
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
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🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
#🌺 श्री गणेश #🌷शुभ बुधवार #🕉️सनातन धर्म🚩 #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🔱हर हर महादेव #🌺 श्री गणेश
🐀 विघ्नहर्ता श्री गणेश का वाहन एक छोटा सा चूहा ही क्यों है? जानिए मूषकराज से जुड़ी ये 3 अत्यंत रोचक और रहस्यमयी पौराणिक कथाएं! ✨👇
, समृद्धि और विद्या के देवता भगवान श्री गणेश का स्वरूप जितना विशाल है, उनका वाहन उतना ही छोटा— एक मूषक (चूहा) है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गजानन ने मूषक को ही अपना वाहन क्यों चुना?
आइए जानते हैं मूषकराज के जन्म और भगवान गणेश के वाहन बनने की 3 अद्भुत पौराणिक कथाएं:
1️⃣ पहली कथा: क्रौंच गंधर्व और महर्षि सौभरि का शाप
सुमेरू पर्वत पर महर्षि सौभरि अपनी रूपवती पत्नी मनोमयी के साथ तपस्या करते थे। एक दिन क्रौंच नामक एक दुष्ट गंधर्व ने ऋषि की अनुपस्थिति में मनोमयी का हरण करने का प्रयास किया। उसी समय ऋषि आ गए और उन्होंने क्रोधित होकर क्रौंच को शाप दिया— "तूने चोर की तरह मेरी पत्नी का हरण करना चाहा है, जा तू धरती के भीतर छुपकर रहने वाला चूहा बन जा!" क्षमा मांगने पर ऋषि ने कहा कि द्वापर युग में जब महर्षि पराशर के यहाँ भगवान गणेश प्रकट होंगे, तब तू उनका वाहन बनेगा। शापग्रस्त विशालकाय चूहा महर्षि पराशर के आश्रम में उत्पात मचाने लगा। तब श्री गणेश ने अपना पाश फेंककर उसे पाताल से बांध लिया। प्राणों की भीख मांगने पर गणेश जी ने उसे क्षमा कर दिया और वरदान मांगने को कहा। अहंकार में चूर चूहे ने उल्टे गणेश जी से कहा, "मुझे कुछ नहीं चाहिए, आप ही मुझसे कुछ मांग लें।" गणेश जी मुस्कुराए और बोले, "तो फिर तुम मेरा वाहन बन जाओ।" इस तरह उसका गर्व चूर हुआ और वह गजानन का वाहन बन गया।
2️⃣ दूसरी कथा: गजमुखासुर का अहंकार और गजानन का प्रहार
गजमुख नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसे किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। शक्तियों के अहंकार में वह देवी-देवताओं पर अत्याचार करने लगा।
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को उसे रोकने के लिए भेजा। भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन जब गजमुख को लगा कि वह हार रहा है, तो उसने माया से स्वयं को एक 'मूषक' (चूहे) के रूप में बदल लिया और गणेश जी की ओर दौड़ा। गजानन तुरंत उछलकर उस मूषक के ऊपर बैठ गए और उसे जीवन भर के लिए अपना वाहन बना लिया। बाद में गजमुख भी अपने इस रूप से प्रसन्न हुआ और भगवान का प्रिय मित्र बन गया।
3️⃣ तीसरी कथा: देवराज इंद्र का श्राप
एक बार देवराज इंद्र अपनी सभा में गंभीर चर्चा कर रहे थे। वहाँ क्रौंच नाम का गन्धर्व अप्सराओं के साथ हंसी-ठिठोली कर रहा था। इंद्र के मना करने पर भी जब वह नहीं माना, तो देवराज ने क्रोधित होकर उसे मूषक बनने का श्राप दे दिया और देवलोक से बाहर फेंकवा दिया।
