
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
@k_r_kashyap
🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
. 🌼 यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि 🌼
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यज्ञोपवीत उदात्त-भावनासम्बद्ध एक पवित्र सूत्र है, जो हमारे जीवन को श्रुति-स्मृति-अनुमोदित मार्ग पर संचालित करते हुए समस्त उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों के सम्यक् निर्वहन हेतु ईश्वरदत्त साधन के रूप में प्रतिष्ठित है। अतः शास्त्रकारों ने प्रत्येक यज्ञोपवीतधारी के लिए यथाशक्ति स्वयं सूत कातकर, अपने हस्त-परिमाणानुसार, यज्ञोपवीत का निर्माण करने का विधान निर्दिष्ट किया है।
महर्षि कात्यायन द्वारा प्रतिपादित यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :—
महर्षि कात्यायन कहते हैं—अब हम यज्ञोपवीत-निर्माण की विधि का निरूपण करते हैं। इसके निर्माण के लिए ग्राम से बाहर किसी तीर्थस्थान, मन्दिर अथवा गोशाला में जाकर, अनध्याय-रहित दिवस में, संध्यावन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न कर, एक सौ आठ, एक सहस्र आठ अथवा यथाशक्ति गायत्री-मन्त्र का जप करके, ऐसे सूत से यज्ञोपवीत तैयार करना चाहिए जो स्वयं, अथवा किसी ब्राह्मण, ब्राह्मण-कन्या अथवा सधवा ब्राह्मणी द्वारा काता गया हो।
तत्पश्चात् उस सूत को ‘भूः’ इति उच्चार्य, षण्णवति (९६) अंगुल-परिमाण में, चारों अँगुलियों के मूल पर लपेटकर उतार लें तथा उसे पलाश-पत्र पर स्थापित करें।
अनन्तर ‘भुवः’ इति उच्चार करते हुए उसी प्रकार द्वितीय वार, तथा ‘स्वः’ इति उच्चार करते हुए तृतीय वार, पुनः ९६ अंगुल-परिमाण के अनुसार, अन्य दो तन्तुओं का निर्माण कर, उन्हें भी पृथक् पलाश-पत्र पर रख दें।
इसके उपरान्त ‘आपो हि ष्ठा’, ‘शं नो देवी’, तथा ‘तत्सवितुः’
इन तीन मन्त्रों द्वारा उन तीनों तन्तुओं को जल में सम्यक् अभिषिक्त कर, बाएँ हस्त में लेकर, त्रिवार प्रबल आघात करें।
तत्पश्चात् तीनों व्याहृतियों द्वारा उन्हें एकत्र बटकर एकरूप बना लें।
फिर इन्हीं मन्त्रों द्वारा उन्हें त्रिगुणित कर पुनः बटकर एकरूप करें।
पुनरपि त्रिगुणित करके, प्रणव (ॐ) के द्वारा उसमें ब्रह्मग्रन्थि स्थापित करें।
तत्पश्चात् उसके नव तन्तुओं में क्रमशः—ओंकार, अग्नि, अनन्त, चन्द्र, पितृगण, प्रजापति, वायु, सूर्य तथा समस्त देवताओं का आवाहन एवं स्थापन करें।
अन्त में ‘उद्वयं तमसः परि’ मन्त्र द्वारा उस सूत्र को सूर्य के समक्ष प्रदर्शित कर, ‘यज्ञोपवीतम्’ मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसे धारण करें।
🔸️मूल संस्कृत प्रमाण (कात्यायनपरिशिष्ट)👉
अथातो यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकारं वक्ष्यामः ।
ग्रामाद् बहिः तीर्थे गोष्ठे वा गत्वा अनध्याय-वर्जितपूर्वाह्ने कृतसन्ध्यः अष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा ब्राह्मणेन तत्कन्यया सुभगया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रम् आदाय ‘भूरिति’ प्रथमां षण्णवतीं मिनोति, ‘भुवरिति’ द्वितीयां, ‘स्वरिति’ तृतीयां मीत्वा, पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य, ‘आपो हि ष्ठेति’ तिसृभिः, ‘शं नो देवी’त्यनेन सावित्र्या च अभिषिच्य, वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य, व्याहृतिभिः त्रिवणितं कृत्वा, पुनः ताभिः त्रिगुणितं कृत्वा, पुनः त्रिवृतं कृत्वा, प्रणवेन ग्रन्थिं कृत्वा—ओङ्कारम्, अग्निम्, नागान्, सोमम्, पितॄन्, प्रजापतिम्, वायुम्, सूर्यम्, विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य सम्पूजयेत्। ‘देवस्य’ इत्युपवीतमादाय, ‘उद्वयं तमसः परि’ इत्यादित्याय दर्शयित्वा, ‘यज्ञोपवीतम्’ इत्यनेन धारयेत्—इत्याह भगवान् कात्यायनः।
