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🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
#🌷शुभ गुरुवार 🔱 मृत्यु : अंत नहीं, एक प्रक्रिया (वेद, योग, आयुर्वेद और पुराणों की दृष्टि से) भारतीय दर्शन में मृत्यु को अचानक घटित होने वाली घटना नहीं माना गया है, बल्कि यह एक दीर्घ प्रक्रिया है। योग और आयुर्वेद के अनुसार, चाहे मृत्यु काल मृत्यु हो या अकाल मृत्यु, उसकी तैयारी शरीर और चेतना में लगभग छह माह पूर्व आरंभ हो जाती है। जहाँ जन्म लेने में नौ माह लगते हैं, वहीं शरीर के क्षय की यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम समय—लगभग छह माह—में पूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि भारतीय योग परंपरा कहती है कि स्थूल शरीर में रोग प्रकट होने से पहले, वही विकार सूक्ष्म शरीर में जन्म ले चुका होता है। यदि उस अवस्था में साधना, संयम, आयुर्वेद और ध्यान द्वारा उपचार हो जाए, तो कई रोगों और अकाल मृत्यु को टाला जा सकता है। ⸻ 🌿 जन्म–मृत्यु का चक्र और चिरंजीवी की अवधारणा हिंदू शास्त्रों में जन्म और मृत्यु को एक अनवरत चक्र बताया गया है—जो कर्म के नियम से संचालित होता है। फिर भी पुराणों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ कुछ महापुरुषों ने इस चक्र को साधना से चुनौती दी। चिरंजीवी माने जाने वाले प्रमुख नाम हैं— • भगवान परशुराम • हनुमान जी • कृपाचार्य • अश्वत्थामा कहा जाता है कि ऋषि वशिष्ठ सशरीर अंतरिक्ष लोक में गमन कर गए और फिर दृष्टिगोचर नहीं हुए। ये कथाएँ इस विश्वास को पुष्ट करती हैं कि मृत्यु अटल होते हुए भी, उसकी समय-सीमा साधना से परिवर्तित की जा सकती है। ⸻ 🍶 सोम रस और अमृत की अवधारणा पुराणों के अनुसार जरा और मृत्यु के विनाश हेतु देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। सोम को ऐसा दिव्य रस माना गया जिससे मृत्यु पर भी विजय संभव थी। आज भी यह विषय शोध और रहस्य का केंद्र है कि कौन-सा आहार, औषधि या रस शरीर और चेतना पर किस प्रकार का भविष्य रचता है। ⸻ ⚕️ आयुर्वेद में मृत्यु के प्रकार धन्वंतरि और अन्य आयुर्वेदाचार्यों ने 100 प्रकार की मृत्यु का वर्णन किया है, जिनमें 18 प्रमुख मानी गई हैं। • काल मृत्यु – जब शरीर अपनी निर्धारित आयु पूर्ण कर ले • अकाल मृत्यु – रोग, दुर्घटना, हिंसा, आत्महत्या आदि से आयुर्वेद का समस्त निदान-तंत्र अकाल मृत्यु को रोकने के प्रयास पर आधारित है। आयु की न्यूनाधिक्य की सूक्ष्म गणना भी ग्रंथों में वर्णित है। ⸻ 🔮 तंत्र-ज्योतिष और मृत्यु पर नियंत्रण आयुर्वेद के अनुसार मृत्यु के तीन भेद माने गए हैं— 1. आदिदैविक 2. आदिभौतिक 3. आध्यात्मिक पहले दो प्रकार की मृत्यु को तंत्र और ज्योतिषीय उपायों से टाला जा सकता है, किंतु आध्यात्मिक मृत्यु पूर्णतः प्रारब्ध से जुड़ी होती है—उसमें हस्तक्षेप संभव नहीं। ⸻ 📜 वेद-पुराणों में मृत्यु का दर्शन गरुड़ पुराण, शिव पुराण और ब्रह्म पुराण में मृत्यु, मृत्यु-पश्चात जीवन और आत्मा की गति का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसी कारण हिंदू परंपरा में मृत्यु के बाद गीता और गरुड़ पुराण का पाठ किया जाता है—ताकि आत्मा को सही ज्ञान मिले और उसकी आगे की यात्रा निर्बाध हो। ⸻ ⚠️ मृत्यु-पूर्वाभास के पारंपरिक संकेत (ये संकेत शास्त्रीय मान्यताओं पर आधारित हैं, वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध नहीं) शास्त्रों के अनुसार मृत्यु से पूर्व व्यक्ति स्वयं कुछ विशिष्ट अनुभव करने लगता है, जैसे— • बार-बार आँखों के सामने अंधेरा छाना • दर्पण या जल में अपनी परछाई