
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
@k_r_kashyap
🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
प्रकृति की गोद में ही सेहत का राज छुपा है! 🌿✨
हम अक्सर महंगी दवाओं के पीछे भागते हैं, जबकि हमारे आयुर्वेद में हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान मौजूद है। इस चार्ट में देखिए भारत की कुछ सबसे शक्तिशाली औषधीय जड़ी-बूटियाँ (Medicinal Plants)।
अश्वगंधा की ताकत हो या गिलोय की इम्यूनिटी, नीम की शुद्धता हो या ब्राह्मी की याददाश्त—ये सिर्फ पौधे नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का दिया हुआ अनमोल खजाना हैं।
इनमें से कौन-कौन सा पौधा आपके घर में लगा हुआ है? कमेंट में बताएं! #🙏कर्म क्या है❓ #📿जया एकादशी🪔 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏गुरु महिमा😇
🕉️✨ भगवान को तजूं, गुरु को ना बिसारूं 🧡📿
बहुत समय पहले की बात है, गंगा किनारे अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। माता-पिता का साया उठ चुका था, जीवन में दिशा की कमी थी और हृदय में बस प्रश्न थे— "जीवन क्या है? मेरा कौन है?"
एक दिन उसकी भेंट एक तेजस्वी वृद्ध साधु, गुरु वासुदेव से हुई। अर्जुन ने पूछा, "महाराज, मेरा जीवन इतना सूना क्यों है?"
गुरु मुस्कुराए, "वत्स, भगवान तक पहुँचने का रास्ता गुरु से होकर जाता है। जिसने गुरु को पाया, उसने ईश्वर को पा लिया।"
यही अर्जुन के जीवन का निर्णायक मोड़ था। वह गुरु के आश्रम में रहने लगा। गुरु ने उसे सिखाया कि पूजा हाथों से नहीं, भाव से होती है; भक्ति मंदिर में नहीं, आचरण में बसती है। अर्जुन का चंचल मन शांत होने लगा।
परीक्षा की घड़ी ⚖️
समय बीता, अर्जुन को नगर जाना पड़ा। वहां दिखावे की दुनिया ने उसे लुभाया। पुराने मित्रों ने कहा, "भक्ति छोड़, पैसे कमा, मजे कर।" एक धनी सेठ ने भी बड़ा प्रलोभन दिया। अर्जुन का मन डगमगाया, लेकिन तभी गुरु की सीख याद आई— "जिस दिन गुरु को भूलोगे, दिशा खो दोगे।"
अर्जुन ने दृढ़ता से कहा, "सेठ जी, धन जीवन चला सकता है, पर आत्मा नहीं। भगवान को तजूं, गुरु को ना बिसारूं। गुरु का मार्ग ही मेरा जीवन है।" वह आश्रम लौट आया।
गुरु का महाप्रयाण 🍂
गुरु वासुदेव का अंतिम समय निकट आया। उन्होंने अर्जुन का हाथ पकड़कर कहा, "वत्स, शरीर नश्वर है, पर गुरु तत्व अमर है। जब मैं न रहूँ, मुझे अपने भीतर जीवित रखना।"
गुरु के जाने के बाद अर्जुन टूट गया, पर उनकी शिक्षा ने उसे संभाला। अब गुरु बाहर नहीं, उसके भीतर थे।
गुरु रूप में अर्जुन 🕯️
अर्जुन ने आश्रम संभाला और लोगों को सेवा, संयम व सत्य का मार्ग दिखाने लगा। उसकी वाणी में अब गुरु की ही गूँज थी। वही सेठ, जिसने कभी उसे भटकाया था, एक दिन हारकर उसकी शरण में आया और शांति पायी।
अपने अंतिम समय में अर्जुन ने शिष्यों से कहा, "संसार छूट सकता है, शरीर टूट सकता है, पर गुरु को मत भूलना। जिसने गुरु को याद रखा, उसने भगवान को पा लिया।" इसी स्मरण के साथ वह परम में विलीन हो गया।
जीवन का सार: 🌟
गुरु ही वह सेतु हैं, जो मनुष्य को संसार से उठाकर ईश्वर तक पहुँचा देते हैं। जब भी जीवन में भटकाव आए, बस यही याद रखना— भगवान को तजूं, गुरु को ना बिसारूं। 🙏
!! जय जय श्री राधे !!
