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🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
#🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 #🌷शुभ सोमवार
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#🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷शुभ सोमवार
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🇮🇳 भारत भाग्य विधाता: सोने की चिड़िया से गणतंत्र तक की एक महागाथा 🇮🇳 यह कहानी है उस देश की जो कभी 'सोने की चिड़िया' कहलाता था, लेकिन जिसे व्यापारियों के भेष में आए अंग्रेजों ने गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया था। जब अंधेरा सबसे घना था, तभी आज़ादी की पहली किरण फूटी। 🔥 अध्याय 1: संघर्ष की मशालें इस महायज्ञ में दो तरह की आहुतियाँ दी गईं: क्रांतिकारियों का जोश: "बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की ज़रूरत होती है।" शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव जैसे वीरों ने अपनी जवानी देश के नाम कर दी, ताकि उनकी शहादत सोए हुए भारत को जगा सके। सत्य और अहिंसा की ढाल: महात्मा गांधी ने 'सत्य और अहिंसा' का ऐसा हथियार दिया जिसकी काट अंग्रेजों के पास नहीं थी। उनके साथ नेहरू की दूरदर्शिता और सरदार पटेल का फौलादी इरादा था। नेताजी की ललकार: सुभाष चंद्र बोस ने देश के बाहर जाकर 'आज़ाद हिन्द फौज' का नेतृत्व किया और अंग्रेजों की नींव हिला दी। अध्याय 2: आधी-अधूरी सुबह (15 अगस्त 1947) 🎉 लंबी लड़ाई के बाद हम आज़ाद हुए। लाल किले पर तिरंगा लहराया। लेकिन यह जीत अधूरी थी—देश का बंटवारा हुआ था, दंगे थे, और हमारे पास अपना कोई 'सिस्टम' नहीं था। हमें एक खाली प्लॉट मिल गया था, इमारत बननी बाकी थी। 🏗️ अध्याय 3: एक राष्ट्र का निर्माण आज़ादी के बाद असली इम्तिहान शुरू हुआ: 1️⃣ लौह पुरुष का संकल्प (सरदार पटेल): भारत 560 से ज़्यादा रियासतों में बंटा था। यह सरदार पटेल की कूटनीति और साहस ही था कि उन्होंने भारत का वह नक्शा तैयार किया जो आज हम देखते हैं। 2️⃣ संविधान के शिल्पकार (डॉ. बी.आर. अंबेडकर): सबसे बड़ा सवाल था—इतनी विविधता वाला यह देश चलेगा कैसे? बाबासाहब अंबेडकर ने रात-दिन एक करके दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान तैयार किया, जिसने राजा और रंक को एक ही लाइन में खड़ा कर दिया। ✨ उपसंहार: गणतंत्र का उदय (26 जनवरी 1950) ✨ 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। यह वही तारीख थी जब 1930 में हमने 'पूर्ण स्वराज्य' की कसम खाई थी। उस पल, सभी क्रांतिकारियों और नेताओं का संघर्ष सार्थक हो गया। भारत एक 'गणतंत्र' बना—एक ऐसा देश जहाँ सत्ता रानी के पेट से नहीं, जनता के वोट से पैदा होती है। यही हमारी महान गाथा है: 15 अगस्त ने हमें ज़मीन दी, और 26 जनवरी ने हमें उस ज़मीन पर स्वाभिमान से जीने का अधिकार दिया। जय हिन्द! 🇮🇳🙏 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌷शुभ सोमवार #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷भीष्म अष्टमी 🙏 #🔱हर हर महादेव #🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝
🌷शुभ सोमवार - UNSEEN GYAAN 4U सोने की चि़ड़िया भारत का प्राचीन वैभव और समृद्धि UNSEEN GYAAN 4U सोने की चि़ड़िया भारत का प्राचीन वैभव और समृद्धि - ShareChat
#🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 🕵️‍♂️ 1941 की वह रात, जब अंग्रेजों की नींद हराम हो गई! 🦁 🇮🇳 इतिहास का सबसे बड़ा 'महाभिनिष्क्रमण': जब एल्गिन रोड से 'गायब' हुआ एक शेर! 🦁 साल 1940. द्वितीय विश्व युद्ध का दौर। कलकत्ता के एल्गिन रोड स्थित एक घर के चारों ओर अंग्रेज पुलिस का कड़ा पहरा था। अंदर कैद थे—नेताजी सुभाष चंद्र बोस। ब्रिटिश सरकार जानती थी कि यह कोई आम कैदी नहीं, बल्कि एक शेर है, जो अगर पिंजरे से बाहर निकला, तो साम्राज्य की नींव हिला देगा। लेकिन सुभाष बाबू तो कुछ और ही ठान चुके थे। वे जानते थे कि घर में कैद रहकर भारत की आज़ादी का सपना पूरा नहीं होगा। उन्हें बाहर निकलना था, एक सेना बनानी थी और अंग्रेजों से लड़ना था। 🕵️‍♂️ वह तूफानी रात और 'मोहम्मद ज़ियाउद्दीन' उन्होंने एक अत्यंत जोखिम भरी योजना बनाई। दाढ़ी बढ़ाई, खुद को बीमार बताकर कमरे में बंद कर लिया। और फिर आई 16-17 जनवरी, 1941 की वह कड़ाके की ठंड वाली आधी रात। जब पुलिस वाले बाहर ऊंघ रहे थे, तब घर के पिछले हिस्से से एक पठान निकला—लंबी दाढ़ी, शेरवानी, ढीला पजामा और सिर पर टोपी। यह कोई और नहीं, बल्कि 'मोहम्मद ज़ियाउद्दीन' नामक बीमा एजेंट का भेष धरे स्वयं नेताजी थे! भतीजे शिशिर बोस की कार में बैठकर, दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की आँखों में धूल झोंककर, शेर अपने पिंजरे से निकल चुका था। 🗺️ एक असंभव यात्रा यह सिर्फ एक घर से निकलना नहीं था। यह एक संकल्प की यात्रा थी। ट्रेन से पेशावर, फिर गूंगे-बहरे पठान का नाटक करते हुए अफगानिस्तान के बीहड़ रास्ते पैदल पार करना, काबुल में छिपना और अंततः सोवियत रूस के रास्ते जर्मनी पहुँचना। जरा सोचिए! एक अकेला व्यक्ति, जिसके पीछे पूरी ब्रिटिश सल्तनत पड़ी हो, वह भेष बदलकर हजारों मील का सफर तय करता है। क्यों? ताकि देश के बाहर जाकर 'आज़ाद हिन्द फौज' का नेतृत्व कर सके और अंग्रेजों की छाती पर चढ़कर 'दिल्ली चलो' का नारा दे सके। 💡 सीख: नेताजी का यह पलायन सिखाता है कि जब लक्ष्य देश की आज़ादी जैसा महान हो, तो कोई पहरा, कोई बाधा आपको रोक नहीं सकती। साहस केवल लड़ने में नहीं, सही समय पर सही रणनीति बनाने में भी है। भारत माँ के इस सच्चे सपूत के दुस्साहस को शत-शत नमन! 🙏🇮🇳 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌷शुभ सोमवार #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷भीष्म अष्टमी 🙏 #🔱हर हर महादेव
🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 - १९४०ः कलकत्ता में नज़रबंद गुप्त योजना १६ जनवरी १९४१ः महान पलायन साम्राज्य हिला दिया महायात्रा दिल्ली चलो १९४०ः कलकत्ता में नज़रबंद गुप्त योजना १६ जनवरी १९४१ः महान पलायन साम्राज्य हिला दिया महायात्रा दिल्ली चलो - ShareChat
#🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 🇮🇳 गणतंत्र दिवस विशेष: इतिहास के पन्नों से 🇮🇳 🤔 सबसे बड़ा सवाल: जब हमारा संविधान नवंबर 1949 में ही बनकर तैयार हो गया था, तो उसे लागू करने के लिए '26 जनवरी' का दिन ही क्यों चुना गया? हम में से कई लोग अक्सर 15 अगस्त और 26 जनवरी की गहराई में कंफ्यूज हो जाते हैं। आइए, आज इस ऐतिहासिक पहेली को सुलझाते हैं और जानते हैं इसके पीछे की गौरवशाली कहानी। पहले बुनियादी फर्क समझें: 🎉 15 अगस्त 1947 (स्वतंत्रता दिवस): गुलामी की जंजीरें टूटीं। ब्रिटिश राज खत्म हुआ। 