#Epstein की फाइल्स बुराई का प्रतीक हैं, तो #ajmer 1992 का वो कांड 'कांग्रेसी पाप' का वो जीता-जागता स्मारक है जिसे कोई भी "भारत जोड़ो यात्रा" नहीं धो सकती।
सात समंदर पार जेफरी एपस्टीन के काले कारनामों की फाइलों पर छाती कूटने वाले ये "सत्य के स्वघोषित ठेकेदार" जब अपने ही घर के पिछवाड़े में दफन 'अजमेर फाइल्स' के कंकालों को देखते हैं, तो अचानक इनकी आँखों पर 'सेक्युलर मोतियाबिंद' उतर आता है।
राहुल गांधी जी को वाशिंगटन से लेकर वेटिकन तक की हर फाइल का 'पेज नंबर' याद रहता है। एपस्टीन की फाइल्स पर तो उनके कार्यकर्ता ऐसे विलाप कर रहे थे मानो अमेरिका का संविधान खतरे में आ गया हो। मोदी जी को घेरने के लिए ये लोग मंगल ग्रह की धूल भी छान मारेंगे, लेकिन जैसे ही राजस्थान के अजमेर की उन गलियों का जिक्र आता है जहाँ 1992 में कांग्रेस के "युवा तुर्क" मासूम बच्चियों की जिंदगी से 'ब्लैकमेलिंग' का खूनी खेल खेल रहे थे, वैसे ही इन 'युवा हृदय सम्राट' की जुबान पर ताले लग जाते हैं।
अजमेर कांड 1992 (अजमेर बलात्कार कांड) एक गंभीर यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग का मामला था, जिसमें 250 से अधिक स्कूली छात्राओं को निशाना बनाया गया। Wikipedia के अनुसार, अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम परिवार के सदस्यों (फारूक और नफीस चिश्ती) और युवा कांग्रेस के नेताओं ने वर्षों तक लड़कियों को ब्लैकमेल किया और उनके साथ दुष्कर्म किया।
अजमेर कांड की प्रमुख बातें:
अवधि: यह कांड 1992 तक चलता रहा और इसमें लगभग 11-20 वर्ष की छात्राएं शिकार हुईं।
पर्दाफाश: स्थानीय समाचार पत्र 'दैनिक नवज्योति' ने इस रैकेट का पर्दाफाश किया, जो लड़कियो की अश्लील तस्वीरें खींचकर उन्हें डराते थे।
आरोपी: मुख्य आरोपियों में फारूक चिश्ती और उनके साथी शामिल थे, जिन्हें सजा भी हुई।
परिणाम: इस मामले ने देश भर में हड़कंप मचा दिया था और प्रशासन पर भी मिलीभगत के आरोप लगे थे।
यह पुरानी घटना भारत के इतिहास में सबसे कुख्यात यौन शोषण मामलों में से एक मानी जाती है।
आजकल राहुल जी हर शहर में "मोहब्बत की दुकान" खोलने का दावा करते हैं। पर क्या इस दुकान में उन सैकड़ों लड़कियों की चीखों के लिए भी कोई जगह है जिन्हें 1992 में फारूक चिश्ती और नफीस चिश्ती जैसे 'कांग्रेसी लाडलों' ने अपनी हवस का शिकार बनाया था? शायद राहुल गांधी के 'मोहब्बत' वाले डिक्शनरी में उन आरोपियों के लिए हमदर्दी है, क्योंकि वे 'पार्टी के वफादार' और 'खास वोट बैंक' के ठेकेदार थे।
* एपस्टीन फाइल्स: राहुल के समर्थकों के लिए यह एक 'इंटरनेशनल थ्रिलर' है जिसे वे मोदी जी के माथे मढ़ने की नाकाम कोशिश करते हैं।
* अजमेर फाइल्स: इनके लिए यह एक 'पुरानी धूल भरी फाइल' है, जिसे खोलना इनके 'सेक्युलरिज्म' के ढांचे को हिला सकता है।
अजीब विडंबना है—जो नेता खुद को 'अन्याय के खिलाफ आवाज' कहते हैं, उनकी याददाश्त अपने ही पार्टी के पदाधिकारियों द्वारा किए गए "सामूहिक बलात्कार कांड" पर आकर 'हैंग' हो जाती है। क्या अजमेर की वो बेटियां 'इंसान' नहीं थीं? या उनका दर्द इसलिए कम है क्योंकि अपराधी राहुल गांधी की विचारधारा के 'पोषक' थे?
राहुल गांधी के पीछे घूमने वाली वो जमात, जो हर सुबह "लोकतंत्र खतरे में है" का कोरस गाती है, अजमेर के मामले में 'गूँगी-बहरी' बन जाती है। इन समर्थकों की नैतिकता किसी 'प्रीपेड सिम कार्ड' की तरह है—जितना पैसा या राजनीतिक फायदा, उतनी ही ऊंची आवाज। ये वो लोग हैं जो न्यूयॉर्क की गंदगी पर तो पीएचडी कर लेंगे, लेकिन राजस्थान के अपने दामन पर लगे खून के धब्बों को 'गंगा जल' बताकर धो देंगे।
राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि 'सत्य' कोई बुफे सिस्टम नहीं है जहाँ आप अपनी पसंद की डिश चुन लें और कड़वी सच्चाई को छोड़ दें।
अपनी "मोहब्बत की दुकान" के शटर उठाने से पहले, राहुल जी को उन सैकड़ों परिवारों से माफी मांगनी चाहिए जिनकी इज्जत आपके "युवा नेताओं" ने सत्ता के नशे में नीलाम की थी। पर अफसोस, इसके लिए 'रीढ़ की हड्डी' चाहिए, 'ट्वीट' करने वाला अंगूठा नहीं।
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