वह सीधे ऋषि पराशर के आश्रम में गिरा और वहां सब कुछ तहस-नहस कर दिया। ऋषियों के वस्त्र और धार्मिक ग्रंथ कुतर डाले। महर्षि पराशर के आवाहन पर श्री गणेश ने अपने पाश से उसे बांधा। गजानन के सम्मुख आते ही उसका अहंकार टूट गया और उसने क्षमा मांगी। गणेश जी ने उसे अपना वाहन बनने का आदेश दिया और उसे अपना भार उठाने की अलौकिक शक्ति भी प्रदान की।
✨ आध्यात्मिक रहस्य (मूषक ही क्यों?):
गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं, जिनका काम हर समस्या की गहराई (तह) तक जाना है। ठीक इसी तरह एक चूहा (मूषक) भी तर्क-वितर्क और विश्लेषण का प्रतीक है। वह हर वस्तु को कुतर-छांट कर उसके एक-एक अंग का विश्लेषण करता है। यह फुर्तीलेपन और हमेशा जागरूक रहने का भी संदेश देता है।
आपको इनमें से कौन सी कथा सबसे ज्यादा पसंद आई? कमेंट में ।। ॐ गं गणपतये नमः ।। अवश्य लिखें! 🙏🌺
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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त्रिकुट पर्वत वासिनी, कलियुग की आधार।
शरण पड़ा जो आ गया, कर देतीं उद्धार।। 🙏✨
जम्मू की पावन पहाड़ियों में विराजित माँ वैष्णो देवी केवल एक आस्था नहीं, बल्कि इस कठिन कलियुग में हम सबका सबसे बड़ा सहारा हैं। 🏔️
इस दोहे का गहरा अर्थ:
🚩 त्रिकुट पर्वत वासिनी: तीन चोटियों वाले साक्षात् शक्ति स्वरूप पर्वत पर माँ का वास है।
🌍 कलियुग की आधार: जब दुनिया में अधर्म और अशांति बढ़ती है, तब माँ ही मानवता की रक्षा का मुख्य स्तंभ बनती हैं।
🙌 शरणागत वत्सल: माँ के दरबार में ऊंच-नीच का भेद नहीं। जो अहंकार छोड़कर माँ के चरणों में शीश झुकाता है...
💫 उद्धार: माँ न केवल उसके कष्ट हरती हैं, बल्कि उसे मानसिक शांति और मोक्ष का आशीर्वाद भी देती हैं।
जीवन की नैया जब भी डगमगाए, बस एक ही नाम पुकारें— जय माता दी! ❤️
. !! जय जय श्री महाकाली !!
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🚩 राम दुलारे हनुमान: भक्ति और शक्ति का संगम 🚩
हनुमान जी केवल एक देवता नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक हैं। आइए जानते हैं उनकी महिमा के चार स्तंभ:
✨ राम नाम रसिया: जिनके रोम-रोम में प्रभु राम बसते हैं, जिन्हें राम कथा सुनने में ही परम आनंद मिलता है।
🏠 भक्ति भाव के धाम: राम तक पहुँचने का मार्ग हनुमान जी से होकर ही जाता है। उनके बिना राम भक्ति अधूरी है।
🙌 चरण शरण: जो उनके चरणों में शीश झुकाता है, बजरंगबली उसे अपना लेते हैं और हर भय से मुक्त कर देते हैं।
💪 सिद्ध करें सब काम: अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता हनुमान जी असंभव को भी संभव बना देते हैं। बस उन पर पूर्ण विश्वास की आवश्यकता है।
संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। 🙏
कमेंट में लिखें- जय श्री राम! जय हनुमान! ❤️
. !! जय जय श्री राम !!
