
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
@k_r_kashyap
🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
🌞 प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य: आरोग्य और तेज के दाता 🌞
हमारे शास्त्रों में भगवान सूर्य को परमात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। वेदों और गीता के अनुसार, सूर्य भगवान ही परमात्मा के नेत्र हैं। मत्स्यपुराण का स्पष्ट वचन है- 'आरोग्यं भास्करादिच्छेत्' अर्थात् आरोग्य (अच्छे स्वास्थ्य) की कामना भगवान सूर्य से करनी चाहिए।
सूर्य की उपासना केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन में तेज, बल, बुद्धि और आरोग्य लाने का विज्ञान है।
सूर्य उपासना के अनिवार्य नियम:
यदि आप सूर्योपासना का पूर्ण लाभ उठाना चाहते हैं, तो इन नियमों का पालन अवश्य करें:
1️⃣ ब्रह्म मुहूर्त में जागरण: प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व शय्या त्यागकर शौच-स्नान से निवृत्त हों।
2️⃣ प्रातः अर्घ्य: स्नानोपरान्त उगते हुए सूर्य भगवान को जल का अर्घ्य देकर प्रणाम करें।
3️⃣ सायं अर्घ्य: सन्ध्या-समय (सूर्यास्त) भी अर्घ्य देकर प्रणाम करना चाहिए।
4️⃣ नाम जप/स्तोत्र: प्रतिदिन सूर्य के 12, 21 या 108 नामों का पाठ करें। 'सूर्यसहस्रनाम' का पाठ अत्यंत लाभकारी है।
5️⃣ आदित्य हृदय स्तोत्र: प्रतिदिन 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ अवश्य करें। (याद रखें, भगवान श्रीराम ने इसी का पाठ करके रावण पर विजय प्राप्त की थी)।
6️⃣ नेत्र रक्षा: आँखों के रोगों से बचने के लिए 'नेत्रोपनिषद' (चाक्षुषोपनिषद्) का पाठ करके सूर्य देव को प्रणाम करें।
विशेष रविवार के नियम (व्रत करने वालों के लिए):
🔅 रविवार को तेल, नमक और अदरक का सेवन न करें और न ही किसी को कराएं।
🔅 दिन में केवल एक बार हविष्यान्न (शुद्ध सात्विक भोजन) ग्रहण करें।
🔅 पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।
📜 इतिहास गवाह है:
धर्मराज युधिष्ठिर ने सूर्य उपासना से ही अक्षयपात्र प्राप्त किया था और समर्थ गुरु रामदास जी प्रतिदिन 108 साष्टांग प्रणाम करते थे।
सूर्य उपासना सबके लिए कल्याणकारी है।
🙏 ॐ घृणिः सूर्याय नमः 🙏
!! जय जय श्री राधे !!
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विषय: सावधान! क्या आप धर्म कार्यों में 'धीमा जहर' इस्तेमाल कर रहे हैं? 🚫
धर्म प्रेमी बंधुओं, 🙏
हम अपने आराध्य देवों और पितरों के लिए जो अर्पित करते हैं, वह पूर्णतः शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। लेकिन आज जाने-अनजाने हम धर्म कार्यों में 'वनस्पति घी' (Vegetable Ghee/Dalda) का प्रयोग कर महापाप के भागी बन रहे हैं।
⚠️ जानिए क्यों वनस्पति घी धर्म और स्वास्थ्य का शत्रु है:
🐮 गौ-वंश का नाशक: इसके प्रचलन से गौ-वध को प्रोत्साहन मिलता है और भारत का गौ-धन नष्ट हो रहा है।
☠️ स्वास्थ्य के लिए मन्द विष (Slow Poison): इसमें निकिल धातु के परमाणु और हानिकारक तेजाब होते हैं।
🌡️ पचने में असंभव: मानव शरीर का तापमान 37°C होता है, जबकि इसे जमने के लिए 40-49°C चाहिए। यह शरीर में जाकर नसों में जम जाता है और जानलेवा बीमारियों को जन्म देता है।
🐟 अशुद्धता: कई रिपोर्ट्स के अनुसार, सुगंध और विटामिन के लिए इसमें मछली का तेल तक मिलाया जाता है।
🙏 एक आवश्यक अपील 🙏
ऐसे अपवित्र और हानिकारक पदार्थ से देवों को वरदान नहीं, अभिशाप मिलता है।
संकल्प लें: यज्ञ, हवन, श्राद्ध, देव पूजन और मन्दिरों के दीपकों में केवल और केवल शुद्ध देशी गौ घृत का ही प्रयोग करें। 🕉️🔥
बहिष्कार करें: वनस्पति घी का धार्मिक कार्यों में पूर्णतया निषेध करें।
जागरूक बनें: अपने स्थानीय मंदिरों और तीर्थ पुरोहितों से भी अनुरोध करें कि वे केवल शुद्ध घी का ही उपयोग सुनिश्चित करें।
धर्म की रक्षा और स्वास्थ्य की सुरक्षा, दोनों हमारे हाथ में है। इस सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने में सहयोग करें।
!! जय जय श्री राधे !!
