
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
@k_r_kashyap
🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
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👹 राक्षसों की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या वे जन्म से ही बुरे थे या रक्षक? 🔱✨
वेद और पुराणों में देव, असुर, यक्ष, गंधर्व और नाग आदि जातियों का वर्णन मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन्हें आज हम 'राक्षस' कहते हैं, उनका मूल काम क्या था और रावण का जन्म कैसे हुआ?
आइए जानते हैं राक्षस वंश का पूरा और रोचक इतिहास! 👇
1️⃣ रक्ष और यक्ष: उत्पत्ति का रहस्य 🌊
प्रारंभिक काल में जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो समुद्र और जल-प्राणियों की सुरक्षा के लिए कुछ जातियों को उत्पन्न किया।
जिन्होंने 'रक्षा' का भार संभाला, वे 'राक्षस' कहलाए। (शुरुआत में यह एक पवित्र कार्य माना जाता था)।
जिन्होंने 'यक्षण' (पूजन) स्वीकार किया, वे 'यक्ष' कहलाए।
2️⃣ हेति और प्रहेति: राक्षसों के प्रथम प्रतिनिधि 👑
ब्रह्मा जी के श्रम और क्रोध से 'हेति' और भूख से 'प्रहेति' नामक दो बलशाली भाइयों का जन्म हुआ। प्रहेति तपस्या में लीन हो गया, जबकि हेति ने राजपाट संभाला। हेति के वंश में आगे चलकर 'विद्युत्केश' का जन्म हुआ।
3️⃣ जब शिव-पार्वती ने लिया एक राक्षस पुत्र को गोद 🌙
विद्युत्केश की पत्नी ने अपने नवजात पुत्र को लावारिस छोड़ दिया था। तब उस अनाथ बालक पर भगवान शिव और माता पार्वती की नजर पड़ी। उन्होंने उसे गोद ले लिया और उसका नाम 'सुकेश' रखा। शिव जी के वरदान से वह अत्यंत शक्तिशाली और निर्भीक हो गया।
4️⃣ लंका का निर्माण और राक्षसों का अहंकार 🏰
सुकेश के तीन पराक्रमी पुत्र हुए— माल्यवान, सुमाली और माली।
इन तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और अजेय होने का वरदान पाया। विश्वकर्मा जी से इन्होंने समुद्र तट पर 'त्रिकुट पर्वत' के निकट स्वर्ण लंका का निर्माण करवाया। लेकिन वरदान पाकर वे अहंकारी हो गए और यक्षों-देवताओं पर अत्याचार करने लगे।
5️⃣ रावण का जन्म और लंका पर अधिकार ⚔️
देवताओं से हारने के बाद राक्षसों को लंका छोड़नी पड़ी और लंका प्रजापति ब्रह्मा ने धनपति कुबेर (यक्ष) को सौंप दी।
सुमाली की पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से हुआ। इन्हीं के पुत्र हुए— महापराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और पुत्री शूर्पणखा। रावण ने अपनी माता के कहने पर शिव जी की तपस्या की, मायावी शक्तियां पाईं और अपने सौतेले भाई कुबेर से युद्ध कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया।
6️⃣ रावण का वंश और महाविनाश 🔥
रावण ने मंदोदरी से विवाह किया, जिससे मेघनाद, अक्षयकुमार आदि पुत्र हुए।
कुम्भकर्ण के पुत्रों में भीम (जिसके नाम पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग है) और विभीषण की पुत्री त्रिजटा (जो सीता जी की रक्षक थी) प्रमुख थे।
अपने अहंकार और अधर्म के कारण रावण ने देवलोक तक दुश्मनी मोल ली।
अंततः रामायण के महायुद्ध में विभीषण को छोड़कर लंका के समस्त राक्षस वंश का नाश हो गया और धर्म की जीत हुई।
।। जय जय सियाराम ।। 🙏🚩
🤔 क्या आप राक्षसों की उत्पत्ति के इस रहस्य (विशेषकर सुकेश की कहानी) को पहले से जानते थे? अपने विचार कमेंट्स में जरूर साझा करें! 👇
!! जय जय श्री राम !!
