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🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
#✋भगवान भैरव🌸 🚩 महाभारत का अनसुना रहस्य: अर्जुन के रथ की ध्वजा पर क्यों विराजे थे वीर हनुमान? 🚩 क्या आपने कभी सोचा है कि महाभारत के भीषण महायुद्ध में पवनपुत्र हनुमान, अर्जुन के रथ की पताका (ध्वजा) पर क्यों विराजमान रहते थे? इसके पीछे 'आनंद रामायण' में वर्णित एक बेहद अद्भुत और रोचक कथा है! 🏹 अर्जुन का अहंकार और एक अनोखी चुनौती एक बार रामेश्वरम तीर्थ में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन का मिलन रामभक्त हनुमान जी से हुआ। बातों-बातों में अर्जुन ने अहंकारवश कहा, "आपके स्वामी श्रीराम तो श्रेष्ठ धनुर्धर थे, फिर उन्हें समुद्र पार करने के लिए पत्थरों का सेतु बनवाने की क्या आवश्यकता थी? यदि मैं वहाँ होता, तो बाणों का ऐसा सेतु बना देता जिस पर से पूरी वानर सेना आसानी से पार चली जाती।" हनुमान जी ने मुस्कुराकर कहा, "असंभव! बाणों का सेतु वानरों का भार नहीं सह सकता था। यदि हमारा एक भी वानर उस पर चढ़ता, तो वह छिन्न-भिन्न हो जाता।" 🔥 अग्नि-परीक्षा की शर्त अर्जुन अपने कौशल पर अड़े रहे और उन्होंने पास के ही एक सरोवर पर अपने तीरों से एक मजबूत सेतु बना दिया। उन्होंने हनुमान जी को चुनौती दी— "यदि आपके चलने से यह सेतु टूट गया, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा, और यदि यह नहीं टूटा तो आपको अग्नि में प्रवेश करना होगा।" बजरंगबली ने चुनौती स्वीकार कर ली। 🐾 जब डगमगाया बाणों का सेतु प्रभु श्रीराम का स्मरण कर हनुमान जी ने अपना विराट रूप धारण किया। जैसे ही उन्होंने पुल पर पहला पग रखा— सेतु बुरी तरह डगमगाने लगा। दूसरा पग रखा— सेतु चरमरा उठा। और जैसे ही तीसरा पग रखा— सरोवर का जल अचानक रक्त (खून) से लाल हो गया! ✨ भगवान श्रीकृष्ण का प्रकटीकरण यह देखकर हनुमान जी तुरंत नीचे उतर आए और अपनी शर्त के अनुसार अर्जुन से अग्नि तैयार करने को कहा। जैसे ही वे अग्नि में कूदने वाले थे, भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए और बोले— "ठहरो!" श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए रहस्य खोला— "हे पवनपुत्र! जब आपने तीसरा पग रखा, तब मैं कछुआ बनकर इस बाणों के सेतु के नीचे लेटा हुआ था। यह सेतु तो आपके पहले ही पग में टूट जाता, यदि मैं नीचे से इसे सहारा न देता। सरोवर का जल मेरे ही रक्त से लाल हुआ है।" 🙏 प्रभु का आदेश और वरदान यह सुनकर हनुमान जी को अत्यंत ग्लानि हुई और उन्होंने प्रभु की पीठ पर पैर रखने के महान अपराध के लिए क्षमा मांगी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, "हे हनुमान! आप खिन्न न हों, यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। अर्जुन को उसके धनुर्विद्या के अहंकार से मुक्त करना आवश्यक था। मेरी यह इच्छा है कि आप आने वाले महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्थान ग्रहण करें और उसकी रक्षा करें।" यही कारण था कि द्वापर युग में महाभारत के महायुद्ध के दौरान श्री हनुमान अजेय ढाल बनकर अर्जुन के रथ की पताका पर विराजमान रहे! जय श्री कृष्ण! जय बजरंगबली! 🙏🌸 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🚩जय श्रीराम🙏 #🌷शुभ रविवार #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#✋भगवान भैरव🌸 🔥 अहंकार का पतन: जब हनुमान जी ने पहचानी रावण की 'असली' बीमारी! 🚩 परम ज्ञानी हनुमान जी ने लंकापति रावण की असली बीमारी (अहंकार) पहचान ली थी और उसे उचित उपचार भी बताया था— "मोह मूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान!" अभिमान से नाता रखना यानी किसी मधुमेह (Diabetes) के रोगी का रसगुल्ले से प्रेम करना! परंतु रावण ने इस अनमोल सीख का उपहास उड़ाते हुए कहा— "मिला हमहिं कपि गुर बड़ ग्यानी!" दृष्टि का भेद: अभिमान बनाम भक्ति अहंकार के मद में चूर होकर जो रावण स्वयं को 'ज्ञानीनाम् अग्रगण्यं, बुद्धिमताम् वरिष्ठं' मानता था, वह भगवान को पहचान न सका, लेकिन राक्षसों ने पहचान लिया: "साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।" रावण ने अभिमान वश प्रभु को साधारण मनुष्य समझा— "अग जग नाथ मनुज करि जाना।" वहीं दूसरी ओर, जिनके कोमल चरण कमलों को देखते ही हनुमान जी पहचान गए थे: "कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहुँ बन स्वामी? जग कारन तारन भव भंजन धरनि भार। कि तुम अखिल भुवन पति, लीन्ह मनुज अवतार!" रावण का खोखला भ्रम रावण ठहाके मारकर प्रभु श्रीराम का उपहास करता था— "लघु तापस कर बाग बिलासा!" मुझ त्रैलोक्य विजयी पर एक तपस्वी के विजय की कामना करना ऐसा है, जैसे— "भूमि गिरा कर गहत अकासा!" (यानी पृथ्वी पर गिरे हुए का आकाश को हाथ में पकड़ने की कामना करना)। अहंकार रूपी मोतियाबिंद हो जाए, तो श्रीराम के चरणारविंद कैसे दिख सकते हैं? भगवान शिव, माता पार्वती से रावण के इसी भ्रम का वर्णन करते हुए कहते हैं: "उमा रावनहिं अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सुत उताना।" (जैसे टिटहरी पक्षी को लगता है कि वह अपने पैरों से गिरते हुए आकाश को रोक लेगी!) अहंकार का भयानक परिणाम जिसके चलने से पृथ्वी कांप उठती थी— "चलत दसानन डोलति अवनी।" वही बलशाली शरीर एक दिन अनाथ बनकर धूल फांक रहा था। महारानी मंदोदरी रावण के मृत शरीर को देखकर विलाप करते हुए कहती हैं: "तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।। सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।।" जिस रावण को यह तक ज्ञात नहीं था कि उसके कितने पुत्र और पौत्र हैं, आज उसकी यह दुर्गति हुई कि— "रहा न कोउ कुल रोवनिहारा!" रावण बनाम जटायु: एक महान सीख रावण को अपने तामसी देह का अभिमान था। लेकिन जरा सोचिए! माता सीता के हरण का विरोध करने वाला जटायु कौन सा सात्विक भोजन करता था? "गीध अधम खग आमिष भोगी!" मरे हुए प्राणी को आहार बनाने वाले जटायु ने स्वाभिमान और परोपकार को सब कुछ माना। और दूसरी ओर, एक उत्तम कोटि के ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी रावण ने "तिय हरन" जैसा नीच अपराध किया। परिणाम देखिए— उस अधम शरीर वाले जटायु की अंतिम क्रिया स्वयं भगवान श्रीराम ने अपने हाथों से की: "तेहि की क्रिया जथोचित निज कर किन्हीं राम!" अनंत योगियों को रमाने वाले राम ने एक गीध को अपनाया, और त्रैलोक्य विजयी रावण अनाथ बनकर धूल में मिल गया। सार: अभिमान को सिर पर लेकर आप आगे तो बढ़ सकते हैं, लेकिन उसे सिर पर लिए वापस नहीं लौट सकते! इसलिए, अपने मन से अहंकार को उतार फेंकिए और हनुमान जी की बात मानिए: ✨ "भजहु राम! भजहु रघुनायक!" ✨ क्योंकि वही तो हैं— "कृपासिंधु भगवान!" 🙏 जय श्री राम! 🙏 🙏 जय श्री सीताराम! 🙏 🙏 जय श्री रामभक्त हनुमान! 🙏 . ॥ सियापति रामचंद्र की जय ॥ ॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥ 🙏👇 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🚩जय श्रीराम🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/ #🌷शुभ रविवार
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#✋भगवान भैरव🌸 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता' - क्या आप जानते हैं महाबली हनुमान की ८ अजेय सिद्धियाँ कौन सी हैं? 🚩✨ हम सभी ने श्री हनुमान चालीसा में इस चौपाई का पाठ अवश्य किया है। इसका अर्थ है कि महावीर हनुमान आठ प्रकार की सिद्धियों और नौ निधियों को प्रदान करने वाले हैं। हिन्दू धर्म में घोर साधना से प्राप्त होने वाली अनेक सिद्धियों का वर्णन है, किन्तु जो इन ८ सिद्धियों को प्राप्त कर ले, वह तीनों लोकों में अजेय हो जाता है। हमारे शास्त्रों में इन अष्ट सिद्धियों को इस श्लोक के माध्यम से दर्शाया गया है: अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा। प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः।। आइये, बजरंगबली की इन ८ सिद्धियों और रामायण काल में उनके उपयोग को विस्तार से समझते हैं: अणिमा (सूक्ष्म रूप): इस सिद्धि से साधक अणु के समान सूक्ष्म रूप धारण कर सकता है। इसी शक्ति का प्रयोग कर हनुमान जी ने लंकिनी से बचकर लंका में प्रवेश