#🙏🏻🌸आध्यात्मिक बाते😇 #💐भक्ति भावना दर्शन💐 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 एक वेश्या ने एक साधु को देखा और वह तृप्ति से भर गई और उसने उसे प्रसन्न करने के लिए अपना प्रस्ताव उसके सामने रखा।
साधु ने बस इतना कहा, "जिस दिन मुझे लगेगा कि तुम्हें मेरी जरूरत है, मैं आऊंगा
वेश्या ने सोचा, "उसे अभी जरूरत नहीं है।"
35 साल के बाद, वह बूढ़ी हो गई और गाँव के लोगों ने उसे गाँव से निकाल दिया।
सर्द रात थी, ठंड से कांप रही थी, प्यासी थी। उसकी सेवा करने वाला कोई नहीं था। उसने पानी मांगा।
अचानक कोई पानी से भरे गिलास के साथ दिखाई दिया।
वह हैरान रह गई और रोने लगी। वही साधु थे।
उसने गिलास लिया, पिया और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अपना चेहरा घुमा लिया।
भिक्षु ने उसके आँसू पोंछे और कहा, मैंने तुमसे कहा था कि जिस दिन तुम्हें मेरी जरूरत होगी मैं #🙏🏻सीता राम
#💐भक्ति भावना दर्शन💐 #🙏राम राम जी जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में फंस गया तो वह रथ से उतरकर उसे ठीक करने लगा। वह उस समय बिना हथियार के थे... भगवान कृष्ण ने तुरंत अर्जुन को बाण से कर्ण को मारने का आदेश दिया।
अर्जुन ने भगवान के आदेश को मान कर कर्ण को निशाना बनाया और एक के बाद एक बाण चलाए। जो कर्ण को बुरी तरह चुभता हुआ निकल गया और कर्ण जमीन पर गिर पड़े।
कर्ण, जो अपनी मृत्यु से पहले जमीन पर गिर गया था, उसने भगवान कृष्ण से पूछा, "क्या यह तुम हो, भगवान? क्या आप दयालु हैं? क्या यह आपका न्यायसंगत निर्णय है! एक बिना हथियार के व्यक्ति को मारने का आदेश?
सच्चिदानंदमय भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उत्तर दिया, "अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु भी चक्रव्यूह में निहत्था हो गया था, जब उन सभी ने मिलकर उसे बेरहमी से मार डाला था, आप भी उसमें थे। तब कर्ण तुम्हारा ज्ञान कहाँ था? यह कर्मों का प्रतिफल है. यह मेरा न्याय है।"
सोच समझकर काम करें। अगर आज आप किसी को चोट पहुँचाते हैं, उनका तिरस्कार करते हैं, किसी की कमजोरी का फायदा उठाते हैं। भविष्य में वही कर्म आपकी प्रतीक्षा कर रहा होगा और शायद वह स्वयं आपको प्रतिफल देगा।
#🙏 जय हनुमान #💐भक्ति भावना दर्शन💐 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🙏राम राम जी *श्री हनुमान जी और बाली युद्ध की कथा*
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कथा का आरंभ तब का है ,,
जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा।
सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस (वरदान द्वारा प्राप्त) पुत्र हैं। और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है।
बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था
उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया
जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी, रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा।
अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई, अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था। हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो
है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो
जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे।
इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे।
बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर, हे ब्रम्ह अंश, हे राजकुमार बाली, (तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो, हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो, फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो, अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो, इससे तुम्हे क्या मिलेगा, तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी।
इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर और राम नाम का जाप कर इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे।
इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम की और जिस राम की तू बात कर रहा है वो है कौन और केवल तू ही जानता है राम के बारे में मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है।
हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है उनकी महिमा अपरंपार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए।
बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे।
हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा।
बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा।
हनुमान जी ने बाली की बात मान ली बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा।
अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए।
हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा।
ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो और युद्ध के लिए न जाओ।
हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता
और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है
जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा अन्यथा सारे विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है।
तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें।
हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था।
हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,,
बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा। ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा।
उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे, उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लग उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा बाली को कुछ समझ नही आ रहा था।
तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ,
बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया।
सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ मुझे कुछ समझ नही आया।
ब्रम्हा जी बोले- पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तुममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा।
बाली- मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है। ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता। पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा।