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#🙏 माँ वैष्णो देवी
हनुमान जी और उनकी वानर सेना माता सीता को ढूंढ़ते हुए एक जादुई गुफा में फंस गए थे।
उस गुफा में बहुत सारा सोना-चांदी और सुख-सुविधाएं थीं।
वहाँ उन्हें यह महिला मिलीं, जिनका नाम 'स्वयंप्रभा' था।
स्वयंप्रभा के पास उस सोने-चांदी की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनकी 'पहचान' वह सोना-चांदी या महल नहीं था। उनकी असली पहचान उनकी 'तपस्या' और 'भक्ति' थी।
उन्होंने अपनी तपस्या की शक्ति से वानर सेना को उस गुफा से बाहर निकाला था।
!! जय जय श्री राम !!
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#🙏 माँ वैष्णो देवी
🌊✨ तीर्थ या कुंभ में केवल डुबकी लगाना ही काफी नहीं! जानिए शास्त्रों के अनुसार 'स्नान' की सही और पुण्यकारी विधि 🕉️
प्राय: लोग तीर्थ या कुंभ मेले में जाते हैं और बस दो-चार डुबकी लगाकर आ जाते हैं। लेकिन साधारण नदी में नहाने और 'तीर्थ स्नान' में बहुत बड़ा अंतर है! अगर सही विधि से स्नान न किया जाए, तो वह व्यर्थ हो सकता है।
आइए जानते हैं स्नान के सही नियम और इसके पीछे का विज्ञान: 👇
1️⃣ हम स्नान क्यों करते हैं? 💧
हमारे शरीर में 9 छिद्र होते हैं। मलपूर्ण शरीर को जब हम शुद्ध तीर्थ में स्नान कराते हैं, तो इसके दो फल मिलते हैं:
दृष्टफल: शरीर की पूर्ण स्वच्छता और निरोगी काया।
अदृष्टफल: पापों का नाश और पुण्यों की प्राप्ति।
2️⃣ तीर्थ स्नान में क्या भूलकर भी न करें (निषिद्ध कार्य) 🚫
नदी को माता माना गया है, इसलिए इसके जल में:
❌ वस्त्र न निचोड़ें और न ही धोएं।
❌ मल-मूत्र त्यागना या थूकना महापाप है।
❌ शौच वाले वस्त्र पहनकर स्नान न करें।
❌ देह पर तेल मलकर नदी में नहाना मना है।
3️⃣ जल की श्रेष्ठता का क्रम 🌊
कुएं से श्रेष्ठ झरने का जल ➡️ झरने से श्रेष्ठ सरोवर ➡️ सरोवर से श्रेष्ठ नदी ➡️ नदी से श्रेष्ठ तीर्थ ➡️ और तीर्थ से भी श्रेष्ठ गंगाजी का जल माना गया है।
4️⃣ शास्त्रों में बताए गए 7 प्रकार के स्नान 🧘♂️
मंत्र स्नान: 'आपो हि ष्ठा' आदि मंत्रों से जल छिड़कना।
भौम स्नान: शरीर पर पवित्र मिट्टी लगाना।
अग्नि स्नान: भस्म (राख) लगाना।
वायव्य स्नान: गाय के खुर की धूलि लगाना।
दिव्य स्नान: सूर्य की किरणों में वर्षा के जल से नहाना।
वरुण स्नान: जल में डुबकी लगाना।
मानसिक स्नान: आत्म-चिंतन करना।
(असमर्थ लोग गीले कपड़े से शरीर पोंछ लें, तो वह भी स्नान है!)
5️⃣ नदी स्नान की सही विधि क्या है? 🌅
🔹 उषाकाल (सूर्योदय से पहले) स्नान सबसे उत्तम है।
🔹 सीधे नदी में न जाएं। पहले तट पर दूर देह को मलकर साफ कर लें (मलापकर्षण स्नान), ताकि रोम छिद्र खुल जाएं।
🔹 हाथ में जल लेकर शास्त्रानुसार संकल्प करें।
🔹 नाभि तक जल में जाएं, प्रवाह या सूर्य की ओर मुख करें।
🔹 शिखा खोलकर 3, 5, 7 या 12 डुबकियां लगाएं।
🔹 स्नान के बाद ध्यान, पूजा या जप अवश्य करें।
🌸 निष्कर्ष:
प्रातः काल तीर्थ स्नान करने से व्यक्ति को रूप, तेज, बल, आयु, आरोग्य और मेधा की प्राप्ति होती है।
🙏 क्या आप कुंभ मेले या किसी तीर्थ में इस विधि से स्नान कर चुके हैं?