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🕉️ सोमनाथ मंदिर का अनसुलझा रहस्य: आखिर कहाँ गए वो ऐतिहासिक दरवाजे? 🕉️
गुजरात का सोमनाथ मंदिर सदियों से भारत की अस्मिता और श्रद्धा का केंद्र रहा है। विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे कई बार तोड़ा, लेकिन हर बार यह और भव्यता से खड़ा हुआ। लेकिन इस मंदिर से जुड़ा एक रहस्य आज भी बरकरार है— इसके मूल मुख्य द्वारों का रहस्य!
इतिहास गवाह है कि इस मंदिर के दरवाजों को वापस लाना कई सेनानायकों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। दो बड़े प्रयास हुए, जंगें लड़ी गईं, लेकिन क्या असली दरवाजे वापस आए?
आइये जानते हैं इतिहास के इस दिलचस्प पन्ने को:
🔥 पहला प्रयास: मराठा वीर महादजी सिंधिया (1782)
पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद मराठा शक्ति को फिर से खड़ा करने वाले महादजी सिंधिया ने सोमनाथ के दरवाजे वापस लाने की प्रतिज्ञा ली थी।
उन्हें सूचना मिली कि दरवाजे लाहौर के महमूद शाह के पास हैं। महादजी ने लाहौर पर हमला बोल दिया और जीत हासिल की। वे वहां से चांदी के तीन भव्य दरवाजे लेकर लौटे।
किन्तु, सोमनाथ मंदिर के पुजारियों ने किन्हीं कारणों से इन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। आज ये ऐतिहासिक दरवाजे उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और गोपाल मंदिर में सुरक्षित हैं।
🇬🇧 दूसरा प्रयास: अंग्रेज गवर्नर जनरल एलनबरो (1842)
करीब 60 साल बाद, एक अंग्रेज अफसर को इन दरवाजों की याद आई। गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो को लगा कि यदि वे सोमनाथ के 'चंदन के दरवाजे' वापस लाएंगे, तो भारतीयों के दिलों में जगह बना लेंगे।
माना जाता था कि महमूद गजनवी उन्हें गजनी (अफगानिस्तान) ले गया था। एलनबरो ने ब्रिटिश सेना को गजनी पर हमले का आदेश दिया। भारी खर्चे और युद्ध के बाद सेना वहां से दरवाजे उखाड़ लाई।
🕵️♂️ एक बड़ा धोखा!
जब ये दरवाजे भारत पहुंचे, तो एक बड़ा खुलासा हुआ। जिन्हें 'चंदन' का दरवाजा समझा जा रहा था, वे वास्तव में 'देवदार' की लकड़ी के निकले (जो अफगानिस्तान में पाई जाती है)। उनकी वास्तुकला भी भारतीय/गुजराती शैली की न होकर इस्लामिक शैली की थी।
सोमनाथ के पुजारियों ने इन्हें भी मुख्य द्वार मानने से इनकार कर दिया। इस महंगे और असफल अभियान के कारण ब्रिटेन की संसद में एलनबरो की भारी फजीहत हुई। ये दरवाजे आज आगरा के लाल किले में रखे हुए हैं।
🧐 निष्कर्ष:
दो बड़े सैन्य अभियानों और विजयों के बाद भी, सोमनाथ मंदिर के असली मूल दरवाजे कहाँ गए, यह आज भी एक बड़ा रहस्य है। मराठों और अंग्रेजों द्वारा लाए गए दरवाजे भले ही सोमनाथ में न लग पाए हों, लेकिन वे इतिहास की इन दिलचस्प कहानियों के मूक गवाह जरूर हैं।
क्या आपको इतिहास का यह पहलू पता था? कमेंट में बताएं! 👇
!! जय जय श्री राधे !!
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🌼 श्रीकृष्ण की 'रासलीला': वासना नहीं, उपासना का उच्चतम शिखर 🌼
श्रीमद्भागवत महापुराण में 'रास पंचाध्यायी' (दशम स्कंध, अध्याय 29-33) का वही स्थान है, जो शरीर में आत्मा का होता है। यह कोई साधारण लौकिक प्रसंग नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम की पराकाष्ठा है।
अक्सर लोग 'रास' के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते। आइये, आज इसके गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को जानते हैं:
✨ क्या है 'रास'?