ब्रम्हा जो बोले- हे बाली मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,, पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके।
सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे
ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती।
ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था मुझे क्षमा करें।
और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और आगे चलकर अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया
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#🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #😇शनिवार भक्ति स्पेशल🌟 #🙏राम राम जी #💐भक्ति भावना दर्शन💐 #🙏🏻सीता राम चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर। तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के राजापुर गांव में सन् 1554 की श्रावण मास की अमावस्या के सातवें दिन हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी था। कहा जाता है कि तुलसीदास का जन्म बारह महीने गर्भ में रहने के बाद हुआ था जिसकी वजह से वह काफी हृष्ट पुष्ट थे।
तुलसीदास ने जब पहला शब्द बोला वह राम था। इसलिए उनका घर का नाम ही रामबोला पड़ गया था। माँ तो जन्म देने के बाद दूसरे ही दिन चल बसीं, पिता ने किसी और अनिष्ट से बचने के लिये बालक को चुनियाँ नाम की एक दासी को सौंप दिया और स्वयं विरक्त हो गए। जब रामबोला साढे पाँच वर्ष का हुआ तो चुनियाँ भी नहीं रही। वह गली-गली भटकता हुआ अनाथों की तरह जीवन जीने को विवश हो गया।
बचपन में इतनी परेशानियां और मुश्किलें झेलने के बाद भी तुलसीदास ने कभी भगवान का दामन नहीं छोडा और उनकी भक्ति में हमेशा लीन रहे। उसी समय रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी ने रामबोला के नाम से बहुचर्चित इस बालक को ढूंढ निकाला और विधिवत उसका नाम तुलसीराम रख उन्हें शिक्षा दी।
21 वर्ष की आयु में तुलसीदास का विवाह यमुना के पार स्थित एक गांव की अति सुन्दरी भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली से कर दी गई। एक रात अंधेरे में वह अपनी पत्नी के घर उससे मिलने तो पहुंच गए पर उसने लोक-लज्जा के भय से जब उन्हें चुपचाप वापस जाने को कहा तो वे उससे उसी समय घर चलने का आग्रह करने लगे। जिसे देख रत्नावली ने एक दोहा कहा, जो इस प्रकार है...
अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति !
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ?
अर्थात जितना प्रेम मेरे इस हाड-मांस के बने शरीर से कर रहे हो, उतना स्नेह यदि प्रभु राम से करते, तो तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती।
यह सुनते ही तुलसीदास की चेतना जागी और उसी समय से वह प्रभु राम की वंदना में जुट गए। इसके बाद तुलसीराम को तुलसीदास के नाम से पुकारा जाने लगा।
कुछ समय बाद वो काशी चले गये और वहाँ की जनता को राम-कथा सुनाने लगे। कथा के दौरान उन्हें एक दिन मनुष्य के वेष में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान जी का पता बतलाया. हनुमान जी से मिलकर तुलसीदास ने उनसे श्रीरघुनाथजी का दर्शन कराने की प्रार्थना की. हनुमानजी ने कहा- “तुम्हें चित्रकूट में रघुनाथजी के दर्शन होंगें.” इस पर तुलसीदास जी चित्रकूट की ओर चल पड़े।
चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने रामघाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले ही थे कि मार्ग में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए. उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परन्तु उन्हें पहचान न सके। तभी हनुमान्जी ने आकर उन्हें सारा भेद बताया तो वे पश्चाताप करने लगे।
संवत् 1607 की मौनी अमावस्या को बुद्धवार के दिन उनके सामने भगवान श्रीराम पुनः प्रकट हुए। उन्होंने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा-”बाबा! हमें चन्दन चाहिये क्या आप हमें चन्दन दे सकते हैं?” हनुमान जी ने सोचा,कहीं वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा...
चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर.
तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
तुलसीदास श्रीराम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गए। अन्ततोगत्वा भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गये।
सन् 1628 में वह हनुमान जी की आज्ञा लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास जी प्रयाग से पुन: वापस काशी आ गये और वहाँ के प्रह्लादघाट पर एक ब्राह्मण के घर निवास किया. वहीं रहते हुए उनके अन्दर कवित्व-शक्ति का प्रस्फुरण हुआ और वे संस्कृत में पद्य-रचना करने लगे। परन्तु दिन में वे जितने पद्य रचते, रात्रि में वे सब लुप्त हो जाते। यह घटना रोज घटती। आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ। भगवान शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में काव्य रचना करो। तुलसीदास जी की नींद उचट गयी, वे उठकर बैठ गये। rpd
यह सुनकर सन् 1631 में तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना शुरु की। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा ही योग आया जैसा त्रेतायुग में राम-जन्म के दिन था। उस दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गए।
इसके बाद तुलसीदास जी काशी चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान् विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को श्रीरामचरितमानस सुनाया। रात को पुस्तक विश्वनाथ-मन्दिर में रख दी गयी। प्रात:काल जब मन्दिर के पट खोले गये तो पुस्तक पर लिखा हुआ पाया गया- ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ जिसके नीचे भगवान् शंकर की सही (पुष्टि) थी। उस समय वहाँ उपस्थित लोगों ने ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की आवाज भी कानों से सुनी।
सन 1680 में श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को तुलसीदास जी ने “राम-राम” कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया।
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#😇शनिवार भक्ति स्पेशल🌟 #🚩प्रेमानंद जी महाराज🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #💐भक्ति भावना दर्शन💐 #🙏राम राम जी
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