📜 26 जनवरी 1950 (गणतंत्र दिवस): भारत का अपना 'संविधान' लागू हुआ। हम 'गणतंत्र' बने—यानी अब देश का राजा कोई वंशानुगत शासक नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुना गया एक आम नागरिक (राष्ट्रपति) होगा। देश अपने खुद के कानून से चलेगा। 🕰️ कहानी 20 साल पुरानी है: 'पूर्ण स्वराज्य' की वह सर्द रात इस तारीख की जड़ें दिसंबर 1929 में हैं। लाहौर में रावी नदी के तट पर कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन चल रहा था। कड़ाके की ठंड थी, लेकिन देशभक्ति का जोश उफान पर था। पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेताओं ने साफ कर दिया था—"हमें आधी-अधूरी आज़ादी (Dominion Status) नहीं, पूरी आज़ादी चाहिए।" 🔥 31 दिसंबर 1929 की आधी रात: नेहरू जी ने तिरंगा फहराया और ऐतिहासिक 'पूर्ण स्वराज्य' (Complete Independence) का प्रस्ताव पास किया। तय हुआ कि अब लक्ष्य अंग्रेजों को पूरी तरह भारत से बाहर निकालना है। 📅 26 जनवरी 1930: पहला (सांकेतिक) स्वतंत्रता दिवस लाहौर अधिवेशन में तय किया गया कि अगले महीने यानी 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में सांकेतिक रूप से 'स्वतंत्रता दिवस' मनाया जाएगा। उस दिन पूरे भारत में लाखों लोगों ने तिरंगा फहराया और सामूहिक प्रतिज्ञा ली कि "भारत को आज़ाद कराना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।" भले ही हम उस दिन असल में आज़ाद नहीं हुए थे, लेकिन मानसिक रूप से भारत ने खुद को उसी दिन आज़ाद मान लिया था। 1947 तक, हर साल 26 जनवरी को ही आज़ादी के संघर्ष के प्रतीक के रूप में मनाया जाता रहा। ⏳ वह 2 महीने का ऐतिहासिक इंतज़ार आज़ादी (1947) मिलने के बाद, डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में करीब 2 साल, 11 महीने और 18 दिन की कड़ी मेहनत के बाद दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान तैयार हुआ। ✅ 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने इसे अपना लिया। वे चाहते तो उसी दिन इसे लागू कर सकते थे। लेकिन... हमारे नेताओं के दिलों में '26 जनवरी' की वह ऐतिहासिक तारीख बसी हुई थी। वे उस दिन को भुलाना नहीं चाहते थे जब पहली बार 'पूर्ण स्वराज्य' का सपना देखा गया था। इसलिए, यह फैसला लिया गया कि संविधान लागू करने के लिए 2 महीने का इंतज़ार किया जाएगा। 🇮🇳 एक नए युग की शुरुआत और फिर वह दिन आया— 26 जनवरी 1950। सुबह 10:18 बजे भारत का संविधान लागू हुआ, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और भारत एक पूर्ण गणतंत्र बना। निष्कर्ष: 26 जनवरी को इसलिए चुना गया क्योंकि इसी दिन 1930 में हमने पहली बार पूरी आज़ादी का सपना देखा था और कसम खाई थी। गणतंत्र दिवस उसी कसम के पूरा होने का उत्सव है। इस गौरवशाली इतिहास को सभी के साथ साझा करें। जय हिन्द! 🇮🇳🙏 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌷भीष्म अष्टमी 🙏 #🔱हर हर महादेव #🌷शुभ सोमवार #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 - भारत का गणतत्रः १९२९ से १९५० की कहानी 1929-30: पूर्ण स्वराज्य की प्रतिज्ञा जवाहललल नेहरू के आमनॅरल पूर्ण  स्वराज्य की प्रगिमवाविल में सात की बलों आघवानीनों पूर्ण स्वराज्य की प्रतिज्ञा इलन पूर्ण स्वराज्य की गाता हैं। 