वास्तव में, रास भगवान श्रीकृष्ण और कामदेव के बीच का एक महायुद्ध था। भगवान शिव का ध्यान भंग कर अहंकारी हुए कामदेव ने श्रीकृष्ण को चुनौती दी थी। शर्तें तय हुईं—शरद पूर्णिमा की रात्रि, वृंदावन का दिव्य वातावरण और अप्सराओं सी सुंदर गोपियाँ। भगवान ने चुनौती स्वीकार की, यह सिद्ध करने के लिए कि जहाँ विशुद्ध प्रेम होता है, वहाँ कामदेव परास्त हो जाते हैं।
✨ गोपियों का निस्वार्थ प्रेम
रास का आधार गोपियों का निष्काम प्रेम है। एक गोपी की अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं होती; वह केवल कृष्ण सुख के लिए जीती है। श्रीकृष्ण की प्रसन्नता में ही उसकी प्रसन्नता है।
✨ वासना का दिव्य रूपांतरण
जब शरद पूर्णिमा की रात वंशी बजी, तो गोपियाँ सुध-बुध खो बैठीं। उनके मन में जो 'काम' जागा, वह सांसारिक वासना नहीं, बल्कि परमात्मा को पाने की तीव्र 'अभीप्सा' (Deep spiritual desire) थी।
सिद्धांत यह है कि जिसका मन भगवान चुरा लें, उसके काम-क्रोध आदि विकार भी कल्याणकारी हो जाते हैं (जैसे वैर भाव रखने वाले कंस और शिशुपाल को भी मुक्ति मिली, तो प्रेम करने वाली गोपियों की क्या बात!)।
✨ भय और मर्यादा से परे
जहाँ स्वार्थ और वासना होती है, वहाँ भय होता है (जैसे सीताहरण के समय रावण डरा हुआ था)। लेकिन गोपियों के मन में कोई भय नहीं था क्योंकि उनका प्रेम पवित्र था। वे जानती थीं कि वे जीवन के परम लक्ष्य—'परमात्मा प्राप्ति'—के लिए जा रही हैं। इसी दिव्य प्रेम ने उन्हें लोक-लाज और सामाजिक मर्यादाओं को लांघने का साहस दिया।
✨ जीवात्मा और परमात्मा का मिलन
वंशी की तान पर हर गोपी को लगा कि कान्हा केवल उसे पुकार रहे हैं। यह भगवान से हमारा व्यक्तिगत (निज) संबंध है। जब गोपियों ने अपना सब कुछ—घर, परिवार, अहंकार—त्याग दिया और वृंदावन पहुंचीं, तब भगवान ने उनके निष्काम भावों को परखा और प्रसन्न होकर कहा— “आओ, रास खेलें।”
सार: रासलीला कामुकता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा में विलीन होने का महाउत्सव है।
।। जय श्री राधे-कृष्ण ।।
🙏🦚🕉️
!! जय जय श्री राधे !!
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🍃 प्रेम की पराकाष्ठा: जब देवर्षि नारद भी नतमस्तक हो गए राधा रानी के भाव के आगे 🍃
तीनों लोकों में हर जुबां पर बस 'राधे-राधे' की गूंज सुनकर देवर्षि नारद के मन में एक प्रश्न खटकने लगा। उन्हें थोड़ी खीझ भी हुई कि प्रेम तो वे भी नारायण से अथाह करते हैं, फिर हर भक्त केवल 'राधे-राधे' ही क्यों रटता है?