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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नाम प्रताप महा बल भारी । पाप पुंज जाहि छन हारी ।।
🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩
🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩
. 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩
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यह दोहा भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति और भगवान शिव की उदारता के संगम का प्रतीक है। जब दैत्यों का अत्याचार बढ़ा, तब विष्णु जी ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए एक हज़ार कमल के पुष्प चढ़ाने का संकल्प लिया। यह दोहा उस चरम क्षण का वर्णन करता है जब एक पुष्प कम होने पर नारायण ने स्वयं का एक नेत्र ही अर्पित करने का निर्णय लिया।
प्रथम पंक्ति (परम समर्पण): भगवान विष्णु का एक नाम 'कमलनयन' है। जब उन्होंने देखा कि सहस्र (1000) कमल के फूलों में एक फूल कम पड़ रहा है, तो उन्होंने अपनी भक्ति और संकल्प को खंडित नहीं होने दिया, उन्होंने निश्चय किया कि वे फूल के स्थान पर अपना एक 'नेत्र' (आँख) निकालकर शिव जी के चरणों में चढ़ा देंगे। जैसे ही नारायण का हाथ अपने नेत्र की ओर बढ़ा, वह पल त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा बन गया।
द्वितीय पंक्ति (शक्ति का उपहार): विष्णु जी के इस अद्भुत त्याग और निष्ठा को देखकर महादेव (शिव नाथ) अत्यंत प्रसन्न (खुश) हो गए। उन्होंने नारायण का हाथ थाम लिया और उस भक्ति के प्रतिफल के रूप में अपनी अमोघ शक्ति से उत्पन्न 'सुदर्शन चक्र' उन्हें भेंट कर दिया। यह चक्र संसार में धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बना।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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🔱 माता पार्वती का 'सोने का महल' और एक अनोखी दक्षिणा! 🔱
क्या आप जानते हैं कि जिस सोने की लंका का जिक्र रामायण में आता है, वह असल में किसके लिए बनाई गई थी? आइए जानते हैं देवों के देव महादेव और माता पार्वती की यह अद्भुत पौराणिक कथा:
🌸 एक महल की इच्छा:
खोह और कंदराओं के जीवन से ऊबकर एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि अन्य देवताओं की तरह उनका भी अपना एक महल होना चाहिए। महादेव ने मुस्कुराकर उनकी बात मान ली।
✨ स्वर्ग से भी सुंदर निर्माण:
ब्रह्मांड के सबसे महान वास्तुकार 'विश्वकर्मा' और धन के देवता 'कुबेर' को यह कार्य सौंपा गया। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति और स्वर्ण राशि लगाकर कैलाश पर एक ऐसी भव्य और अनुपम सोने की नगरी का निर्माण किया, जो पृथ्वी पर पहले कभी नहीं थी।
🔥 गृहप्रवेश और एक श्रेष्ठ अतिथि:
इस अपूर्व महल के गृहप्रवेश की पूजा के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध, ज्ञान और विवेक के धनी महर्षि विश्रवा (रावण के पिता) को आमंत्रित किया गया। अनुष्ठान अत्यंत भव्य और अलौकिक था।
🙏 वह दक्षिणा जिसने इतिहास बदल दिया:
पूजा संपन्न होने पर प्रसन्न माता पार्वती ने मुनि विश्रवा से इच्छानुसार दक्षिणा माँगने का आग्रह किया। मुनि पहले तो संकोच में पड़े, लेकिन माता के बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने कहा— "यदि भगवान शिव सामर्थ्य रखते हैं, तो आप यह सोने की नगरी मुझे दे दें!"
