अजीब सन्नाटा है भाई! 🤫
आमतौर पर अगर कोई आम इंसान या कोई दूसरा नेता रामायण और महाभारत को महज 'किस्से-कहानियाँ' कह दे, तो अब तक टीवी डिबेट्स में भूचाल आ गया होता। धर्म गुरुओं, शंकराचार्यों और कथा वाचकों की 'भावनाएं' तुरंत आहत हो जातीं और फतवे जारी हो जाते। 🔥
लेकिन जब यही बात 'साहब' के मुख से निकली, तो सबने जैसे मौन व्रत धारण कर लिया है। 🤔
क्या भावनाओं के आहत होने का भी कोई 'प्रोटोकॉल' होता है? या फिर धर्म की रक्षा सिर्फ कमजोर लोगों के खिलाफ ही की जाती है?
कथा वाचकों का वो रोद्र रूप अब कहाँ है? जनता जवाब मांग रही है।
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