किया था और सुरसा के मुख में जाकर वापस लौट आए थे। महिमा (विशाल रूप): साधक अपना आकार कितना भी विशाल कर सकता है। लंका युद्ध में कुम्भकर्ण के समक्ष, लक्ष्मण जी के लिए पूरा संजीवनी पर्वत उठाते समय, और महाभारत में भीम का घमंड तोड़ते समय हनुमान जी ने इसी शक्ति से विराट रूप धरा था। गरिमा (अत्यधिक भार): रूप सामान्य रहते हुए भी शरीर का भार किसी पर्वत के समान हो जाना। इसी सिद्धि के बल पर हनुमान जी ने अपनी पूंछ का भार इतना बढ़ा लिया था कि महाबली भीम भी उसे हिला नहीं सके थे। लघिमा (भारहीनता): शरीर का भार रुई के समान हल्का कर लेना। अशोक वाटिका में सीता माता की खोज के दौरान, हनुमान जी इसी सिद्धि के बल पर एक वृक्ष के छोटे से पत्ते पर बैठ गए थे और पवन वेग से उड़ान भरते थे। प्राप्ति (इच्छित प्राप्ति): अदृश्य होकर कहीं भी आना-जाना और पशु-पक्षियों की भाषा समझना। सीता माता की खोज के दौरान उन्होंने अनेक पशु-पक्षियों की भाषा समझ कर ही उनका मार्ग ज्ञात किया था। प्राकाम्य (चिरंजीवी व अजर-अमर): इच्छित वस्तु का चिरकाल तक स्थायी रहना। इसी सिद्धि के कारण पवनपुत्र अजर-अमर हैं और कल्प के अंत तक भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन रहेंगे। वे स्वर्ग से पाताल तक कहीं भी जा सकते हैं। ईशित्व (देवत्व और नेतृत्व): अद्वितीय नेतृत्व क्षमता और देवतातुल्य हो जाना। इसी बल पर उन्होंने सुग्रीव की रक्षा की, श्रीराम से उनकी मित्रता करवाई और पूरे लंका युद्ध में वानर सेना का सफल मार्गदर्शन किया। वशित्व (इन्द्रिय निग्रह): अपनी इन्द्रियों और दूसरों को वश में रखना। इसी सिद्धि के कारण बजरंगबली परम जितेन्द्रिय और पूर्ण ब्रह्मचारी हैं, जिन्होंने अपने मन और इच्छाओं को पूरी तरह वश में किया हुआ है। प्रभु श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी अष्ट सिद्धियों के स्वामी होकर भी सदैव विनम्र रहे। उनका जीवन हमें शक्ति के साथ-साथ संयम की शिक्षा देता है। क्या आपको इससे पहले इन अष्ट सिद्धियों के इन अद्भुत प्रसंगों के बारे में पता था? कमेंट्स में जय श्री राम अवश्य लिखें! 👇🙏 . ॥ सियापति रामचंद्र की जय ॥ ॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥ 🙏👇 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🌷शुभ रविवार #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🙏 जय माँ दुर्गा 🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏
✋भगवान भैरव🌸 - अनिमा महिमा जय सिद्धि 9 राम अष्ट लघिमा 4 1 ೯ 5 वशित्व பOI sPlr अनिमा महिमा जय सिद्धि 9 राम अष्ट लघिमा 4 1 ೯ 5 वशित्व பOI sPlr - ShareChat
#✋भगवान भैरव🌸 🏹 कर्ण और अर्जुन की दुश्मनी महाभारत काल की नहीं, बल्कि उससे भी युगों पुरानी थी! पद्मपुराण का यह रहस्य आपको चौंका देगा... 👇✨ महाभारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी— कर्ण और अर्जुन! हम सब द्वापर युग में इनके महासंग्राम से तो भली-भांति परिचित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों की प्रतिस्पर्धा सीधे त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) से जुड़ी हुई है? पद्मपुराण में वर्णित इन दोनों के पूर्वजन्म की यह कथा वास्तव में अत्यंत आश्चर्यजनक है! 🔱 ब्रह्मा जी के पसीने से 'स्वेदजा' (कर्ण) का जन्म कथा उस समय की है जब परमपिता ब्रह्मा जी पंचमुखी थे। उनके चार मुख वेदों का पाठ करते, किन्तु पांचवां मुख सदैव महादेव की निंदा करता था। रुष्ट होकर भगवान शिव ने उनका वह मुख काट दिया। इस युद्ध के श्रम और क्रोध के कारण ब्रह्मा जी के पसीने (स्वेद) से एक भयानक दैत्य उत्पन्न हुआ, जिसे जन्मजात 1000 दिव्य कवच प्राप्त थे। ब्रह्मा जी ने उसका नाम "स्वेदजा" रखा और उसे महादेव से युद्ध करने कैलाश भेज दिया। 