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आई लव शेयरचैट

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✍️अल्फ़ाज़✍️

#षड्यन्त्रों_की_पोल_खोल : #मूलनिवासी_आदिवासी शब्द ईसाइयों द्वारा रचे गए शब्द Aborigine या Ab Origine शब्द की हिंदीबाजी है। ठीक उसी तरह जैसे रिलीजन और कास्ट की हिंदीबाजी धर्म और जाति में की गयी है। आज से पांच सौ वर्ष पूर्व जब यूरोप भयंकर भुखमरी और गरीबी के दौर से गुजर रहा था, तो चर्च और वहां के धनिकों ने कुछ भाड़े के दस्युवों को भारत को खोजने और उसके धन वैभव को लूटने के उद्देश्य से उनकी यात्रा का खर्च वहन किया। उसमें पहला लुटेरा गलती से भारत के स्थान पर अमेरिका पहुंच गया। कुछ वर्ष बाद दूसरा दस्यु सरदार वास्कोडिगामा भारत आ पहुँचा। उनके लूट की कहानियों को आप भली भांति जानते हैं। अमेरिका के देशी लोगों को उन्होंने इंडियन, ab origine या Indigenous people का नाम दिया। Aborigine एक लैटिन शब्द है। लैटिन नग्रेजी की माता है। ग्रीक और लैटिन क्लासिकल भाषाएं हैं जिनसे यूरोप की आधुनिक भाषाएं विकसित हुई हैं। इनका अध्ययन की विधा को फिलोलोजी कहते हैं। ठीक उसी तरह जैसे संस्कृत से भारत की समस्त भाषाओ का विकास हुआ है। संस्कृत विश्व की भाषाओ की जननी नही है। यह अफवाह 1786 में एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक विलियम जोंस ने उड़ाई प्रथम बार। उन्होंने उन देशी अमेरिकन्स का बाइबिल और ईसाइयत के नाम पर जेनोसाइड किया। लोगों का अनुमान है कि उन्होंने अकेले अमेरिका में लगभग 20 करोड़ लोगों की हत्या किया था। अमेरिका के बचे हुए देशी लोगों के द्वारा लिखे गए निबंधों को एक पुस्तक में संकलित करके एकं पुस्तक 2009 में प्रकशित की गई है : " Confronting Genocide: Judaism, Christianity, Islam ( edited by) Steven Leonard Jacobs. इसको पढिये आपको समझ मे आ जायेगी कि इनका वास्तविक स्वरूप और इतिहास कितना विकृत और घृणित है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह शब्द भारत मे कैसे आयातित हुवा? 1786 में जब विलियम जोन्स ने संस्कृत का सम्बंध युरोपियन भाषा से जोड़ा तो यूरोप के विश्विद्यालयों में इसे अफवाह विज्ञान - फिलोलोजी और इंडोलॉजी के नाम पर पढ़ाया जाने लगा। जिसमे विलियम जोंस के कल्पनात्मक गप और किस्से कहानियों में अपनी भी कल्पना जोड़कर हजारों ग्रंथ लिखे गए। 1859 में पहली बार महान धोखेबाज मैक्समुलर ने #आर्यन_अफवाह वाला फिक्शन लिखा और उसको यूरोप के एकेडेमिया को सौंपा। इसके कारण क्या थे यह बात मैंने कई पोस्टों में लिखा है। अगले कुछ दशकों में गप्प और कहानियो को जोड़ जोड़कर यह सिद्ध किया गया कि जर्मन ईसाई ही असली वाले आर्यन थे। परिणाम यह हुवा कि दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी के ईसाइयों ने यूरोप के 60 लाख यहूदियों और 40 लाख जिप्सियों का बर्बर तरीके से हत्या किया। यह कहानी भारत भी एक्सपोर्ट की गयी। भारत के अनेक विद्वान इस अफवाह से दिग्भ्रमित हुए - उनमे प्रमुख नाम बाल गंगाधर तिलक, डॉ अम्बेडकर और रामधारी सिंह दिनकर जैसे विद्वान लोग थे। 