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श्री लाड़ली जी (राधा रानी) के प्राकट्य की यह कथा उतनी ही मधुर है जितनी उनकी छवि। आइए, प्रेम के उस क्षण का आनंद लेते हैं जब बरसाने की इस पावन धरा पर 'करुणा' ने अवतार लिया :
🧿
॥ श्री राधा रानी के प्राकट्य की दिव्य कथा ॥
शास्त्रों और ब्रज की मान्यताओं के अनुसार, श्री राधा जी माता के गर्भ से जन्म नहीं लेतीं, बल्कि वे 'अयोनिजा' (बिना जन्म के प्रकट होने वाली) हैं।
👉
१. राजा वृषभानु की तपस्या
बरसाने के राजा वृषभानु जी परम भक्त थे। एक बार वे यमुना जी के किनारे (निकटवर्ती रावल ग्राम में) स्नान कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि जल के बीचों-बीच एक स्वर्ण कमल का पुष्प तैर रहा है, जिससे करोड़ों सूर्यों जैसा तेज निकल रहा है।
💥
२. कमल पुष्प पर साक्षात् लक्ष्मी
जैसे ही राजा वृषभानु उस कमल के पास पहुँचे, वह पुष्प खिल गया। उसके भीतर एक नन्हीं सी, परम सुकोमल और दिव्य कन्या लेटी हुई थी। राजा की कोई संतान नहीं थी, इसलिए वे उस कन्या को पाकर निहाल हो गए और उसे साक्षात् 'शक्ति' का रूप मानकर अपने महल ले आए।
👁️
३. ग्यारह मास तक नहीं खोलीं आँखें
महल में उत्सव मनाया गया, लेकिन एक बात ने सबको चिंतित कर दिया। वह नन्हीं कन्या अपनी आँखें नहीं खोल रही थी। सबको लगा कि शायद वह देख नहीं सकती। लेकिन असल में, प्रिया जी ने यह संकल्प लिया था कि इस मृत्युलोक में आकर वे सबसे पहले अपने प्राणप्रिय श्यामसुंदर का ही मुख निहारेंगी।
🫂
४. कृष्ण के दर्शन और प्रथम दृष्टि
जब नंद बाबा, यशोदा मैया और नन्हे कृष्ण को लेकर वृषभानु जी के यहाँ बधाई देने पहुँचे, तब बाल कृष्ण रेंगते हुए उस पालने के पास गए जहाँ राधा जी सो रही थीं। जैसे ही कृष्ण की परछाईं राधा जी पर पड़ी और प्रभु ने पालने को स्पर्श किया, राधा जी ने अपनी आँखें खोल दीं।
👁️🧿💞
उनकी पहली दृष्टि साक्षात् पूर्णब्रह्म कृष्ण पर पड़ी। उस दिन बरसाने और रावल में आनंद की जो वर्षा हुई, उसकी गूँज आज भी ब्रज की गलियों में सुनाई देती है।
🙏🎼
॥ एक विशेष पद ॥
"भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी, भयो अनूप प्रकाश।
वृषभानु के आँगन प्रकट भई, जगत की सुख-रासि ॥"
॥ भाव-सुमिरन ॥
इन नीले और लाल वस्त्रों में सजी श्री जी की छवि को देखकर मन ही मन कहें:
"हे भानु-दुलारी ! जैसे आपने कृष्ण को देखने के लिए आँखें खोलीं, वैसे ही मुझ पर भी अपनी एक कृपा-दृष्टि डाल दीजिए ताकि मेरे मन का अंधकार मिट जाए।"
जय श्री राधे ! बरसाने की यह महिमा वाकई निराली है।
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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🛑 हम जिसे 'उपवास' कहते हैं, वह असल में 'अनशन' है! जानिए ओशो ने ऐसा क्यों कहा? 👇
क्या आपको भी लगता है कि उपवास का मतलब सिर्फ अन्न-जल छोड़ देना या फल खाना है? ओशो के अनुसार, यह उपवास नहीं, बल्कि शरीर को कष्ट देने वाला 'अनशन' है।
असली फर्क समझिए:
❌ अनशन (Starving): आप खाना नहीं खाते, लेकिन आपका पूरा ध्यान शरीर और भूख पर अटका रहता है। दिन भर मन में यही चलता है कि "कितनी भूख लगी है, कल क्या खाऊंगा।"
✅ उपवास (Upvas): 'उप' (पास) + 'वास' (रहना) = अपनी आत्मा के पास रहना! उपवास का अर्थ है ध्यान या ईश्वर की मस्ती में इतना डूब जाना कि आपको शरीर की कोई सुध ही न रहे।
जब आप अपनी आत्मा के निकट होते हैं, तो शरीर भूल जाता है कि उसे क्या चाहिए। इसलिए अगली बार जब आप व्रत रखें, तो केवल भूखे न रहें, बल्कि अपने भीतर उतरने का प्रयास करें! 🌿✨
क्या आपने कभी ऐसे असली 'उपवास' का अनुभव किया है? कमेंट में साझा करें!
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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✨ इच्छा ही मृत्यु है और इच्छा की मृत्यु ही मुक्ति! ✨
जब बच्चा जन्म लेता है, तो मुट्ठी बांधे हुए इस दुनिया में आता है; लेकिन जब इंसान इस दुनिया से विदा लेता है, तो उसके हाथ पूरी तरह खुले रह जाते हैं।
कहावत भी है— "बंधी मुट्ठी लाख की, खुली तो खाक की!"
