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*शराब घोटाला*
#फैक्टचेक डिस्चार्ज का मतलब बरी (एक्विटल) नहीं है – यह ट्रायल से पहले चार्ज फ्रेमिंग को रिजेक्ट करना है।
राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने डिस्चार्ज ऑर्डर पास किया है। कृपया इसे बरी करने से कन्फ्यूज़ न हों।
27 फरवरी 2026 को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट (स्पेशल जज जितेंद्र सिंह) ने CBI के केस में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों (कुल 23) को डिस्चार्ज कर दिया। कोर्ट ने CBI की चार्जशीट को रिजेक्ट करते हुए कहा कि कोई प्राइमा फेसी केस (प्रारंभिक सबूत) नहीं बनता, कोई क्रिमिनल कांस्पिरेसी साबित नहीं हुई, और जांच में गंभीर खामियां हैं (जैसे 'साउथ लॉबी' जैसे टर्म्स का इस्तेमाल बिना ठोस आधार के)। यह डिस्चार्ज है, न कि बरी – मतलब ट्रायल शुरू नहीं होगा, लेकिन अपील से इसे रिवर्स किया जा सकता है।
CBI दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस में AAP नेताओं को बरी करने के राउज़ एवेन्यू कोर्ट के ऑर्डर को चुनौती देने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट जाएगी।
CBI ने तुरंत घोषणा की कि वे इस डिस्चार्ज ऑर्डर को दिल्ली हाई कोर्ट में चैलेंज करेंगे। अधिकारियों ने कहा कि कोर्ट ने उनके सबूतों को 'इग्नोर' या 'नॉट कंसिडर्ड' किया, और वे 'इमीडिएटली' अपील करेंगे।
CBI का दावा है कि उनके पास 100 करोड़ के किकबैक्स, साउथ ग्रुप (तेलंगाना MLC K Kavitha आदि) से AAP को फंडिंग, और नीति में अनियमितताओं के सबूत हैं। लेकिन कोर्ट ने इन्हें 'कंजेक्चरल' (अनुमान-आधारित) और अपर्याप्त माना, कहा कि चार्जशीट में विरोधाभास हैं और कोई क्रिमिनल इंटेंट साबित नहीं। CBI अपील में इन सबूतों को फिर से पेश कर सकती है
ED और CBI का केस एक ही है?
नहीं! दोनों केस एक ही एक्साइज पॉलिसी स्कैम पर आधारित हैं, लेकिन अलग-अलग कानूनों के तहत
CBI का केस भ्रष्टाचार (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988) – नीति बनाने में अनियमितताएं, किकबैक्स आदि है ।
ED का केस: मनी लॉन्ड्रिंग (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, PMLA) – कथित अवैध फंड्स का इस्तेमाल और लॉन्ड्रिंग।
CBI का केस अब डिस्चार्ज हो गया अपील पेंडिंग है , लेकिन ED का केस अलग से चल रहा है।
ED का केस CBI से स्वतंत्र है, और ED ने अपनी चार्जशीट फाइल की है। कोर्ट ED केस में अलग से फैसला ले सकती है – अगर सबूत अपर्याप्त लगे, तो डिस्चार्ज हो सकता है। लेकिन ED के पास PMLA के तहत सख्त प्रावधान हैं, जहां बेल मिलना मुश्किल है। केजरीवाल को ED केस में सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम बेल मिली थी (जून 2024), लेकिन ट्रायल जारी है।
क्या दोनों केस अलग-अलग मुद्दा रखते हैं ED और CBI का?
हां, अलग मुद्दे लेकिन जुड़े हुए हैं CBI फोकस नीति की अनियमितताओं पर (जैसे प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाना, लाइसेंस अलॉटमेंट), जबकि ED फोकस अवैध फंड्स के फ्लो पर (जैसे AAP के गोवा इलेक्शन में इस्तेमाल)। दोनों एक ही घटनाओं से निकले हैं, इसलिए सबूत ओवरलैप कर सकते हैं। लेकिन कानूनी रूप से अलग – CBI के डिस्चार्ज से ED का केस ऑटोमैटिक प्रभावित नहीं होता।
कोर्ट ने इस बात पर संज्ञान क्यों नहीं लिया कि दोषियों के मोबाइल फोन जिनमें सबूत छिपे थे वह तोड़ दिए गए थे?