विकृत दिखना • चंद्रमा दो भागों में दिखाई देना • शरीर से असामान्य गंध आना (मृत्यु-गंध) • श्वास-प्रश्वास की लय का अत्यंत अव्यवस्थित हो जाना • केवल एक नासिका से लंबे समय तक श्वास चलना • अचानक रंग, रस और गंध की अनुभूति उलटी हो जाना • मृत्यु से कुछ दिन पूर्व आसपास किसी “साया” होने का आभास ⸻ 🐕 पशु और मृत्यु-संकेत लोकमान्यता है कि कुत्ते और बिल्लियाँ अपनी तीव्र घ्राण शक्ति से मृत्यु-गंध को पहचान लेते हैं। इसी कारण उनके असामान्य रोने को अपशकुन से जोड़ा गया है। ⸻ 🕉️ निष्कर्ष भारतीय दर्शन में मृत्यु डर नहीं, बल्कि यात्रा का पड़ाव है। योग, आयुर्वेद और साधना का उद्देश्य मृत्यु से भागना नहीं, बल्कि— “सचेत, संतुलित और सार्थक जीवन जीना” जब जीवन शुद्ध होता है, तब मृत्यु भी भयावह नहीं रहती—वह केवल वस्त्र परिवर्तन बन जाती है। !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🙏गुरु महिमा😇 #🪔द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी 🌺 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏कर्म क्या है❓
🌷शुभ गुरुवार - ai 6o'l ai 6o'l - ShareChat
#🌷शुभ गुरुवार हम RO का पानी पीते हैं, लेकिन आयुर्वेद किसे 'बेस्ट' मानता है? 🌧️💧 ​आज से हम अष्टांगहृदयम् का अध्याय 5 (द्रवद्रव्य विज्ञानीय) शुरू कर रहे हैं। इस पूरे चैप्टर में हम पीने वाली चीजों (Liquid Foods) पर बात करेंगे। शुरुआत सबसे जरूरी चीज से— पानी (Water)। ​📖 श्लोक: जीवनं तर्पणं हृद्यं ह्लादि बुद्धिप्रबोधनम्। (सूत्रस्थान, अध्याय 5, श्लोक 1) ​महर्षि वाग्भट के अनुसार, दुनिया का सबसे शुद्ध और ताकतवर पानी "गांगं वारि" (Rain Water) है। (लेकिन वह जो साफ बर्तन में इकट्ठा किया गया हो, न कि छत से बहता हुआ गंदा पानी)। ​💎 वर्षा जल के गुण: ​जीवनं: यह साक्षात् जीवन है। ​तर्पणं: यह तुरंत प्यास बुझाता है और शरीर को तृप्त करता है। ​बुद्धिप्रबोधनम्: यह दिमाग को तेज करता है। ​लघु: यह पचने में सबसे हल्का होता है (RO पानी से भी हल्का)। ​आजकल पॉल्यूशन (Pollution) के कारण हम बारिश का पानी सीधे नहीं पी सकते, लेकिन 'उबाला हुआ पानी' (Boiled Water) इसके सबसे करीब होता है। ​क्या आप जानते थे कि बारिश का पानी स्टोर करके पिया जा सकता है? 👇 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🪔द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी 🌺 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏गुरु महिमा😇
🌷शुभ गुरुवार - ShareChat
#🪔द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी 🌺 अप्सराएँ हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है। अप्सराओं का मुख्य कार्य इंद्र एवं अन्य देवताओं को प्रसन्न रखना था। विशेषकर गंधर्वों और अप्सराओं का सहचर्य बहुत घनिष्ठ माना गया है। गंधर्वों का संगीत और अप्सराओं का नृत्य स्वर्ग की शान मानी जाती है। अप्सराएँ पवित्र और अत्यंत सम्माननीय मानी जाती है। अप्सराओं को देवराज इंद्र यदा-कड़ा महान तपस्वियों की तपस्या भंग करने को भेजते रहते थे। पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जब किसी तपस्वी की तपस्या से घबराकर, कि कहीं वो त्रिदेवों से स्वर्गलोक ही ना मांग लें, देवराज इंद्र ने कई अप्सराओं को पृथ्वी पर उनकी तपस्या भंग करने को भेजा। अप्सराओं का सौंदर्य ऐसा था कि वे सामान्य तपस्वियों की तपस्या को तो खेल-खेल में भंग कर देती थी। हालाँकि ऐसे भी महान ऋषि हुए हैं जिनकी तपस्या को अप्सरा भंग ना कर पायी और उन्हें उनके श्राप का भाजन करना पड़ा। महान ऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को