1885 में पहली बार जब गजेटियर ऑफ इंडिया लिखी गयी, तो उसमें उन्होंने हिंदुओं को दो भाग में वैधानिक रूप से बांट दिया गया - आर्यन और aborigines या Indigenous people. उसको दूसरे रुप मे लिखा जाए तो आर्यन ( तथाकथित सवर्ण ) और aborigines Indigenous people ( शूद्र अतिशूद्र, असवर्ण, द्रविड़ आदि आदि ) मूलतः उन्होंने अपने अमेरिका जैसे देशों में अपने कृत्यों का बाइबिल के सिद्धांतों को मिश्रित करके हिन्दू समाज पर आरोपण कर दिया। आप जानते है कि ईसाई विद्वानों ने बताया कि वर्ण का अर्थ है चमड़े का रंग। उसी आधार पर साहित्यों और कहानियो में हिंदुओं का सवर्ण और असवर्ण में बंटवारा किया। लेकिन आप जानते है कि हमारे देश मे चमड़ी के रंग रूप के आधार पर कभी समाज को बांटा नही गया वरना क्या भगवान कृष्ण और राम साँवले होते क्या? लेकिन यह जगविदित है कि रंगभेद नीति ( Apartheid) की नीति किन किन देशों में चलती थी? आगे की कहानी आप समझ लीजिए। नग्रेजी विद्वानों को जब मूर्ख देशी भारतीयों को भी शिक्षित करने की आवश्यकता महसूस हुई तो उन्होंने बड़े हिंदीबाज अनुवादकों को यह जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने Aborigines और Indigenous people का अनुवाद किया आदिवासी में। उसी को ईसाइयों ने मूलनिवासी शब्द में रूपांतरित किया। भारत के वन में निवास करने वाले ऋषियों ने अनेकों ग्रंथ की रचना किया है जिनको आरण्यक कहते हैं। वे वेद और उपनिषद की तरह ही ज्ञान के भंडार हैं। वनवासी या आरण्यक कहा जाना अधिक उचित होगा। ये सब क्यों किया गया? इसके कई कारण हैं जिनको मैं पूर्व में लिख चुका हूँ। लेकिन उनमें सबसे बड़ा कारण था - उन्होंने भारत के धन वैभव को लूटा और भारत के कृषि वाणिज्य और शिल्प का विनाश किया, जिसके कारण करोड़ो भारतीय भूंखमरी और संक्रामक रोगों से मौत के मुंह मे समा गए। अपने इन्ही अपराधों पर पर्दा डालने हेतु उन्हीने इन गप्पों के द्वारा हिन्दू समाज की व्याख्या करने का कुत्सित और वीभत्स प्रयास किया। वे सफल भी हुए। क्यों ? क्योंकि मैकाले ने भारत मे आधुनिक शिक्षा की नींव रखने के बाद अपने बाप को लिखे पत्र में लिखा था -"इस शिक्षा से एलियंस (अभारतीय) और स्टुपिड प्रोटागोनिस्ट ( मूर्ख पिछलग्गू) तैयार किये जायेंगे"। उनसे आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं? क्लास 5th मे पढ़ने वाली बच्ची ने आज पूंछा कि -"पापा Early Human Beings क्या खाते थे" ? मेरी समझ मे नहीं आया कि क्या पूंछ रही है ये / मैंने पूंछा -"क्या मतलब" ? उसने दो बार यही बात दोहराई / फिर मुझको बेवकूफ समझकर उसने बताया कि #आदिवासी को अङ्ग्रेज़ी मे Early Human Beings कहते हैं / मैंने पूंछा कहाँ पढ़ा ? उसने बताया कि उसके क्लास 4 की पुस्तक मे था / मैंने कहा दिखाओ / उसने कहा अभी आप काम पर जाइए , शाम तक खोज कर दिखाऊँगी / ये पढ़ाया जा रहा है कोमल मस्तिस्क के बच्चो को / बाद मे ये वामपंथ के शिकार बनकर class War और Caste War पढ़ेंगे / दरअसल आदिवासी Aborigines का हिन्दी अनुवाद है , जिसका अनुवाद मिशनरियों ने किया था / जब ये चंडूखाने की हवा मक्ष्मुल्लर ने उड़ाई कि आर्य बाहर से आए और Aborigines - द्रविड़ , शूद्र , अति शूद्र ( फुले महात्मा की खोज ) आदि को गुलाम बनाया / और एच एच रीसले ने 1901 मे जातियों की उत्पत्ति के रहस्य के खोज करते हुये ये बताया कि बाहर से आने वाले सुदृढ़ आर्य जब भारत आए तो Aborigines की स्त्रियॉं को