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शीर्षक: 🤔 आखिर सृष्टि के रचयिता 'ब्रह्माजी' की पूजा क्यों नहीं होती?
सनातन धर्म में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का सर्वोच्च स्थान है। भगवान विष्णु और शिवजी के तो असंख्य मंदिर हैं, लेकिन सृष्टि के सर्जक, चार वेदों के उद्गम और 'विधाता' कहे जाने वाले भगवान ब्रह्मा के मंदिर न के बराबर क्यों हैं?
इसके पीछे पद्मपुराण में एक बहुत ही रोचक कथा आती है:
📜 माता सरस्वती का शाप
एक बार पुष्कर में ब्रह्माजी एक महायज्ञ कर रहे थे। यज्ञ के मुहूर्त का समय निकलता जा रहा था, लेकिन ब्रह्माजी की पत्नी देवी सरस्वती वहां पहुंचने में विलम्ब कर रही थीं। पत्नी के बिना यज्ञ अधूरा माना जाता है।
मजबूरी में, देवताओं ने सलाह दी और ब्रह्माजी ने यज्ञ पूरा करने के लिए सावित्री (गायत्री) नाम की कन्या को अपने वामभाग में बैठाकर यज्ञ शुरू कर दिया।
जब देवी सरस्वती वहां पहुंचीं और उन्होंने अपने स्थान पर किसी और को देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गईं। क्रोध में आकर उन्होंने देवताओं को श्राप दिया और ब्रह्माजी को शाप दिया कि "पुष्कर को छोड़कर पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं भी आपकी प्रतिमा रूप में पूजा नहीं होगी।"
यही कारण है कि ब्रह्माजी के मंदिर दुर्लभ हैं (मुख्यतः पुष्कर और बिठूर में)।
🌟 मंदिर नहीं, फिर भी महत्व सर्वोच्च है:
भले ही उनकी मूर्ति पूजा कम हो, लेकिन ब्रह्माजी का महत्व कम नहीं होता:
वे वेदों के रचयिता और लोकपितामह हैं।
यज्ञों में उनकी अमूर्त उपासना होती है। ऋत्विज् के रूप में 'ब्रह्मा' का स्थान मुख्य होता है।
जब भी धरती पर पाप बढ़ता है, तो देवता सबसे पहले ब्रह्माजी के पास ही जाते हैं और उनकी प्रार्थना पर ही भगवान विष्णु अवतार लेते हैं।
ब्रह्माजी ज्ञान और विद्या के अधिष्ठाता हैं, उनकी मानसिक आराधना अत्यंत फलदायी है।
जय ब्रह्मदेव! 🙏🕉️
!! जय जय श्री राधे !!
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शीर्षक: 🤯 जब एक दानवीर राजा को बनना पड़ा 'गिरगिट'! श्रीकृष्ण ने ऐसे किया उद्धार 🙏
क्या आप जानते हैं, अनजाने में किया गया पाप भी कितना भारी पड़ सकता है? श्रीमद्भागवत महापुराण की यह कथा आँखें खोल देने वाली है।
एक बार द्वारका में श्रीकृष्ण के पुत्रों को एक कुएँ में एक विशालकाय गिरगिट दिखा। वे उसे निकाल न सके और श्रीकृष्ण को बुलाया। भगवान के स्पर्श मात्र से वह गिरगिट एक दिव्य पुरुष बन गया! वह कोई और नहीं, दानवीर राजा नृग थे।
🤔 आखिर क्यों मिला उन्हें यह श्राप?