रम्भा भंग ना कर पायी और उसे महर्षि के श्राप को झेलना पड़ा किन्तु बाद में वही विश्वामित्र मेनका के सौंदर्य के आगे हार गए। उर्वशी ने भी कई महान ऋषियों की तपस्या भंग की किन्तु मार्कण्डेय ऋषि के समक्ष पराजित हुई। अप्सराओं को उपदेवियों की श्रेणी का माना जाता है। वे मनचाहा रूप बदल सकती हैं और वरदान एवं श्राप देने में भी सक्षम मानी जाती है। कई अप्सराओं ने अनेक असुरों और दैत्यों के नाश में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसमें से तिलोत्तमा का नाम उल्लेखनीय है जो सुन्द-उपसुन्द की मृत्यु का कारण बनी। रम्भा को कुबेर के पुत्र नलकुबेर के पास जाने से जब रावण रोकता है और उसके साथ दुर्व्यहवार करता है तब वो रावण को श्राप देती है कि यदि वो किसी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। उसी श्राप के कारण रावण देवी सीता को उनकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श ना कर सका। उर्वशी ने अर्जुन को १ वर्ष तक नपुंसक रहने का श्राप दिया था। पुराणों में कुल १००८ अप्सराओं का वर्णन है जिनमे से १०८ प्रमुख अप्सराओं की उत्पत्ति देवराज इंद्र ने की थी। उन १०८ अप्सराओं में भी ११ अप्सराओं को प्रमुख माना जाता है। उन ११ अप्सराओं में भी ४ अप्सराओं का सौंदर्य अद्वितीय माना गया है। ये हैं - रम्भा, उर्वशी, मेनका और तिलोत्तमा। रम्भा सभी अप्सराओं की प्रधान और रानी है। कई अप्सराएं ऐसी भी हैं जिन्हे पृथ्वीलोक पर रहने का श्राप मिला था जैसे बालि की पत्नी तारा, दैत्यराज शम्बर की पत्नी माया और हनुमान की माता अंजना। अप्सराएँ दो प्रकार की मानी गयी हैं: दैविक: ऐसी अप्सराएँ जो स्वर्ग में निवास करती हैं। रम्भा सहित मुख्य ११ अप्सराओं को दैविक अप्सरा कहा जाता है। लौकिक: ऐसी अप्सराएँ जो पृथ्वी पर निवास करती हैं। जैसे तारा, माया, अंजना इत्यादि। इनकी कुल संख्या ३४ बताई गयी है। अप्सराओँ को सौभाग्य का प्रतीक भी माना गया है। कहते हैं अप्सराओं का कौमार्य कभी भंग नहीं होता और वो सदैव कुमारी ही बनी रहती है। समागम के बाद अप्सराओं को उनका कौमार्य वापस प्राप्त हो जाता है। उनका सौंदर्य कभी क्षीण नहीं होता और ना ही वे कभी बूढी होती हैं। उनकी आयु भी बहुत अधिक होती है। मार्कण्डेय ऋषि के साथ वार्तालाप करते हुए उर्वशी कहती है - हे महर्षि! मेरे सामने कितने इंद्र आये और कितने इंद्र गए किन्तु मैं वही की वही हूँ। जब तक १४ इंद्र मेरे समक्ष इन्द्रपद को नहीं भोग लेते मेरी मृत्यु नहीं होगी। ये भी जानने योग्य है कि भारतवर्ष का सर्वाधिक प्रतापी पुरुवंश स्वयं अप्सरा उर्वशी की देन है। उनके पूर्वज पुरुरवा ने उर्वशी से विवाह किया जिससे आगे पुरुवंश चला जिसमे ययाति, पुरु, यदु, दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती, शांतनु, भीष्म और श्रीकृष्ण पांडव जैसे महान राजाओं और योद्धाओं ने जन्म लिया। उन्ही के दूसरे वंशबेल में इक्षवाकु कुल में भगवान श्रीराम ने जन्म लिया। अन्य संस्कृतियों में जैसे ग्रीक धर्म में भी अप्सराओं का वर्णन है। इसके अतिरिक्त कई देशों जिनमे से इंडोनेशिया, कम्बोडिया, चीन और जावा में अप्सराओं का बहुत प्रभाव है। आइये मुख्य अप्सराओं और उनके मन्त्रों के विषय में जानते हैं: प्रधान अप्सरा - रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा ३ सर्वोत्तम अप्सराएँ: उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा मेनका तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा ७ प्रमुख अप्सराएँ: कृतस्थली पुंजिकस्थला प्रम्लोचा अनुम्लोचा घृताची वर्चा पूर्वचित्ति अन्य प्रमुख