कम से कम बच्चा अपने साथ कुछ पाने का भ्रम तो लेकर आता है। लेकिन समय के साथ, जीवन हमारे इन सारे भ्रमों को एक-एक करके तोड़ देता है।
अभागे हैं वे लोग, जो जीवन के इस कड़वे सच से कोई सीख नहीं लेते। जीवन उनके भ्रमों को तोड़ता है, और वे नए भ्रम पाल लेते हैं। जीवन उनके सपनों को धूल में मिलाता है, और वे फिर से नए भौतिक सपने बुनने लगते हैं। इंसान अपनी आखिरी सांस तक इन्हीं इच्छाओं और माया-प्रपंच में उलझा रहता है।
और इसी व्यर्थ की भागदौड़ में, इंसान अपना "असली घर" भूल जाता है—
वह घर जो कहीं बाहर नहीं था, जो बहुत दूर भी नहीं था... वह घर जो हमारे अपने भीतर छिपा था, जो हमारे प्राणों का प्राण था, हमारी अपनी अंतरात्मा थी। हम जीवन भर बाहर खोजते हैं और भीतर के खजाने से वंचित रह जाते हैं।
इसलिए व्यर्थ की माया में उलझकर... काहे होत अधीर? (क्यों बेचैन होते हो?)शांत रहिए, स्वयं को पहचानिए।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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🚩 सनातन धर्म में शादियां दिन में होती थीं, तो 'रात्रि विवाह' और 'बाल विवाह' की प्रथा कहाँ से आई? 🚩
दुनिया का हर संप्रदाय दिन में विवाह समारोह करता है। हमारे भारत में भी वैदिक काल से विवाह या स्वयंवर दिन के उजाले में ही होते थे।
माता सीता और द्रौपदी का स्वयंवर सूर्य की उपस्थिति में ही हुआ था। शास्त्रों के अनुसार रात्रि काल में हवन-यज्ञ वर्जित माने गए हैं। पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को छोड़ दें, तो आज भी शेष भारत में शादियां दिन में ही होती हैं।
तो फिर यह रात के अंधेरे में विवाह की प्रथा शुरू कैसे हुई?
⚠️ गुलामी और विदेशी आक्रांताओं का दौर:
भारत में गुलामी के कालखंड में एक ऐसा समय आया, जब सत्ता पर काबिज आक्रांताओं और फौजियों को जैसे ही किसी विवाह योग्य कन्या की जानकारी मिलती, वे उसका अपहरण कर लेते थे।
🌙 रात्रि विवाह और बाल विवाह की मजबूरी:
अपहरण से बचने के लिए लगभग 500 वर्ष पूर्व लोगों ने रात के अंधेरे में, सरसों के तेल या घी के दीयों की मद्धम रोशनी में चोरी-छिपे अपनी बेटियों का विवाह करना शुरू कर दिया। जब आक्रांताओं को इसका पता चला, तो वे कम उम्र की बच्चियों को निशाना बनाने लगे। इसी मजबूरी में 'बाल विवाह' जैसी कुप्रथा ने जन्म लिया।
🛡️ सनातन की रक्षा और भक्ति आंदोलन:
विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध मेवाड़ के राणा वंश और गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने डटकर सामना किया। जब समाज निराश था, तब भक्ति आंदोलन (कबीर, सूरदास, रविदास, तुलसीदास, मीराबाई) ने सांस्कृतिक चेतना जगाई।
बाद में महाराणा प्रताप के संघर्षों के बाद, उत्तर में गुरु गोबिंद सिंह जी और दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज के सतत प्रयत्नों का ही परिणाम रहा कि सनातन धर्म का गौरव लौटा और पुनः वयस्क होने पर दिन में विवाह होने लगे।
❓ आज का कड़वा सच:
बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में गुलामी के दौर की ये जड़ें इतनी गहरी हो गईं कि आज भी लोग 'रात्रि विवाह' को ही परंपरा मान बैठे हैं। आज के समय में रात्रि विवाह के कारण पूरा समाज और विशेषकर मध्यम वर्ग अत्यधिक आर्थिक और मानसिक बोझ तले दबा हुआ है।