🪷 श्रीहरि विष्णु के रक्त से 'रक्तजा' (अर्जुन) की उत्पत्ति जब महादेव को स्वेदजा के आने का भान हुआ, तो उन्होंने भगवान विष्णु से इसका उपाय निकालने को कहा और स्वयं समाधि में चले गए। तब श्रीहरि ने अपने रक्त (खून) से एक शक्तिशाली असुर की उत्पत्ति की— "रक्तजा"। नारायण के आशीर्वाद से उसके 1000 हाथ थे और वह 500 दिव्य धनुषों का स्वामी था। श्रीहरि की आज्ञा पाकर रक्तजा ने स्वेदजा को कैलाश जाने से रोक दिया। ⚔️ स्वेदजा और रक्तजा का भयंकर महासंग्राम ब्रह्मा और विष्णु के अंश से जन्मे दोनों अतुल बलशाली योद्धाओं के बीच कई वर्षों तक भीषण युद्ध चला। इस युद्ध में: रक्तजा ने स्वेदजा के 999 कवच तोड़ डाले! वहीं स्वेदजा ने रक्तजा के 998 हाथ काट दिए और उसके सभी 500 धनुष नष्ट कर दिए। जब स्वेदजा के पास मात्र 1 कवच शेष बचा और रक्तजा निहत्था हो गया, तब श्रीहरि समझ गए कि रक्तजा अब पराजित हो जाएगा। उन्होंने बीच-बचाव कर युद्ध रुकवा दिया। 🌅 कर्ण और अर्जुन के रूप में पुनर्जन्म रक्तजा को स्वेदजा को पराजित ना कर पाने का अत्यंत क्षोभ था। उसने अगले जन्म में स्वेदजा को हराने की प्रतिज्ञा की। तब श्रीहरि ने उसे वचन दिया कि अगले जन्म में वे स्वयं उसकी सहायता के लिए अवतार लेंगे। बाद में, भगवान शिव ने सूर्यदेव को स्वेदजा और देवराज इंद्र को रक्तजा के संरक्षण का दायित्व सौंपा। द्वापर युग में: 🌞 सूर्यदेव के तेज से स्वेदजा ने 'कर्ण' के रूप में (अपने बचे हुए उसी 1 कवच के साथ) जन्म लिया। ⛈️ देवराज इंद्र के तेज से रक्तजा ने 'अर्जुन' के रूप में जन्म लिया। 🦚 और श्रीहरि विष्णु ने 'श्रीकृष्ण' के रूप में अवतार लिया। अंततः भगवान श्रीकृष्ण की नीति और देवराज इंद्र के छल से कर्ण का वह अंतिम कवच दान में मांग लिया गया। और अर्जुन ने अपने पूर्वजन्म की प्रतिज्ञा पूरी करते हुए श्रीकृष्ण की सहायता से कर्ण पर विजय प्राप्त की! 👇 कमेंट में प्रेम से लिखें - "जय श्री कृष्ण" और इस अद्भुत और दुर्लभ कथा को अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें! 🙏 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🙏 माँ वैष्णो देवी #🌷शुभ रविवार #🙏 जय माँ दुर्गा 🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
✋भगवान भैरव🌸 - पद्मपुराणः कर्ण और अर्जुन का पूर्वजन्म संघर्ष कर्ण का पूर्वजन्म अर्जुन का पूर्वजन्म स्वेदजा (Swedaja ) रक्तजा (Raktaja ) पद्मपुराणः कर्ण और अर्जुन का पूर्वजन्म संघर्ष कर्ण का पूर्वजन्म अर्जुन का पूर्वजन्म स्वेदजा (Swedaja ) रक्तजा (Raktaja ) - ShareChat
#✋भगवान भैरव🌸 जब कंस को यह ज्ञात हुआ कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसका काल बनेगी, तो उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। एक-एक करके उस पापी ने उनके सात नवजात शिशुओं का निर्दयता से वध कर दिया। प्रभु की करुण पुकार 🪷 आठवीं संतान के रूप में स्वयं श्रीहरि विष्णु जन्म लेने वाले थे। अपने पुत्रों के वध से शोकाकुल देवकी और वसुदेव ने अत्यंत दीन अवस्था में भगवान की आराधना की। उनके मन में केवल यही प्रश्न था— "आखिर हम किस पाप का दण्ड भुगत रहे हैं? क्या हमारा आठवाँ पुत्र भी मारा जाएगा?" श्री नारायण का प्राकट्य ✨ जिस रात परमावतार श्रीकृष्ण का जन्म होने वाला था, उनकी पीड़ा और तप देखकर स्वयं भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हुए। त्रिलोकीनाथ को देखकर दोनों उनके चरणों में गिर पड़े और अपने अश्रुओं से उनके चरण पखार दिए। देवकी ने रुंधे गले से पूछा- "हे नाथ! आप तो सर्वज्ञ हैं। इच्छा मात्र से कंस का वध कर सकते हैं, फिर हमारी इतनी कठिन परीक्षा क्यों?" भगवान का अद्भुत रहस्योद्घाटन 🕉️ प्रभु ने मुस्कुराते हुए उन्हें उठाया और संसार के विधान का ज्ञान दिया। उन्होंने कहा, "अपने अन्य पुत्रों की मृत्यु का संताप ना करो। वे सातों जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मेरे धाम आ चुके हैं। और अब दुःख किस बात का, जब मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में आ रहा हूँ।" इसके बाद भगवान ने देवकी-वसुदेव को उनके पिछले जन्मों का स्मरण कराते हुए बताया कि यह तीसरी बार है जब वे उनके पुत्र बनेंगे: 1️⃣ पहला जन्म (पृश्निगर्भ): स्वयंभू मन्वन्तर में तुम 'पृश्नि' थीं और वसुदेव 'सुतपा' (प्रजापति) थे। तुम्हारे 12,000 वर्षों के कठोर तप से प्रसन्न होकर, मैं 'पृश्निगर्भ' के रूप में तुम्हारा पुत्र बना। 