पैट्रोल सुलगने लगा। ऐसी तस्वीरों को तिलांजलि दे दें। जैसे हम देशभक्तों की जीवनी पढ़ते हैं और मूर्ति देखते हैं तो हमारे अंदर देशभक्ति की प्रेरणा होती है। ऐसी तस्वीर घर में हों तो कोई हानि नहीं।
यदि हम साधु-संत-फकीरों तथा अच्छे चरित्रावान नागरिकों की जीवनी पढ़ते-सुनते हैं तो सर्व दोष शांत होकर हम अच्छे नागरिक बनने का विचार करते हैं। इसलिए हमें संत तथा सत्संग की अति आवश्यकता है जहाँ अच्छे विचार बताए जाते हैं।
हम अपनी छोटी-सी बेटी को स्नान कराते हैं, वस्त्र पहनाते हैं। इस प्रकार सब करते हैं। वही बेटी विवाह के पश्चात् ससुराल जाती है। अन्य की बेटी हमारे घर पर बहू बनकर आती है। अब नया क्या हो गया? यह शुद्ध विचार से विचारने की बात है। इस प्रकार विवेक करने से खाना बदोश विचार नष्ट हो जाते हैं। साधु भाव उत्पन्न हो जाता है।
समाचार पत्रों में भी इतनी अश्लील तस्वीरें छपती हैं जो युवाओं को असामान्य कर देती हैं। कुछ कच्छे की प्रसिद्धि में लड़कियाँ केवल अण्डरवीयर तथा ब्रेजीयर पहनती हैं जो गलत है। इसी प्रकार पुरूष भी अण्डरवीयर की प्रसिद्धि के लिए केवल कच्छा पहनकर खड़े दिखाई देते हैं जो महानीचता का प्रतीक है। इनको बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए सभ्य संगठन की आवश्यकता है जो संवैधानिक तरीके से इस प्रकार की अश्लीलता को बंद कराने के लिए संघर्ष करे तथा मानव को चरित्रावान, दयावान बनाने के लिए अच्छी पुस्तकें उपलब्ध करवाए। सत्संग की व्यवस्था करवाए।
अच्छे विचार सुनने वाले बच्चे संयमी होते हैं। देखने में आता है कि जिस बेटी का पति विवाह के कुछ दिन पश्चात् फौज में अपनी ड्यूटी पर चला गया। लगभग आठ-नौ महीने छुट्टी पर नहीं आता। कुछ बेटियों के पति अपने रोजगार के लिए विदेश चले जाते हैं और तीन वर्ष तक भी नहीं लौटते। वे बेटियाँ संयम से रहती हैं। किसी गैर पुरूष को स्वपन में भी नहीं देखती। ये उत्तम खानदान की बेटियाँ हैं। पुरूष भी इतने दिन संयम में रहता है। वे बच्चे ऊँचे घर के हैं। असल खानदान के होते हैं।
जो भड़वे होते हैं, वे तांक-झांक करते रहते हैं। सिर के बालों की नये स्टाईल से कटिंग कराकर काले-पीले चश्में लगाकर गली-गली में कुत्तों की तरह फिरते हैं। वे खाना बदोश होते हैं। वे किसी गलत हरकत को करके बसे बसाए घर को उजाड़ देते हैं क्योंकि वे किसी की बहन बेटी को उन्नीस-इक्कीस कहेंगे जिससे झगड़ा होगा। लड़ाई का रूप न जाने कहाँ तक विशाल हो जाए। किसी की मृत्यु भी हो सकती है। उस एक भड़वे ने दो घरों का नाश कर दिया। इसलिए अपने बच्चों को बचपन से ही सत्संग के वचन सुनाकर विचारवान तथा चरित्रावान बनाना चाहिए।
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. भगवान v/s पूर्ण परमेश्वर
जिन भगवानों को सब लोग भगवान मानते हैं, वास्तव में ये पूर्ण परमात्मा नहीं हैं। पूर्ण परमात्मा तो कोई और है जिसकी शरण में जाने के लिए गीता ज्ञान दाता गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कह रहा है।
हिन्दू धर्म के लोग प्रमुख रूप से ब्रह्मा,विष्णु,महेश की पूजा करते हैं लेकिन इन तीनों देवताओं की पूजा करने से मुक्ति नहीं मिलती है। परमात्मा कबीर परमात्मा ने कहा कि
तीन देव की जो करते भगति, उनकी कभी ना होवे मुक्ति।
अर्थात तीनों देवताओं की भक्ति करने से मुक्ति नहीं हो सकती। मुक्ति तो केवल पूर्ण संत से उपदेश लेकर पूर्ण परमात्मा की सतभक्ति करने से ही होगी। परमात्मा कबीर साहिब की एक और वाणी है कि
तीन देव की भक्ति में,ये भूल पड़यो संसार।
कह कबीर निज नाम बिना,कैसे उतरे पार ।।