अप्सराएँ: अम्बिका अलम्वुषा अनावद्या अनुचना अरुणा असिता बुदबुदा चन्द्रज्योत्सना देवी गुनमुख्या गुनुवरा हर्षा इन्द्रलक्ष्मी काम्या कांचन माला: ॐ श्री कांचन माले आगच्छागच्छ स्वाहा कर्णिका केशिनी कुण्डला हारिणि: ॐ श्री ह्रीं कुण्डला हारिणि आगच्छागच्छ स्वाहा क्षेमा लता लक्ष्मना मनोरमा मारिची मिश्रास्थला मृगाक्षी नाभिदर्शना पूर्वचिट्टी पुष्पदेहा भूषिणि: ॐ वाः श्री वाः श्री भूषिणि आगच्छागच्छ स्वाहा रक्षिता रत्नमाला: ॐ श्री ह्रीं रत्नमाले आगच्छागच्छ स्वाहा ऋतुशला साहजन्या समीची सौरभेदी शारद्वती शुचिका सोमी सुवाहु सुगंधा सुप्रिया सुरजा सुरसा सुराता शशि: ॐ श्री शशि देव्या मा आगच्छागच्छ स्वाहा उमलोचा !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌸जय सिया राम #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🕉️सनातन धर्म🚩
🪔द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी 🌺 - अप्सराएंः नर्तको या देवियां२ अप्सराएंः नर्तको या देवियां२ - ShareChat
#🪔द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी 🌺 🌿🕉️ निधिवन, वृंदावन: जहाँ आज भी रात्रि में साक्षात राधा-कृष्ण रास रचाते हैं 🕉️🌿 — आस्था, रहस्य और दिव्यता से भरा वह वन, जिसे आज भी मनुष्य समझ नहीं पाया ⸻ ✨ भूमिका ब्रजभूमि का कण-कण श्रीकृष्ण की लीलाओं से पावन है, किंतु वृंदावन का निधिवन उन सभी स्थानों में सबसे अधिक रहस्यमयी, दिव्य और चमत्कारिक माना जाता है। यह कोई साधारण उपवन नहीं, बल्कि वह स्थल है जहाँ आज भी हर रात राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण गोपियों संग महारास रचाते हैं—ऐसा श्रद्धालुओं और संतों का अटूट विश्वास है। निधिवन केवल भक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि नियम, मर्यादा और दिव्य चेतावनी का स्थान है। यहाँ की कथाएँ जितनी भावविभोर करने वाली हैं, उतनी ही नियमभंग करने वालों के लिए भयावह भी। ⸻ 🌙 सूर्यास्त के बाद निषिद्ध निधिवन निधिवन में प्रतिदिन शाम की आरती के बाद मंदिर और वन के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। स्थानीय संतों, पुजारियों और ब्रजवासियों का स्पष्ट नियम है— “सूर्यास्त के बाद निधिवन में कोई भी जीव नहीं रुकता।” यहाँ तक कि: • दिन भर उछल-कूद करने वाले बंदर • पक्षियों की चहचहाहट • पशुओं की हलचल सब कुछ अचानक शांत हो जाता है, मानो प्रकृति स्वयं संकेत दे रही हो कि अब यह क्षेत्र मानव लोक का नहीं रहा। कहा जाता है कि रात्रि में यहाँ अलौकिक प्रकाश, मधुर बांसुरी की ध्वनि और घुँघरुओं की आहट अनुभव की जाती है—लेकिन देखने वाला कोई नहीं। ⸻ ⚠️ रास देखने का दंड: आस्था की चेतावनी लोकमान्यता है कि जो व्यक्ति छिपकर रास लीला देखने का प्रयास करता है, उसका अंत शुभ नहीं होता। कई कथाओं में बताया जाता है कि ऐसे लोग: • अंधे, बहरे या गूंगे हो गए • मानसिक संतुलन खो बैठे • जीवन भर भय और भ्रम में जीते रहे इसका कारण यही बताया जाता है कि— दिव्य लीला को देखने की शक्ति सामान्य मनुष्य की आँखों में नहीं होती। यह केवल भय नहीं, बल्कि यह संदेश है कि ईश्वर को देखने से पहले स्वयं को शुद्ध करना आवश्यक है। ⸻ 🌳 टेढ़े-मेढ़े वृक्ष: गोपियों का जीवंत स्वरूप निधिवन के वृक्ष संसार के किसी भी वन से भिन्न हैं। 