2️⃣ दूसरा जन्म (वामन अवतार): तुम दोनों 'अदिति' और 'कश्यप' के रूप में जन्मे। तब मैंने 'उपेन्द्र' के रूप में तुम्हारे घर जन्म लिया। शरीर छोटा होने के कारण लोग मुझे 'वामन' भी कहते थे। 3️⃣ तीसरा जन्म (श्रीकृष्ण): अब इस द्वापर युग में, मैं 'कृष्ण' के रूप में पुनः तुम्हारे यहाँ जन्म ले रहा हूँ। मेरा यह रूप पिछले सभी अवतारों से श्रेष्ठ होगा और संपूर्ण संसार के कष्टों का हरण करेगा। अंतिम सत्य 🌅 यह जानकर देवकी और वसुदेव का सारा शोक समाप्त हो गया। उन्हें विश्वास हो गया कि कंस के अत्याचार की समाप्ति अब निकट है। उसी मध्यरात्रि, नारायण के वचनानुसार, देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ। 🦚 👇 कमेंट में प्रेम से लिखें - "जय श्री कृष्ण" और इस अद्भुत कथा को अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें! 🙏 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏 माँ वैष्णो देवी #🙏 जय माँ दुर्गा 🙏 #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🌷शुभ रविवार https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#✋भगवान भैरव🌸 क्या आप जानते हैं कि श्रीराम के अवतार श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण विदुषी तारा का एक श्राप था? पंचकन्याओं में से एक, महासती तारा के जीवन के रहस्य जानने के लिए पढ़ें यह लेख। 🙏✨ पञ्चसती श्रृंखला का यह तीसरा लेख है। मंदोदरी और अहिल्या के बाद, आज हम वानरराज बाली की पत्नी तारा के विषय में जानेंगे। उत्पत्ति और विवाह का अद्भुत प्रसंग 🌊 तारा के जन्म की सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, वे समुद्र मंथन के समय अन्य अप्सराओं के साथ प्रकट हुई थीं। उस मंथन में देवताओं की सहायता कर रहे वानरराज बाली और वानर वैद्य सुषेण, दोनों उनके रूप पर मोहित हो गए। सुषेण तारा के वाम (बाएं) भाग में और बाली दक्षिण (दाहिने) भाग में खड़े हो गए। तब भगवान विष्णु ने घोषित किया कि कन्या के वाम भाग में खड़ा व्यक्ति पिता और दक्षिण भाग वाला पति होता है। इस प्रकार सुषेण उनके पिता घोषित हुए और बाली उनका पति बना। तारा और बाली के पुत्र का नाम अंगद था। रामायण में विदुषी तारा की भूमिका 📖 तारा अत्यंत विदुषी और बुद्धिमान स्त्री थीं। रामायण में इनके जीवन से जुड़े तीन प्रमुख प्रसंग मिलते हैं: बाली को चेतावनी: जब सुग्रीव ने युद्ध के लिए ललकारा, तो तारा ने अपनी बुद्धिमत्ता से बाली को रोकने का प्रयास किया और बताया कि सुग्रीव की सहायता श्रीराम कर रहे हैं। धर्म का पालन: बाली के वध के पश्चात अत्यधिक शोक में होते हुए भी, तारा ने हनुमान जी द्वारा दिए गए अंगद के राज्याभिषेक के प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि सुग्रीव जीवित थे। ऐसी दारुण परिस्थिति में भी यह धर्मयुक्त आचरण तारा ही कर सकती थीं। लक्ष्मण जी का क्रोध शांत करना: जब राज्य पाकर सुग्रीव अपना वचन भूल गए, तो किष्किंधा में क्रोधित लक्ष्मण को शांत करने का साहस किसी में नहीं था। तब तारा ने ही अपने कोमल वचनों से महर्षि विश्वामित्र का उदाहरण देते हुए लक्ष्मण जी का क्रोध शांत किया था। श्रीराम को श्राप ⚡ अध्यात्म रामायण के अनुसार, पति की मृत्यु से शोकाकुल तारा ने श्रीराम को श्राप दिया था कि अगले जन्म में बाली ही उनकी मृत्यु का कारण बनेगा। इसी श्राप के प्रभाव से जब श्रीहरि ने श्रीकृष्ण अवतार लिया, तो बाली ने बहेलिये के रूप में जन्म लिया, जिसके बाण से श्रीकृष्ण ने निर्वाण प्राप्त किया। सुग्रीव से विवाह 🤝 बाली की मृत्यु के पश्चात, अपने पुत्र अंगद के भविष्य को सुरक्षित करने हेतु तारा किष्किंधा की राजमाता और सुग्रीव की पत्नी बनीं। महाभारत के अरण्य पर्व और रामायण, दोनों में यह वर्णित है कि बाली के मारे जाने के बाद किष्किंधा और तारा, दोनों सुग्रीव को प्राप्त हुए। अन्य पंचकन्याओं के समान तारा भी अक्षतयौवना थीं, अर्थात प्रतिदिन वह अपना कौमार्य प्राप्त कर लेती थीं। पुराणों के अनुसार, इन पाँचों सतियों का प्रतिदिन स्मरण करने से मनुष्य के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। अगले लेखों में हम अन्य दो सतियों - कुंती एवं द्रौपदी के विषय में जानेंगे। हमारे पेज से जुड़े रहें! 