15 307 1947: स्वतंत्रता प्राप्ति १५ अगस्त प्रणि दव भगर्ग बाों १९४७ स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रतिकारूत साए गारााक्े १९ वन की जतपाला दुमान करें रही राता है। २६ नवंबर १९४९ः संविधान स्वीकार হাঁ বী ৫২ সানওক২ কা মবিধান स्वीकार के लिए सकयात पर हते है বিনন কা ননী কা নন দীন ম आस् प्रस्ति पर संविधान की मतनात की तममा जाता है। २६ जनवरी १९५०ः गणतंत्र दिवस लागू डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के डॉ माणूत प्रमात का समान पञसंदर में सवाजाले गणतंत्र दिवस के सेअभत रेगन मंद दिवस लाता है। भारत का गणतत्रः १९२९ से १९५० की कहानी 1929-30: पूर्ण स्वराज्य की प्रतिज्ञा जवाहललल नेहरू के आमनॅरल पूर्ण  स्वराज्य की प्रगिमवाविल में सात की बलों आघवानीनों पूर्ण स्वराज्य की प्रतिज्ञा इलन पूर्ण स्वराज्य की गाता हैं। 15 307 1947: स्वतंत्रता प्राप्ति १५ अगस्त प्रणि दव भगर्ग बाों १९४७ स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रतिकारूत साए गारााक्े १९ वन की जतपाला दुमान करें रही राता है। २६ नवंबर १९४९ः संविधान स्वीकार হাঁ বী ৫২ সানওক২ কা মবিধান स्वीकार के लिए सकयात पर हते है বিনন কা ননী কা নন দীন ম आस् प्रस्ति पर संविधान की मतनात की तममा जाता है। २६ जनवरी १९५०ः गणतंत्र दिवस लागू डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के डॉ माणूत प्रमात का समान पञसंदर में सवाजाले गणतंत्र दिवस के सेअभत रेगन मंद दिवस लाता है। - ShareChat
#🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 🇮🇳 गणतंत्र दिवस विशेष: इतिहास के पन्नों से 🇮🇳 🤔 सबसे बड़ा सवाल: जब हमारा संविधान नवंबर 1949 में ही बनकर तैयार हो गया था, तो उसे लागू करने के लिए '26 जनवरी' का दिन ही क्यों चुना गया? हम में से कई लोग अक्सर 15 अगस्त और 26 जनवरी की गहराई में कंफ्यूज हो जाते हैं। आइए, आज इस ऐतिहासिक पहेली को सुलझाते हैं और जानते हैं इसके पीछे की गौरवशाली कहानी। पहले बुनियादी फर्क समझें: 🎉 15 अगस्त 1947 (स्वतंत्रता दिवस): गुलामी की जंजीरें टूटीं। ब्रिटिश राज खत्म हुआ। 📜 26 जनवरी 1950 (गणतंत्र दिवस): भारत का अपना 'संविधान' लागू हुआ। हम 'गणतंत्र' बने—यानी अब देश का राजा कोई वंशानुगत शासक नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुना गया एक आम नागरिक (राष्ट्रपति) होगा। देश अपने खुद के कानून से चलेगा। 🕰️ कहानी 20 साल पुरानी है: 'पूर्ण स्वराज्य' की वह सर्द रात इस तारीख की जड़ें दिसंबर 1929 में हैं। लाहौर में रावी नदी के तट पर कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन चल रहा था। कड़ाके की ठंड थी, लेकिन देशभक्ति का जोश उफान पर था। पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेताओं ने साफ कर दिया था—"हमें आधी-अधूरी आज़ादी (Dominion Status) नहीं, पूरी आज़ादी चाहिए।" 🔥 31 दिसंबर 1929 की आधी रात: नेहरू जी ने तिरंगा फहराया और ऐतिहासिक 'पूर्ण स्वराज्य' (Complete Independence) का प्रस्ताव पास किया। तय हुआ कि अब लक्ष्य अंग्रेजों को पूरी तरह भारत से बाहर निकालना है। 📅 26 जनवरी 1930: पहला (सांकेतिक) स्वतंत्रता दिवस लाहौर अधिवेशन में तय किया गया कि अगले महीने यानी 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में सांकेतिक रूप से 'स्वतंत्रता दिवस' मनाया जाएगा। उस दिन पूरे भारत में लाखों लोगों ने तिरंगा फहराया और सामूहिक प्रतिज्ञा ली कि "भारत को आज़ाद कराना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।" भले ही हम उस दिन असल में आज़ाद नहीं हुए थे, लेकिन मानसिक रूप से भारत ने खुद को उसी दिन आज़ाद मान लिया था। 