Concubine ( इसका अर्थ रखैल होता है ?) बनाया / और उनसे जो बच्चे पैदा हुये उससे एक जाति बनी / इस तरह से उसने 2000 से ऊपर जातियों की खोज की / अब अम्रीका और औस्ट्रालिया के Aborigines की तो हत्या कर दिया गोरे इसाइयों ने और उनकी सोने चांदी के खज़ानों पर कब्जा कर दिया / मात्र अमेरिका मे 1500- से 1800 के बीच 20 करोड़ Aborigines की हत्या इसलिए कर दिया क्योंकि वे अपनी जमीन से हटने को तैयार नहीं थे / लेकिन भारत के Aborigines 64 कलाओं के ज्ञाता थे - जिनके बनाए हुये वस्त्रों को भारत पर कब्जा करने के पूर्व वे आयातित करते थे / इसके अलावा अन्य बहुत सी जीवन उपयोगी बहुमूल्य वस्तुवे , जिंका उत्पादन करना उन जंगलियों ने नहीं सीखा था, वो वस्तुएं भी वे भारत से आयात कर ले जाते थे / इसलिए इन बहूपयोगी Aborigines की हत्या नहीं किया बल्कि उनको बेघर बेरोजगार कर भूंख से मरने के लिए छोड़ दिया / 1850 से 1900 के बीच करीब 5 करोड़ Aborigines भूंख से तड़पकर मर गए / 1935 मे इन्हीं Aborigines को 429 जातियों की लिस्ट बनाकर एक सूची तैयार किया और उनको scheduled Caste घोसित किया / उनके प्रतिनिधियों को एकलव्य शंबूक और मनुस्मृतियों की लोरी सुनाकर बताया कि तुम्हारे दुर्दशा के असली कारण हम #गौरांग ईसाई नहीं , बल्कि ये सवर्ण है , जिनहोने तुमको बेरोजगार होने पर अपने खेतों मे काम करके पेट भरने का मौका दिया / ✍🏻डॉ त्रिभुवन सिंह जो आदमी अपने AC कमरे से निकलकर कभी सड़क तक आएगा उसे राजस्थान से लेकर हरियाणा तक के बीच कई ट्रक-टेम्पो पर लिखा “जय खांटू श्याम महाराज” लिखा हुआ दिख जायेगा | कभी सोचा है कि ये खांटू श्याम महाराज कौन से भगवान थे या आज तक श्याम को कृष्ण ही समझते रहे हैं ? शायद इन्हें आप कृष्ण ही समझते रहे होंगे, और खांटू का मतलब शायद कोई जगह समझते होंगे | जैसे काली कलकत्ते वाली टाइप कुछ ? ऐसा है नहीं ! कभी पुछा होगा तो पता होगा ये खांटू श्याम जी अलग होते हैं | इनकी माँ का नाम था “मोरवी”, जी हाँ अच्छा अंदाजा लगाया, वनवासी-आदिवासी कहते हैं आज उन्हें | इन्हें अग्नि से एक ऐसा धनुष प्राप्त था जिसके बल से वो अपराजेय थे | उसके कारण इन्हें “तीन बाण धारी” भी कहा जाता है | उनके पिता का नाम आपने जरूर सुना होगा | ये घटोत्कच के पुत्र थे, यानि भीम और हिडिम्बा के राक्षस पुत्र के बेटे हैं खांटू श्याम महाराज | मिशनरी फण्ड पर चलते AC से युक्त कमरों में बैठे दल हित को चीन तक पहुँचाने की कोशिश में जुटे तथाकथित दलित चिन्तक की “किराये की कलम” ने आपको कभी बताया है कि मंदिर किन्ही तथाकथित सवर्णों के नहीं होते ? हिन्दुओं में आदमी अपने कर्मों की वजह से पूजा जाता है | कहाँ-कैसे जन्म हुआ था इस से कोई लेना देना नहीं होता | अगली बार जब किराये की कलमें मंदिरों की बात करें तो उनसे खांटू श्याम महाराज के मंदिरों के बारे में भी पूछ लीजियेगा | नटरमा, रवांडा के एक चर्च में एक तस्वीर बेन कर्टिस ने ली थी | 1994 में इस कैथोलिक चर्च में शरण लिए आदिवासी दंगा पीड़ितों को मिशनरियों की मदद से बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया था | कैथोलिक दंगाई इस देश में सौ दिन तक लोगों को काटते रहे थे | रवांडा के कैथोलिक चर्च ने 1994 के इस नरसंहार में अपने घृणित कुकर्मों के लिए 20 नवम्बर, 