कमेंट्स में "जय श्री हरि" या "हर हर गंगे" लिखकर पुण्य के भागी बनें! 👇
!! जय जय श्री राधे !!
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#🙏 माँ वैष्णो देवी
🌺 जब माँ तारा ने कहा— "मेरा बेटा भूखा है, मैं भोग कैसे खाऊँ?" 🌺
पश्चिम बंगाल के तारापीठ की रोंगटे खड़े कर देने वाली सत्य घटना! 🔥
बंगाल के वीरभूम जिले में स्थित तारापीठ (Tarapith) केवल एक शक्तिपीठ नहीं, बल्कि तंत्र साधना का महाकेंद्र है। यहाँ श्मशान में जलती चिताओं के बीच एक ऐसा 'पागल' साधु रहता था, जिसने दुनिया को सिखाया कि माँ और बेटे का रिश्ता कैसा होता है। वे थे— संत वामा खेपा (Bamakhepa)। 🙏
'खेपा' का बंगाली में अर्थ होता है— 'पागल'। लेकिन यह पागलपन दुनिया के लिए नहीं, माँ तारा की भक्ति के लिए था।
1️⃣ मंदिर का वह कांड: जब पुजारियों ने पीटा 😔
वामा खेपा को दुनियादारी की कोई समझ नहीं थी। वे माँ तारा को पत्थर की मूर्ति नहीं, अपनी सगी माँ मानते थे।
एक दिन मंदिर में महाभोग की खुशबू फैली थी। वामा खेपा को जोरों की भूख लगी। वे बच्चों की तरह दौड़ते हुए गर्भगृह में गए और पुजारियों से बोले— "माँ को भूख लगी है और मुझे भी। मुझे खाना दो!"
पुजारियों ने इसे धर्म का अपमान माना। उन्होंने कहा— "अभी भगवान को भोग नहीं लगा, तुझे कैसे दे दें?" और वामा खेपा को लाठियों से पीटकर मंदिर से बाहर फेंक दिया।
2️⃣ माँ तारा का रूठना (रानी का सपना) 👑💤
रोते-रोते वामा खेपा श्मशान में एक शिमुल के पेड़ के नीचे भूखे पेट ही सो गए।
उसी रात, मंदिर की देखरेख करने वाली नाटोर की रानी (Rani of Natore) को एक सपना आया।
सपने में स्वयं माँ तारा प्रकट हुईं, लेकिन एक दुखी माँ के रूप में। उन्होंने रानी से कहा—
"रानी! आज मुझे भोग क्यों नहीं चढ़ाया गया?"
रानी घबरा गईं— "माँ! भोग तो समय पर चढ़ा था।"
तब माँ तारा ने जो कहा, उसने इतिहास बदल दिया:
🛑 "नहीं! जब तक मेरा बेटा वामा भूखा है, मैं कैसे खा सकती हूँ? मेरे पुजारियों ने उसे मारा है। मेरा पेट तभी भरेगा जब पहले वामा का पेट भरेगा।"
3️⃣ बदल गया सदियों पुराना नियम 📜
रानी पसीने से तर-बतर होकर जागीं। सिपाहियों को भेजा गया। श्मशान से वामा खेपा को ससम्मान लाया गया। पुजारियों को अपनी गलती का अहसास हुआ।
उस दिन सबसे पहले वामा खेपा को भर पेट भोजन कराया गया, उसके बाद ही माँ की पूजा हुई। तब से यह नियम बन गया कि वामा खेपा को मंदिर में कोई नहीं रोकेगा।
4️⃣ जूठा भोग: अनोखी भक्ति 🍛
वामा खेपा की पूजा में कोई मंत्र नहीं था, केवल 'भाव' था।
वे भोजन की थाली माँ तारा के सामने रखते, पहले खुद एक कौर खाते और फिर अपने मुंह से निकाला हुआ जूठा खाना मूर्ति के मुंह से लगा देते— "ले माँ खा! बहुत स्वादिष्ट है।" 😲
लोगों ने अपनी आँखों से देखा है कि पत्थर की मूर्ति सचमुच वह भोजन ग्रहण करती थी!