1947 तक, हर साल 26 जनवरी को ही आज़ादी के संघर्ष के प्रतीक के रूप में मनाया जाता रहा। ⏳ वह 2 महीने का ऐतिहासिक इंतज़ार आज़ादी (1947) मिलने के बाद, डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में करीब 2 साल, 11 महीने और 18 दिन की कड़ी मेहनत के बाद दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान तैयार हुआ। ✅ 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने इसे अपना लिया। वे चाहते तो उसी दिन इसे लागू कर सकते थे। लेकिन... हमारे नेताओं के दिलों में '26 जनवरी' की वह ऐतिहासिक तारीख बसी हुई थी। वे उस दिन को भुलाना नहीं चाहते थे जब पहली बार 'पूर्ण स्वराज्य' का सपना देखा गया था। इसलिए, यह फैसला लिया गया कि संविधान लागू करने के लिए 2 महीने का इंतज़ार किया जाएगा। 🇮🇳 एक नए युग की शुरुआत और फिर वह दिन आया— 26 जनवरी 1950। सुबह 10:18 बजे भारत का संविधान लागू हुआ, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और भारत एक पूर्ण गणतंत्र बना। निष्कर्ष: 26 जनवरी को इसलिए चुना गया क्योंकि इसी दिन 1930 में हमने पहली बार पूरी आज़ादी का सपना देखा था और कसम खाई थी। गणतंत्र दिवस उसी कसम के पूरा होने का उत्सव है। इस गौरवशाली इतिहास को सभी के साथ साझा करें। जय हिन्द! 🇮🇳🙏 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷भीष्म अष्टमी 🙏 #🔱हर हर महादेव #🌷शुभ सोमवार
🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 - भारत भाग्य विधाताः एक महागाथा संघर्ष की मशालें (The Struggle) आधी -अधूरी सुबह (१५ अगस्त १९४७) ಖ೦n3 93 হানিখান एक राष्ट्र का निर्माण और गणतंत्र का उदय (The Making of the Republic) भारत भाग्य विधाताः एक महागाथा संघर्ष की मशालें (The Struggle) आधी -अधूरी सुबह (१५ अगस्त १९४७) ಖ೦n3 93 হানিখান एक राष्ट्र का निर्माण और गणतंत्र का उदय (The Making of the Republic) - ShareChat
#🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 🇮🇳 गणतंत्र दिवस विशेष: क्या सिर्फ गोली खाना ही 'बलिदान' है? 🇮🇳 जब हम 'बलिदान' शब्द सुनते हैं, तो हमारा मन बरबस 15 अगस्त और उन क्रांतिकारियों की ओर चला जाता है जिन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले लगाया। वे निस्संदेह हमारे सर्वोच्च नायक हैं। लेकिन, जब बात 'गणतंत्र दिवस' (26 जनवरी) की आती है, तो हमें 'बलिदान' के दायरे को थोड़ा बड़ा करना होगा। एक गणतंत्र (Republic) केवल आज़ादी से नहीं बनता, उसे बनाने के लिए एक अलग तरह की तपस्या चाहिए होती है। यह कहानी उन "नींव के पत्थरों और इमारत के शिल्पकारों" की है, जिनके मिले-जुले त्याग से आज हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। 📜 गणतंत्र की वेदी पर चढ़े दो तरह के फूल: 1️⃣ पहला अध्याय: नींव में समाए हुए रक्त-बीज (दिसंबर 1929 - अगस्त 1947) कल्पना करें कि भारत एक भव्य इमारत है। इस इमारत की नींव खोदने का काम सबसे खतरनाक था। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे वीरों ने अपने प्राणों की आहुति इसलिए दी ताकि 'विदेशी राज' खत्म हो और 'जनता के राज' (गणतंत्र) का सपना देखा जा सके। वे वो नींव के पत्थर थे जो ज़मीन के नीचे दफन हो गए ताकि उनके ऊपर आज़ाद भारत की इमारत खड़ी हो सके। 