समय आ गया है कि हम अपनी वास्तविक सनातन जड़ों की ओर लौटें और विवाह जैसी पवित्र रस्मों को दिन के शुभ प्रकाश में संपन्न करें। ☀️
इस ज्वलंत सामाजिक विषय पर आप सभी प्रबुद्ध जनों के क्या विचार हैं? कमेंट में अपनी राय अवश्य दें। 🙏
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⛰️ तिल-तिल क्यों घट रहा है गोवर्धन पर्वत? जानिए गर्ग संहिता का यह अद्भुत रहस्य! 🌿✨
क्या आपने कभी सोचा है कि ब्रजमंडल की शान 'गोवर्धन पर्वत' का आकार प्रतिदिन क्यों घटता जा रहा है? गर्ग संहिता में ऋषि गर्गाचार्य जी ने इसका बहुत ही सुंदर और रहस्यमयी वर्णन किया है। आइए जानते हैं:
✨ श्रीकृष्ण और राधारानी की लीला:
जब भगवान श्रीकृष्ण धरती पर अवतरित हुए, तो उन्होंने राधा रानी जी की इच्छा पूर्ति के लिए अपनी लीला से गोवर्धन पर्वत को वृंदावन में प्रकट किया। गोवर्धन मूल रूप से द्रोणाचल पर्वत के पुत्र हैं। (लंबाई 8 योजन, ऊंचाई 2 योजन)।
✨ पुलस्त्य मुनि का आग्रह और गोवर्धन की शर्त:
एक बार पुलस्त्य ऋषि गोवर्धन की सुंदरता पर मोहित हो गए और उन्हें अपने साथ काशी ले जाने की इच्छा जताई। गोवर्धन ने मुनि के साथ जाने के लिए एक शर्त रखी— "आप मुझे जहाँ भी धरती पर रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाऊँगा।" मुनि ने यह शर्त मान ली और गोवर्धन को अपने हाथ पर उठाकर चल दिए।
✨ ब्रज से प्रेम और गोवर्धन की युक्ति:
जब मुनि गोवर्धन को लेकर ब्रजमंडल से गुजर रहे थे, तो गोवर्धन को भगवान श्रीकृष्ण, राधारानी और ग्वाल-बालों की याद सताने लगी। ब्रज में ही रुकने के लिए गोवर्धन ने अपना भार बढ़ाना शुरू कर दिया।
✨ मुनि का श्राप:
पर्वत के अत्यधिक भार से मुनि का हाथ थकने लगा। मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गए और विश्राम करने के लिए गोवर्धन को धरती पर रख दिया। बाद में जब मुनि ने गोवर्धन को उठने के लिए कहा, तो गोवर्धन ने अपनी शर्त याद दिला दी और वहीं वृंदावन में स्थापित हो गए।
अपनी ही शर्त हारने पर क्रोधित होकर पुलस्त्य मुनि ने श्राप दिया: "मेरा मनोरथ पूरा नहीं हुआ, इसलिए तू प्रतिदिन तिल-तिल घटता जाएगा!" 🌟 परिक्रमा का महत्व:
उसी श्राप के कारण गोवर्धन पर्वत आज भी घट रहा है। गर्ग संहिता के अनुसार, जब तक धरती पर मां गंगा प्रवाहित हैं, तब तक कलियुग का पूर्ण प्रभाव नहीं होगा, और जो भी भक्त सच्चे मन से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करेगा, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।
जय श्रीनाथ जी! 💐
जय गोवर्धन भगवान! 👏
जय श्री हरि! 🌹