माता पार्वती यह सुनकर स्तब्ध रह गईं! लेकिन वैरागी महादेव ने एक पल की भी देरी किए बिना अविचलित शांत स्वर में कहा— "तथास्तु!"
भगवान शिव के आदेश पर विश्वकर्मा ने उस स्वर्ण नगरी को कैलाश से उठाकर श्रीलंका में स्थापित कर दिया और वही नगरी 'सोने की लंका' कहलाई।
निष्कर्ष व सीख:
इस दान के बाद मुनि विश्रवा का कुल सांसारिक लिप्सा और अहंकार में डूबता चला गया, जबकि माता पार्वती के मन से भौतिक सुखों की इच्छा सदा के लिए समाप्त हो गई। इस महादान से उन्हें ऐसा पुण्य मिला कि शिव-पार्वती और उनके परिवार को गुफाओं-कंदराओं में फिर कभी कोई कष्ट नहीं हुआ।
अतः जीवन में भौतिक सुख अस्थायी हैं, लेकिन त्याग और शांति का आनंद हमेशा स्थायी होता है।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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✨ मृत्यु का रहस्य: आखिर मौत में होता क्या है? ✨
हम अनंत बार जन्म ले चुके हैं और अनंत बार मर चुके हैं, लेकिन फिर भी हम 'मृत्यु' से अपरिचित हैं। ओशो के शब्दों में जानिए कि मृत्यु के उस अंतिम क्षण में वास्तव में क्या घटित होता है:
🪔 ऊर्जा का सिमटना (The Retracting Energy):
जैसे किसी जलते हुए दीये की लौ को धीमा करने पर उसका फैला हुआ प्रकाश धीरे-धीरे सिकुड़कर वापस दीये के पास आ जाता है और अंधकार घिरने लगता है... ठीक वैसे ही मृत्यु के समय हमारे शरीर के कोने-कोने में फैली प्राणों की ऊर्जा सिकुड़कर अपने 'केंद्र' (बीज-रूप) में वापस लौट आती है।
🍂 घर का निर्जन होना:
जब प्राणों की यह ऊर्जा वापस लौटने लगती है, तो हाथ-पैर शिथिल हो जाते हैं, श्वास उखड़ने लगती है और इंद्रियां काम करना बंद कर देती हैं। शरीर जो ऊर्जा के कारण जीवंत था, वह फिर से एक खाली घर की तरह उदास और निर्जन हो जाता है। इसी सिकुड़न से इंसान को अहसास होता है— "मैं मरा! सब छूट रहा है।"
🌱 अंत नहीं, एक नई यात्रा का आरंभ:
मृत्यु कोई अंत नहीं है। जो ऊर्जा अपने केंद्र पर लौटती है, वह एक नई यात्रा के लिए फिर से 'बीज' और 'अणु' बनती है।
हम मृत्यु को क्यों नहीं जान पाते?
हर बार जब मौत की घड़ी आती है, तो हम अपनी विदाई, बेचैनी और घबराहट में इतने उलझ जाते हैं कि उस क्षण के पार देख ही नहीं पाते। हर बार मौत हमारे आस-पास से गुजर जाती है, और हम फिर भी उससे अपरिचित रह जाते हैं।
मृत्यु से डरें नहीं, उसे समझें।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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🛑 पंचक क्या है और इसमें शुभ कार्य क्यों वर्जित माने जाते हैं? 🛑
हम अक्सर सुनते हैं कि "पंचक लगा है, अभी यह शुभ कार्य मत करो।" लेकिन क्या आप जानते हैं कि पंचक असल में क्या है और क्या यह हमेशा अशुभ ही होता है? आइए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसके रहस्य को समझते हैं:
✨ पंचक क्या है?
जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि से गुजरता है (धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती नक्षत्र), तो इन 5 नक्षत्रों के योग को 'पंचक' कहा जाता है।
⚠️ पंचक के 5 प्रकार और उनके प्रभाव:
दिन के अनुसार पंचक का प्रभाव बदल जाता है:
🤒 रोग पंचक (रविवार): शारीरिक व मानसिक परेशानियां। स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें।
👑 राज पंचक (सोमवार): सरकारी नौकरी ज्वाइन करने के लिए इसे अत्यंत शुभ माना गया है!
💰 चोर पंचक (शुक्रवार): व्यापारिक लेन-देन और यात्रा से बचें, आर्थिक नुकसान की संभावना रहती है।
☠️ मृत्यु पंचक (शनिवार): विवाह और जोखिम भरे कार्यों की सख्त मनाही।
🔥 अग्नि पंचक (मंगलवार): घर का निर्माण या गृह प्रवेश न करें। (कोर्ट-कचहरी के काम किए जा सकते हैं)।
(नोट: बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में विशेष वर्जनाएं नहीं होती हैं।)
❌ पंचक में भूलकर भी न करें ये 3 काम:
१. दक्षिण दिशा की यात्रा (यह यम की दिशा है)।
२. घर की छत डलवाना या चारपाई/बेड बनवाना।
३. बिना विशेष विधि के अंतिम संस्कार (गरुड़ पुराण के अनुसार आटे या कुश के 5 पुतलों का भी विधि-विधान से संस्कार होना चाहिए)।
🌸 क्या पंचक में सब कुछ अशुभ होता है? बिलकुल नहीं!
कई शुभ कार्य पंचक में किए जा सकते हैं:
🚗 धनिष्ठा और शतभिषा: यात्रा करना, वाहन या मशीनरी खरीदना शुभ है।
🏡 उत्तराभाद्रपद: गृह प्रवेश, शांति पूजन और बीज बोने जैसे स्थिर कार्यों में सफलता मिलती है।
💍 रेवती: कपड़े-गहने खरीदना, व्यापारिक सौदे करना और विवाद निपटाना शुभ माना गया है।
निष्कर्ष: पंचक पूरी तरह से अशुभ नहीं होता। सही नक्षत्र और मुहूर्त का ज्ञान हो, तो पंचक में भी सफलता और धन लाभ प्राप्त किया जा सकता है!
सनातन धर्म और ज्योतिष की ऐसी ही गूढ़ जानकारियों के लिए हमारे पेज से जुड़े रहें। 🙏
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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🔱 शिव-शक्ति का कल्याणकारी स्वरूप और उनकी शरण का रहस्य 🔱
✨ "गौरा अर्धांगिन बनीं, नंदी जिनके द्वार।
शरण पड़े जो शिव चरण, बेड़ा होवे पार॥" ✨
भगवान शिव का परिवार और उनका स्वरूप हमें जीवन के सबसे गहरे रहस्य और मोक्ष का मार्ग समझाता है। आइए जानते हैं इस अद्भुत दोहे का गूढ़ अर्थ:
🌸 गौरा अर्धांगिन बनीं: माता पार्वती (गौरा) महादेव की 'अर्धांगिनी' हैं। यह रूप दर्शाता है कि पुरुष और प्रकृति (शिव और शक्ति) का संबंध अटूट है। शिव केवल शक्ति के साथ ही पूर्ण हैं।
🐂 नंदी जिनके द्वार: महादेव के सबसे अनन्य भक्त और वाहन 'नंदी' सदैव उनके द्वार पर तैनात रहते हैं। नंदी जी हमें अनुशासन, निस्वार्थ सेवा और अटूट भक्ति का पाठ पढ़ाते हैं।
🙏 शरण पड़े जो शिव चरण: जो भी मनुष्य इस सांसारिक माया-मोह और चिंताओं को त्याग कर महादेव के चरणों में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर देता है...
