शंख का महत्त्व हम सभी जानते हैं। कहते हैं कि जहाँ तक शंख की ध्वनि जाती है वहाँ तक कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती। प्राचीन काल में शंख ना सिर्फ पवित्रता का प्रतीक था बल्कि इसे शौर्य का द्योतक भी माना जाता था। प्रत्येक योद्धा के पास अपना शंख होता था और किसी भी युद्ध अथवा पवित्र कार्य का आरम्भ शंखनाद से किया जाता था। महाभारत में भी हर योद्धा के पास अपना शंख था और कुछ के नाम भी महाभारत में वर्णित हैं। आइये कुछ प्रसिद्ध शंखों के बारे में जानें।
पाञ्चजन्य: ये श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध शंख था। जब श्रीकृष्ण और बलराम ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा समाप्त की तब उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप में अपने मृत पुत्र को माँगा। तब दोनों भाई समुद्र के अंदर गए जहाँ श्रीकृष्ण ने शंखासुर नामक असुर का वध किया। तब उसके मरने के बाद उसका शंख (खोल) शेष रह गया जो श्रीकृष्ण ने अपने पास रख लिया। वही पाञ्चजन्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस बारे में विस्तृत लेख बाद में धर्मसंसार पर प्रकाशित किया जाएगा।
गंगनाभ: ये गंगापुत्र भीष्म का प्रसिद्ध शंख था जो उन्हें उनकी माता गंगा से प्राप्त हुआ था। गंगनाभ का अर्थ होता है "गंगा की ध्वनि" और जब भीष्म इस शंख को बजाते थे तब उसकी भयानक ध्वनि शत्रुओं के ह्रदय में भय उत्पन्न कर देती थी। महाभारत युद्ध का आरम्भ पांडवों की ओर से श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य और कौरवों की ओर से भीष्म ने गंगनाभ को बजा कर ही की थी।
हिरण्यगर्भ: ये सूर्यपुत्र कर्ण का शंख था। कहते हैं ये शंख उन्हें उनके पिता सूर्यदेव से प्राप्त हुआ था। हिरण्यगर्भ का अर्थ सृष्टि का आरम्भ होता है और इसका एक सन्दर्भ ज्येष्ठ के रूप में भी है। कर्ण भी कुंती के ज्येष्ठ पुत्र थे।
अनंतविजय: ये महाराज युधिष्ठिर का शंख था जिसकी ध्वनि अनंत तक जाती थी। इस शंख को साक्षी मान कर चारो पांडवों ने दिग्विजय किया और युधिष्ठिर के साम्राज्य को अनंत तक फैलाया। इस शंख को धर्मराज ने युधिष्ठिर को प्रदान किया था।
विदारक: ये महारथी दुर्योधन का भीषण शंख था। विदारक का अर्थ होता है विदीर्ण करने वाला या अत्यंत दुःख पहुँचाने वाला। ये शंख भी स्वाभाव में इसके नाम के अनुरूप ही था जिसकी ध्वनि से शत्रुओं के ह्रदय विदीर्ण हो जाते थे। इस शंख को दुर्योधन ने गांधार की सीमा से प्राप्त किया था।
पौंड्र: ये महाबली भीम का प्रसिद्ध शंख था। इसका आकर बहुत विशाल था और इसे बजाना तो दूर, भीमसेन के अतिरिक्त कोई अन्य इसे उठा भी नहीं सकता था। इसकी ध्वनि इतनी भीषण थी कि उसके कम्पन्न से मनुष्यों की तो क्या बात है, अश्व और यहाँ तक कि गजों का भी मल-मूत्र निकल जाया करता था। कहते हैं कि जब भीम इसे पूरी शक्ति से बजाते थे जो उसकी ध्वनि से शत्रुओं का आधा बल वैसे ही समाप्त हो जाया करता था। ये शंख भीम को नागलोक से प्राप्त हुआ था।
देवदत्त: ये अर्जुन का प्रसिद्ध शंख था जो पाञ्चजन्य के समान ही शक्तिशाली था। इस शंख को स्वयं वरुणदेव ने अर्जुन को वरदान स्वरुप दिया था। इस शंख को धारण करने वाला कभी भी धर्मयुद्ध में पराजित नहीं हो सकता था। जब पाञ्चजन्य और देवदत्त एक साथ बजते थे तो दुश्मन युद्धस्थल छोड़ कर पलायन करने लगते थे।
सुघोष: ये माद्रीपुत्र नकुल का शंख था। अपने नाम के स्वरुप ही ये शंख किसी भी नकारात्मक शक्ति का नाश कर देता था।
मणिपुष्पक: ये सहदेव का शंख था। मणि और मणिकों से जड़ित ये शंख अत्यंत दुर्लभ था। नकुल और सहदेव को उनके शंख अश्विनीकुमारों से प्राप्त हुए थे।
यञघोष: ये द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न का शंख था जो उसी के साथ अग्नि से उत्पन्न हुआ था और तेज में अग्नि के समान ही था। इसी शंख के उद्घोष के साथ वे पांडव सेना का सञ्चालन करते थे।
श्रीमद्भगवतगीता के पहले अध्याय के एक श्लोक में इन शंखों का वर्णन है।
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर।।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर।
