#🪔संक्रांति दान-पूजा का महत्व🍒🙏 🌼🌿 *मकर संक्रांति* 🌿🌼
*मकर क्या है?*
खगोल शास्त्र (Astronomy) और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आकाश मंडल को 12 भागों में बांटा गया है जिन्हें 'राशियां' कहते हैं। मकर (Capricorn) इन 12 राशियों में से दसवीं राशि है। 'मकर' का अर्थ संस्कृत में घड़ियाल या मगरमच्छ होता है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उस प्रक्रिया को 'संक्रांति' कहते हैं। अतः जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर 'मकर राशि' में प्रवेश करता है, तो उसे मकर संक्रांति कहा जाता है।
यह क्यों मनाया जाता है? (ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कारण)
मकर संक्रांति मनाने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:
उत्तरायण का प्रारंभ: इस दिन से सूर्य उत्तर की दिशा में गति करना शुरू करते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को 'देवताओं का दिन' और दक्षिणायण को 'देवताओं की रात' कहा गया है। महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी क्योंकि इस समय देह त्यागने पर मोक्ष मिलता है।
पिता-पुत्र का मिलन: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के बीच मतभेद थे। लेकिन मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव स्वयं अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि शनि की स्वामित्व वाली राशि है) मिलने जाते हैं। यह दिन संबंधों में सुधार और कड़वाहट खत्म करने का प्रतीक है।
कृषि और आभार: यह पर्व नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है। किसान प्रकृति और सूर्य देव को अपनी अच्छी फसल के लिए धन्यवाद अर्पित करते हैं।
इस दिन क्या-क्या करना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार इस दिन की दिनचर्या इस प्रकार होनी चाहिए:
ब्रह्म मुहूर्त स्नान: सूर्योदय से पूर्व जल में काले तिल और गंगाजल मिलाकर स्नान करना।
सूर्य उपासना: उगते सूर्य को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना।
खिचड़ी का भोग: चावल और उड़द की दाल की खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाना और स्वयं प्रसाद ग्रहण करना।
पितृ तर्पण: पूर्वजों के नाम पर जल में तिल छोड़कर तर्पण करना।
अग्नि पूजा: शाम को पवित्र अग्नि जलाकर उसमें तिल अर्पित करना।
विशेष उपाय और उनके पीछे के कारण (प्रमाण सहित)
1. तिल और गुड़ का दान और सेवन
क्यों: तिल शनि का प्रतीक है और गुड़ सूर्य का। इन दोनों को मिलाकर खाने का अर्थ है कि सूर्य (पिता) और शनि (पुत्र) का मिलन हो रहा है, जो घर में सुख-शांति लाता है। वैज्ञानिक रूप से तिल और गुड़ सर्दी के मौसम में शरीर को गर्मी और ऊर्जा प्रदान करते हैं।
प्रमाण: इसका उल्लेख विष्णु पुराण और भविष्य पुराण में मिलता है कि मकर संक्रांति पर तिल का दान करने वाला व्यक्ति नरक के दर्शन नहीं करता।
2. खिचड़ी दान (उड़द दाल और चावल)
क्यों: चावल को चंद्रमा का, उड़द को शनि का, हल्दी को बृहस्पति का और घी को सूर्य का प्रतीक माना जाता है। खिचड़ी खाने और दान करने से कुंडली के ये सभी मुख्य ग्रह शांत और संतुलित होते हैं।
प्रमाण: गोरखनाथ मंदिर (नाथ संप्रदाय) की परंपराओं के अनुसार, बाबा गोरखनाथ ने इस परंपरा की शुरुआत की थी ताकि सैनिकों को पौष्टिक भोजन मिल सके। इसे 'खिचड़ी पर्व' भी इसीलिए कहा जाता है।
3. तांबे के बर्तन और ऊनी वस्त्रों का दान
क्यों: सूर्य को तांबा अत्यंत प्रिय है। तांबे का दान कुंडली में सूर्य को मजबूत करता है जिससे समाज में मान-सम्मान और सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है। वस्त्र दान दरिद्रता का नाश करता है।
प्रमाण: मत्स्य पुराण के अनुसार, संक्रांति के समय दिया गया दान 100 गुना फल प्रदान करता है।
ये उपाय कहाँ से आए? (स्रोत की जानकारी)
ये सभी उपाय और विधियाँ निम्नलिखित प्राचीन भारतीय ग्रंथों से संकलित हैं:
पद्म पुराण (उत्तर खण्ड): इसमें मकर संक्रांति के दिन तिल के महत्व और 'षटतिला' (तिल के छह प्रयोग) का विस्तृत विवरण है।
निर्णय सिंधु: यह ग्रंथ हिंदू व्रतों और त्योहारों के समय और विधि का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। इसमें संक्रांति के पुण्य काल का सटीक वर्णन है।
देवी भागवत पुराण: इसमें सूर्य की गति और उत्तरायण के आध्यात्मिक महत्व का वर्णन है।
धर्मसिंधु: इस ग्रंथ में दान की वस्तुओं (जैसे कंबल, तिल, अन्न) और उनसे मिलने वाले फलों की विस्तृत सूची दी गई है।
कृपया ध्यान दें कि विभिन्न प्रकाशनों (जैसे गीता प्रेस, चौखंबा आदि) में श्लोक संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन विषय वस्तु समान रहती है।
१. मत्स्य पुराण (Matsya Purana)
मत्स्य पुराण में संक्रांति के समय किए जाने वाले दान की महिमा का बहुत विस्तार से वर्णन है।
अध्याय: ९८ (संक्रांति व्रत वर्णन)
संदर्भ: इस अध्याय में बताया गया है कि संक्रांति के दिन जो भी दान किया जाता है, वह अक्षय होता है।
श्लोक संख्या: श्लोक १७ और १८ में स्पष्ट कहा गया है:
यत्किंचित् दीयते दानं संक्रान्त्यां तच्चतुर्गुणम्। तदेव विषुवे लक्षं व्यतीपाते त्वनन्तकम्॥
(अर्थ: सामान्य संक्रांति पर दिया गया दान चार गुना फल देता है, लेकिन उत्तरायण/मकर संक्रांति के समय इसका महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।)
२. विष्णु पुराण (Vishnu Purana)
विष्णु पुराण में सूर्य की गति और उत्तरायण के आध्यात्मिक प्रभाव का वर्णन मिलता है।
अध्याय: द्वितीय अंश, अध्याय ८
श्लोक संख्या: २८ से ३१
विवरण: इन श्लोकों में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की गति का वर्णन है। यहाँ स्पष्ट किया गया है कि मकर राशि से ही सूर्य की उत्तर दिशा की ओर यात्रा (उत्तरायण) प्रारंभ होती है, जो देवताओं का समय माना जाता है।
३. भविष्य पुराण (Bhavishya Purana)
भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में संक्रांति के दिन किए जाने वाले विशिष्ट कार्यों और तिल के महत्व का उल्लेख है।
अध्याय: उत्तर पर्व, अध्याय १७ (संक्रांति माहात्म्य)
विवरण: इस अध्याय में भगवान कृष्ण युधिष्ठिर को संक्रांति के पुण्य काल के बारे में बताते हैं।
श्लोक संदर्भ: इसमें स्पष्ट लिखा है कि मकर संक्रांति पर जो व्यक्ति तिल का दान करता है और तिल से स्नान करता है, वह रोगों से मुक्त होकर सौभाग्य प्राप्त करता है।
४. पद्म पुराण (Padma Purana)
जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, पद्म पुराण के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य के अंतर्गत तिल के छह प्रयोगों का वर्णन है।
अध्याय: उत्तर खण्ड, अध्याय २३२ (माघ माहात्म्य)
श्लोक: तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी। तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशनाः॥
(नोट: यह श्लोक 'षटतिला एकादशी' और 'मकर संक्रांति' दोनों के संदर्भ में अत्यंत प्रामाणिक माना जाता है क्योंकि दोनों ही पर्व माघ मास में आते हैं और सूर्य के उत्तरायण काल से संबंधित हैं।)
५. नारद पुराण (Narada Purana)
नारद पुराण में भी संक्रांति के स्नान और दान का विशेष उल्लेख मिलता है।
अध्याय: पूर्व भाग, अध्याय १२४
श्लोक संख्या: ५६-५८
विवरण: यहाँ बताया गया है कि मकर संक्रांति के दिन उपवास रखकर तिल युक्त जल से स्नान करने और पितरों का तर्पण करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।
साफ शब्दों में (Disclaimer): इन पुराणों के श्लोक संस्कृत के क्लिष्ट व्याकरण पर आधारित होते हैं। इनके सटीक अर्थ के लिए विद्वानों द्वारा की गई व्याख्याओं का सहारा लेना उचित रहता है। उपरोक्त जानकारी धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित है। ज्योतिषीय उपाय अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार ही करने चाहिए।