⛵ बेड़ा होवे पार: उस भक्त का उद्धार निश्चित है! वह जीवन-मरण के चक्र और संसार के सभी दुखों से मुक्त होकर परम शांति और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।
निष्कर्ष: शिव-शक्ति का स्वरूप अत्यंत दयालु और कल्याणकारी है। यदि हम निष्काम भाव से शिव के चरणों में अपना ध्यान लगाएं, तो महादेव हर मुश्किल से हमारा बेड़ा पार करते हैं।
कमेंट्स में 'हर हर महादेव' लिखकर अपनी हाजिरी लगाएं! 👇
राधे राधे! 🌺
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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🚩 भक्त की पुकार: जब महाकाल ने 'काल' को ही भस्म कर दिया! 🚩
क्या कोई भक्त अपनी मृत्यु को टाल सकता है? राजा श्वेतकेतु की यह कहानी सिद्ध करती है कि जहाँ महाकाल की कृपा हो, वहाँ स्वयं 'काल' को भी हार माननी पड़ती है! आइए जानते हैं यह अद्भुत कथा:
👑 एक सदाचारी शिव भक्त:
राजा श्वेतकेतु महादेव के परम भक्त और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी निष्ठापूर्ण आराधना के कारण उनके राज्य में न कोई दुखी था, न कोई दरिद्र, और न ही किसी की अकाल मृत्यु होती थी।
⏳ जब यमदूतों के कदम ठिठक गए:
जब राजा का अंतिम समय आया और वे शिव साधना में लीन थे, तो यमदूत उनके प्राण लेने पहुंचे। लेकिन राजा को महादेव के ध्यान में मग्न देखकर वे बाहर ही रुक गए। दूतों को वापस न आते देख स्वयं यमराज कालदंड लेकर पहुंचे, परंतु वे भी शिव पूजा के बीच में विघ्न डालने का साहस न कर सके।
🔥 महादेव का तीसरा नेत्र और काल का भस्म होना:
तभी 'काल' को इसकी सूचना मिली और उसने मंदिर में प्रवेश कर राजा पर तलवार उठा ली। जैसे ही काल ने राजा का सिर काटने का प्रयास किया, महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया और पलक झपकते ही काल वहीं जलकर भस्म हो गया!
🙏 भक्त की करुणा और काल को जीवनदान:
जब राजा का ध्यान टूटा, तो उन्होंने उस राख के बारे में पूछा। महादेव ने बताया कि यह तुम्हारे प्राण लेने आया काल था। राजा श्वेतकेतु का हृदय इतना कोमल था कि उन्होंने महादेव से काल को वापस जीवित करने की विनती की, क्योंकि उसी से यह लोक नियंत्रित होता है।
✨ शिवजी की कृपा से काल फिर जीवित हुआ और उसने राजा को गले लगाकर कहा— "तुम जैसा भक्त तीनों लोकों में नहीं है, जिसने अजेय काल को भी जीत लिया!"
अकाल मृत्यु का निवारण:
अंत में काल और यमराज ने वरदान दिया कि जो भी शिव भक्त पूर्ण श्रद्धा रखता है, मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड लगाता है, रुद्राक्ष धारण करता है और 'पंचाक्षर मंत्र' (ॐ नमः शिवाय) का जाप करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय कभी नहीं सताएगा।
राजा श्वेतकेतु ने लंबे समय तक राज किया और अंततः महाकाल में ही विलीन हो गए।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
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🚩 कलियुग के साक्षात देव: संकटमोचन हनुमान! 🚩
क्या आप जानते हैं? हिन्दू धर्म के सबसे जाग्रत और सर्वशक्तिशाली देवताओं में एकमात्र हनुमानजी की कृपा जिस पर बरसना शुरू होती है, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। दस दिशाओं और चारों युग में केवल उन्हीं का प्रताप है:
✨ "चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।" ✨
आज की भागदौड़ और संकटों से भरे कलियुग में, बहुत से लोग समाधान के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हनुमानजी की सच्ची भक्ति ही हमें हर दुख और संकट से उबारने में सक्षम है। जो एक बार उनसे जुड़ गया, समझो उसका हर संकट कट गया!