राजा नृग ने जीवन भर लाखों गायों और अपार धन का दान किया था। लेकिन एक बार, भूलवश, एक ब्राह्मण की गाय उनकी गायों में मिल गई और उन्होंने उसे अनजाने में दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया। इस एक छोटी सी भूल के कारण, दोनों ब्राह्मणों के बीच विवाद हुआ और अंततः राजा नृग को यमराज ने पाप का फल पहले भोगने का विकल्प दिया।
🙏 श्रीकृष्ण का उपदेश: ब्राह्मण-धन है 'महाविष'
राजा नृग का उद्धार करने के बाद, श्रीकृष्ण ने अपने परिवार और समाज को एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी:
🔥 "ब्राह्मण का धन हलाहल विष से भी खतरनाक है। विष तो सिर्फ खाने वाले को मारता है, लेकिन ब्राह्मण के धन से पैदा हुई आग पूरे कुल का नाश कर देती है।"
🔥 "जो मूर्ख राजा अभिमान में ब्राह्मण का धन हड़पते हैं, वे अपने और अपने वंशजों के लिए नरक का रास्ता साफ करते हैं।"
🔥 "ब्राह्मण अगर अपराध भी करे, गाली दे या मारे, तब भी उसे नमस्कार ही करना चाहिए, द्वेष नहीं।"
शिक्षा: हमें अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। अनजाने में की गई भूल भी पाप बन सकती है। दान-पुण्य करते समय भी अत्यंत सावधानी बरतें। और सबसे महत्वपूर्ण, ब्राह्मणों और सज्जनों का सदा सम्मान करें।
जय श्री कृष्णा! 🙏🕉️
!! जय जय श्री राधे !!
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शीर्षक: 🌅 जब विंध्याचल के अहंकार ने रोक दिया था सूर्य का रास्ता! 🌅
स्कंद महापुराण के काशी खंड में सूर्योदय और सूर्यास्त से जुड़ी एक बड़ी ही रोचक कथा आती है।
एक बार देवर्षि नारद विंध्याचल पर्वत के पास से गुजरे। विंध्या देवी ने उनका सत्कार किया, लेकिन बातों ही बातों में मेरु पर्वत के प्रति अपनी ईर्ष्या व्यक्त कर दी। उन्हें लगता था कि मेरु को व्यर्थ ही इतना सम्मान मिलता है। नारद जी तो "भविष्य ही निर्णय करेगा" कहकर चले गए, लेकिन विंध्या देवी के मन में अहंकार और ईर्ष्या की आग लग गई।
🔥 विंध्या का हठ और घोर अन्धकार
अपनी शक्ति सिद्ध करने के लिए विंध्याचल ने निश्चय किया कि वह सूर्य देव का मार्ग रोक देगी। वह आकाश की ओर बढ़ने लगी और उसने अपना आकार इतना विशाल कर लिया कि सूर्य का रास्ता ही अवरुद्ध हो गया।
परिणामस्वरूप, तीनों लोकों में घोर अंधकार छा गया! हाहाकार मच गया।
🙏 महर्षि अगस्त्य का उपाय
सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने बताया कि इस समस्या का समाधान केवल महर्षि अगस्त्य ही कर सकते हैं, जो इस समय काशी में तपरत हैं।
देवताओं की प्रार्थना पर, जगत कल्याण के लिए महर्षि अगस्त्य ने अपनी प्रिय काशी नगरी छोड़ने का कठोर निर्णय लिया और विंध्याचल की ओर चल पड़े।
🙇 विंध्या का झुकना
अगस्त्य मुनि के तेज को देखकर विंध्या देवी कांप उठीं। उन्होंने तुरंत अपना मस्तक झुकाकर मुनि को प्रणाम किया और सेवा पूछी।
महर्षि अगस्त्य ने अपनी युक्ति से काम लिया और बोले: "विंध्या! मैं दक्षिण दिशा में जा रहा हूँ। मेरे लौटने तक तुम इसी प्रकार झुकी रहो, ऊपर उठने की चेष्टा न करना। यही मेरा आदेश है।"
महर्षि अगस्त्य दक्षिण चले गए और वहीं गोदावरी तट पर निवास बना लिया, वे कभी नहीं लौटे।
विंध्या आज भी मुनि के लौटने की प्रतीक्षा में झुकी हुई हैं। और इसी कारण, पूर्व से सूर्योदय और पश्चिम में सूर्यास्त का क्रम पुनः आरंभ हो सका, जो आज तक निर्बाध चल रहा है।
सीख: अहंकार कितना भी विशाल क्यों न हो, उसे अंततः झुकना ही पड़ता है।
हर हर महादेव ।। 🙏🕉️☀️
!! जय जय श्री राधे !!