🌿 यहाँ: • पेड़ों की शाखाएँ ऊपर नहीं, नीचे की ओर झुकी हुई हैं • शाखाएँ आपस में गुँथी हुई प्रतीत होती हैं • कोई भी वृक्ष पूर्ण सीधा नहीं है 🌸 मान्यता कहा जाता है कि ये साधारण वृक्ष नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की गोपियाँ हैं। रात्रि में ये वृक्ष: • अपना वृक्ष रूप त्यागकर • गोपी रूप धारण करती हैं • और राधा-कृष्ण संग रास में सम्मिलित होती हैं प्रातः होते ही पुनः वृक्ष बन जाती हैं—यह लीला मानव बुद्धि से परे है। ⸻ 🏰 रंग महल: जहाँ रात्रि की तैयारी होती है निधिवन के भीतर स्थित ‘रंग महल’ इस रहस्य का सजीव प्रमाण माना जाता है। प्रतिदिन पुजारी द्वारा यहाँ: • राधा रानी के लिए साड़ी, चूड़ियाँ, चंदन, श्रृंगार सामग्री • श्रीकृष्ण के लिए दातुन और जल का लोटा • सेज (बिस्तर) और पान सजाकर रखे जाते हैं 🌙 रात्रि में महल बंद कर दिया जाता है। 🌅 प्रातः का रहस्य सुबह जब द्वार खोले जाते हैं तो: • बिस्तर अस्त-व्यस्त मिलता है • पान चबाया हुआ होता है • श्रृंगार सामग्री उपयोग में लाई हुई प्रतीत होती है पुजारी कभी भीतर रुकने का साहस नहीं करते—क्योंकि जहाँ स्वयं भगवान विराजमान हों, वहाँ मानव की उपस्थिति अनुचित मानी जाती है। ⸻ 🎶 स्वामी हरिदास और बांके बिहारी का प्राकट्य निधिवन केवल रास लीला का स्थल नहीं, बल्कि भक्ति संगीत की अमर भूमि भी है। यहीं संत स्वामी हरिदास जी अपनी कुटिया में: • मधुर पद • राधा-कृष्ण की लीलाओं का गायन करते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर राधा-कृष्ण साक्षात प्रकट हुए। लेकिन: • उनकी दिव्यता इतनी तेजस्वी थी कि • साधारण मनुष्य उसे सहन नहीं कर सकता था स्वामी हरिदास जी की प्रार्थना पर राधा-कृष्ण एक संयुक्त विग्रह में प्रकट हुए— 🌸 श्री बांके बिहारी जी 🌸 जो आज वृंदावन की आत्मा हैं। ⸻ 🌱 तुलसी वन: जोड़ों में खड़ी चेतना निधिवन की एक और अद्भुत विशेषता है— 🌿 यहाँ तुलसी के पौधे हमेशा जोड़ों में होते हैं। मान्यता है: • यदि कोई व्यक्ति यहाँ से एक भी पत्ता तोड़कर ले जाए, • तो वह गंभीर संकट में फँस जाता है क्योंकि यह स्थान भोग का नहीं, समर्पण का है। ⸻ 🕉️ आध्यात्मिक संदेश निधिवन हमें सिखाता है— 🔹 ईश्वर लीला आज भी जीवित है 🔹 भक्ति नियम और मर्यादा से जुड़ी है 🔹 हर सत्य देखने योग्य नहीं होता 🔹 कुछ रहस्य केवल अनुभव के लिए होते हैं, प्रमाण के लिए नहीं ⸻ 🌺 निष्कर्ष निधिवन कोई पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आस्था की परीक्षा भूमि है। यहाँ तर्क मौन हो जाता है और श्रद्धा बोलती है। जो झुककर आता है—वह कृपा पाता है। जो देखने की जिद करता है—वह भय पाता है। 🕉️ जय श्री राधे! जय श्रीकृष्ण! 🕉️ !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌸जय सिया राम
🪔द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी 🌺 - निधिवन व्रूंदावन जहों आज भी रात्रि में साक्थात रायों कूण्ण राय रयाते हे ओ giaئaa fea ffa মরব ত২ ক তাবুমা नलरल उचदत उख्नी हाे निवनयन कर थहाली हीर guia a ara ffa ffaaa নিহল্ বক্কা নন ক২ মিহলাল ই वो वुमः गोपियो को पग उदिस माम जॉतंत खरप पडविगे चे बलिवने , सरपु र्त झव्मला ले எகளச்கசு कपुल ममरयत शांत हीता यहे = पराली जावन हरने राम पकिका थारत पायन्स रडन केशार घमरे रेग् महल ; लहों राचि की तेयारी हेसेहि थॉर तेज वीववत ररन स्ल सी आतारों थॉर वह्े रडन लरे थाता खवानी इरिदार ओर चांकै विढारीं का पाकदय खये हैं मुवप अद्रव्यन ख्ुष््प सम्पबाये के ।खूली वीबिव कर मरयर ऊस् सी रहै यह मया रर्मन का निथियत आथ्था ऑर नियत को पयटाा गूनि हैॅ॰ः श्रकृष्ण ! ಕ7 ಖT 2u जय 0 निधिवन व्रूंदावन जहों आज भी रात्रि में साक्थात रायों कूण्ण राय रयाते हे ओ giaئaa fea ffa মরব ত২ ক তাবুমা नलरल उचदत उख्नी हाे निवनयन कर थहाली हीर guia a ara ffa ffaaa নিহল্ বক্কা নন ক২ মিহলাল ই वो वुमः गोपियो को पग उदिस माम जॉतंत खरप पडविगे चे बलिवने , सरपु र्त झव्मला ले எகளச்கசு कपुल ममरयत शांत हीता यहे = पराली जावन हरने राम पकिका थारत पायन्स रडन केशार घमरे रेग् महल ; लहों राचि की तेयारी हेसेहि थॉर तेज वीववत ररन स्ल सी आतारों थॉर वह्े रडन लरे थाता खवानी इरिदार ओर चांकै विढारीं का पाकदय खये हैं मुवप अद्रव्यन ख्ुष््प सम्पबाये के ।खूली वीबिव कर मरयर ऊस् सी रहै यह मया रर्मन का निथियत आथ्था ऑर नियत को पयटाा गूनि हैॅ॰ः श्रकृष्ण ! ಕ7 ಖT 2u जय 0 - ShareChat