2016 को माफ़ी मांगी है | इस नरसंहार में बलात्कार और अन्य कुकर्मों के अलावा सौ दिन में रवांडा की करीब 30% आबादी कैथोलिक हमलों में ख़त्म हो गई थी | जड़ी बूटियों से हाइपर टेंशन, डायबिटीज, कोलेरा, मीसल्स जैसी बिमारियों के इलाज के बारे में क्या ख्याल है आपका ? क्या हुआ बात कुछ कुछ स्वामी रामदेव जैसी लग रही है ? हो सकता है, बिलकुल हो सकता है कि मेरी ये बात अजीब लगे । लेकिन ऐसा इस लिए है क्योंकि एक तो भारतवासियों ने भारत घूम के नहीं देखा । ऊपर से दल हित चिंतकों ने यहाँ की आदिवासी जनजातियों के बारे में कभी आपको पूरा सच बताया ही नहीं । जैसे कि अगर आपको ये बता दिया जाये की भारत में, गोंड भित्ति चित्रों में पालतू घोड़े नजर आते हैं तो फिर वो आर्यन इन्वेशन के समय घुड़सवार "आर्यों" का स्थानीय "द्रविड़ों" पर हमला कह कर लोगों को भड़काना मुश्किल हो जायेगा । ईसाई हमलावरों के भारत में आने के समय तक भारत में बोली जाने वाली भाषाओँ में गोंड एक प्रमुख भाषा थी । भारत के सबसे बड़े इलाके में यही भाषा चलती थी । 1800 के बाद के समय में गोंड जनजाति और उसकी भाषा को गायब किया गया ये बताने पर तो "दलित आदिवासियों" पर किन्हीं "ब्राह्मणों" के अत्याचार भी साबित नहीं हो पाएंगे । अभी भी भारत के एक भाग मध्य प्रदेश में गोंड काफी संख्या में हैं । लेकिन अगर गोंड आबादी को सचमुच उनके अपने तौर तरीकों, उनकी अपनी परम्पराओं में देखना है तो आपको पातालकोट जाना होगा । नाम पातालकोट इसलिए है क्योंकि ये इतनी गहराई में है कि पाताल जैसा लगता है । एक प्रचलित मान्यता के अनुसार रावण का पुत्र मेघनाद शिव उपासना बाद इसी रास्ते से पाताल गया था । ऐसा भी माना जाता है कि अठारहवीं शताब्दी में राजाओं ने जो सुरंगे बनवा रखी थीं वो पंचमढ़ी (होसंगाबाद जिला) से आकर इसी घाटी (छिंदवाड़ा जिला) में कहीं खुलती थी । ये इलाका, यहाँ की आबादी बरसों दुनियां की नज़रों से ओझल रहे, अभी कुछ ही साल पहले लोगों को यहाँ के गाँवों और करीब दो-तीन हज़ार की आबादी का पता चला है । इस इलाके में पुरुषों और महिलाओं की गिनती लगभग बराबर है । बाकि आबादी से कटे रहने कारण ज्यादातर बीमारियों का इलाज यहाँ स्थानीय वैद्य यानि "भुमक" करते हैं । जाहिर है यहाँ पायी जाने वाली ज्यादातर बिमारियों का पूरा इलाज उनकी जड़ियों से हो जाता है । इनकी धार्मिक मान्यताओं को देखा जाये तो पूजा के स्थान को "देवघर" कहा जाता है । मुख्य रूप से "महादेव", "मदाई", "मदमी देवी", "सूरजदेव" जैसे देवताओं पूजा होती है । त्योहारों में काफी सारे जेवर भी पहने जाते हैं, वैसे ही बीड्स (beads) वाले जैसे आजकल आदिवासियों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले पहनते हैं । बिलकुल वैसे ही । अगर सचमुच की आदिवासी संस्कृति देखनी हो तो उसके लिए ये बिलकुल सही जगह है । भोपाल से छिंदवाड़ा जाने रास्ते में एक डायवर्सन है पातालकोट के लिए । लेकिन चाहे जिधर से जायेंगे घाटी में कम से कम पांच से दस किलोमीटर चलना होगा । मतलब सचमुच जाने के लिए पांच किलोमीटर पहाड़ों पर चलने का अभ्यास हो या शारीरिक सामर्थ्य तभी जाने की सोचिये । मध्यप्रदेश सरकार इस जगह को संरक्षित कर के यहाँ की आबादी की जीवनशैली को बचाने की कोशिश कर रही है । इसे eco tourism के स्थल के रूप में