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शीर्षक: 🦁 जब भगवान नृसिंह के क्रोध से कांप उठे थे तीनों लोक, तब एक 5 साल के बालक ने किया यह चमत्कार! 🙏
हिरण्यकशिपु के वध के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनका विकराल रूप देखकर ब्रह्मा जी, शंकर जी और यहाँ तक कि स्वयं माता लक्ष्मी भी उनके पास जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।
सभी देवता भयभीत थे। तब देवर्षि नारद ने एक युक्ति सुझाई... उन्होंने नन्हे भक्त प्रह्लाद को आगे किया।
🌸 अद्भुत दृश्य:
जो भगवान देवताओं के लिए भय का कारण बने हुए थे, वही 5 वर्ष के प्रह्लाद को देखते ही मुस्कुरा उठे!
जब शांत होकर भगवान ने प्रह्लाद से कहा, "बेटा! वर मांगो, मैं तुम्हें सब कुछ दे सकता हूँ।" तब प्रह्लाद ने जो उत्तर दिया, वह आज के समय में हम सबके लिए एक महान शिक्षा है।
💎 प्रह्लाद का अद्भुत ज्ञान:
प्रह्लाद ने हाथ जोड़कर कहा: "प्रभु! जो सेवक स्वामी से कुछ कामना लेकर जाता है, वह सेवक नहीं, वह तो 'वणिक' (व्यापारी) है। यह तो व्यापार हुआ कि मैंने भक्ति की और आपने वर दिया। मैं व्यापारी नहीं, आपका दास हूँ।"
प्रह्लाद ने आगे कहा: "हे नाथ! यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो यह वर दीजिये कि मेरे हृदय में कभी आपसे कुछ मांगने की बुद्धि ही पैदा न हो। क्योंकि कामना ही समस्त सद्गुणों (सत्य, तेज, धर्म, बुद्धि) का नाश करती है।"
✨ परिणाम:
भगवान नृसिंह इस निष्काम भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने न केवल प्रह्लाद को निष्कामता का वरदान दिया, बल्कि उन्हें आदेश दिया कि वे एक मन्वन्तर (लगभग 30 करोड़ वर्ष) तक पृथ्वी का राज्य भोगें।
सीख: भगवान से भगवान को ही मांगें, संसार की वस्तुएं नहीं। सच्ची भक्ति व्यापार नहीं होती।
बोलिए नृसिंह भगवान की जय! भक्त प्रह्लाद की जय!
!! जय जय श्री राधे !!
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शीर्षक: 🚩 जब हनुमान जी ने 1000 अमर राक्षसों को अंतरिक्ष में फेंक दिया! 🚩
लंका युद्ध का एक अद्भुत और कम सुना गया प्रसंग!
जब रावण को अपनी हार दिखने लगी, तो उसने अपना आखिरी दांव खेला। उसने 1000 ऐसे 'अमर' राक्षसों को रणभूमि में उतारा जिन्हें काल भी नहीं मार सकता था।
यह देखकर प्रभु श्रीराम और सुग्रीव चिंतित हो गए। अगर शत्रु मरेगा ही नहीं, तो युद्ध का अंत कैसे होगा? माता सीता का उद्धार कैसे होगा?
संकटमोचन का आगमन:
प्रभु को चिंतित देख हनुमान जी आगे आए। विभीषण ने समस्या बताई कि ये राक्षस अमर हैं।
पवनपुत्र ने मुस्कुराकर कहा, "प्रभो! असंभव को संभव और संभव को असंभव कर देने का नाम ही तो हनुमान है! आप चिंता न करें, मैं अकेला ही काफी हूँ।"
अद्भुत पराक्रम और अनोखी युक्ति:
रणभूमि में हनुमान जी ने उन राक्षसों को ललकारा। राक्षस हँसे कि हम तो अमर हैं। हनुमान जी ने कहा, "अमर हो, तभी तो जीवित ऊपर भेजूंगा!"