विश्वास वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में भी प्रकाश लाया जा सकता है। 🙏✨सच्ची भक्ति और साफ़ दिल, ईश्वर को सबसे प्रिय है। #🌷शुभ बुधवार #🌸जय सिया राम #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩
🌷शुभ बुधवार - शुभ बुधबार सूर्यकोटि समप्रभ "वक्रतुण्ड महाकाय 4 निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा II शुभ बुधबार सूर्यकोटि समप्रभ "वक्रतुण्ड महाकाय 4 निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा II - ShareChat
माथे पर तिलक लगाना केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानसिक संतुलन और एकाग्रता से जुड़ा गहरा भाव भी छिपा हुआ है। भारतीय योग और ध्यान पद्धति में दोनों भौहों के बीच स्थित स्थान को ‘आज्ञा चक्र’ कहा जाता है। इसे शरीर का ऊर्जा केंद्र माना जाता है, जहाँ से सोचने-समझने की शक्ति, स्मरण क्षमता और मानसिक शांति नियंत्रित होती है। जब इस स्थान पर तिलक लगाया जाता है — चाहे वह चंदन का हो, कुमकुम का या भस्म का — तो वहां हल्का दबाव और ठंडक महसूस होती है। इससे नसों को आराम मिलता है और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि पूजा, ध्यान या किसी शुभ कार्य से पहले तिलक लगाने की परंपरा चली आ रही है। तिलक लगाने के मुख्य लाभ ✅ एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता है ✅ मन को शांत और स्थिर करता है ✅ तनाव और बेचैनी कम करता है ✅ ध्यान में गहराई लाता है ✅ सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है योग विज्ञान के अनुसार आज्ञा चक्र सक्रिय होने पर व्यक्ति की सोच स्पष्ट होती है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि माथे का यह भाग ब्रेन से सीधे जुड़ा होता है, जहाँ हल्का स्पर्श या दबाव मानसिक शांति देता है। निष्कर्ष तिलक केवल माथे की शोभा नहीं है, बल्कि यह: 🌿 मन को केंद्रित करने का माध्यम 🌿 ऊर्जा को संतुलित करने का बिंदु 🌿 और मानसिक शक्ति को जाग्रत करने का साधन है इसलिए तिलक को अंधविश्वास नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक उपहार समझना चाहिए। !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌷शुभ बुधवार #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌸जय सिया राम
🌷शुभ बुधवार - तिलक कै 3 मुख्यप्रकार UNSEEN GK त्रिपुंड (शिव भक्त) UNSEEN GK उर्ध्वपुंड्र (विष्णु भक्त) रोली।कुंकुम (शक्ति भक्त) UNSEEN GK तिलक कै 3 मुख्यप्रकार UNSEEN GK त्रिपुंड (शिव भक्त) UNSEEN GK उर्ध्वपुंड्र (विष्णु भक्त) रोली।कुंकुम (शक्ति भक्त) UNSEEN GK - ShareChat