कैसे मिलेगी यह विशेष कृपा?
प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ, मंगलवार का व्रत, मंत्र जप या बजरंग बाण का निरंतर पाठ त्वरित फल देता है। जीवन की हर बाधा का निराकरण उनके नाम में ही छिपा है।
अगर आप कभी भी डर, चिंता या निराशा महसूस करें, तो किस्मत बदलने की शक्ति रखने वाली इस अत्यंत सरल चौपाई का निरंतर जप करें:
🙏 "सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना।" 🙏
अर्थ: जो भी आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख और आनंद प्राप्त होते हैं। और जब स्वयं संकटमोचन हमारे रक्षक हैं, तो फिर किसी बात का डर क्यों?
अपनी सारी चिंताएं आज ही उनके चरणों में सौंप दें।
🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩
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✨ आदिशक्ति माँ दुर्गा: उत्पत्ति, रहस्य और नवदुर्गा का स्वरूप ✨
क्या आप जानते हैं कि वेदों और उपनिषदों में वर्णित 'उमा हैमवती' ने महिषासुर के आतंक का अंत करने के लिए कैसे महाशक्ति का रूप धारण किया? आइए जानते हैं माँ भवानी के प्राकट्य की यह अद्भुत कथा:
🔥 कैसे हुआ महाशक्ति का प्राकट्य?
जब असुरराज महिषासुर ने देवताओं से स्वर्ग छीन लिया, तब शिवजी और विष्णुजी के क्रोध से एक दिव्य 'तेज' उत्पन्न हुआ। इसी तेज से देवी का प्राकट्य हुआ। शिव के तेज से मुख, विष्णु के तेज से भुजाएं, अग्नि से नेत्र और चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल का निर्माण हुआ।
⚔️ देवताओं का महादान:
देवी को महाशक्ति बनाने के लिए सभी देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र उन्हें सौंपे:
शिवजी: त्रिशूल 🔱
विष्णुजी: सुदर्शन चक्र 🥏
इंद्रदेव: वज्र और घंटा 🔔
हिमालय: सवारी के लिए शक्तिशाली सिंह 🦁
(और ऐसे ही सूर्य, अग्नि, कुबेर, वरुण आदि ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र माँ की 18 भुजाओं में सजाए!)
🚩 कैसे पड़ा 'दुर्गा' नाम?
रुरु दैत्य के पुत्र 'दुर्गमासुर' ने जब वेदों को चुराकर देवलोक पर अधिकार कर लिया और पृथ्वी पर अकाल पड़ गया, तब देवताओं के आवाहन पर माता प्रकट हुईं। काली, तारा, छिन्नमस्ता आदि कई शक्तियों के साथ भयंकर युद्ध कर माता ने दुर्गमासुर का वध किया। इसी दैत्य का वध करने के कारण भगवती संसार में "दुर्गा" नाम से विख्यात हुईं।
🌸 नवदुर्गा: देवी के 9 दिव्य स्वरूप
१. शैलपुत्री: हिमालय की पुत्री।
२. ब्रह्मचारिणी: तपस्या का स्वरूप।
३. चंद्रघंटा: मस्तक पर अर्धचंद्र।
४. कुष्मांडा: ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली।
५. स्कंदमाता: कार्तिकेय (स्कंद) की माता।
६. कात्यायनी: महर्षि कात्यायन की पुत्री।
७. कालरात्रि: काली के समान भयंकर रूप।
८. महागौरी: पूर्णतः गौर वर्ण।
९. सिद्धिदात्री: सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली।
सृष्टि के कण-कण में विद्यमान परा-शक्ति को हमारा कोटि-कोटि नमन। 🙏
।। जय माता दी ।।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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