हनुमान जी ने अपनी विशाल पूंछ बढ़ाई और उन एक हजार अमर राक्षसों को उसमें लपेट लिया। और फिर पूरी शक्ति से उन्हें ऊपर आकाश की ओर फेंक दिया!
वे राक्षस पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से भी ऊपर चले गए। तुलसीदास जी लिखते हैं, वे अभी भी अंतरिक्ष में जा ही रहे हैं, न मर सकते हैं, न वापस आ सकते हैं।
प्रभु श्रीराम हुए ऋणी:
जब हनुमान जी लौटे, तो प्रभु श्रीराम ने उन्हें गले लगा लिया और भावुक होकर बोले:
"हनुमान! तुमने जो उपकार किया है, मैं चाहता हूँ उसका बदला कभी न चुका सकूँ, क्योंकि उपकार का बदला विपत्ति में चुकाया जाता है। और मैं चाहता हूँ तुम पर कभी कोई विपत्ति न आए।"
धन्य हैं महावीर हनुमान और उनकी यह अद्भुत बुद्धि! 🙏
जय सियाराम! जय बजरंगबली!
!! जय जय श्री राधे !!
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विषय: जब ठाकुर जी स्वयं गूँगे बालक के वेश में ब्राह्मण का पारिश्रमिक देने आए... 🌸🙏
यह कथा है काशी के एक निष्काम ब्राह्मण की, जिनका जीवन केवल भागवत जी के पाठ में ही बीतता था। घर की स्थिति दयनीय थी, पत्नी मेहनत करके जैसे-तैसे घर चलाती थीं, पर ब्राह्मण अपनी साधना से कभी डिगे नहीं।
एक दिन, संतों का एक समूह उनके घर भोजन की आशा में आया। घर में अन्न का दाना न था। संत स्थिति समझकर भूखे ही लौट गए। यह देख ब्राह्मण पत्नी का धैर्य टूट गया। क्रोध और दुख में उन्होंने पति से कह दिया, "आज या तो भागवत जी को चुनिए या हमें! मेरे द्वार से संत भूखे चले गए, ऐसी भक्ति का क्या लाभ?"
ब्राह्मण चुपचाप अपना पोथी-पत्रा लेकर घर से निकल गए और घाट पर जाकर पुनः पाठ में लीन हो गए।
उसी दिन, ब्राह्मण के द्वार पर एक अद्भुत बालक आया। सिर पर टोकरी, पीताम्बर धारी, मोरपंख लगाए, गले में वैजयंती माला। बालक गूँगा था। उसने लिखकर बताया:
"आपके पति हमारे परिवार के लिए वर्षों से भागवत पाठ कर रहे हैं, पर कभी कुछ स्वीकार नहीं किया। यह टोकरी उन्हीं का पारिश्रमिक है।"
टोकरी हीरे-माणिक्यों से भरी थी! जब तक पत्नी की नज़र उठी, बालक अदृश्य हो चुका था।
जब ब्राह्मण घर लौटे और पत्नी ने सारी बात बताई, तो वे बालक का हुलिया सुनकर काँप उठे। उन्होंने भागवत जी खोली और भगवान श्रीकृष्ण के रूप-वर्णन का श्लोक सुनाया। पत्नी रो पड़ी, "हाँ नाथ! वह बिल्कुल ऐसा ही था।"
ब्राह्मण की आँखों से अविरल अश्रु बह निकले, वे बोले, "अरी पगली! वह कोई साधारण बालक नहीं, साक्षात् मेरे ठाकुर जी थे, जो मेरे निष्काम पाठ का मोल चुकाने आए थे।"
सच है, प्रभु भाव के भूखे हैं। निष्काम भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
जय श्री राधे कृष्णा! 🙌❤️
!! जय जय श्री राधे !!
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विषय: एक ऐसा कुंड, जिसने भगवान परशुराम के हाथों से 'मातृ-हत्या' का कलंक धो दिया! 🕉️💧
यह कथा है धर्म, कर्तव्य और प्रायश्चित की।
महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका का जीवन तपस्या का पर्याय था। माता रेणुका का सतीत्व इतना प्रबल था कि वे कच्चे मिट्टी के घड़े में नदी से जल भर लाती थीं। किंतु एक दिन, एक क्षण के मोह ने उनके वर्षों के तप को खंडित कर दिया और वह कच्चा घड़ा बिखर गया।
क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया। चार बड़े भाइयों ने ममता वश मना कर दिया और जड़ (पत्थर) हो गए।
🪓 धर्म संकट:
तब आए सबसे छोटे पुत्र, भगवान परशुराम। पिता की आज्ञा और माता का प्रेम—उनके सामने धर्म का सबसे कठिन मार्ग था। उन्होंने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना और भारी मन से अपनी जननी का मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
पिता प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। परशुराम जी ने तुरंत माता का जीवन और भाइयों का चैतन्य वापस मांग लिया। सब जीवित तो हो गए, पर...
