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कविता कोष

भारतीय काव्य का महासागर

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कविता

क्या मुझे पहचान लोगी मिल गये उस जन्म में संयोगवश यदि, क्या मुझे पहचान लोगी? चौंककर चंचल मृगी सी धर तुरत दो चार पल पग, कहो प्रिय, क्या देखते ही खोल गृह-पट आ मिलोगी? खुली लट होगी तुम्हारी झूमती मुख चूमती सी, कहो प्रिय, क्या आ ललककर पुलक आलिंगन भरोगी? कहो, क्या इस जन्म की सब लोक-लज्जा, प्राण, मेरे हित वहाँ तुम त्याग दोगी? जब विरह के युग बिता, युग-प्रेमियों के उर मिलेंगे। कौन जाने कल्प कितने बाहु-बन्धन में बंधेंगे? कहेंगे दृग-अधर हँस-मिल अश्रुमय अपनी कहानी, एक हो शम कम्प उर के मौन हो-होकर सुनेंगे? प्रलय होगी, सिन्धु उमड़ेंगे हृदय में, चेत होगा, फिर नयी जब सृष्टि होगी! मिल गये उस जन्म में संयोगवश यदि, क्या मुझे पहचान लोगी? . . रचनाकार: नरेन्द्र शर्मा . . प्रस्तुति: शारदा सुमन
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2 साल पहले
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कविता

युग युग से है अपने पथ पर देखो कैसा खड़ा हिमालय! डिगता कभी न अपने प्रण से रहता प्रण पर अड़ा हिमालय! जो जो भी बाधायें आईं उन सब से ही लड़ा हिमालय, इसीलिए तो दुनिया भर में हुआ सभी से बड़ा हिमालय! अगर न करता काम कभी कुछ रहता हरदम पड़ा हिमालय तो भारत के शीश चमकता नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय! खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आँधी पानी में, खड़े रहो अपने पथ पर सब कठिनाई तूफानी में! डिगो न अपने प्रण से तो –– सब कुछ पा सकते हो प्यारे! तुम भी ऊँचे हो सकते हो छू सकते नभ के तारे!! अचल रहा जो अपने पथ पर लाख मुसीबत आने में, मिली सफलता जग में उसको जीने में मर जाने में! . . रचनाकार: सोहनलाल द्विवेदी . . प्रस्तुति: शारदा सुमन .
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2 साल पहले
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कविता

ये शामें, सब की शामें... जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में ये शामें क्या इनका कोई अर्थ नहीं? वे लमहें वे सूनेपन के लमहें जब मैनें अपनी परछाई से बातें की दुख से वे सारी वीणाएं फेकीं जिनमें अब कोई भी स्वर न रहे वे लमहें क्या इनका कोई अर्थ नहीं? वे घड़ियां, वे बेहद भारी-भारी घड़ियां जब मुझको फिर एहसास हुआ अर्पित होने के अतिरिक्त कोई राह नहीं जब मैंने झुककर फिर माथे से पंथ छुआ फिर बीनी गत-पाग-नूपुर की मणियां वे घड़ियां क्या इनका कोई अर्थ नहीं? ये घड़ियां, ये शामें, ये लमहें जो मन पर कोहरे से जमे रहे निर्मित होने के क्रम में क्या इनका कोई अर्थ नहीं? जाने क्यों कोई मुझसे कहता मन में कुछ ऐसा भी रहता जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं अर्पित है पूजा के फूलों-सा जिसका मन अनजाने दुख कर जाता उसका परिमार्जन अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को नत-मस्तक होकर वह कर लेता सहज ग्रहण वे सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियां यह पीड़ा, यह कुण्ठा, ये शामें, ये घड़ियां इनमें से क्या है जिनका कोई अर्थ नहीं! कुछ भी तो व्यर्थ नहीं! . . रचनाकार: धर्मवीर भारती
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2 साल पहले
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कविता