- कोर्ट ने CBI की पूरी जांच को अपर्याप्त माना, जिसमें मोबाइल फोन नष्ट करने का आरोप भी शामिल है। CBI ने दावा किया कि आरोपियों ने 170+ फोन नष्ट किए (जैसे विजय नायर, समीर महेंद्रू आदि), लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह सबूत पर्याप्त नहीं क्योंकि कोई डायरेक्ट लिंक या क्रिमिनल इंटेंट साबित नहीं। कोर्ट ने जांच की 'लैप्सेस' (खामियां) पर फोकस किया, जैसे स्टेटमेंट्स में विरोधाभास।
इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 201 के तहत सबूत नष्ट करना या छिपाना अपराध है, जिसमें 7 साल तक की सजा हो सकती है। लेकिन इसे साबित करने के लिए प्रूफ चाहिए – जैसे इंटेंट और डायरेक्ट कनेक्शन। CBI ने यह दावा किया, लेकिन कोर्ट ने इसे केस बनाने लायक नहीं माना। ED केस में यह पॉइंट अभी उठ सकता है।
नवंबर 2021 में दिल्ली सरकार ने नई एक्साइज पॉलिसी लागू की, जिसमें प्राइवेट कंपनियों को लाइसेंस दिए गए। आरोप: नीति में अनियमितताएं (12% प्रॉफिट मार्जिन से फायदा), साउथ ग्रुप (K Kavitha, सरथ रेड्डी आदि) से AAP को 100 करोड़ किकबैक्स, गोवा इलेक्शन में इस्तेमाल। नीति मार्च 2022 में वापस ली गई।
सबूत (CBI/ED के दावे): गवाह स्टेटमेंट्स (जैसे बुच्ची बाबू का), कॉल रिकॉर्ड्स, फंड ट्रांसफर (हवाला), नष्ट फोन (170+), और AAP की मीटिंग्स। लेकिन कोर्ट ने इन्हें कमजोर माना – कोई डायरेक्ट प्रूफ नहीं, सिर्फ अनुमान।
आगे की संभावनाएं:
CBI केस: हाई कोर्ट में अपील अगर हाई कोर्ट डिस्चार्ज रद्द करता है, तो ट्रायल शुरू हो सकता है। अगर नहीं, तो CBI का केस खत्म। संभावना 50-50, क्योंकि ट्रायल कोर्ट की आलोचना मजबूत है।
ED केस: जारी रहेगा। ED के पास PMLA के तहत मजबूत पावर, जहां ट्रायल में सबूत नष्ट करने का पॉइंट उठ सकता है। केजरीवाल/सिसोदिया पर ट्रायल हो सकता है, कन्विक्शन की संभावना (अगर सबूत मजबूत साबित हुए)।
ओवरऑल सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है। राजनीतिक रूप से AAP को राहत जरूर है लेकिन ED केस से दबाव बनेगा। अगर ED जीतती है, तो जेल संभव। अगर सब केस कमजोर साबित हुए, तो पूरा डिस्चार्ज/एक्विटल। समय लगेगा
दिल्ली की राउस एवेन्यू कोर्ट ने शराब घोटाले में केजरीवाल और सिसोदिया को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। गिरफ्तारी के बाद और जमानत तक केजरीवाल करीब पाँच महीने और सिसोदिया करीब सत्रह महीने जेल में रहे थे। मीडिया अब सीबीआई को मोहरा बना रही है और सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठा रही है। सवाल उठना चाहिए अदालत और कानूनी प्रक्रिया पर। कानून के जानकार लोग, जिनमे वकील और पुलिस शामिल है, जानते है कि गिरफ्तारी के बाद चौबीस घंटे के अंदर मुलजिम को अदालत में पेश किया जाता है और अदालत को गिरफ्तार व्यक्ति के खिलाफ सबूत दिखाए और बताए जाते है। उसके बाद ही अदालत मुलाजिम को न्यायिक हिरासत में जेल भेजती है। अब अदालत कह रही है कि चार्ज लगाने के लिए इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। यह बात हैरान करने वाली है। जिन सबूतों के आधार पर इनको न्यायिक हिरासत में भेजा गया था, वे अब कहाँ गए। अदालत ने सीबीआई को सबूत साबित करने से पहले से मुलजिमों को बरी कर दिया। किसी भी मामले में सबूत होना और उन सबूतों को साबित करना, दो अलग अलग बातें है। यही भारतीय न्याय प्रणाली की ख़ूबसूरती है। ख़ुद जेल में रखो और फिर सबूत न होने के नाम पर बरी कर दो। वैसे दिल्ली की नई शराब नीति अपने आप में घोटाला थी जिसमें सरकार को मिलने वाला टैक्स घटाया गया था और विक्रेता का कमीशन बढ़ाया गया था। यानि सरकार को ग़ैर क़ानूनी हानि और अपनों को ग़ैर क़ानूनी फ़ायदा। अगर अदालत को यह चीटिंग नहीं दिखी है तो क्या क़ानून की देवी की आँखों पर फिर से पट्टी बांध देनी चाहिए।
साभार
जय श्री राम
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"न भूलो.. न माफ़ करो "
27 फरवरी 2002, काला दिन ..