नकुल सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।
अर्थात: श्रीकृष्ण भगवान ने पांचजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त और भीमसेन ने पौंड्र शंख बजाया। कुंती-पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय शंख, नकुल ने सुघोष एवं सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख का नाद किया।
इसके अगले श्लोक में अन्य योद्धाओं द्वारा शंख बजाने का वर्णन है हालाँकि उनके नाम नहीं दिए गए हैं।
काश्यश्च परमेष्वास शिखण्डी च महारथ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजिताः।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।
अर्थात: इसके अलावा काशीराज, शिखंडी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों एवं अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंखों का नाद किया।
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हिन्दू धर्म में गोमती नदी का बड़ा महत्त्व है। हमारी पांच सबसे पवित्र नदियों में से एक गोमती भी है। मान्यता है कि गोमती महर्षि वशिष्ठ की पुत्री थी जो बाद में नदी के रूप में परिणत हो गयी। इसी पवित्र नदी के अंदर एक विशेष पत्थर पाया जाता है जिसे हम गोमती चक्र के नाम से जानते हैं। ये पत्थर उतना कीमती तो नहीं होता किन्तु बहुत दुर्लभ होता है। ये कैल्शियम का पत्थर होता है जिसमे चक्र का निशान होता है जो इसके नाम का मुख्य कारण है। हिन्दू धर्म में गोमती चक्र का बड़ा महत्त्व है। विशेष रूप से ज्योतिष शास्त्र में इसे बहुत पवित्र माना जाता है। मुख्य रूप से गोमती चक्र श्रीहरि और श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है।
पुराणों में भी गोमती चक्र की उत्पत्ति की कथा दी गयी है। इसे हिन्दू धर्म में वर्णित ८४ रत्नों से एक माना गया है। ये कथा समुद्र मंथन से जुडी है। समुद्र मंथन के विषय में हम सभी जानते हैं किन्तु आम मान्यता ये है कि समुद्र मंथन से कुल १४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी किन्तु पुराणों में वर्णित है कि समुद्र मंथन से इन १४ "मुख्य" रत्नों के अतिरिक्त ७० और रत्न निकले थे। इस प्रकार उस समुद्र मंथन से कुल ८४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी किन्तु मुख्य रत्नों में केवल १४ की गिनती होती है।
गोमती चक्र भी उन्ही ८४ रथों में से एक माना जाता है। ऐसी कथा है कि जब समुद्र मंथन से १४ रत्नों की प्राप्ति हो गयी तब उसके समापन की बात उठी। किन्तु देवों और दैत्यों ने ये सोचकर कि अभी उन्हें और रत्नों की प्राप्ति होगी, समुद्र मंथन जारी रखा। किन्तु दोनों पक्ष बहुत श्रमित थे और अब मंदराचल पर्वत और वासुकि नाग को संभाल कर रखना उनके लिए अत्यंत कठिन हो गया। धरती माता भी मंदराचल के घर्षण और गर्जन से तप्त हो गयी।
तब उन्होंने एक गाय का रूप लिया और भगवान विष्णु के पास पहुंची और उन्होंने अपनी व्यथा उन्हें बताई। तब श्रीहरि ने अपने सुदर्शन चक्र को समुद्र पर चलाया जिससे एक महान चक्रवात उत्पन्न हुआ। वो चक्रवात इतना भयानक था कि उसके वेग से सम्पूर्ण मंदराचल पर्वत वासुकि नाग सहित समुद्र के ऊपर आ गया। इसके बाद उस महान आयुध सुदर्शन चक्र की शक्ति से मंदराचल स्वतः ही घूमने लगा और उसी वेग से समुद्र मंथन होने लगा।
तब उस समुद्र मंथन से समुद्र के अंदर के बहुमूल्य पत्थर, मणियां, धातु और शंख इत्यादि स्वतः समुद्र से बाहर आने लगे। अंत में घर्षण इतना तेज हो गया कि समुद्र से निकले धातु उसके ताप से पिघल गए और समुद्र के सतह पर वृताकार रूप में जम गए। उनकी संख्या इतनी अधिक हो गयी कि वो चक्रवात भी थम गया और समुद्र मंथन स्वतः ही रुक गया। चूँकि धरती माता के कारण श्रीहरि ने वो श्रम किया था, उस रत्न का नाम "गोमातृका" पड़ा। समय के साथ उस गोमातृका को गोमती चक्र के नाम से जाना जाने लगा।