अपनी इसी व्यथा का समाधान पाने वे श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।
🥺 प्रभु की लीला और नारद की परीक्षा
वहाँ पहुँचकर नारदजी ने देखा कि श्रीकृष्ण भयंकर सिर दर्द से कराह रहे हैं। अपने आराध्य को पीड़ा में देख देवर्षि का हृदय भी टीस उठा।
उन्होंने व्याकुल होकर पूछा, ‘प्रभु! इस असहनीय दर्द का कोई तो उपचार होगा? यदि मेरे रक्त से यह शांत हो सकता है, तो मैं अभी अपना रक्त देने को तैयार हूँ।’
श्रीकृष्ण ने मंद स्वर में उत्तर दिया, ‘नारदजी! मुझे रक्त की नहीं, प्रेम की आवश्यकता है। यदि मेरा कोई सच्चा भक्त अपना 'चरणामृत' (अपने पांव धोकर) मुझे पिला दे, तो मेरा दर्द शांत हो सकता है।’
🤔 धर्मसंकट और भय
नारदजी सन्न रह गए। उन्होंने मन में सोचा, ‘भक्त का चरणामृत... वह भी साक्षात भगवान के श्रीमुख में! ऐसा अनर्थ करने वाला तो घोर नरक का भागी बनेगा। भला यह जानते हुए कौन यह पाप करेगा?’ नारदजी पीछे हट गए।
श्रीकृष्ण ने नारद से कहा कि वे रुक्मिणी जी के पास जाएं, शायद वे तैयार हो जाएं। नारदजी दौड़े-दौड़े रुक्मिणी के पास गए और सारा हाल सुनाया।
रुक्मिणी जी ने कांपते हुए हाथ जोड़ लिए, ‘नहीं, नहीं देवर्षि! यह महापाप मैं नहीं कर सकती। मैं अपने स्वामी को अपना चरणामृत कैसे पिला सकती हूँ?’
🌸 राधा का समर्पण: प्रेम का सर्वोच्च शिखर
हारकर नारदजी वापस आये। अब श्रीकृष्ण ने उन्हें अंतिम आशा के रूप में राधा रानी के पास भेजा।
जैसे ही राधा जी ने सुना कि उनके प्रियतम कष्ट में हैं और उपचार उनका चरणामृत है... उन्होंने एक क्षण भी नहीं गंवाया। मर्यादा, पाप-पुण्य सब भूल गईं।
तत्काल एक पात्र में जल लाकर उन्होंने अपने दोनों पैर डुबोए और वह जल नारदजी की ओर बढ़ा दिया।
राधा जी की आँखों में आंसू थे, उन्होंने कहा:
"देवर्षि! इसे शीघ्र अति शीघ्र मेरे श्यामसुन्दर के पास ले जाइए। मैं जानती हूँ कि अपने आराध्य को पाँव धोकर पिलाने से मुझे 'रौरव' जैसे घोर नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। परन्तु... अपने प्रियतम के क्षण भर के सुख के लिए, मैं अनंत युगों तक नरक की यातना भोगने को सहर्ष तैयार हूँ।"
🙏 नारद का नमन
राधा के इन शब्दों ने नारदजी के अहंकार को चूर-चूर कर दिया। वे समझ गए कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम का स्तुतिगान क्यों होता है। जहाँ अपना सुख-दुःख, यहाँ तक कि मोक्ष का भी लोभ न हो, वही सच्चा प्रेम है।
देवर्षि की आँखों से अश्रु बह निकले, उन्होंने अपनी वीणा उठाई और स्वयं राधा की स्तुति गाने लगे।
🌺 जय जय श्री राधे! राधे राधे! 🌺
!! जय जय श्री राधे !!
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✨🏵️ जया एकादशी महात्म्य: पिशाच योनि से मुक्ति दिलाने वाला पावन व्रत 🏵️✨
माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'जया एकादशी' कहते हैं। धर्म शास्त्रों में इसे 'भीष्म एकादशी' भी कहा गया है। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है और इसका व्रत करने से व्यक्ति को नीच योनि (जैसे भूत, प्रेत, पिशाच) से मुक्ति मिलती है।
आइये जानते हैं इस व्रत की विधि, कथा और शुभ मुहूर्त।
🔸 व्रत व पूजा विधि 🔸
भगवान विष्णु (विशेषकर श्रीकृष्ण अवतार) की प्रसन्नता के लिए यह व्रत इस प्रकार करें:
1️⃣ दशमी (व्रत से पूर्व दिन): व्रती को दशमी के दिन केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। संयमित रहें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
2️⃣ एकादशी (व्रत का दिन): प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। धूप, दीप, चंदन, फल, तिल और पंचामृत आदि अर्पित करके भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण रूप की विधिवत पूजा करें।
3️⃣ रात्रि जागरण: एकादशी की रात्रि में जागरण करें और श्री हरि के नाम का संकीर्तन व भजन करें।
