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Shri Devkinandan Thakur Ji Maharaj

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“जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है”"रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है”झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।आज कथा पंडाल में भोपाल से सांसद साध्वी प्रज्ञा जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।साध्वी प्रज्ञा जी ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि झांसी की धरा इतिहास की धरा है इसिलए कभी ओज और जोश अपना भूलना मत, जब जय श्री राम का नारा लगता है तो अयोध्या दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जिसने भी भगवा को आतंकवाद कहा, जिस संस्था ने कहा, जिस व्यक्ति ने कहा वो समापन की ओर आ गए हैं। मैने संत महात्माओं से कहा कि भगवा क्या सिर्फ मैने पहना है, जब भगवा का नाम आया आतंकवाद के साथ जोडा तो क्यों पीड़ा नहीं हुई आप लोगों को, जब सन्यासी दल एक साथ खड़ा होकर हुंकार भरता तो शायद राम मंदिर बनने में इतने वर्ष नहीं लगते। उन्होंने कहा कि देश से बड़ा कुछ नहीं होता, देश है तो हम पूजा पाठ स्वतंत्रता से करते हैं और आपको विश्वास ना हो तो जाइए हमारी एक माता पाकिस्तान में भी विराजमान है, उनके कितने लोग दर्शन कर पाते हैं, इसिलिए राष्ट्र की रक्षा अनिवार्य है।पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आप लोगों के भाग्य की सराहना कोई नहीं कर सकता, आप लोगों के भाग्य को देखकर देवता भी जल रहे होंगे। झांसी के लोगों के भाग्य की सराहना हम कितनी करें की एक तरफ मां पीताम्बरा विराजमान है। दूसरी तरफ राम राजा सरकार विराजमान हैं और आप उनके मध्य में बैठकर श्रीमद्भागवत महापुराण श्रवण कर रहे हैं। महाराज श्री ने कहा कि जो जीव सच्चे मन से भगवान की कथा सुनते हैं उन लोगों को ना भूख लगती है, ना प्यास लगती है बल्कि मैं यह कहूं की जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है। जितनी कथा आप सुनते जाएंगे उतनी प्यास आपकी बढ़ती जाएगी। जितना सुनते हैं उतनी प्यास बढ़ती है यह भक्ति का सूत्र है।महाराज श्री ने प्रभु की रास के बारे में बताते हुए कहा कि रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है। अगर भगवान के इस रास में अकेले दिमाग का इस्तेमाल करेंगे सुनने में तो आपको इस रास में भगवान पर संदेह हो जाएगा और अगर आपको भगवान पर संदेह हो गया तो आपको नरकगामी बनना पड़ेगा। भगवान की ये रासलीला बड़ी उत्तम है, श्रेष्ठ है. बडे बड़े ऋषि भी इस रास को सुनकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
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🙏 धर्म-कर्म

🙏 धर्म-कर्म - Day मदभागवत कथा 11 से 18 नवंबर 2019 ) झाँसी ( उ . प्र . ) 685 क cont Read SOY SDONGS - ShareChat
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“आपके दु:ख का कारण दुनिया से आपका बंधन है”“जीवन में सुख पाने का एक ही मार्ग है ठाकुर की शरणागति”झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।आज कथा पंडाल में झांसी से सांसद श्री अनुराग शर्मा जी, विधायक श्री रवि शर्मा जी, महापौर श्री रामतीर्थ सिंघल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे द्वारा किए गए वेद मंत्रों से वातावरण शुद्ध होता है लेकिन आजकल वेद मंत्रों का उतना उच्चारण नहीं होता जितना होना चाहिए। जब जब भागवत के श्लोकों का उच्चारण होता है, भागवत नाम उच्चारण होता है उससे वायुमंडल शुद्ध होता है। वैज्ञानिकों ने भी कहा कि जो यज्ञ होते हैं उससे वायुमंडल शुद्ध होता है, क्योंकि यज्ञ में अधिकांश पीपल की लकड़ियां जलाई जाती हैं। हमारे ऋषियों का कोई भी कार्य ऐसा नहीं था जो इस प्रकृति के विपरित हो। हमारे ऋषियों का विज्ञान इतना श्रेष्ठ था की कोई भी विज्ञान उनका सामना नहीं कर सकता। ऋषियों के विज्ञान को नजर अंदाज करना बहुत बड़ा अनर्थ है।महाराज श्री ने कहा कि आजकल हमें वो व्यक्ति पढ़ा लिखा लगता है जो चार शब्द अंग्रेजी के बोल दे। सब यही चाहते हैं की हमारा बच्चा हिंदी बोले या ना बोले, संस्कृति बोले या ना बोले लेकिन इंग्लिश जरुर बोले। इस तरह तो आज भी हम अंग्रेजों के गुलाम ही हैं। हमारे पूर्वज तो सिर्फ शारीरिक गुलाम थे लेकिन हम तो मेंटली गुलाम हैं। अपने बच्चों को सिखाइए की जेंटलमेन सिर्फ कोर्ट पैंट पहनकर, इंग्लिश बोलकर नहीं होता जिसका आचरण श्रेष्ठ होता है वही जेंटलमेन होता है।महाराज श्री ने कहा कि हम और आप जन्म जन्मांतर से परेशान हैं, एक ही जन्म में नहीं बल्कि हर जन्म में परेशान हैं क्योंकि हमें बंधनों से मुक्त होने का मार्ग नहीं मिल रहा है। जिसे हम आनंद समझ रहे हैं वो आनंद नहीं बल्कि बंधन है। जब तक आप संसार के बंधनों में बंधे रहोगे कभी सुखी नहीं होगे, सुखी होने का एक ही मार्ग है ठाकुर जी की शरणागति स्वीकार कर लो और अपना सम्बंध भगवान से जोड़ लो उसही दिन सारे बंधन मुक्त हो जाएंगे और आप सुखी हो जाओगे।पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
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🙏 धर्म-कर्म - Day नामदभागवत कथा 11 से 18 नवंबर 2019 ) झाँसी ( उ . प्र . ) | RECRETHAN श्रीमदभागवत कथा विश 11 से 18 नवम्बर 2019 स्थान : झाँसी - ShareChat
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