एक और कथा के अनुसार गोमती चक्र श्रीकृष्ण के प्रमुख आयुधों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि गोमती चक्र को भी श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र की भांति ही धारण करते थे। उसके उपयोग का तरीका भी वही था जो सुदर्शन चक्र के उपयोग का था। हालाँकि गोमती चक्र सुदर्शन चक्र के जितना शक्तिशाली तो नहीं था किन्तु फिर भी ये श्रीकृष्ण के प्रमुख अस्त्रों में से एक माना जाता है। महाभारत में श्रीकृष्ण के द्वारा गोमती चक्र के उपयोग का वर्णन शाल्व और पौंड्रक के विरुद्ध युद्ध में किया गया है।
ज्योतिष में गोमती चक्र का बहुत महत्त्व है। इसके अतिरिक्त तांत्रिक विद्या में भी इसका बहुत प्रयोग किया जाता है किन्तु इस लेख में हम गोमती चक्र के किसी तांत्रिक प्रयोग का वर्णन नहीं करेंगे। लगभग हर प्रमुख हिन्दू त्यौहार पर गोमती चक्र का उपयोग किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि गोमती चक्र माता लक्ष्मी को रोकने के लिए उपयोग में लाया जाता है। अर्थात अगर किसी का खर्च बहुत अधिक हो अथवा ऋण में डूबा हो तो गोमती चक्र को पास में रखने का विशेष प्रावधान है। लक्ष्मी पूजा, विशेषकर दीपावली में गोमती चक्र का बड़ा महत्त्व माना जाता है। इसके अतिरिक्त भी गोमती चक्र के कई ज्योतिष उपयोग हैं। गोमती चक्र को माला अथवा अंगूठी के रूप में पहना जाता है।
इन सब के अतिरिक्त चिकत्साशास्त्र में भी गोमती चक्र का उपयोग किया जाता है। ताम्बे के बर्तन में पानी के साथ गोमती चक्र को रात भर रख कर सुबह उस पानी को पीने से कई रोगों का निदान होता है। किन्तु सदैव ये ध्यान रखें कि रुद्राक्ष की ही भांति खरीदते समय नकली गोमती चक्र से बचें। आज बाजार में मिलने वाले ९०% गोमती चक्र नकली और महंगे होते हैं। गोमती चक्र की कीमत ५००/- रूपये से कम ही होती है इसीलिए अगर इससे महंगा गोमती चक्र देखें तो सावधान हो जाएँ। इसके अतिरिक्त जब भी गोमती चक्र खरीदें, प्रामाणिक विक्रेताओं से ही खरीदें।
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🔥 “जिस सती ने त्रिदेवों को शिशु बना दिया… वही थीं अनसूया!” 😱✨
पतिव्रता की ऐसी शक्ति, जिसे देवता भी न झुका सके 🙏
भारतभूमि की पावन परंपरा में यदि सती-साध्वी नारियों का स्मरण किया जाए, तो अनसूया जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। उनका जीवन केवल एक कथा नहीं, बल्कि धर्म, तपस्या और नारी-शक्ति का दिव्य प्रकाश है।
ऋषि कुल में जन्मी अनसूया, ब्रह्मर्षि कर्दम और देवी देवहूति की पुत्री थीं, और भगवान कपिल जैसे महान अवतार की बहन। बचपन से ही उनके भीतर सत्य, शील, विनय, क्षमा और तपस्या जैसे गुण स्वाभाविक रूप से विकसित हुए थे—मानो वे स्वयं इन गुणों की मूर्ति हों।
उनका विवाह परम तपस्वी महर्षि अत्रि से हुआ। लेकिन यह केवल एक विवाह नहीं था—यह एक ऐसा दिव्य संबंध था, जहाँ सेवा ही प्रेम थी और समर्पण ही साधना। अनसूया जी ने अपने पतिव्रत और तपस्या से ऐसा तेज अर्जित किया कि स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उनकी परीक्षा लेने आए…
और तब हुआ एक अद्भुत चमत्कार—अनसूया ने अपने पतिव्रत बल से त्रिदेवों को शिशु बना लिया और उन्हें अपनी गोद में खेलाया! 😲✨
यह घटना केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि एक सच्ची नारी का संकल्प और चरित्र कितना महान हो सकता है।
समय बीता… जब भगवान श्रीराम वनवास में सीता और लक्ष्मण के साथ वन में विचरण कर रहे थे, तब वे महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे। वहाँ अनसूया जी ने सीता का अत्यंत स्नेह और सम्मान के साथ स्वागत किया—जैसे एक माँ अपनी पुत्री का करती है।
फिर उन्होंने सीता को सती धर्म का ऐसा गूढ़ ज्ञान दिया, जो आज भी हर नारी के लिए मार्गदर्शक है।
उन्होंने कहा—
"पति चाहे जैसे भी हों—धनी या निर्धन, सरल या कठिन स्वभाव वाले—एक सच्ची नारी के लिए वह देवता के समान हैं।"
उनके शब्दों में केवल उपदेश नहीं था, बल्कि अनुभव की तपिश और सत्य की चमक थी। उन्होंने समझाया कि नारी का सच्चा आभूषण उसका पतिव्रत, उसका धैर्य और उसका धर्म है।
सीता जी ने भी अपने विचारों से सती धर्म की महिमा प्रकट की, जिसे सुनकर अनसूया अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने सीता को दिव्य वस्त्र, आभूषण और अंगराग भेंट किए—जो केवल बाहरी सौंदर्य ही नहीं, बल्कि आंतरिक तेज का प्रतीक थे।