2️⃣ दूसरा अध्याय: शांति के लिए एक महाप्राण का अंत (जनवरी 1948) आज़ादी मिली, लेकिन देश दंगों की आग में जल रहा था। संविधान बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, लेकिन माहौल अशांत था। तभी 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बलिदान हुआ। उनकी शहादत ने देश को झकझोर कर शांत कर दिया। उसी शांति में हमारे संविधान निर्माता अपना काम पूरा कर सके। वे गणतंत्र की सुबह देखने से ठीक पहले चले गए। 3️⃣ तीसरा अध्याय: शिल्पकारों की तपस्या - जीवन और स्वास्थ्य का बलिदान (1947 - 1950) अब ज़मीन तैयार थी। अब बारी थी उन नेताओं की जिन्होंने संविधान बनाने और देश को जोड़ने के लिए अपने जीवन के सुख-चैन और स्वास्थ्य का बलिदान दिया। यह गोलियों का नहीं, 'धीमी तपस्या' का बलिदान था। 🔥 लौह पुरुष का तिल-तिल कर जलना (सरदार पटेल): भारत 560 टुकड़ों में बंटा था। अगर यह एक न होता, तो कोई गणतंत्र नहीं बन पाता। खराब सेहत और डॉक्टरों की चेतावनी के बावजूद, सरदार पटेल ने पूरे देश का दौरा किया और भारत को अखंड बनाया। इस अथक परिश्रम ने उनके शरीर को तोड़ दिया। गणतंत्र बनने के कुछ ही महीनों बाद, उन्होंने देश के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। ✍️ बाबासाहब की स्वास्थ्य की आहूति (डॉ. अंबेडकर): संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर गंभीर बीमारियों (मधुमेह आदि) से जूझ रहे थे। लेकिन करीब 3 वर्षों तक, अपनी सेहत और आंखों की रोशनी की परवाह किए बिना, उन्होंने रात-रात भर जागकर दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा। ताकि देश के हर वंचित को न्याय मिल सके। 🇮🇳 निष्कर्ष: जब 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ, तो उसके हर पन्ने पर इन सभी बलिदानों की स्याही थी। यह दिन उन शहीदों का है जिन्होंने नींव में अपना खून दिया, उस महात्मा का है जिसने शांति के लिए प्राण दिए, और उन शिल्पकारों (पटेल, अंबेडकर, नेहरू, प्रसाद) का है जिन्होंने इस देश का भविष्य गढ़ने के लिए अपना जीवन खपा दिया। आइए, इस गणतंत्र दिवस पर बलिदान के इस विराट स्वरूप को नमन करें। जय हिन्द! 🙏 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🔱हर हर महादेव #🌷शुभ सोमवार #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷भीष्म अष्टमी 🙏
🫡गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं🤝 - সতানন্স কী ঐত্রী ৭ং ঘট কুল' शिल्पकारों की तपस्या (1947-1950) ವ सचचान शांति का महाबलिदान (जनवरी १९४८) पूर्ण स्वराज्य नींव के रक्त बीज (1929-1947) ~rq सचियान २६ जनवरी १९५०ः गणतंत्र का उदय সতানন্স কী ঐত্রী ৭ং ঘট কুল' शिल्पकारों की तपस्या (1947-1950) ವ सचचान शांति का महाबलिदान (जनवरी १९४८) पूर्ण स्वराज्य नींव के रक्त बीज (1929-1947) ~rq सचियान २६ जनवरी १९५०ः गणतंत्र का उदय - ShareChat