🩸 वह अमिट दाग:
उस फरसे पर लगा रक्त का दाग और 'मातृ-हत्या' का सूक्ष्म पाप परशुराम जी के हाथों से चिपक गया। वह शस्त्र उनके हाथ से अलग ही नहीं हो रहा था। वे वर्षों तक तीर्थ-तीर्थ भटकते रहे, पर मुक्ति नहीं मिली।
🏔️ मुक्ति का द्वार: परशुराम कुंड
अंततः, वे अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों में लोहित नदी के तट पर पहुंचे। जैसे ही उन्होंने वहाँ के पवित्र कुंड के शीतल जल को स्पर्श किया, एक चमत्कार हुआ! वर्षों से चिपकी वह कुल्हाड़ी स्वयं छूटकर गिर पड़ी।
वह स्थान आज 'परशुराम कुंड' के नाम से पूजा जाता है।
यह कथा सिखाती है कि धर्म का मार्ग सरल नहीं होता, लेकिन यदि मन में शुद्धि हो, तो प्रकृति हमें हर पाप से मुक्त कर देती है। आज भी मकर संक्रांति पर हज़ारों श्रद्धालु यहाँ आत्मा के संताप को धोने आते हैं।
🙏 जय भगवान परशुराम! 🙏
!! जय जय श्री राधे !!
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🌹 क्या आप जानते हैं 'पितृ गीत' का मर्म? आपके पूर्वज आपसे क्या चाहते हैं? 🌹
विष्णुपुराण में वर्णित 'पितृ गीत' हमें बताता है कि हमारे पितर (पूर्वज) अपने वंशजों से केवल धन या बड़े भोज की अपेक्षा नहीं करते, वे तो बस आपके प्रेम और स्मरण के भूखे हैं।
क्या है पितरों की अभिलाषा?
पितर सोचते हैं—"क्या हमारे कुल में कोई ऐसा समझदार वंशज है जो धन का लोभ त्यागकर हमें याद करेगा?"
शास्त्रों ने श्राद्ध की व्यवस्था हर वर्ग के लिए की है, चाहे वह अमीर हो या निर्धन:
संपन्न लोगों के लिए: जिनके पास सामर्थ्य है, वे दिल खोलकर विप्रों को भोजन, वस्त्र और दान दें।
मध्यम वर्ग के लिए: जो बहुत धनवान नहीं हैं, वे केवल अपनी शक्ति अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन करा दें।
साधारण लोगों के लिए: यदि भोजन की भी सामर्थ्य नहीं, तो कच्चा अनाज (आटा-दाल) और थोड़ी दक्षिणा दें।
निर्धन के लिए: यदि यह भी संभव नहीं, तो केवल एक मुट्ठी तिल और जल से तर्पण करें।
अत्यंत अभाव में: यदि इतना भी नहीं है, तो श्रद्धापूर्वक किसी गाय को चारा खिला दें।
🙏 जब पास कुछ भी न हो:
विष्णुपुराण का यह श्लोक अत्यंत भावुक है—
यदि किसी के पास धन, अन्न या कुछ भी नहीं है, तो वह किसी एकांत/वन में जाकर आकाश की ओर हाथ उठाकर सूर्य और लोकपालों से कहे:
"हे प्रभु! मेरे पास धन नहीं है, श्राद्ध के लिए कोई सामग्री नहीं है। मैं केवल अपने पितरों को भक्तिभाव से नमस्कार करता हूँ। वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों।"
निष्कर्ष:
पितर केवल 'श्रद्धा' के भूखे हैं। जो उन्हें याद करता है, वे उसे आशीर्वाद देकर जाते हैं जिससे कुल में वीर और निरोगी संतानें जन्म लेती हैं।
अपने पितरों को कभी न भूलें। 🕉️
!! जय जय श्री राधे !!
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