यह पूरा प्रसंग हमें यह सिखाता है कि नारी की शक्ति उसके रूप में नहीं, बल्कि उसके चरित्र, त्याग और निष्ठा में होती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस दिव्य प्रसंग को रामचरितमानस में अत्यंत मार्मिक शब्दों में वर्णित किया है—जहाँ नारी के धर्म, धैर्य और प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाया गया है।
🌺 अनसूया केवल एक नाम नहीं… एक आदर्श हैं।
एक प्रेरणा हैं, जो सिखाती है कि सच्ची नारी वही है, जो अपने धर्म और प्रेम में अडिग रहे।
🙏 जय श्री राधे कृष्णा ❤️
🙏 अगर आप भी सती अनसूया की दिव्य शक्ति और आदर्शों से प्रेरित हैं, तो इस पोस्ट को Like ❤️, Share 🔄 और Follow जरूर करें।
💬 कमेंट में लिखें — “जय सती अनसूया माता 🙏” और अपने जीवन में धर्म, भक्ति और नारी शक्ति का संकल्प लें।
#सतीअनसूया #AnasuyaMata #SanatanDharma #BhaktiShakti #NariShakti #HinduCulture
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जिस घर में कुलदेवी और कुलदेवता की कृपा प्रवेश कर जाए… वहाँ गरीबी ज्यादा दिन टिक नहीं पाती।
कभी-कभी इंसान मेहनत तो बहुत करता है, लेकिन फिर भी घर में बरकत नहीं आती। पुराने ऋषि कहते थे कि जब कुल की दिव्य शक्तियाँ प्रसन्न होती हैं, तब बंद किस्मत के द्वार भी खुलने लगते हैं। अचानक रुका हुआ धन आने लगता है, घर में शांति बढ़ती है और हर काम में शुभ संकेत मिलने लगते हैं।
कुलदेवी केवल धन ही नहीं देतीं, बल्कि पूरे परिवार की रक्षा करती हैं। कुलदेवता साहस, सम्मान और सफलता का आशीर्वाद देते हैं। जिस घर में रोज श्रद्धा से दीपक जलता है और अपने कुल का स्मरण होता है, वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं।
अगर आप भी अपने कुलदेवी-कुलदेवता का नाम श्रद्धा से लेते हैं, तो आज कमेंट में उनका नाम जरूर लिखें। माना जाता है कि सच्चे भाव से लिया गया नाम भी कृपा को आकर्षित करता है।
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"पेड़ों में आध्यात्मिक संसार - जड़ों में देवता, पत्तों में वेद"*
सनातन धर्म में वृक्ष सिर्फ लकड़ी नहीं, जीवित देवालय हैं*
*1. भूमिका: वृक्ष - सनातन का पहला मंदिर , मंदिर बनने से पहले, मूर्ति गढ़ने से पहले, ऋषियों ने किसकी पूजा की? वृक्ष की।
*ऋग्वेद*कहता है: वृक्षे वृक्षे वसति देवा: - हर वृक्ष में देवता बसते हैं। पेड़ ऑक्सीजन ही नहीं देते, प्राण देते हैं, ज्ञान देते हैं, मोक्षका रास्ता दिखाते हैं।
बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला, कृष्ण ने कदंब के नीचे रास रचाया, शिव वटवृक्ष के नीचे दक्षिणामूर्ति बनकर बैठे। ये संयोग नहीं, विज्ञान है। पेड़ और मनुष्य का रिश्ता जड़ से जुड़ा है - हम दोनों ही पृथ्वी से जन्मे, आकाश की ओर बढ़ते हैं।
*2. वेदों में 5 दिव्य वृक्ष - पंचवटी का रहस्य....
*अथर्ववेद में 5 वृक्षों को 'पंच देव वृक्ष' कहा गया।
वृक्ष देवता,आध्यात्मिक शक्ति, वैज्ञानिक लाभ ....
1. पीपल
विष्णु + ब्रह्मा + शिव | पितृ मोक्ष, कुंडलिनी जागरण | 24 घंटे ऑक्सीजन, दमा-हृदय रोग नाश ।
2. बरगद/वट
शिव + यम अकाल मृत्यु टालना, दीर्घायु, सबसे ज्यादा ऑक्सीजन, मिट्टी बाँधता है ।
3. बेल*
शिव त्रिदोष नाश, शिव कृपा पेट-शुगर रोग नाश, शिवलिंग पर प्रिय
4. आँवला*
लक्ष्मी + कार्तिकेय
धन-स्वास्थ्य, ब्रह्मचर्य रक्षा विटामिन C, कायाकल्प
5. अशोक*
कामदेव + इंद्र | शोक नाश, स्त्री रक्षा, स्त्री रोग, मानसिक तनाव दूर
रामायण में पंचवटी
राम ने पंचवटी में 5 वृक्ष लगाए थे - पीपल, बरगद, बेल, आँवला, अश्वत्थ। कहते हैं जहाँ पंचवटी हो, वहाँ ऋण, रोग, शोक नहीं आते।
3. वृक्षों के भीतर का देव लोक - क्या होता है छाल के नीचे?
पद्म पुराण की कथा
एक बार नारद जी ने देखा कि वृक्ष काटने पर खून निकलता है। पूछा "नारायण, वृक्ष में जीव कैसे?"
विष्णु बोले, "नारद, हर वृक्ष एक ऋषि का शरीर है। सतयुग में जो ऋषि तप में लीन हो गए, कलियुग में जीवों की सेवा के लिए वृक्ष बन गए।"
वृक्ष के 3 सूक्ष्म लोक.....