शायद थोड़े समय में मान्यता मिल जाएगी । फ़िलहाल यहाँ कोई रुकने जगह नहीं है, लगभग 15 गाँव हैं जहाँ आप रात में नहीं रुक पाएंगे । सबसे नजदीक तामिया के PWD या वन विभाग के गेस्ट हाउस में रुकने का इंतज़ाम हो सकता है । सदियों तक भारत की आर्य आबादी से कटे लोगों को कोई अलग द्रविड़ परम्पराओं के बदले हिन्दुओं जैसी ही परम्पराओं में पातालकोट में देखा जा सकता है । दूसरा तरीका है तथाकथित "बुद्धिजीवियों" का लिखा, किसी रथों वाले लोगों के, भारत पर आक्रमण को, किताबों में पढ़ना । वैसे एक अंग्रेज़ "A. O. Hume" द्वारा 1885 में स्थापित की गई राजनैतिक पार्टी सदस्य खड़गे "द्रविड़" और "आर्यों" बारे में भी कुछ कहते हैं । आप उनकी भी सुन सकते हैं । बाकि जब वो गाना लिखा गया होगा ना, "कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...", तो कुछ सोचकर ही लिखा गया होगा । ✍🏻आनन्द कुमार
11 ने देखा
3 मिनट पहले
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🙏 धर्म-कर्म

*काल और महाकाल* काल को जब तक नही समझते तब तक महाकाल की परिभाषा का ज्ञान ही नही होगा । काल का अर्थ है चिरंतन सत्य जिसको कोई ठुकरा नही सकता । मृत्यु से अलग है काल । काल का अर्थ है अंत । काल का अर्थ है समय । हर एक का सृजन और अंत निश्चित समय पर होता है जो पहले से तय है । जीवित हो या निर्जिब हर एक का सृजन हुआ है तो समय के साथ अंत भी होगा । और महाकाल का अर्थ है जो उसके परे हों । जिनका न तो सृजन होता है और न ही ध्वंस । *काल-जीत महाकाल कहलाते हैं वो*💀 मृत्यु को जीतना मृत्युंजय कहलाता है । लेकिन काल को जितना महाकाल कहलाता है । जो मृत्यु को जीत लेता है वो अमर हो जाता है । हर वो व्यक्ति अपने आप मे मृत्युंजय है जिसने अपने मृत्यु को जीत लिया जैसे कि रावण कर्ण अर्जुन युधिष्ठिर दुर्योधन आदि । जिन्होंने अपने मरने के बाद भी अमर रहे हैं । आज हम उन सभी को याद करते हैं । इस लिस्ट में गुरु गोरखनाथ आदि गुरु संकराचार्य राम कृष्ण परमहसँ वामाखेपा दैत्य गुरु शुक्राचार्य आदि सब हैं । इन सब को मृत्युंजय महादेव की कृपा प्राप्त हुई तब जाकर ये सब मृत्युंजय बन पाए । मरने के बाद भी अपने अच्छे या बुरे कर्मों के चलते अमर रहे । विष्णु तो उनको अपनाते हैं जो धर्म की मार्ग पर चलते हैं नियम का पालन करते हैं लेकिन महादेव ने तो सबको अपनाया । देव और असुर सब ने उन्ही को आराधा । जिनका कोई अंत नही । जो अपने आप मे अंत हीन है । काल चक्र की सीमा में वो बंधे हुए नही हैं । हनुमान जी विभीषण अश्वस्थमा आदि जिनको भी अमर मानते हैं आज के युग मे कल्प के अंत मे उन सब को भी विलीन होना पड़ता है और नए कल्प के साथ फिर से उनका सृजन या अवतार होता है जो कि इन्ही महाकाल के अधीन है । जब सृष्टि विलीन हो जाती है तब एक मात्र शिव ही बचते हैं अपने निराकार रूप में बम्ह स्वरूप । और फिर जब नया सृष्टि का निर्माण होता है तब इन्ही की इच्छा से होता है । पराशक्ति महामाया जगदम्बा भी इन्ही के अंदर समाहित हो जाती है और बाद में इन्ही से उत्तपन्न होती है । सब को इनका नियम मानकर चलना पड़ता है *(काल चक्र भी इन्ही की इच्छा से चलता है और काल भैरव के रूप में महादेव खुद उसको चलाते हैं)* जन्म मरण के बंधन से मुक्त हैं वो । अघोरियों में सर्वश्रेष्ठ अघोरी हैं