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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![🕉️सनातन धर्म🚩 - उपवास 3R সন: (१) उपवास का मतलबः (२) उपनिषद का अर्थः अपने पास रहना, স্ীথী ক্রী নৃহি ম गुरु के पास बैठना। आत्मा के निकट। अनशन (भूखे रहना, विधि) संन्यासीः आज तो मेरा उपवास है खाना नहीं लेते। ओशोः फिर अनशन क्या है? न खाने पर जोर 3 को कष्ट। असली उपवास (ध्यान में लीन) साधना' एक न्यक्ति अपनी आत्मा में इतना लीन (3নম) दिन बीत जाते हैं शरीर का पता नहीं। रातें वीत जाती हॅ। সন্ামী: সাত সসসা কি युवकः चार बजे से ध्यान उपवास का क्या अर्थ है! मेँ गए हैं... उठ नहीं रहे हैं! ओशोः उन्हें पडा रहने दो। हद दरजे का 531 ೯l अनशन बनाम उपवास का भेद अनशन उपवास मस्ती' प्यास भूख मस्ती' VS सानपं nind full की ती भूख ] आत्मा' of future ध्यान Body relaxed उपवास को आत्मा के निकट होना कहो। उपवास 3R সন: (१) उपवास का मतलबः (२) उपनिषद का अर्थः अपने पास रहना, স্ীথী ক্রী নৃহি ম गुरु के पास बैठना। आत्मा के निकट। अनशन (भूखे रहना, विधि) संन्यासीः आज तो मेरा उपवास है खाना नहीं लेते। ओशोः फिर अनशन क्या है? न खाने पर जोर 3 को कष्ट। असली उपवास (ध्यान में लीन) साधना' एक न्यक्ति अपनी आत्मा में इतना लीन (3নম) दिन बीत जाते हैं शरीर का पता नहीं। रातें वीत जाती हॅ। সন্ামী: সাত সসসা কি युवकः चार बजे से ध्यान उपवास का क्या अर्थ है! मेँ गए हैं... उठ नहीं रहे हैं! ओशोः उन्हें पडा रहने दो। हद दरजे का 531 ೯l अनशन बनाम उपवास का भेद अनशन उपवास मस्ती' प्यास भूख मस्ती' VS सानपं nind full की ती भूख ] आत्मा' of future ध्यान Body relaxed उपवास को आत्मा के निकट होना कहो। - ShareChat 🕉️सनातन धर्म🚩 - उपवास 3R সন: (१) उपवास का मतलबः (२) उपनिषद का अर्थः अपने पास रहना, স্ীথী ক্রী নৃহি ম गुरु के पास बैठना। आत्मा के निकट। अनशन (भूखे रहना, विधि) संन्यासीः आज तो मेरा उपवास है खाना नहीं लेते। ओशोः फिर अनशन क्या है? न खाने पर जोर 3 को कष्ट। असली उपवास (ध्यान में लीन) साधना' एक न्यक्ति अपनी आत्मा में इतना लीन (3নম) दिन बीत जाते हैं शरीर का पता नहीं। रातें वीत जाती हॅ। সন্ামী: সাত সসসা কি युवकः चार बजे से ध्यान उपवास का क्या अर्थ है! मेँ गए हैं... उठ नहीं रहे हैं! ओशोः उन्हें पडा रहने दो। हद दरजे का 531 ೯l अनशन बनाम उपवास का भेद अनशन उपवास मस्ती' प्यास भूख मस्ती' VS सानपं nind full की ती भूख ] आत्मा' of future ध्यान Body relaxed उपवास को आत्मा के निकट होना कहो। उपवास 3R সন: (१) उपवास का मतलबः (२) उपनिषद का अर्थः अपने पास रहना, স্ীথী ক্রী নৃহি ম गुरु के पास बैठना। आत्मा के निकट। अनशन (भूखे रहना, विधि) संन्यासीः आज तो मेरा उपवास है खाना नहीं लेते। ओशोः फिर अनशन क्या है? न खाने पर जोर 3 को कष्ट। असली उपवास (ध्यान में लीन) साधना' एक न्यक्ति अपनी आत्मा में इतना लीन (3নম) दिन बीत जाते हैं शरीर का पता नहीं। रातें वीत जाती हॅ। সন্ামী: সাত সসসা কি युवकः चार बजे से ध्यान उपवास का क्या अर्थ है! मेँ गए हैं... उठ नहीं रहे हैं! ओशोः उन्हें पडा रहने दो। हद दरजे का 531 ೯l अनशन बनाम उपवास का भेद अनशन उपवास मस्ती' प्यास भूख मस्ती' VS सानपं nind full की ती भूख ] आत्मा' of future ध्यान Body relaxed उपवास को आत्मा के निकट होना कहो। - ShareChat](https://cdn4.sharechat.com/bd5223f_s1w/compressed_gm_40_img_490741_1c887a57_1775617470470_sc.jpg?tenant=sc&referrer=user-profile-service%2FrequestType50&f=470_sc.jpg)