#🌷भीष्म अष्टमी 🙏 🌞 प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और उनके सात घोड़ों का रहस्य 🌞 🌞 ॐ सूर्याय नमः 🌞 ।। सूर्यदेव और उनके सात घोड़ों का दिव्य रहस्य ।। (प्रकाश, समय और जीवन का आधार) सनातन धर्म में भगवान सूर्य ही एकमात्र ऐसे देव हैं जो हमें प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। वे केवल प्रकाश नहीं, बल्कि हमारे जीवन, समय, स्वास्थ्य और चेतना के आधार हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यदेव सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश में भ्रमण करते हैं। यह केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा विज्ञान और अध्यात्म छिपा है। रथ के सारथी 'अरुण' हैं, जो अंधकार के बाद आने वाले प्रकाश (उषा) के प्रतीक हैं। रथ का एक चक्र = समय का चक्र। तीन नाभियाँ = भूत, वर्तमान और भविष्य। ❓ आखिर क्या दर्शाते हैं सूर्यदेव के ये 'सात घोड़े'? यह सात का अंक बहुत रहस्यमयी है। आइए जानते हैं इसके विभिन्न अर्थ: 1️⃣ सप्ताह के सात दिन: ये घोड़े समय की गति के प्रतीक हैं—रविवार से लेकर शनिवार तक। 2️⃣ प्रकाश के सात रंग (VIBGYOR): सूर्य की सफेद किरणें जब विभाजित होती हैं, तो सात रंग बनते हैं (लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी, बैंगनी)। यही सात घोड़े हैं। 3️⃣ शरीर के सात चक्र: योग शास्त्र में ये सात रंग हमारे शरीर के सात ऊर्जा केंद्रों (मूलाधार से सहस्रार तक) से जुड़े हैं। 4️⃣ वेदों के सात छंद: ऋग्वेद के अनुसार, ये सात वैदिक छंदों (गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप और जगती) के प्रतीक हैं। 🌼 आध्यात्मिक संदेश: सूर्यदेव का रथ हमें सिखाता है कि जीवन संतुलन, अनुशासन और निरंतरता से ही चलता है। प्रकाश अंततः अंधकार पर विजय प्राप्त करता है। 🙏 सूर्य उपासना: प्रतिदिन सूर्योदय के समय अर्घ्य देना और सूर्य नमस्कार करना हमें आरोग्य और आत्मबल प्रदान करता है। ✨ “तमसो मा ज्योतिर्गमय” ✨ (हे प्रभु! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।) अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगी हो, तो कृपया 'जय सूर्यदेव' लिखकर शेयर करें। 🙏 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷शुभ सोमवार #🔱हर हर महादेव #🌸 जय श्री कृष्ण😇
🌷भीष्म अष्टमी 🙏 - सूर्यदेव और उनके सात घोड़ेः समय, प्रकाश और चेतना का रहस्य ससमयचक रविवारः सोमवारः எஎ*், मंगलवारः बुधवारः गरुवारः থ[ক্নায: नारंगी रंग, मूलाधार चक्र নীলা ফয;, जामुनी रंग, পীলা ফা; हरा रंग, स्वाधिष्ठान चक्र मणिपुर  विशुद्धि चक्र 3নামন বক্ক आज्ञा चक्र चक्र श त्र 3 शुक्रवारः बैंगनी रंग, न॰य ल गायत्री ग जामुनी रंग, सहसार चक्र उष्णिक आज्ञा चक्र সামন্গী विशुद्धि वादीक अनाहत सूर्यदेव और उनके सात घोड़ेः समय, प्रकाश और चेतना का रहस्य ससमयचक रविवारः सोमवारः எஎ*், मंगलवारः बुधवारः गरुवारः থ[ক্নায: नारंगी रंग, मूलाधार चक्र নীলা ফয;, जामुनी रंग, পীলা ফা; हरा रंग, स्वाधिष्ठान चक्र मणिपुर  विशुद्धि चक्र 3নামন বক্ক आज्ञा चक्र चक्र श त्र 3 शुक्रवारः बैंगनी रंग, न॰य ल गायत्री ग जामुनी रंग, सहसार चक्र उष्णिक आज्ञा चक्र সামন্গী विशुद्धि वादीक अनाहत - ShareChat
#🌷भीष्म अष्टमी 🙏 🌊।। त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे ।।🌊 समस्त सनातन धर्म प्रेमियों को अलौकिक और पुण्यदायिनी माँ नर्मदा के प्राकट्योत्सव (नर्मदा जयंती) की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🙏 माघ शुक्ल सप्तमी के पावन अवसर पर हम माँ रेवा का जन्मोत्सव मनाते हैं। शास्त्रों में माँ नर्मदा का तट अत्यंत पवित्र और सुभिक्ष माना गया है। ✨ नर्मदा जयंती का महत्व और परंपरा: 🔸 भक्तिमय वातावरण: प्राकट्योत्सव से एक दिन पूर्व ही भक्त बड़ी संख्या में नर्मदा तटों पर पहुँचते हैं। पूरी रात भजन-कीर्तन और माँ के जयकारों से घाट गूंज उठते हैं। 