वो अघोरेश्वर । जिनका निवास ही समशान है । तंत्र के जनक रचयिता है वो लेकिन हर तंत्र मंत्र से परे हैं वो । हर आशा निराशा से परे है उस शिव की परिभाषा । शिव को न तो किसीने साध पाया है और न ही कोई साध पायेगा । बस इनकी कृपा प्राप्त हो जाए तो सब कुछ मिल जाता है । कोई साधना या फिर कोई मन्त्र तंत्र में बंधे नही हैं । सभी से परे हैं । करोड़ों जन्म लग जाते हैं इनकी कृपा का पात्र बनने में । उन्ही की कृपा मांगो पूरा जीवन भी कम पड़ जायेगा उसको पाने में । *भस्म धारी त्रिपुरारी है बाबा भूतनाथ*
10 ने देखा
3 मिनट पहले
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👌अच्छी सोच

: *किसी से बदला लेने का नहीं अपितु स्वयं को बदल डालने का विचार ज्यादा श्रेष्ठ है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि दूसरे आपको गलत कहते हैं अपितु यह है कि आप गलत नहीं करते हैं।* *बदले की आग दूसरों को कम, स्वयं को ज्यादा जलाती है। बदले की आग उस मसाल की तरह है जिसे दूसरों को खाक करने से पहले स्वयं को राख होना पड़ता है। इसीलिए सहनशीलता के शीतल जल से जितना जल्दी हो सके इस आग को भड़कने से रोकना ही बुद्धिमत्ता है।* *बदले की भावना केवल आपके समय को ही नष्ट नहीं करती अपितु आपके स्वास्थ्य को भी नष्ट कर जाती है। अत: प्रयास जरूर करो मगर बदला लेने का नहीं अपितु स्वयं को बदल डालने का।* *Զเधॆ- Զเधॆ*🙏​​​​​​🙏 *कहने वाले कुछ भी कहते रहते हैं,* *ख़ामोशी से हम सब सहते रहते हैं...* *कुछ दरिया में बहने वाले होते हैं,* *कुछ के अंदर दरिया बहते रहते हैं...* ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻ 💕 जय श्री कृष्ण जी 💕 गमों के सागर में डूब मत जाना.. मंजिल ना मिले तो टूट मत जाना.. अगर जो जिंदगी में कोई कमी महसूस हो तो राधेजी हर पल साथ हैं ये भूल मत जाना.. *🙏🏻🌹ना चिंता ना भय🌹🙏🏻* *🌹🙏🏻श्री राधे राधे.... जी..🙏🏻🌹* *जब चलना नहीं आता था, तब कोई गिरने नहीं देता था..* *और जब चलना सीख लिया तो, हर कोई गिराने में लगा है....!!* *यही जीवन की सच्चाई है*...,अब बस श्याम बाबा का सहारा ह।। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 जय श्री श्याम 😭 ✍ *हर रिश्ते में अमृत बरसेगा...* *शर्त इतनी है कि..,* *शरारतें करो पर, साजिशे नहीं....!!* *🙏🏻जय श्री श्याम*🙏 *कहने वाले कुछ भी कहते रहते हैं,* *ख़ामोशी से हम सब सहते रहते हैं...* *कुछ दरिया में बहने वाले होते हैं,* *कुछ के अंदर दरिया बहते रहते हैं...* ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻ 💕 जय श्री कृष्ण जी 💕 गमों के सागर में डूब मत जाना.. मंजिल ना मिले तो टूट मत जाना.. अगर जो जिंदगी में कोई कमी महसूस हो तो राधेजी हर पल साथ हैं ये भूल मत जाना.. *🙏🏻🌹ना चिंता ना भय🌹🙏🏻* *🌹🙏🏻श्री राधे राधे.... जी..🙏🏻🌹 *जब चलना नहीं आता था, तब कोई गिरने नहीं देता था..* *और जब चलना सीख लिया तो, हर कोई गिराने में लगा है....!!* *यही जीवन की सच्चाई है*...,अब बस श्याम बाबा का सहारा ह।। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 जय श्री श्याम 😭 ✍ *हर रिश्ते में अमृत बरसेगा...* *शर्त इतनी है कि..,* *शरारतें करो पर, साजिशे नहीं....!!* *🙏🏻जय श्री श्याम*🙏🏻
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