तुम्हें याद हो कि ना याद हो ..✍️
उस ट्रेन का नाम साबरमती एक्सप्रेस था ..
27 फ़रवरी 2002 को ये ट्रेन जब 7:43 में गोधरा से गुजरी तो ये ट्रेन भारत के और कई रेलगाड़ियों की तरह ही लेट थी ! चार घंटे लेट........ ट्रेन की गति को धीमा करने के लिए... उसे रोकने के लिए उस ट्रेन पर गोधरा स्टेशन से निकलते ही पथराव किया गया ! ट्रेन रुकी और फिर चली ! जब ये अगले सिग्नल (सिंगल फालिया) पर पहुंची तो करीब दो हज़ार लोगों की भीड़ ने इसपर भयानक पथराव शुरू कर दिया ! ट्रेन रोक देनी पड़ी ..
इस कुकृत्य की तैयारी के लिए 140 लीटर ज्वलनशील खरीद कर रज्जाक कुरकुर के गेस्ट हाउस में रखे गए थे ! साठ लीटर पेट्रोल में डूबे बोए.... S-6 के अलग अलग दरवाज़ों-खिड़कियों से अन्दर डाले गए ! तेल में डुबोये कपड़े के बोए पहले ही तैयार रखे गए थे, तारों से दरवाज़ों को बाहर से बाँध कर बंद कर दिया गया ..
तुम्हें याद हो कि ना याद हो ....शायद
पूरे रेल के एक डब्बे को, S–6 को आग लगा दी गई थी !
जिन्हें जला कर मार डाला गया उनमें से ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे !इस डब्बे में 10 बच्चे जल कर मरे थे ! इस रेल के डब्बे में 27 महिलाएं जल कर मरी थी !इस बोग्गी में सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 59 लोग जल कर मरे थे ! इसमें 48 घायल हुए थे.....😢
तुम्हें याद हो कि ना याद हो ....
इसकी जांच जिस नानावटी-शाह कमीशन ने की उसे 22 बार अपना कार्यकाल बढ़ाने दिया गया !लेकिन 2014 में भी जब उसकी रिपोर्ट आई तो भी रिपोर्ट के हिसाब से सारे दोषियों को माकूल सज़ा नहीं दी जा सकी ..
तुम्हें याद हो कि ना याद हो ...
सज़ा ए मौत सिर्फ पूर्व पार्षद बिलाल हाजी, रज्जाक मोहम्मद कुरकुर, रमजान बिनयामिन बेहरा, अहमद चरखा उर्फ़ लालू, जाबिर बिनयामिन बेहरा, महबूब खालिद चंदा, सलमान युसूफ सत्तार ज़र्दा उर्फ़ सलीम, सिराज़ मोहम्मद अब्दुल मेदा उर्फ़ बाला, इफ्रण अब्दुल माजिद गांची कलंदर उर्फ़ इफरान भोंपू, इफरान मोहम्मद हनिफब्दुल गानी पटालिया और महबूब अहमद युसूफ हसन उर्फ़ लतिको को हुई थी !सारे दोषी तो अदालत के सामने भी नहीं आये होंगे.....
तुम्हें याद हो कि ना याद हो ....
दस मासूम बच्चों, सत्ताईस महिलाओं और 22 हिन्दुजनों का खून आज भी इन्साफ मांगता है..... इनके परिजनों को एक पैसे का मुआवजा नहीं दिया गया.... गुजरात में दंगे भड़काने का जिन्हें अदालत ने दोषी माना था, उनमें से कई आज भी खुले ही घुमते होंगे.... ताकि तुम भूल ना जाओ इसलिए फिर से याद दिला दिया .... क्या पता ??
तुम्हें याद हो कि ना याद हो .... साभार ! #🔍 જાણવા જેવું #🔴 क्राइम अपडेट #🤔होलाष्टक में क्या न करें❓ #🌐 राष्ट्रीय अपडेट #🗞️पॉलिटिकल अपडेट
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