मुझे स्वीकार हैं वे हवाएँ भी जो तुम्हें शीत देतीं और मुझे जलाती हैं किन्तु इन हवाओं को यह पता नहीं है मुझमें ज्वालामुखी है तुममें शीत का हिमालय है फूटा हूँ अनेक बार मैं, पर तुम कभी नहीं पिघली हो, अनेक अवसरों पर मेरी आकृतियाँ बदलीं पर तुम्हारे माथे की शिकनें वैसी ही रहीं तनी हुई. तुम्हें ज़रूरत है उस हवा की जो गर्म हो और मुझे उसकी जो ठण्डी! फिर भी मुझे स्वीकार है यह परिस्थिति जो दुखाती है फिर भी स्वागत है हर उस सीढ़ी का जो मुझे नीचे, तुम्हें उपर ले जाती है काश! इन हवाओं को यह सब पता होता। तुम जो चारों ओर बर्फ़ की ऊँचाइयाँ खड़ी किए बैठी हो (लीन... समाधिस्थ) भ्रम में हो। अहम् है मुझमें भी चारों ओर मैं भी दीवारें उठा सकता हूँ लेकिन क्यों? मुझे मालूम है दीवारों को मेरी आँच जा छुएगी कभी और बर्फ़ पिघलेगी पिघलेगी! मैंने देखा है (तुमने भी अनुभव किया होगा) मैदानों में बहते हुए उन शान्त निर्झरों को जो कभी बर्फ़ के बड़े-बड़े पर्वत थे लेकिन जिन्हें सूरज की गर्मी समतल पर ले आई. देखो ना! मुझमें ही डूबा था सूर्य कभी, सूर्योदय मुझमें ही होना है, मेरी किरणों से भी बर्फ़ को पिघलना है, इसी लिए कहता हूँ- अकुलाती छाती से सट जाओ, क्योंकि हमें मिलना है। . . रचनाकार: दुष्यंत कुमार
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2 साल पहले
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(एक) बहुत दिनों के बाद हम उसी नदी के तट से गुज़रे जहाँ नहाते हुए नदी के साथ हो लेते थे आज तट पर रेत ही रेत फैली है रेत पर बैठे–बैठे हम यूँ ही उसे कुरेदने लगे और देखा कि उसके भीतर से पानी छलछला आया है हमारी नज़रें आपस में मिलीं हम धीरे से मुस्कुरा उठे। (दो) छूटती गयी तुम्हारे हाथों की मेहँदी की शोख लाली पाँवों से महावर की हँसी आँखों से मादका प्रतीक्षा की आकुलता वाणी से फूटती शेफाली हँसी से फूटती चैत की सुबह मुझे लगा कि मेरे लिये तुम्हारा प्यार कम होता जा रहा है मैं कुछ नहीं बोला भीतर–भीतर एक बोझ् ढोता रहा और एक दिन जब तुमसे टकराना चाहा तो देखा तुम ‘तुम’ थीं कहाँ? तुम तो मेरा सुख और दुःख बन गयीं थीं। . . रचनाकार: रामदरश मिश्र . . प्रस्तुति: शारदा सुमन .
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2 साल पहले
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बीस साल बाद, अगर उससे हो जाए मुलाक़ात। शाम की पीली नदी में कौवे जब घर फिरते हों तब, जब घास-पात नरम और हल्की हो जाए। या जब कोई न हो धान खेत में कहीं भी आपाधापी मची न हो हंसों और चिड़ियों के घोसलों से जब गिर रहे हों तिनके मनियार के घर रात हो, शीत हो और जब शिशिर की नमी झर रही हो। जीवन कर गया है बीस साल पार- ऐसे में तुम्हें पा जाऊँ मीठी राह एक बार। हो सकता है आधी रात को जब चाँद उगा हो शिरीष या जामुन, झाऊ या आम के पत्तों के गुच्छों के पीछे काले कोमल डाल-पात झाँकती तुम आ जाओ क्या बीससाल पहले की तुम्हें कुछ नहीं याद। जीवन कर गया है बीस साल पार और ऐसे में अगर मुलाकात हो जाए एक बार। तब शायद झपटकर उल्लू मैदान पर उतर पड़ें- बबुआ की गली के अन्धकार में अश्वत्थ के जंगले के फाँक में कहाँ छुपाऊँ आपको? पलक की तरह झुककर छुपूँ कहाँ चील का डैना थाम कर- सुनहली-सुनहली चील-शिशिर का शिकार कर जिसे ले गयी उसे बीस साल बाद उसी कोहरे में अगर मुलाकात हो जाए। . . रचनाकार: जीवनानंद दास . अनुवाद: समीर वरण नंदी
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2 साल पहले
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कविता

वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर। ‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख, चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र। ‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश, शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल। जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें। ‘भूलोक, अतल, पाताल देख, गत और अनागत काल देख, यह देख जगत का आदि-सृजन, यह देख, महाभारत का रण, मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान, इसमें कहाँ तू है। ‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख। सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं। ‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन, साँसों में पाता जन्म पवन, पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर! मैं जभी मूँदता हूँ लोचन, छा जाता चारों ओर मरण। ‘बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है? ‘हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा। ‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर, फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा। दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा। ‘भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे, वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे। आखिर तू भूशायी होगा, हिंसा का पर, दायी होगा।’ थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े। केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे। कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’! . . रचनाकार: रामधारी सिंह "दिनकर" . . प्रस्तुति: शारदा सुमन
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2 साल पहले
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मैं इस पोस्ट का विरोध करता हूँ, क्योंकि ये पोस्ट...
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