4️⃣ द्वादशी (पारण का दिन): अगले दिन किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।
📜 जया एकादशी की पौराणिक कथा 📜
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा सुनाई थी:
एक बार नंदन वन में देवताओं के उत्सव में गंधर्व गायन और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं। सभा में 'माल्यवान' नामक गंधर्व और 'पुष्पवती' नामक गंधर्व कन्या का प्रदर्शन चल रहा था। तभी पुष्पवती माल्यवान पर मोहित हो गई और सभा की मर्यादा भूलकर उसे आकर्षित करने के लिए नृत्य करने लगी। माल्यवान भी अपनी सुध-बुध खो बैठा और गायन में सुर-ताल भटक गया।
उनके इस अमर्यादित कृत्य पर क्रोधित होकर देवराज इन्द्र ने उन्हें श्राप दिया: "तुम दोनों स्वर्ग से भ्रष्ट होकर मृत्युलोक में जाओ और अति नीच 'पिशाच योनि' को प्राप्त करो।"
श्राप के कारण वे दोनों हिमालय पर पिशाच बनकर अत्यंत कष्ट भोगने लगे। संयोगवश, एक बार माघ शुक्ल एकादशी के दिन वे बहुत दुखी थे और उन्होंने केवल फलाहार किया। भीषण ठंड के कारण वे रात भर कांपते हुए जागते रहे।
ठंड से उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन अनजाने में ही सही, उनसे एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण हो गया। जया एकादशी के इस पुण्य प्रभाव से उन्हें तत्काल पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। वे पहले से भी सुंदर रूप प्राप्त कर स्वर्ग लोक लौट गए, जिसे देखकर स्वयं इन्द्र भी चकित रह गए।
⏰ जया एकादशी शुभ मुहूर्त ⏰
(दी गई जानकारी के अनुसार)
🔹 एकादशी तिथि प्रारम्भ: बुधवार, 28 जनवरी, सायं 04:34 बजे से।
🔹 एकादशी तिथि समाप्त: गुरुवार, 29 जनवरी, दोपहर 01:55 बजे तक।
👉 (उदयातिथि के अनुसार व्रत 29 जनवरी, गुरुवार को रखा जाएगा)
🌅 पारण का समय (व्रत खोलने का समय):
शुक्रवार, 30 जनवरी को सुबह 07:07 बजे से 09:15 बजे तक।
🪔 भगवान जगदीश्वर जी की आरती 🪔
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥ ॐ जय...॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥
🙏 ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। 🙏
आप सभी को जया एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं।
!! जय जय श्री राधे !!
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👁️🗨️ बुरी नजर: सिर्फ वहम या इसके पीछे कोई विज्ञान है? 🤔
🌼 बुरी नजर लगने की मान्यता और बचाव के तरीके 🌼
हम अक्सर सुनते हैं कि "नजर लग गई"। दुनिया भर में यह मान्यता है कि किसी की तीव्र ईर्ष्या या अत्यधिक आकर्षण भरी दृष्टि जीवित प्राणियों यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं को भी नुकसान पहुँचा सकती है।
क्या होता है असर?
🔸 अचानक हंसता-खेलता बच्चा बीमार पड़ जाए, दूध पीना छोड़ दे या चिड़चिड़ा हो जाए।
🔸 दुधारू पशु अचानक दूध देना कम कर दें।
🔸 चलता हुआ व्यापार ठप हो जाए या नई गाड़ी/मकान में दिक्कतें आने लगें।
इसके पीछे का तर्क (Science behind the belief):
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, इसे 'मानवीय विद्युत' (Human Electricity) या आकर्षण शक्ति का अहितकर प्रभाव माना गया है। जैसे अजगर अपनी दृष्टि से पक्षियों को खींच लेता है, वैसे ही कुछ लोगों की एकाग्र और दूषित दृष्टि सामने वाले की ऊर्जा को प्रभावित करती है। कोमल मन वाले बच्चे और महिलाएं इसका शिकार जल्दी होते हैं।
काला धागा या टीका ही क्यों? ⚫
मान्यता है कि काला रंग नकारात्मक ऊर्जा या विद्युत का सुचालक होता है और उसे सोख लेता है। इसलिए बच्चों को काजल, काला धागा, या मकानों पर काली हंडिया लगाई जाती है, ताकि बुरी नजर का सीधा प्रभाव उन पर न पड़े और एकाग्रता भंग हो जाए।
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🌿🔥 उमा क्षमा श्रापहु ते भारी 🔥🌿
संत तुलसीदास जी ने कहा है—
दुखिया को ना सताइए, दुखिया देगा रोय।
जब दुखिया का मुखिया सुने, तब तेरी गति क्या होय?