🔸 पावन स्नान: जयंती की सुबह माँ नर्मदा के पवित्र जल में स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किया गया स्नान जन्मांतर के पापों को धो देता है। 🔸 शिव पूजन: नर्मदा स्नान के पश्चात भगवान शिव का अभिषेक और पूजन करने की परंपरा है, क्योंकि नर्मदा जी भगवान शिव की ही पुत्री मानी जाती हैं। 📜 शास्त्रों में महिमा: रामायण, महाभारत सहित अनेक धर्मग्रंथों में माँ नर्मदा की महिमा का बखान है। ऐसा कहा जाता है कि माँ नर्मदा के केवल दर्शन मात्र से ही मनुष्य के पापों का नाश हो जाता है। उनके पूजन, दीपदान और स्नान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। आइए, इस पावन अवसर पर हम माँ नर्मदा के संरक्षण का संकल्प लें। ।। हर हर नर्मदे ।। !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷शुभ सोमवार #🌊नर्मदा जयंती🌷
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#🌷भीष्म अष्टमी 🙏 🚩 "जिसके घोड़े तीन समुद्रों का पानी पीते थे!" : महान सम्राट गौतमीपुत्र सातकर्णी 🚩 भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में एक ऐसा नाम दर्ज है, जिसने न केवल विदेशी आक्रांताओं को धूल चटाई, बल्कि मातृभक्ति की एक ऐसी मिसाल पेश की जो आज भी अकल्पनीय है। वह महान सम्राट थे—गौतमीपुत्र सातकर्णी। ⚔️ प्रतिशोध की अग्नि और धैर्य: पिता की हत्या विदेशी शक राजा नेहपान के हाथों हुई थी। सातकर्णी उस समय शिशु थे। माता गौतमी ने राजपाठ संभाला और अपने पुत्र को इस योग्य बनाया कि वह पिता का प्रतिशोध ले सके। राजा बनने के बाद 16 वर्षों तक उन्होंने अद्भुत धैर्य दिखाया। चुपचाप अपनी शक्ति बढ़ाई और फिर जब प्रहार किया, तो पूना से लेकर पूरे महाराष्ट्र और अंततः 2 वर्ष के भीषण संघर्ष के बाद नेहपान का वध कर अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लिया। 🌊 त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन (समुद्रों का स्वामी): इतिहास में उन्हें 'त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन' कहा गया है, अर्थात जिसके वाहन (घोड़े) तीनों समुद्रों (अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर) का जल पीते थे। उनका साम्राज्य इतना विशाल था। 👑 एक आदर्श और प्रजावत्सल राजा: वे इतने महान थे कि उनके लिए लिखा गया—"पोरजन निविसेस सम दुःख सुखस"। अर्थात, एक ऐसा राजा जिसका अपना कोई सुख-दुःख नहीं था; प्रजा का सुख ही उनका सुख और प्रजा का दुःख ही उनका दुःख था। वे सनातन धर्मशास्त्रों के अनुसार ही कर (Tax) लेते थे और स्वभाव से अत्यंत क्षमाशील थे। 🙏 माँ सदैव शुभ होती है: उस युग में जब विधवा स्त्री को शुभ नहीं माना जाता था, इस महान सम्राट ने समाज की सोच बदल दी। उन्होंने घोषणा की— "माँ सदैव शुभ होती है! आज से मेरे नाम से पूर्व मेरी माँ का नाम लगेगा। मुझे 'गौतमीपुत्र सातकर्णी' के नाम से जाना जाए।" ऐसे धर्मरक्षक, मातृभक्त और पराक्रमी सम्राट को शत-शत नमन! 🙏 !! जय जय श्री राधे !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌷शुभ सोमवार
🌷भीष्म अष्टमी 🙏 - त्रि-समुद्र तोय पीत ्वाहनः गौतमीपुत्र सुातकर्णी त्रि-समुद्र तोय पीत ्वाहनः गौतमीपुत्र सुातकर्णी - ShareChat