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#🙏🌼Jay Shree Jagannath🌼🙏 #jay jagannath #Jay shree jagannath swami ⭕‼️⭕ #jay shree jagannath swamy 🙏 puri dham. #jay baba jagannath
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#🌹प्यार के नगमे💖 #😘रोमांटिक सॉन्ग #❤️प्यार वाले स्टेटस ❤️ #🎶हैप्पी रोमांटिक स्टेटस #💝 इज़हार-ए-मोहब्बत
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00:48
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00:41
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00:44
#Gita gyan #motivational_thoughts🙏 #कृष्ण ग्यान गिता ✨✨🙏 #gita ka gyan ##Bhagawat gita #Dharm gyan # Dharm vani
Gita gyan - Bhagavad Gita:  Chapter 17, Verse 14 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || १४|| परमपिता परमात्मा , ब्राह्मणों, आध्यात्मिक गुरु, बुद्धिमान तथा श्रेष्ठ सन्तजनों की पूजा यदि पवित्रता , सादगी , ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा के साथ की जाती है तब इसे शरीर की तपस्या कहा जाता है। Bhagavad Gita:  Chapter 17, Verse 14 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || १४|| परमपिता परमात्मा , ब्राह्मणों, आध्यात्मिक गुरु, बुद्धिमान तथा श्रेष्ठ सन्तजनों की पूजा यदि पवित्रता , सादगी , ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा के साथ की जाती है तब इसे शरीर की तपस्या कहा जाता है। - ShareChat
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00:42
#happy new year #नववर्ष की शुभकामना #🙏🌼Jay Shree Jagannath🌼🙏 #jay jagannath #Jay shree jagannath swami ⭕‼️⭕
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00:22
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Gita gyan - Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 13 विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् | श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते || १३|| श्रद्धा विहीन होकर तथा धर्मग्रन्थों की आज्ञाओं के विपरीत किया गया यज्ञ जिसमें अन्न अर्पित न किया गया हो, मंत्रोच्चारण न किए गए हों तथा दान न दिया गया होे, ऐसे यज्ञ की प्रकृति तमोगुणी होती है। Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 13 विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् | श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते || १३|| श्रद्धा विहीन होकर तथा धर्मग्रन्थों की आज्ञाओं के विपरीत किया गया यज्ञ जिसमें अन्न अर्पित न किया गया हो, मंत्रोच्चारण न किए गए हों तथा दान न दिया गया होे, ऐसे यज्ञ की प्रकृति तमोगुणी होती है। - ShareChat
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Gita gyan - Bhagavad Gita: Chapter 17 Verse 12 अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् | इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् || 12|| हे श्रेष्ठ भरतवंशी! जो यज्ञ भौतिक लाभ दंभपूर्ण उद्देश्य के साथ किया जाता है अथवा उसे रजोगुणी श्रेणी का यज्ञ समझो। Bhagavad Gita: Chapter 17 Verse 12 अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् | इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् || 12|| हे श्रेष्ठ भरतवंशी! जो यज्ञ भौतिक लाभ दंभपूर्ण उद्देश्य के साथ किया जाता है अथवा उसे रजोगुणी श्रेणी का यज्ञ समझो। - ShareChat