1. जड़ लोक -नागलोक,
जड़ों में नाग देवता रहते हैं। इसलिए पीपल की जड़ में दूध चढ़ाते हैं। बरगद की जड़ में अक्षय वट है - प्रयाग में जहाँ मार्कंडेय ऋषि प्रलय में भी जीवित रहे।
2. तना लोक - यक्ष-गंधर्व लोक तने में *वृक्ष देवता*रहते हैं। स्कंद पुराण कहता है बिना प्रार्थना वृक्ष न काटो। काटने से पहले क्षमा माँगो 'हे वृक्ष देव, मेरा अपराध क्षमा करो, दूसरे स्थान पर निवास करो।'
3. पत्ता-शाखा लोक - देव लोक पत्तों पर देवता विहार करते हैं। पीपल में ब्रह्मा दिन में,
विष्णु शाम को,
शिव* रात में
इसलिए पीपल को रात में नहीं छूते - शिव समाधि में होते हैं।
4. 7 पवित्र वृक्ष और उनकी गुप्त शक्तियाँ**
*1. पीपल . 'अश्वत्थ' यानी कल भी रहेगा।
**गीता 10.26*अश्वत्थःसर्ववृक्षाणां* - वृक्षों में मैं पीपल हूँ।
*रहस्य* पीपल ही एकमात्र वृक्ष जो CO2 दिन-रात खींचकर O2 देता है। शनि, पितृ दोष, कालसर्प दोष की एकमात्र काट। शनिवार सुबह जल चढ़ाने से 100 साल के पाप कटते हैं।
2. वटवृक्ष-अक्षय जीवन काप्रतीक
सावित्री ने सत्यवान को यमराज से वट के नीचे ही वापस लिया। वट सावित्री व्रत में महिलाएँ 108 परिक्रमा करती हैं।
रहस्य ...वट की लटकती जड़ें 'संजीवनी' हैं। ये पृथ्वी पर सबसे लंबा जीने वाला वृक्ष - 3000 साल तक। प्रयाग का अक्षयवट प्रलय में भी नहीं डूबता।
*3. तुलसी - वृंदा का अवतार
तुलसी पौधा नहीं, वृंदा देवी हैं - विष्णु प्रिया। इनके बिना शालिग्राम भोग स्वीकार नहीं करते।
रहस्य ..तुलसी में पारा होता है - बिजली गिरने से बचाती है। 4 तुलसी पत्र रोज = कैंसर रोधी। तुलसी विवाह = कन्या दान फल।
4. नीम - शीतला माता का रूप
नीम को 'ग्राम देवता'कहते हैं। चेचक, मलेरिया, वायरस की दुश्मन।
रहस्य* नीम में कड़वाहट* यमराज को दूर रखती है। घर के बाहर नीम = नेगेटिविटी अंदर नहीं आती। नीम की दातून = 70 रोग दूर करता है।
5. कदंब - कृष्ण का प्रेम वृक्ष
वृंदावन में कृष्ण कदंब पर चढ़कर बाँसुरी बजाते। गोपियाँ कहतीं - कदंब फूल की खुशबू में कृष्ण बसते हैं।
*रहस्य .. कदंब का फूल बारिश से पहले खिलता है - मौसम वैज्ञानिक है। प्रेम, आकर्षण बढ़ाता है।
*6. शमी - अग्नि देव का वास
महाभारत में पांडवों ने अस्त्र शमी वृक्ष में छुपाए। दशहरे को शमी पूजा = विजय।
**रहस्य* शमी में अग्नि तत्व छुपा है। पुराने समय में शमी की लकड़ी रगड़कर आग जलाते। शनि देव शमी के नीचे शांत होते हैं।
*7. केले का पेड़ - बृहस्पति + कदली देवी ।
सत्यनारायण कथा बिना केले के अधूरी। केला *बृहस्पति* का वृक्ष।
रहस्य* केले में एक ही बार फल - सिखाता है 'जीवन में मौका एक बार'। गुरुवार को केला पूजने से विवाह, ज्ञान, संतान दोष कटता है।
वृक्ष क्यों पूजें?
4 कारण....
1. प्राण दाता 1 पीपल = 5 AC के बराबर ऑक्सीजन। वृक्ष काटना = अपने फेफड़े काटना।
2. *कर्म साक्षी* पेड़ बोलते नहीं पर देखते सब हैं। पीपल के नीचे झूठ नहीं बोलते - पितृ सुन लेते हैं।
3. *ऊर्जा ग्रिड*वृक्ष कॉस्मिक एनर्जी के टावर हैं। पीपल 24 घंटे, तुलसी सुबह, बेल शाम को सबसे ज्यादा ऊर्जा देते।
4. पितृ लोक का द्वार*पितृ पेड़ों में विश्राम करते हैं। गया श्राद्ध में पीपल पर पिंडदान = सीधा पितरों तक।
वृक्ष पूजा विधि...
1. सोमवार बेल पर जल + दूध = शिव कृपा, रोग नाश होता है।
2. मंगलवार नीम पर सिंदूर = मंगल दोष, शत्रु नाश
3. बुधवार केले पर चने दाल = बुद्धि, व्यापार
4. गुरुवार पीपल पर हल्दी जल = गुरु बल, विवाह
5. शुक्रवार तुलसी पर घी दीपक = लक्ष्मी, सुहाग
6. शनिवार शमी + पीपल पर तेल दीपक = शनि शांत, साढ़ेसाती कम
7. रविवार आँकड़े/अर्क पर जल = सूर्य दोष, सरकारी काम
मंत्र.....मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे। अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥
"जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु, ऊपर शिव - हे वृक्षराज, प्रणाम।"
6. कलियुग में वृक्ष काटने का श्राप
भविष्य पुराण की चेतावनी:
एक वृक्ष समारोप्य दशकूप समा धरा।*
1 पेड़ लगाना = 10 कुएँ बनवाने के बराबर।
*एक वृक्षं तु यो हन्ति ब्रह्महत्या समं लभेत्।*
1 हरा पेड़ काटना = ब्रह्म हत्या का पाप।
आज AC, प्यूरीफायर लगाते हैं, पर पेड़ काट देते हैं। फिर पूछते हैं - बीमारी, डिप्रेशन, गर्मी क्यों? क्योंकि *प्रकृति का वेंटिलेटर* बंद कर दिया।
7. निष्कर्ष: पेड़ लगाओ, पुण्य कमाओ*
*स्कंद पुराण* कहता है:
*अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश चिञ्चिणीकम्।*
*कपित्थ बिल्वामलकत्रयं च पञ्चाम्रवापी नरकं न पश्येत्॥*
1 पीपल, 1 नीम, 1 बरगद, 10 इमली, 3 कैथ, 3 बेल, 3 आँवला, 5 आम लगाने वाला नरक नहीं देखता।
*कलियुग का सबसे बड़ा दान* वृक्षारोपण। पैसा नहीं है तो भी चलेगा। पीपल का बीज कहीं गमले में डाल दो, तुलसी बाँट दो।
जब अंतिम समय आएगा, यमराज लेखा पूछेंगे - "धन कितना कमाया?" नहीं पूछेंगे। पूछेंगे - "पेड़ कितने लगाए? कितने जीवों को छाया दी?"