इस वाणी से सिद्ध है कि पूर्ण परमात्मा के नाम जाप के बिना पूर्ण मोक्ष नहीं मिल सकता। जिन भगवानों की हम भक्ति करते हैं,वो सिर्फ अपने भाग्य में लिखा हुआ ही देते हैं लेकिन पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी जो अपने भाग्य में लिखा हुआ मिटा देते हैं और नया भाग्य लिख देते हैं।
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. दान की महिमा
बहुत समय पहले एक राजा था। वह अपनी न्यायप्रियता के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। एक बार वह अपने दरबार में बैठा ही था कि अचानक उसके दिमाग में एक सवाल उभरा। सवाल था कि मनुष्य का मरने के बाद क्या होता होगा? इस अज्ञात सवाल के उत्तर को पाने के लिए उस राजा ने अपने दरबार में सभी मंत्रियों आदि से मशवरा किया। सभी लोग राजा की इस जिज्ञासा भरी समस्या से चिंतित हो उठे। काफी देर सोचने विचारने के बाद राजा ने यह निर्णय लिया कि मेरे सारे राज्य में यह ढिंढोरा पिटवा दिया जाए कि जो आदमी कब्र में मुरदे के समान लेटकर रात भर कब्र में मरने के बाद होने वाली सभी क्रियाओं का हवाला देगा, उसे पांच सौ सोने की मोहरें भेंट दी जाएंगी।
राजा के आदेशानुसार सारे राज्य में उक्त ढिंढोरा पिटवा दिया गया। अब समस्या आई कि अच्छा भला जीवित कौर व्यक्ति मरने को तैयार हो? आखिरकार सारे राज्य में एक ऐसा व्यक्ति इस काम को करने के लिए तैयार हो गया, जो इतना कंजूस था कि वह सुख से खाता पीता, सोता नहीं था। उसको राजा के पास पेश किया गया। राजा के आदेशानुसार उसके लिए बढ़िया फूलों से सुसज्जित अर्थी बनाई गई। उसको उस पर लिटाकर बाकयदा श्वेत कफन से ढक दिया गया और उसे कब्रिस्तान ले जाया गया।
घर से जाने पर रास्ते में एक फकीर ने उसका पीछा किया और उससे कहा कि अब तो तुम मरने जा रहे हो, घर में तुम अकेले हो। इतना धन तुम्हारे घर में ही कैद पड़ा रहेगा, मुझे कुछ दे दो। कंजूस के बार बार मना करने पर भी फकीर ने कंजूस का पीछा नहीं छोड़ा और बरबार कुछ मांगने की रट लगाए रहा। कंजूस जब एकदम परेशान हो गया तो उसने कब्रिस्तान में पड़े बादाम के छिलकों के एक ढेर में से मुट्ठी भर छिलके उठाए और उस फकीर को दे दिए।
बाद में कंजूस को एक कब्र में लिटा दिया गया और ऊपर से पूरी कब्र बंद कर दी गई। बस एक छोटा से छेद सिर की तरफ इस आशा के साथ कर दिया गया कि यह इससे सांस लेता रहे और अगली सुबह राजा को मरने के बाद का पूरा हाल सुनाए। सभी लोग कंजूस को उस कब्र में लिटाकर चले गए। रात हुई। रात होने पर एक सांप कब्र पर आया और छेद देखकर उसमें घुसने का प्रयत्न करने लगा। यह देखकर कब्र में लेटे कंजूस की घबराहट का ठिकाना न रहा। सांप ने जैसे ही घुसने का प्रयत्न किया तो उस छेद में बादाम के छिलके आड़ बनकर आ गए।
सुबह होते ही राजा के सभी नौकर बड़ी जिज्ञासा के साथ कब्रिस्तान आए और जल्दी ही कब्र को खोदकर कंजूस को निकाला। मरने के बाद क्या होता है, यह हाल सुनाने के लिए कंजूस को राजा के पास चलने को कहा। कंजूस ने राजा के नौकरों की बात को थोड़ा भी नहीं सूना।
वह पहले अपने घर गया और अपनी तमाम धन संपत्ति को गरीबों में बांट दिया। सब लोग कंजूस की अचानक दान करने की इस दयालुता को देखकर हैरान में पड़ गए। उनके मन में कई सवाल उठने लगे। अंत में कंजूस को राज दरबार में पूरा हाल सुनाने के लिए राजा के सामने पेश किया गया। कंजूस ने बीती रात, सांप व बादाम के छिलकों के संघर्ष की पूरी कहानी कह सुनाई और कहा कि हे महाराज! मरने के बाद सुमरण के साथ सबसे ज्यादा दान ही काम आता है, अतः दान करना ही सब धर्मों से श्रेष्ठ है।
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