🙏 . ॥ सियापति रामचंद्र की जय ॥ ॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥ 🙏👇 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🌷शुभ रविवार #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🙏 माँ वैष्णो देवी #🙏 जय माँ दुर्गा 🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏 जय माँ दुर्गा 🙏 अग्नि से प्रकट हुई एक ऐसी नायिका, जिसके तेज ने पूरे आर्यावर्त का इतिहास बदल दिया! महर्षि मुद्गल की पत्नी 'इन्द्रसेना' से लेकर पांचाल की राजकुमारी 'कृष्णा' तक की यह महाकथा आपके मन-मस्तिष्क में एक अद्भुत दृश्य उकेर देगी। अग्नि से जन्मीं महासती याज्ञसेनी: द्रौपदी के जीवन का प्रामाणिक सत्य! 🔥🦚 द्रौपदी के चरित्र को समझे बिना महाभारत को समझना असंभव है। वे केवल पांचाल की राजकुमारी नहीं, बल्कि साक्षात इन्द्राणी शचि का अवतार थीं। आइए, आज उनके पूर्वजन्म से लेकर स्वर्गारोहण तक की यात्रा और उनके सतीत्व को गहराई से जानते हैं। 🌸 पूर्वजन्म का रहस्य: ५ पतियों का वरदान पूर्व काल में 'इन्द्रसेना' नामक कन्या का विवाह ऋषि मुद्गल से हुआ। विवाह के तुरंत बाद पति की मृत्यु होने के कारण वे वैवाहिक सुख से वंचित रह गईं। इन्द्रसेना (मुद्गलनी) ने महादेव की घोर तपस्या की और वरदान में एक ऐसा पति माँगा जो— धर्म का ज्ञाता, अपार बलशाली, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, सर्वाधिक सुन्दर और असीम सहनशील हो। महादेव ने समझाया कि एक पुरुष में ये सारे गुण असंभव हैं, किन्तु इन्द्रसेना ने हठपूर्वक 5 बार "वर देहि" कहा। इसी कारण शिव जी ने उन्हें अगले जन्म में इन ५ गुणों वाले ५ पतियों की प्राप्ति का वरदान दिया। 🔥 अग्नि से प्रादुर्भाव (जन्म) पांचाल नरेश द्रुपद ने द्रोणाचार्य से अपने अपमान का प्रतिशोध लेने हेतु एक महान यज्ञ किया। उस यज्ञ की वेदी से धृष्टद्युम्न और एक अत्यंत रूपवती कन्या का प्रादुर्भाव हुआ। द्रुपद की पुत्री होने के कारण वे द्रौपदी, पांचाल की होने से पांचाली, यज्ञ से प्रकट होने के कारण याज्ञसेनी और सांवले रंग के कारण कृष्णा कहलाईं। 🏹 स्वयंवर का सत्य और भ्रम द्रौपदी के स्वयंवर में घूमती हुई मछली की आँख बींधनी थी। कई लोग मानते हैं कि द्रौपदी ने कर्ण को सूतपुत्र कहकर अपमानित किया था, किन्तु महाभारत के दक्षिणात्य पाठ के अनुसार— महारथी कर्ण धनुष तो उठा सके, किन्तु प्रत्यंचा चढ़ाने में ही असफल रहे थे। अंततः ब्राह्मण वेश में अर्जुन ने लक्ष्य भेदकर द्रौपदी का वरण किया। ⚖️ पाँच पांडवों से विवाह और चिरकुमारी का वरदान जब माता कुंती ने अनजाने में द्रौपदी को पाँचों भाइयों में बांटने का आदेश दिया, तब महर्षि व्यास और श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को उनके पूर्वजन्म का शिव वरदान स्मरण कराया। युधिष्ठिर (धर्म) भीम (बल) अर्जुन (धनुर्विद्या) नकुल (सौंदर्य) सहदेव (सहनशीलता) सतीत्व को लेकर द्रौपदी के संशय को दूर करते हुए महर्षि व्यास ने उन्हें चिरकुमारी होने का वरदान दिया, जिससे प्रतिदिन उनका कौमार्य अक्षत हो जाता था। 🛡️ वनवास, अज्ञातवास और महासती का तेज अक्षय पात्र: वनवास के दौरान भगवान सूर्य ने द्रौपदी को एक 'अक्षय पात्र' दिया, जिससे पांडव हजारों ऋषियों का सत्कार कर सके। अपमान का प्रतिशोध: द्युत क्रीड़ा में दुःशासन द्वारा चीरहरण के प्रयास पर श्रीकृष्ण ने उनकी लाज बचाई। वहीं कीचक द्वारा अज्ञातवास में कुदृष्टि डालने पर भीम ने कीचक और उसके १०५ भाइयों का वध कर अपनी सती पत्नी की रक्षा की। 🏔️ स्वर्गारोहण: द्रौपदी का पतन क्यों हुआ? महाभारत युद्ध के बाद 36 वर्षों तक द्रौपदी पटरानी रहीं। जब पांडव स्वर्गारोहण कर रहे थे, तो द्रौपदी सबसे पहले मृत्यु को प्राप्त हुईं। युधिष्ठिर ने इसका कारण बताते हुए कहा— "यद्यपि वे पांचों की पत्नी थीं, किन्तु उनके हृदय में अर्जुन के प्रति प्रेम सर्वाधिक था।" इसी आंशिक पक्षपात के कारण उनका पतन पहले हुआ। 