क्योंकि वृक्ष ही सच्चे संत हैं - बिना बोले देते हैं, काटने पर भी छाया देते हैं, मरकर भी लकड़ी बनकर जलाते हैं।
वृक्ष देवो भव। वृक्ष ही गुरु है।
अश्वत्थ हर, वट हर, तुलसी हर, नीम हर।
अगली बार पीपल के पास से गुजरें तो रुककर कान लगाना। हो सकता है जड़ों में ऋषि मंत्र जप रहे हों, पत्तों में वेद गूँज रहे हों।
ॐ हरि
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🕉🔱 भगवान शिव के प्रमुख गण 🔱🕉
उनके परम भक्त, रक्षक और आज्ञाकारी सेवक हैं, जो कैलाश की रक्षा करते हैं और सृष्टि में संतुलन बनाए रखते हैं। भैरव और नंदी के नेतृत्व में, वीरभद्र, भृंगी, मणिभद्र और कीर्तिमुख जैसे गण शिव की शक्ति और भक्ति का प्रतीक हैं, जो नकारात्मकता को नष्ट करते हैं।
शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के कुछ प्रमुख गण:
1⃣भैरव (काल भैरव): शिव के सबसे प्रमुख गण और रक्षक, जो भय और नकारात्मकता का नाश करते हैं।
2⃣वीरभद्र: शिव के अत्यंत उग्र और बहादुर गण, जो धर्म की रक्षा और अन्याय के विनाश के लिए प्रकट हुए।
3⃣नंदी: भगवान शिव के परम भक्त और वाहन, जो निष्ठा और समर्पण के प्रतीक हैं।
4⃣भृंगी (भृगिरिटी): शिवभक्ति में पूरी तरह समर्पित ऋषि, जो केवल शिव की परिक्रमा करते हैं।
5⃣मणिभद्र: शिव के गणों में प्रमुख, जो भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
6⃣कीर्तिमुख: शिव के प्रमुख पार्षद, जो उनके तेज का प्रतीक हैं।
7⃣चंदिस: शिव के गण, जो शांत और कल्याणकारी माने जाते हैं।
8⃣शैल: शिव के गणों में प्रमुख, जो स्थिरता और धैर्य के प्रतीक हैं।
9⃣गोकर्ण: शिव कथा के प्रेमी, जो ज्ञान के प्रतीक हैं।
🔟घंटाकर्ण: सदैव जाग्रत रहने वाले और भक्तों की पुकार सुनने वाले गण।
1⃣1⃣ जय : विजय और सफलता प्रदान करने वाले, धर्म मार्ग के रक्षक।
1⃣1⃣ विजय : सर्व प्रकार की बाधाओं पर विजय दिलाने
ये बारह प्रमुख माण भगवान शिव के दिव्य गण हैं, जो भक्तों की रक्षा करते हैं और सभी कष्टों का नाश करते हैं।
इनके अलावा, पिशाच, दैत्य, और नाग-नागिन भी शिव के गण माने जाते हैं।
▶️🙏🏻🆑🙏🏻 ॐ नमः शिवाय 🙏🏻🆑🙏🏻◀️
🔱 ॐ नम: पार्वती पतये, हर हर महादेव 🔱
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**🔥 बप्पा रावल - अरबों का बाप, मेवाड़ी शेर 🔥**
**कहानी:**
आठवीं शताब्दी का भारत। सिंध पर अरब आक्रमणकारी विजय प्राप्त कर चुके थे और अब राजस्थान की ओर बढ़ रहे थे। उनका मंसूबा था — हिंदुस्तान को तलवार के जोर पर इस्लाम में बदलना।
लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि **मेवाड़ की पहाड़ियों** में एक शेर जाग चुका है — **महाराणा बप्पा रावल**।
बप्पा रावल ने जब सुना कि अरब सेना लूटपाट और मंदिरों को तोड़ते हुए आगे बढ़ रही है, तो उनका खून खौल उठा। उन्होंने कहा:
> “ये विदेशी लुटेरे हमारे घर में घुसकर हमारी माँ-बहनों की इज्जत पर हाथ डालना चाहते हैं? तो हम उनके घर में घुसकर उनके सर काटेंगे!”
बप्पा रावल ने अपनी वीर सेना के साथ रणनीति बनाई। रात के अंधेरे में, पहाड़ी रास्तों से चुपके से वे अरब छावनी के पास पहुँचे। अरब सिपाही सो रहे थे, नशे में धुत थे और अपने विजय का जश्न मना रहे थे।
**तब बप्पा रावल गरजे** — “**जय एकलिंगजी!**”
उनके योद्धाओं ने तलवारें निकालीं। बप्पा स्वयं सबसे आगे थे। उन्होंने अरब सेना के शिविर में घुसकर एक-एक करके दुश्मनों को मारना शुरू किया। जो भी उनके सामने आया, उसका सिर धड़ से अलग हो गया। खून की नदियाँ बहने लगीं। अरब सेना के कमांडर हैबिब बिन मुहम्मद को बप्पा रावल ने खुद तलवार से चुनौती दी और एक भयंकर द्वंद्व युद्ध में उसे मार गिराया।
अरब सेना में आतंक फैल गया। जो बच गए, वे चीखते हुए भागे — “ये कोई इंसान नहीं, **शैतान** है! **मेवाड़ी शेर** है!”