🔥 निष्कर्ष:
श्मशान के उस पागल साधु ने दुनिया को दिखा दिया कि ईश्वर मंत्रों के नहीं, प्रेम और भाव के भूखे होते हैं। एक माँ के लिए उसका बच्चा चाहे जैसा भी हो, वह उसे भूखा नहीं देख सकती।
🚩 जय माँ तारा! जय बाबा वामा खेपा! 🚩
🙏 क्या आप कभी तारापीठ गए हैं?
अपने अनुभव कमेंट्स में साझा करें और माँ तारा का आशीर्वाद पाने के लिए लिखें— "जय माँ तारा!" 👇
!! जय जय श्री महाकाली !!
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#🙏 माँ वैष्णो देवी
🔱 काशी के 'आपदुद्धारक': जब 5 साल के बालक ने किया महाबली राक्षस का अंत! 🐕✨
काशी में जहाँ 'काल भैरव' को कोतवाल कहा जाता है, वहीं बाबा बटुक भैरव को 'आपदुद्धारक' (मुसीबतों से बचाने वाला) कहा जाता है। वे भगवान शिव का बाल रूप हैं, जो अपने भक्तों पर एक बच्चे की तरह स्नेह लुटाते हैं। ❤️
आइये जानते हैं, कैसे हुआ था इनका प्राकट्य! 👇
1️⃣ 'आपद' राक्षस का वरदान और आतंक 👹
एक बार 'आपद' नामक राक्षस ने ब्रह्मा जी से विचित्र वरदान मांग लिया— "मेरी मृत्यु किसी देवता या असुर से न हो, मुझे केवल 5 वर्ष का कोई बालक ही मार सके।"
उसे लगा कि 5 साल का बच्चा उसका क्या बिगाड़ लेगा? उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। देवता भी त्रस्त होकर महादेव की शरण में पहुंचे।
2️⃣ 5 वर्ष के 'बटुक' का अवतार 👶☀️
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए। उसी क्षण उनके तेज से एक 5 वर्ष का अत्यंत सुंदर और तेजस्वी बालक प्रकट हुआ, जिसके साथ एक श्वान (कुत्ता) भी था।
यही बालक 'बटुक भैरव' कहलाए।
3️⃣ खेल-खेल में राक्षस का वध ⚔️
बालक रूपी भैरव ने खेल-खेल में ही उस भयानक राक्षस को चुनौती दी। राक्षस उस छोटे बच्चे को देखकर हंसा, लेकिन बटुक भैरव ने एक हुंकार भरी और पल भर में उसका वध कर दिया।
चूंकि उन्होंने 'आपद' (मुसीबत) का नाश किया था, इसलिए काशी में मान्यता है कि भक्तों की कैसी भी विपत्ति हो, बटुक भैरव उसे तुरंत हर लेते हैं।
4️⃣ काशी के कमच्छा (Kamachha) स्थित दरबार की महिमा मंदिर 🛕
काशी के कमच्छा इलाके में बाबा का प्राचीन मंदिर है।
🔹 सौम्य स्वरूप: यहाँ बाबा उग्र नहीं, बल्कि सौम्य (शांत) हैं। वे भक्तों को दंड नहीं देते, बस दुलारते हैं।
🔹 श्वान (Dog) सेवा: बाबा का वाहन कुत्ता है। यहाँ कुत्तों को बिस्किट, रोटी या दूध खिलाने से बाबा सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं। 🐕
🔹 अखंड धूना: मंदिर में एक धूना (हवन कुंड) हमेशा जलता रहता है। यहाँ की भभूत (राख) लगाने से बीमारियां और नजर दोष दूर हो जाते हैं। 🔥
🔹 प्रसाद: यहाँ बाबा को लड्डू, गुड़-चने और विशेष रूप से 'मीठा रोट' चढ़ाया जाता है।
🌸 निष्कर्ष:
काशी में एक कहावत है— "काल भैरव शरीर की रक्षा करते हैं और बटुक भैरव आत्मा और प्राणों की।"
अगर आप किसी संकट में हैं, तो बस सच्चे मन से पुकारें—
✨ "ॐ बटुक भैरवाय नमः" ✨
...वे एक बच्चे की तरह दौड़कर आपकी रक्षा करने आ जाएंगे।
🙏 क्या आपने काशी में बटुक भैरव के दर्शन किए हैं?