सावधान! यदि संत तुम्हारे अपराध पर कुछ ना बोले, तुम्हें क्षमा कर दें, तो जान लेना कि तुम्हारी दुर्गति निश्चित है। यदि उन्होंने डांट दिया, तो समझो बच गए।
📜 एक मर्मस्पर्शी प्रसंग:
एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बड़ी नाव में बैठकर गंगाजी पार कर रहे थे। उसी नाव में दो पुलिस कर्मचारी भी चढ़े। उन दिनों पुलिस घोड़े पर चलती थी और उनके पास संगीन लगी बंदूकें होती थीं।
नाव में भीड़ थी, संत अपने शिष्यों सहित बहुत सिमट कर बैठे थे। एक अभिमानी पुलिस वाले ने संत को जूते की ठोकर मारी और कहा— "ऐ हट!" वे और हट गए। उसने फिर कहा— "और साइड हटो।" जगह नहीं थी, वे चुप बैठे रहे।
क्रोध में पुलिस वाले ने शिष्य को दो थप्पड़ जड़ दिए 👋। शिष्य भी शांत बैठा रहा, कुछ नहीं बोला। 🤫
नाव किनारे लगी। पानी उथला था। पुलिस वाले ने जूते गीले न हों, इसलिए छलांग लगाने के लिए बंदूक का सहारा लिया और उसे नीचे टिकाया। जैसे ही उसने छलांग लगाई, बंदूक की संगीन सीधे उसकी गर्दन के पार चली गई और वहीं उसकी मृत्यु हो गई। 💀
यह देखते ही गुरु तुरंत उठे और अपने उस शिष्य को आठ-दस थप्पड़ जड़ दिए! 👋👋👋
अन्य यात्रियों ने हैरान होकर पूछा— "महाराज! इसमें इसका क्या दोष? इसने तो मार खाई है।"
गुरु ने जो कहा, वह जीवन का सार है:
🗣️ "अगर इसने उस सिपाही को थोड़ा डांट-डपट दिया होता, तो उसका पाप वहीं कट जाता और वह मरता नहीं। इसने कुछ नहीं बोला, इसकी 'क्षमा' ने उसे मार डाला।"
सार:
इसलिए याद रखें, यदि आपकी गलती पर संत या सज्जन पुरुष चुप रह जाएं, तो यह मत मानना कि वे दब गए। वे तो चुप हो गए, लेकिन उनका स्वामी (ईश्वर) तुम्हें दंड देगा। संतों को अनाथ न समझो, वे ईश्वर के साक्षात पार्षद हैं। 🙏
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#📿जया एकादशी🪔
💰 गुरुवार को भूलकर भी न करें ये 7 काम, वरना घेर सकती है आर्थिक परेशानी! 💰
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गुरुवार का दिन देवगुरु बृहस्पति का होता है। थोड़ी सी सावधानी आपके लिए सौभाग्य के द्वार खोल सकती है, लेकिन कुछ गलतियां आपको आर्थिक संकट में भी डाल सकती हैं।
मालामाल बने रहने के लिए गुरुवार को इन 7 बातों का विशेष ध्यान रखें:
1️⃣ कर्ज लेन-देन से बचें: गुरुवार को न तो किसी को पैसा उधार दें और न ही किसी से कर्ज लें। यहाँ तक कि बैंक लोन के लिए भी यह दिन टालना बेहतर है। 🚫💸
2️⃣ बाल-नाखून न काटें: बड़े-बुजुर्गों के अनुसार, इस दिन बाल और नाखून काटने से आर्थिक नुकसान होता है और सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है। ✂️❌
3️⃣ अपमान न करें: यह गुरु का दिन है। भूलकर भी पिता, गुरुजनों या बुजुर्गों का अपमान न करें, उन्हें अपशब्द न कहें। 🙏
4️⃣ पीले वस्त्र पहनें: इस दिन सफेद कपड़े पहनने से बचें। गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करने से बरकत होती है, मन शांत रहता है और कारोबार में लाभ होता है। 🟡👕
5️⃣ धन संचय: गुरुवार को धन जमा करने या निवेश शुरू करने से बचना चाहिए। यदि कोई विशेष कार्य करना ही हो, तो किसी ज्योतिषी से सलाह लें (जैसे गुरु पुष्य नक्षत्र में किया जा सकता है)। 🏦
6️⃣ कन्या विदाई: मान्यता है कि गुरुवार को बेटी की विदाई करने से घर की लक्ष्मी चली जाती है। यदि विदा करना अत्यंत आवश्यक हो, तो कन्या के हाथ से कोई वस्तु लेकर घर में रख लें। 👰♀️🏠
सावधानी ही बचाव है! इस जानकारी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें ताकि वे भी इन गलतियों से बच सकें। 👇
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#📿जया एकादशी🪔
✨ धन-धान्य की देवी माँ लक्ष्मी के 8 दिव्य धाम ✨
माँ लक्ष्मी हिंदू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं। वे केवल धन ही नहीं, बल्कि समृद्धि, सौभाग्य और सुंदरता की भी प्रतीक हैं। भारतवर्ष में उनके अनेक भव्य मंदिर हैं, जहाँ दर्शन मात्र से जीवन धन्य हो जाता है।
आइये जानते हैं भारत के 8 प्रमुख लक्ष्मी मंदिरों के बारे में:
🛕 1. लक्ष्मी नारायण मंदिर (स्वर्ण मंदिर), वेल्लूर (तमिलनाडु)
✨ खासियत: 15,000 किलोग्राम विशुद्ध सोने का प्रयोग!