बप्पा रावल ने न सिर्फ अरबों को हराया, बल्कि उन्हें इतना भयभीत कर दिया कि सदियों तक वे मेवाड़ की तरफ आने की हिम्मत नहीं कर सके।
**बप्पा रावल** को इतिहास में “**अरबों का बाप**” कहा गया, क्योंकि उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों को उनके ही खेल में मात दी — घर में घुसकर मारने का सबक सिखाया।
**वे सच्चे मेवाड़ी शेर थे** 🦁
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**#VeerBappaRawal**
**#SanatanHistory**
🦁🔥🗡️🏹🛡️🇮🇳
जय एकलिंगजी! जय मेवाड़! जय भवानी! 🙏
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एक बार माता पार्वती ने महादेव से कहा कि आप सारा समय कैलाश पर्वत पर बैठे रहते हैं, आपको अपनी छवि सुधारने के लिए संसार के अन्य पतियों की तरह कुछ काम करना चाहिए। पार्वती जी के सुझाव पर भोलेनाथ खेती करने के लिए तैयार हो गए। खेती के लिए दो बैलों की आवश्यकता थी, इसलिए पार्वती जी ने सलाह दी कि एक बैल (नंदी) तो उनके पास है ही, दूसरा वे अपने मित्र श्री कृष्ण से मांग लें और उन्हीं के खेत में खेती करें।
माता पार्वती ने महादेव को सावधान किया कि श्री कृष्ण बहुत चतुर हैं, इसलिए वे पहले ही शर्त रख लें कि फसल का ऊपर का हिस्सा उनका होगा और नीचे का हिस्सा कृष्ण का।
पहली फसल: आलू
जब महादेव श्री कृष्ण के पास पहुंचे, तो कृष्ण ने सहर्ष उन्हें बैल और खेत दे दिए। महादेव ने शर्त रखी कि "ऊपर की फसल हमारी और नीचे की तुम्हारी।" कृष्ण मान गए और उन्होंने महादेव को आलू बोने की सलाह दी। जब फसल तैयार हुई, तो महादेव ऊपर की हरी पत्तियां और घास बटोर कर घर ले आए, जबकि जमीन के नीचे के असली आलू श्री कृष्ण के पास रह गए। घर पहुंचकर जब पार्वती जी ने देखा कि महादेव केवल घास लाए हैं, तो उन्होंने महादेव को फिर से समझाया।
दूसरी फसल: बाजरा
पार्वती जी ने महादेव को दोबारा भेजा और इस बार शर्त बदलने को कहा। महादेव ने कृष्ण से कहा, "अबकी बार नीचे की फसल हमारी और ऊपर की तुम्हारी।" कृष्ण ने मुस्कुराकर सहमति दी और बाजरा बोने का सुझाव दिया। जब फसल कटी, तो ऊपर के अनाज वाले हिस्से (बालियां) श्री कृष्ण के पास रहे और महादेव नीचे के डंठल (सरकंडे) लेकर घर पहुंचे। पार्वती जी फिर से दुखी हुईं और उन्होंने एक अंतिम प्रयास के लिए महादेव को भेजा।
तीसरी फसल: मक्का
इस बार पार्वती जी ने महादेव को सिखाया कि वे कहें, "ऊपर की फसल भी हमारी और नीचे की भी हमारी, बीच की तुम्हारी।" कृष्ण ने इस शर्त को भी स्वीकार किया और मक्का बोने को कहा। फसल पकने पर ऊपर के फूल और नीचे की जड़ें महादेव के हिस्से आईं, जबकि बीच के मोटे और दानेदार भुट्टे श्री कृष्ण के पास रह गए।
अंत में जब माता पार्वती ने अपनी हार मान ली, तब श्री कृष्ण स्वयं आलू, बाजरा और मक्का लेकर वहां पहुंचे। उन्होंने माता पार्वती को समझाया कि यह महादेव का ही स्वभाव है—वे स्वयं मेहनत करते हैं, लेकिन उसका फल पूरे संसार में बांट देते हैं। वे परम दयालु हैं और अपने लिए कुछ नहीं रखते।
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भगवान शिव और माता पार्वती की संतान "गर्भ से" न होने के पीछे पुराणों में एक नहीं, तीन जुड़ी हुई कथाएँ मिलती हैं — और तीनों का संबंध श्राप और देवताओं के भय से है।
1. सबसे पहला कारण: रति का श्राप .....
सती के बाद शिव गहरी तपस्या में चले गए। सृष्टि रुकने लगी तो देवताओं ने कामदेव को भेजा कि शिव का ध्यान तोड़ें। शिव ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए।
कामदेव की पत्नी रति का हृदय टूट गया। दुःख में उसने श्राप दिया
"जिस देवी को शिव की अर्धांगिनी बनना है, वह भी मेरी तरह संतान- सुख से वंचित रहेगी, वह कभी गर्भ धारण नहीं कर पाएगी।"
इसी कारण कहा जाता है कि पार्वती, जो स्वयं शक्ति और उर्वरता की देवी हैं, फिर भी लंबे समय तक स्वाभाविक रूप से माँ नहीं बन पाईं "शक्ति का स्रोत होते हुए भी वह प्राकृतिक रूप से जन्म नहीं दे सकीं।"
2. दूसरा कारण: देवताओं का डर और उनकी प्रार्थना...
शिव-शक्ति का मिलन सामान्य नहीं था। शिव पुराण कहता है, देवताओं को डर था कि यदि शिव और पार्वती का तेज एक साथ गर्भ में आए तो उससे जन्मा बालक इतना शक्तिशाली होगा कि इंद्र का सिंहासन भी हिल जाएगा।
इसलिए उन्होंने शिव से प्रार्थना की —
"आप पार्वती को कभी गर्भवती न करें।"शिव ने यह बात मान ली। जब तारकासुर वध के लिए पुत्र चाहिए था, तब शिव का वीर्य पार्वती के गर्भ में नहीं, बल्कि अग्नि में गया, अग्नि ने उसे गंगा को दिया, और गंगा से कार्तिकेय का जन्म हुआ। इसलिए कार्तिकेय को "अयोनिज" कहा जाता है।
3. तीसरा कारण: पार्वती का पलट-श्राप .....