कमेंट्स में "जय बाबा बटुक भैरव" लिखकर अपनी हाजिरी लगाएं! 👇
!! जय जय श्री महाकाल !!
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#🙏 माँ वैष्णो देवी
: 🛑 कामाख्या मंदिर का वह श्राप: क्यों एक राजवंश के लिए 'वर्जित' हैं देवी के दर्शन? 🛑
असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी मंदिर तंत्र साधना का केंद्र है, लेकिन इसके इतिहास में एक ऐसी घटना भी दर्ज है, जिसने एक महान भक्त को पत्थर बना दिया और एक राजा के वंश को मंदिर से हमेशा के लिए दूर कर दिया। 🔱🌋
यह कहानी है भक्त केंदुकलाई (Kendukalai) और राजा नरनारायण की। 👇
1️⃣ जब माता स्वयं आती थीं नृत्य करने 💃✨
प्राचीन काल (कोच राजवंश) में मंदिर के मुख्य पुजारी थे—केंदुकलाई। वे केवल पुजारी नहीं, बल्कि माता के परम भक्त और संगीत के जानकार थे।
कहा जाता है कि जब शाम की आरती के समय केंदुकलाई आंखें मूंदकर मृदंग बजाते और भजन गाते, तो माता कामाख्या इतनी प्रसन्न होती थीं कि वे गर्भगृह में साक्षात प्रकट होकर नृत्य करती थीं। यह भक्त और भगवान के बीच का एक बेहद पवित्र और गुप्त रिश्ता था।
2️⃣ राजा की हठ और विनाश की शुरुआत 👑
असम के राजा नरनारायण को जब इस चमत्कार का पता चला, तो उन्होंने हठ पकड़ ली— "मुझे भी अपनी कुलदेवी का नृत्य अपनी आंखों से देखना है।"
केंदुकलाई ने राजा को बहुत समझाया कि यह अनर्थ होगा, माता का यह रूप मनुष्यों के लिए नहीं है। लेकिन राजा की जिद और दबाव के आगे भक्त को झुकना पड़ा।
3️⃣ विश्वासघात और दीवार का सुराख 👁️
योजना बनी कि आरती के समय राजा मंदिर की दीवार में बने एक छिद्र (छेद) से छुपकर अंदर झांकेंगे।
शाम हुई... संगीत शुरू हुआ... माता प्रकट हुईं और नृत्य करने लगीं।
जैसे ही पुजारी ने इशारा किया और राजा ने छिद्र से माता को देखा, माता कामाख्या की दृष्टि राजा पर पड़ गई।
4️⃣ माता का क्रोध और दो श्राप ⚡
अपने और भक्त के बीच की गोपनीयता भंग होने और विश्वासघात से माता का रूप रौद्र हो गया! 😡
🔹 पहला श्राप: माता ने पुजारी केंदुकलाई को (कुछ कथाओं में थप्पड़ मारकर) उसी क्षण पत्थर की मूर्ति बना दिया।
🔹 दूसरा श्राप: राजा नरनारायण से कहा— "तूने छिपकर मुझे देखा है। आज के बाद तू या तेरे वंश का कोई भी राजा अगर मेरे दर्शन करने आया, तो उसका वंश नष्ट हो जाएगा।"
🚫 आज भी माना जाता है यह नियम
इस घटना का प्रभाव आज भी दिखता है:
✅ मंदिर परिसर में केंदुकलाई की वह पाषाण मूर्ति आज भी मौजूद है, जो इस गलती की गवाही देती है।
✅ कहा जाता है कि कूच बिहार (Cooch Behar) के राजपरिवार (कोच राजवंश) का कोई भी वंशज आज भी कामाख्या देवी के दर्शन नहीं करता। वे मंदिर की ओर देखते तक नहीं, और अगर पास से गुजरना पड़े तो छाता तान लेते हैं या दूसरी तरफ मुंह कर लेते हैं।
🌸 सीख:
भक्ति में छल का कोई स्थान नहीं होता। भगवान और भक्त के बीच का रिश्ता पवित्रता और विश्वास पर टिका होता है, जिसमें तीसरे का हस्तक्षेप ईश्वर को स्वीकार नहीं।
🙏 क्या आपने कामाख्या मंदिर में केंदुकलाई की मूर्ति देखी है?