'नारी' प्रकृति-स्वरूप है, 'नारी' शक्ति स्त्रोत। 'जीव' नारि पूजन करो, 'नारी' जीवन ज्योत॥१॥ 🌹🌹 पोस्ट संख्या 322-1 🌹🌹 🏵️ यत्र नार्यास्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवताः। 🏵️ 🙏🙏🙏 जय मातेश्वरि! भगवती-स्वरूपा समस्त नारियों के श्रीचरणों में नमस्कार है। नारी, शक्ति का ही स्वरूप है। परमप्रकृति ही नारी है। भारतीय संस्कृति में नारीको मातृदेवता कहा गया है। पुत्र भले ही कुपुत्र निकल जाये परन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती। जहाँ नारीकी पूजा होती है, वहाँ पर हमेशा सभी देवता निवास करते हैं और जहाँ उनकी पूजा नहीं होती, वहाँ सभी प्रकार के धर्मकार्य विफल हो जाते हैं। जिस घरमें स्त्रियाँ विषाद को, दुःख को प्राप्त होती हैं। उस कुल की बर्बादी को कोई नहीं रोक सकता। इसके विपरीत, जिस घर में स्त्रियाँ आनन्द में रहती हैं वह कुल, परिवार निरन्तर कीर्ति, यश, प्रतिष्ठा, समृद्धि को प्राप्त होता है। श्रीमद्देवीभागवत् में कहा गया हैै- विद्याः समस्तास्तव देवी भेदाः स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु॥ या याश्च ग्राम्यदेव्यः स्युस्ताः सर्वाः प्रकृतेः कलाः। कलांशांशसमुद्भूताः प्रतिविश्वेषु योषितः॥ समस्त विद्या और सब स्त्रियाँ देवी का ही रूप हैं। सभी ग्राम्य देवियाँ और समस्त विश्वस्थिता स्त्रियाँ प्रकृति माता की अंशरूपणी हैं। इसलिये, यदि हम अपना कल्याण चाहते हैं तो केवल निज पत्नीके प्रति अर्द्धाङ्गिनी का भाव रख उसे उचित सम्मान देते हुए विश्व की समस्त नारियों के प्रति मातृभाव रखते हुए व्यहार करें। आद्याशक्ति भगवती हमारा निश्चितरूप से कल्याण करेगीं। 🏵️ भवदीय-अशोक कुमार खरे 'जीव' 🏵️ 'नारी' प्रकृति-स्वरूप है, 'नारी' शक्ति स्त्रोत। 'जीव' नारि पूजन करो, 'नारी' जीवन ज्योत॥१॥ 'नारी' जन्मप्रदायिनी, तासों 'माँ' कहलाई। जग माई सम देवता, अउर न दे दिखलाई॥२॥ जग महुँ जेती नारियाँ, करो सदा सत्कार। नारि मान 'जगदंबिका', परिहरि काम बिकार॥३॥ देखे 'पूत' कपूत पर, 'मातु' कुमातु न होय। देवी सम सब 'नारियाँ', यह मन राखो गोय॥४॥ जहँ 'नारी' पूजन तहाँ, सब देवन करि वास। 'जीव' अवज्ञा नारि जहँ, तहँ सब कारज नास॥५॥ (भवदीय-अशोक कुमार खरे 'जीव') ३०/०१/२०२६ 🌹सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।🌹 🌹शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥🌹 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌷शुभ बुधवार #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌸जय सिया राम
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#🌷शुभ बुधवार 33 कोटी देवी देवता #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌸जय सिया राम
🌷शुभ बुधवार - ३३कोटि देवी देवता : ३३ प्रकारकेदेवता = 330 123f 115 8 9{ आर्यमा fa धता अहिखुध्य अजाकपत 3 GIIl विवास्वन gu िरूपक्ष रवतत ٥٤ Cu अंश பN QP] बहुरूप विष्णु त्वाष्ट्र द्वयंबक வa अंश भाग इन्द्र और प्रजापति पिनकी विष्णु त्वाष्ट्र प्रजापति अपराजिता ~   ३३कोटि देवी देवता : ३३ प्रकारकेदेवता = 330 123f 115 8 9{ आर्यमा fa धता अहिखुध्य अजाकपत 3 GIIl विवास्वन gu िरूपक्ष रवतत ٥٤ Cu अंश பN QP] बहुरूप विष्णु त्वाष्ट्र द्वयंबक வa अंश भाग इन्द्र और प्रजापति पिनकी विष्णु त्वाष्ट्र प्रजापति अपराजिता ~ - ShareChat
#🌷शुभ बुधवार प्रसंग मन चंगा तो कठौती में गंगा एक बार संत रविदास जी अपनी छोटी सी दुकान में बैठकर जूते बना रहे थे। वे अपने काम में बहुत मग्न थे और उसे ही पूजा मानते थे। तभी वहाँ से एक पंडित जी (ब्राह्मण) गुजरे जो गंगा स्नान (गंगा नहाने) के लिए जा रहे थे। पंडित जी ने रविदास जी से पूछा, "अरे भाई, तुम भी चलो गंगा स्नान करने, बहुत पुण्य मिलेगा।" रविदास जी ने विनम्रता से कहा, "पंडित जी, मेरा मन तो बहुत है, लेकिन मैंने एक ग्राहक को आज ही जूते देने का वादा किया है। अगर मैं गंगा नहाने गया, तो मेरा वचन टूट जाएगा और मेरा काम अधूरा रह जाएगा। मेरे लिए मेरा कर्म ही धर्म है।" फिर रविदास जी ने अपनी गुल्लक से एक सुपारी (या सिक्का) निकाला और पंडित जी को देते हुए कहा, "पंडित