जब पार्वती ने देखा कि उनका पुत्र उनके बिना ही जन्म ले रहा है, और देवताओं के कारण उनका मिलन बार-बार बाधित हो रहा है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुईं।
कथा कहती है पार्वती ने देवताओं को श्राप दिया कि —
"तुमने मेरे रज को व्यर्थ किया, इसलिए तुम्हारी पत्नियाँ भी संतानहीन रहेंगी।"
और — "पार्वती ने स्वर्गवासियों को श्राप दिया कि उनकी पत्नियाँ बाँझ रहेंगी।"
यही कारण है कि पुराणों में अधिकांश देवताओं की अपनी जैविक संतानें नहीं दिखतीं।
तो फिर गणेश, कार्तिकेय, अशोकसुंदरी कैसे हुए?
कार्तिकेय: शिव के तेज से, अग्नि और गंगा के माध्यम से, कृत्तिकाओं द्वारा पाले गए — पार्वती के गर्भ से नहीं।
गणेश: रति के श्राप को तोड़ने के लिए पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से बालक बनाया और उसमें प्राण फूँके — "माँ बनने के लिए गर्भ की नहीं, प्रेम की ज़रूरत होती है।"
अशोकसुंदरी: पद्म पुराण के अनुसार कल्पवृक्ष की इच्छा से उत्पन्न।
इसलिए शास्त्र कहते हैं — शिव-पार्वती की संतानें "जैविक" नहीं, "संकल्पज" हैं। यह श्राप नहीं, लीला थी, ताकि दुनिया समझे कि ईश्वर का परिवार रक्त से नहीं, भक्ति और इच्छा शक्ति से बनता है
हर हर महादेव 🙏
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भगवान श्री राम ने सीता जी के स्वयंवर में गुरु विश्वामित्र जी की आज्ञा से शिवजी का कठोर धनुष तोड़ कर सीता जी से विवाह किया था। लेकिन शिवजी का वह धनुष किसने और किससे बनाया था तथा वह शिव धनुष महाराज जनक जी केपास कैसे पहुंचा, इस रहस्य को बहुत कम लोग जानते हैं।
पिनाक धनुष की बड़ी विचित्र कथा है। कहते हैं एक बार घोर कानन के अंदर कण्व मुनि बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। तपस्या करते करते समाधिस्थ होने के कारण उन्हें भान ही नहीं रहा कि उनका शरीर दीमक के द्वारा बाँबी बना दिया गया। उस मिट्टी के ढ़ेर पर ही एक सुंदर बाँस उग आया। कण्व जी की तपस्या जब पूर्ण हुई, तब ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने अपने अमोघ जल के द्वारा कण्व जी की काया को सुंदर बना दिया।
ब्रह्मा जी ने उन्हें अनेक वरदान प्रदान किए और जब ब्रह्मा जी जाने लगे, तब उन्हें ध्यान आया कि कण्व की मूर्धा पर उगी हुई बाँस कोई साधारण नहीं हो सकती। इसलिए इसका सद्उपयोग किया जाना चाहिए। यह विचारकर ब्रह्मा जी ने वह बाँस काटकर विश्वकर्मा जी को दे दिया। विश्वकर्मा जी ने उससे दो दिव्य धनुष बनाये, जिनमें एक जिसका नाम सारंग था, उन्होंने भगवान विष्णुजी को और एक जिसका नाम पिनाक था,शिव जी को समर्पित कर दिया।
पिनाक धनुष धारण करने के कारण ही शिवजी को पिनाकी कहा जाता है। शिवजी ने जिस पिनाक धनुष को धारण किया था, उसकी एक टंकार से बादल फट जाते थे और पृथ्वी डगमगा जाती थी। ऐसा लगता था मानों कोई भयंकर भूकंप आ गया हो। यह असाधारण धनुष अत्यंत ही शक्तिशाली था। इसी के मात्र एक ही तीर से भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद यह धनुष देवताओं को सौंप दिया। देवताओं ने इस धनुष को महाराजा जनक जी के पूर्वज देवरात को दे दिया।
महाराजा जनक जी के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। शिवजी का वह धनुष उन्हीं की धरोहर स्वरूप जनक जी के पास सुरक्षित था। इस शिव-धनुष को उठाने की क्षमता कोई नहीं रखता था। एक बार देवी सीता जी ने इस धनुष को उठा दिया था, जिससे प्रभावित हो कर जनक जी ने सोचा कि यह कोई साधारण कन्या नहीं है। अत: जो भी इससे विवाह करेगा, वह भी साधारण पुरुष नहीं होना चाहिए। इसी लिए ही जनक जी ने सीता जी के स्वयंवर का आयोजन किया था और यह शर्त रखी थी कि जो कोई भी इस शिव-धनुष को उठाकर, तोड़ेंगा, सीता जी उसी से विवाह करेंगीं । उस सभा में भगवान श्री राम ने शिव-धनुष तोड़ कर सीता जी से विवाह किया था। जब शिवजी का वह कठोर धनुष टूटा तो उसकी ध्वनि सुनकर परशुराम जी इसलिए क्रोधित होकर जनक जी की सभा में आए थे क्योंकि भगवान शंकर, परशुराम जी के आराध्य देव हैं।
जय पिनाक धनुष धारी शिव शंकर भोलेनाथ
हर हर महादेव 🙏
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