यह मंदिर थिरुमलाई कोड़ी में 100 एकड़ भूमि पर बना है। इसे बनने में 7 वर्ष लगे और 2007 में इसे भक्तों के लिए खोला गया। यह वास्तुकला का अद्भुत नमूना है।
🌊 2. महालक्ष्मी मंदिर, मुंबई (महाराष्ट्र)
✨ खासियत: समुद्र किनारे स्थित भव्य मंदिर।
कहा जाता है कि माँ ने एक ठेकेदार के सपने में आकर समुद्र से मूर्तियां निकालने को कहा था। यहाँ महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती तीनों रूप एक साथ विराजित हैं।
द 3. लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर), दिल्ली
✨ खासियत: महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटित।
यह ऐतिहासिक मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है। मूल रूप से 1622 में बना, जिसका 1938 में बिड़ला समूह ने भव्य पुनरोद्धार कराया।
☀️ 4. महालक्ष्मी (अम्बा जी) मंदिर, कोल्हापुर (महाराष्ट्र)
✨ खासियत: मूर्ति पर पड़ती हैं सूर्य की किरणें।
यहाँ देवी लक्ष्मी को 'अम्बा जी' के नाम से पुकारा जाता है। 7वीं शताब्दी में चालुक्य शासकों द्वारा निर्मित इस मंदिर के गर्भगृह में माँ की 40 किलो की भव्य प्रतिमा है।
🌸 5. अष्टलक्ष्मी मंदिर, चेन्नई (तमिलनाडु)
✨ खासियत: माँ के 8 रूप, 4 मंजिलों में।
इलियट समुद्र तट के पास स्थित यह मंदिर देवी के आठ रूपों (वंश, सफलता, समृद्धि, धन, साहस, वीरता, भोजन, ज्ञान) को समर्पित है। दूसरी मंजिल पर भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी विराजित हैं।
🛕 6. अष्टलक्ष्मी मंदिर, हैदराबाद (तेलंगाना)
✨ खासियत: दक्षिण भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना।
1996 में बना यह मंदिर देवी के 8 अलग-अलग रूपों में विराजित होने के कारण विशेष है। यह हैदराबाद के बाहरी इलाके में स्थित है।
💰 7. लक्ष्मी कुबेर मंदिर, वडलूर, चेन्नई
✨ खासियत: लक्ष्मी और कुबेर एक साथ।
यह एक अनोखा मंदिर है जहाँ धन के देवता कुबेर और देवी लक्ष्मी एक साथ विराजित हैं। यह लगभग 4000 स्क़्वायर फ़ीट में बना हुआ है।
⚪ 8. लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर), जयपुर (राजस्थान)
✨ खासियत: सफेद संगमरमर की अद्भुत सुंदरता।
1988 में बिड़ला परिवार द्वारा निर्मित यह मंदिर दक्षिण शैली में बना है। विशाल परिसर में बना यह मंदिर अपनी नक्काशी और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।
🙏 जय माँ लक्ष्मी! 🙏
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!! जय जय श्री राधे !!
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