🛑 आधुनिक मिथक और सत्य आजकल के कुछ टीवी सीरियल्स और सस्ती किताबों ने इस महासती के चरित्र को विकृत करने का प्रयास किया है: ❌ द्रौपदी का कर्ण के प्रति आकर्षण: यह पूर्णतः असत्य और मनगढ़ंत है। ❌ "अंधे का पुत्र अंधा": मूल महाभारत में द्रौपदी द्वारा दुर्योधन को ऐसा कहने का कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता। यह समझना आवश्यक है कि ५ पुरुषों की पत्नी होते हुए भी वे एक महासती थीं। स्वयं रुक्मिणी और सत्यभामा जैसी सतियाँ उनसे सतीधर्म की शिक्षा लिया करती थीं। आइए, इस ज्ञानवर्धक श्रृंखला का अंत महापातक नाशक 'पंचकन्या श्लोक' से करें: अहिल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा। पंचकन्या स्मरणित्यं महापातक नाशक॥ (अर्थात: इन पाँच कन्याओं का प्रतिदिन स्मरण करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।)जय श्रीकृष्ण! 🙏🚩 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏 माँ वैष्णो देवी #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 #🌷शुभ रविवार #🚩जय श्रीराम🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🌷शुभ रविवार महादेव के वरदान से अजेय हुआ एक ऐसा योद्धा जिसे मारने के लिए स्वयं श्रीकृष्ण को युद्ध का मैदान छोड़कर भागना पड़ा! जानिए कालयवन की अनसुनी कहानी। 🙏✨ जन्म से ब्राह्मण, कर्म से राक्षस: कालयवन और श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला! 🦚✨ महाभारत काल में एक ऐसा योद्धा भी था जिसे हराना किसी भी सूर्यवंशी या चंद्रवंशी के लिए असंभव था। इस योद्धा का नाम था— कालयवन। अधिकतर लोगों को लगता है कि यवन मुस्लिम थे, किन्तु प्राचीन काल में यवन म्लेच्छों के राजवंश (ययाति के पुत्र 'द्रुहु' के वंश) से आते थे। कैसे हुआ कालयवन का जन्म? 🕉️ कालयवन जन्म से एक ब्राह्मण था। उसके पिता महर्षि 'शेशिरायण' ने महादेव की घोर तपस्या की और एक ऐसा पुत्र माँगा जिसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र मार ना सके। महादेव ने वरदान दिया, किन्तु एक शर्त भी रखी— "जिस दिन यह किसी ऐसे व्यक्ति का अपमान करेगा जिसे मृत्यु देने का वरदान प्राप्त हो, वही दिन इसका आखिरी दिन होगा।" महर्षि का विवाह देवराज इंद्र की अप्सरा रम्भा से हुआ और उन्हीं से कालयवन का जन्म हुआ। यवनराज कैसे बना एक ब्राह्मण पुत्र? 👑 मलीच देश के राजा 'कालजंग' ने अपने राज्य विस्तार के लिए महर्षि शेशिरायण से उनके इस अजेय पुत्र को दत्तक पुत्र के रूप में मांग लिया। वरदान के प्रभाव से कालयवन जल्द ही एक महाबली और निरंकुश शासक बन गया। सत्ता के नशे में उसने अपना मनुष्यत्व खो दिया और कर्म से पूरी तरह राक्षस बन बैठा। जरासंध से मित्रता और मथुरा पर आक्रमण ⚔️ जब जरासंध श्रीकृष्ण से 17 बार हारकर निराश हो चुका था, तब देवर्षि नारद की युक्ति से कालयवन भी श्रीकृष्ण का वध करने के लिए मथुरा आ पहुँचा। कालयवन के वरदान को जानते हुए, श्रीकृष्ण ने रातों-रात एक नया नगर 'द्वारका' बसाया और मथुरावासियों को वहाँ सुरक्षित भेज दिया। जब श्रीकृष्ण कहलाए 'रणछोड़' 🏃‍♂️💨 युद्ध के मैदान में जब कालयवन श्रीकृष्ण के सामने आया, तो भगवान ने एक अद्भुत लीला रची। वे कालयवन से युद्ध करने के बजाय रणभूमि छोड़कर भागने लगे! क्रोधित कालयवन उन्हें "रणछोड़-रणछोड़" कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा। (यहीं से प्रभु का नाम रणछोड़ पड़ा)। कालयवन का भस्म होना 🔥 भागते-भागते श्रीकृष्ण एक गहरी गुफा में पहुँचे जहाँ इक्ष्वाकु वंश के राजा मुचुकुन्द त्रेतायुग से सो रहे थे। देवराज इंद्र ने उन्हें वरदान दिया था कि जो भी उनकी नींद तोड़ेगा, वह उनके देखते ही भस्म हो जाएगा। श्रीकृष्ण ने अपना पीताम्बर (उत्तरीय) सोते हुए राजा मुचुकुन्द पर डाल दिया और स्वयं छिप गए। पीछे से आए कालयवन ने राजा मुचुकुन्द को ही कृष्ण समझ लिया और क्रोध में उन्हें जोर से लात मारी। जैसे ही राजा मुचुकुन्द की नींद टूटी और उन्होंने कालयवन की ओर देखा, महादेव का श्राप और इंद्र का वरदान एक साथ फलीभूत हुआ। पल भर में ही वह अजेय और निरंकुश कालयवन जलकर राख हो गया! 