कमेंट्स में 'जय माँ कामाख्या' लिखकर अपनी हाजिरी लगाएं! 👇
!! जय जय श्री महाकाली !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🌸शुभ शुक्रवार🙏 #🙏🏻 श्री तिरुपति बालाजी 🚩 #🌸जय सिया राम #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
#🙏🏻 श्री तिरुपति बालाजी 🚩
🐴✨ ज्ञान, बुद्धि और वेदों के रक्षक: भगवान हयग्रीव का दिव्य स्वरूप 📚🕉️
क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु ने एक बार अश्व (घोड़े) का मुख धारण किया था? यह कोई साधारण रूप नहीं, बल्कि ज्ञान और विद्या के देवता 'हयग्रीव' का अवतार है! 🙏
जब असुरों ने वेदों का हरण कर सृष्टि को अज्ञान के अंधकार में धकेल दिया था, तब भगवान श्रीहरि ने हयग्रीव रूप धारण कर वेदों की पुनर्स्थापना की और जगत में पुनः ज्ञान का प्रकाश फैलाया। 🌅
✨ इस दिव्य स्वरूप का रहस्य:
यह स्वरूप केवल अद्भुत ही नहीं, बल्कि अत्यंत गूढ़ भी है:
🔹 अश्व मुख: वेग और निरंतर सीखने का प्रतीक।
🔹 निर्मल स्फटिक वर्ण: ज्ञान की परम शुद्धता।
🔹 हाथ में ग्रंथ: समस्त विद्याओं का आधार।
🔹 कमल: आध्यात्मिक चेतना का विकास।
📖 शास्त्रों में महिमा:
भगवान हयग्रीव को सभी विद्याओं का आधार माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है—
ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्।
आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवं उपास्महे॥
अर्थात्: जो ज्ञान और आनंद से पूर्ण हैं, जो निर्मल स्फटिक (Crystal) के समान उज्ज्वल हैं और जो समस्त विद्याओं के आधार हैं, ऐसे श्री हयग्रीव की हम उपासना करते हैं। 🙏
🎓 विद्यार्थियों और साधकों के लिए विशेष:
जो भक्त श्रद्धा से भगवान हयग्रीव का ध्यान करते हैं:
✅ उनकी बुद्धि तीक्ष्ण (Sharp) होती है।
✅ स्मरणशक्ति (Memory) प्रबल होती है।
✅ कठिन विषय भी सहज समझ आने लगते हैं।
✅ वाणी में मधुरता और स्पष्टता आती है।
📿 आज का मंत्र:
अपनी पढ़ाई या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले इस मंत्र का जाप अवश्य करें:
✨ “ॐ श्री हयग्रीवाय नमः” ✨
जहाँ हयग्रीव की कृपा होती है, वहाँ अज्ञान का अंधकार टिक नहीं सकता।
🙏 क्या आप अपने बच्चों या स्वयं के लिए अच्छी बुद्धि की कामना करते हैं?
कमेंट्स में "ॐ श्री हयग्रीवाय नमः" लिखकर प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करें! 👇
!! जय जय श्री राधे !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🌸शुभ शुक्रवार🙏 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🌸जय सिया राम












