गरीब, रतन जडाऊ मन्दिर है, लख जोजन अस्थान। साकट सगा न भेंटिये, जै होय इन्द्र समान।।
जो रिश्तेदार साकट हैं यानि नास्तिक हैं। उसका एक लाख योजन में स्थान यानि पथ्वी का मालिक हो। उसके ( मंदिर ) महलों में रत्न जडे हों। चाहे वह स्वर्ग के राजा इन्द्र जैसा ऐश्वर्यवान हो। वह (सया>) रिश्तेदार कभी ना मिले जो परमात्मा से दूर है। उसक प्रभाव में आकर कच्चा भक्त भक्ति त्यागकर नरक का भागी बन जाता है। - बंदीछोड़ सतगूरू रामपाल जी महाराज #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏गीता ज्ञान🛕