💥 भगवान श्रीकृष्ण की लीला अपरम्पार है। वे जहाँ बल काम नहीं आता, वहाँ अपनी बुद्धि और चतुराई से धर्म की रक्षा करते हैं। 🙏🌺 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🚩जय श्रीराम🙏 #🔱हर हर महादेव #🙏 माँ वैष्णो देवी #🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 संसार में सबसे अधिक सहनशील कौन है— जल, वायु, अग्नि, आकाश या कोई और? 🌍 संसार में सबसे अधिक सहनशील कौन है? 🌍 बहुत काल पहले विद्वानों की एक सभा में शास्त्रार्थ चल रहा था। तभी एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न उठा— "सृष्टि में वह कौन है जिसकी सहनशीलता अपार है?" विद्वानों ने अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए: किसी ने जल को चुना, जो कितने भी प्रहार सहे पर अंततः शांत हो जाता है। किसी ने वायु को बताया, जो जीव मात्र को जीने की शक्ति प्रदान करती है। किसी की दृष्टि में अग्नि श्रेष्ठ थी, जो संसार की समस्त अशुद्धियों को नष्ट कर देती है। तो किसी ने आकाश को चुना, जो आपदाओं से हमारी रक्षा करता है। ✨ ऋषि होत्र का अद्भुत उत्तर अंततः ऋषि होत्र ने सभा को संबोधित करते हुए कहा— "हे महानुभावों! आपके द्वारा बताए गए सभी तत्व निश्चय ही सहनशील हैं, किन्तु मेरे विचार से पृथ्वी (धरती माता) इन सब से अधिक सहनशील है।" जब सभी ने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बहुत ही सुंदर व्याख्या की: "जल में उफान आ सकता है, वायु तूफान बन सकती है, अग्नि दावानल का रूप ले सकती है और आकाश चक्रवातों को जन्म दे सकता है। किन्तु धरती, एक माता की भांति सारे कष्ट सहते हुए समस्त प्राणियों की रक्षा करती है।" 🌿 धरती माता की सहनशीलता के प्रमाण: वह मेघों से बरसने वाले जल को अपने भीतर सोखती है, ताकि वह मनुष्यों के काम आ सके। अपनी छाती पर हल चलने का कष्ट सहती है, ताकि संसार को अन्न प्राप्त हो सके। शेषनाग के फण पर स्थित होने के कारण भीतर इतनी हलचलों के बाद भी वह स्थिर रहती है, ताकि हमें एक सुरक्षित आधार मिल सके। मनुष्यों की तो बात ही क्या, वह सभी वनस्पतियों, पशु-पक्षियों और यहाँ तक कि छोटे-छोटे कीटों को भी स्वयं पर आश्रय देती है। यह सुनकर सभा में उपस्थित सभी विद्वानों ने ऋषि होत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की। 🙏 वेदों का अमूल्य संदेश हमारी सनातन संस्कृति में धरती को केवल मिट्टी नहीं, बल्कि माता माना गया है। इसी कारण वेदों में निर्देश है कि प्रतिदिन प्रातःकाल धरती पर चरण रखने से पहले यह श्लोक अवश्य पढ़ना चाहिए: समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व में।। अर्थात: हे धरती माता! आप समुद्र और पर्वतों को अपने हृदय में धारण करती हैं। आप स्वयं भगवान नारायण की अर्धांगिनी हैं। मैं आपके ऊपर अपने चरण रखने जा रहा हूँ, कृपया इसके लिए मुझे क्षमा करें। 🙏🌸 प्रकृति का सम्मान करें और अपनी सनातन संस्कृति पर गर्व करें! ।। ॐ नमः शिवाय ।। ।। हर हर महादेव ।। . !! जय जय श्री महाकाल !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🔱हर हर महादेव #🙏 माँ वैष्णो देवी #🚩जय श्रीराम🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
🪔अधिक भानु सप्तमी🙏📿 - समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मेंIl ০ Goddess, who has the oceans as her dress and is adorned Consort of Vishnu, I bow to you; with mountains as her breasts please forgive my foot stepping on you. समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मेंIl ০ Goddess, who has the oceans as her dress and is adorned Consort of Vishnu, I bow to you; with mountains as her breasts please forgive my foot stepping on you. - ShareChat
#🔱हर हर महादेव #🙏🙏 जय शनिदेव 🙏🙏 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🪔शुभ शनिवार🙏 #🚩नीम करोली बाबा 🙏
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