जी, मेरी तरफ से यह छोटी सी भेंट माँ गंगा को दे देना। लेकिन एक शर्त है—यह भेंट तभी देना जब माँ गंगा खुद अपने हाथ बढ़ाकर इसे स्वीकार करें, वरना वापस ले आना।" पंडित जी हँसे और सोचने लगे कि गंगा मैया साक्षात् हाथ कैसे बढ़ाएंगी? पर उन्होंने सुपारी रख ली। गंगा घाट पहुँचकर पंडित जी ने स्नान किया और मजाक में कहा, "हे गंगा मैया! रविदास ने यह भेंट भेजी है, अगर स्वीकार हो तो हाथ बढ़ाकर ले लो।" तभी एक चमत्कार हुआ! गंगा नदी की लहरों से साक्षात् दो हाथ बाहर निकले और उस भेंट को स्वीकार कर लिया। बदले में गंगा मैया ने पंडित जी को एक सोने का कंगन (Bangle) दिया और कहा, "यह मेरे भक्त रविदास को दे देना।" पंडित जी के मन में लालच आ गया। उन्होंने वो कंगन रविदास जी को देने के बजाय राजा को दे दिया ताकि इनाम मिल सके। रानी को वो कंगन बहुत पसंद आया और उसने दूसरे कंगन की मांग कर दी। अब पंडित जी फँस गए क्योंकि दूसरा कंगन तो था ही नहीं। राजा ने कहा, "दूसरा लाओ वरना सजा मिलेगी।" डरते हुए पंडित जी रविदास जी के पास पहुँचे और रोते हुए सच बता दिया। रविदास जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "पंडित जी, घबराइए मत।" उन्होंने अपनी चमड़ा भिगोने वाली कठौती (मिट्टी या लकड़ी का बर्तन जिसमें पानी भरा होता है) में हाथ डाला और माँ गंगा का आह्वान किया। देखते ही देखते, उस छोटे से कठौती के पानी से गंगा मैया प्रकट हुईं और दूसरा सोने का कंगन रविदास जी के हाथ में रख दिया। यह देखकर पंडित जी उनके चरणों में गिर पड़े। तब संत रविदास जी ने यह दोहा कहा: "मन चंगा तो कठौती में गंगा" (अर्थात्: यदि आपका मन पवित्र है और नीयत साफ है, तो तीर्थ जाने की जरूरत नहीं, ईश्वर आपके पास ही हैं।) !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌸जय सिया राम
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#🌷शुभ बुधवार 🌸 सूनी गोद भरने के लिए लाल किताब का अद्भुत रहस्य 🌸 संतान सुख में बाधा आना केवल शारीरिक समस्या नहीं, कई बार यह ग्रह दोष या पूर्व जन्म के संस्कारों का फल भी होता है। जब दवा काम न करे, तो दुआ और पुराने नुस्खे चमत्कार कर जाते हैं। ✨ लाल किताब का यह सरल उपाय, पूर्ण श्रद्धा से करने पर संतान प्राप्ति के योग बनाता है। 👇 🔴 अचूक उपाय: 3 सरल चरण 🔴 1️⃣ रक्षा सूत्र: गर्भधारण (Conception) होते ही गर्भवती महिला अपनी दाईं कलाई (Right Wrist) में लाल रंग का शुद्ध धागा बांध लें। मन में केवल संतान की मंगल कामना रखें। 🧵 2️⃣ गौ सेवा: प्रतिदिन अपने भोजन का आधा हिस्सा निकालकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिलाएं। यह गर्भस्थ शिशु के संस्कारों और सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। 🐄 3️⃣ जन्म के बाद: शिशु के जन्म के बाद, माता अपनी कलाई से वह धागा खोलकर शिशु की कलाई में बांध दें। ✨ इस उपाय का प्रभाव: ✅ गर्भ की रक्षा होती है। ✅ शिशु स्वस्थ और दीर्घायु होता है। ✅ संतान सुख की बाधाएं दूर होती हैं। नोट: यह उपाय पूर्ण विश्वास और सात्विक जीवन के साथ ही फलदायी होता है। 🙌 ईश्वर करे, हर आंगन में किलकारी गूंजे! यदि यह जानकारी उपयोगी लगी, तो इसे सहेज कर रखें और जरूरतमंदों के साथ शेयर करें। !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌸जय सिया राम #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
🌷शुभ बुधवार - संतान सुखः एक दिव्य आशीर्वाद 35 3 श्रद्धा और विश्वास लाल किताब का अचूक उपाय ৬ু శః संतान सुखः एक दिव्य आशीर्वाद 35 3 श्रद्धा और विश्वास लाल किताब का अचूक उपाय ৬ু శః - ShareChat