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एग्जाम प्रिपरेशन

=>"यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में 3 भारतीय स्थल शामिल" - यूनेस्को ने रविवार को चंडीगढ़ के केपीटोल कांप्लेक्स और सिक्किम के कंचनचंघा पार्क को अपने विश्व विरासत स्थलों में शामिल कर इस साल भारत से जुड़े तीनों नामांकनों को मंजूरी दे दी। - इससे पहले इस्तांबुल में विश्व विरासत समिति के 40 वें सत्र में बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय के पुरातात्विक स्थल को मंजूरी दी। -संस्कृति मंत्रालय के अनुसार पहली बार है जब किसी देश के तीन स्थलों को समिति की बैठक के एक ही सत्र में विश्व विरासत सूची में जगह मिली हो। - भारत के संस्कृति मंत्रालय ने ट्वीट किया, ‘बहुप्रतिक्षित सपना पूरा हुआ। चंडीगढ़ का कैपिटोल कांप्लेक्स अब विश्व धरोहर स्थल है। रूचिरा कम्बोज यूनेस्को में भारत की दूत हैं। - कैपिटोल कांप्लेक्स सात देशों (फ्रांस, स्विटजरलैंड, बेल्जियम, जर्मनी, अर्जेंटीना, जापान और भारत) में 17 स्थलों का एक हिस्सा है जिसकी रूपरेखा फ्रांस-स्विटजरलैंड के वास्तुकार "ले करबुसियर" ने बनायी थी। उन्होंने 1950 के दशक में चंडीगढ की योजना निरूपित की थी। - अन्य मुख्य पहचान में सिक्किम का कंचनजंघा राष्ट्रीय पार्क है। इसके अलावा एंटीगुआ नेवल डॉकयार्ड तथा संबंधित पुरातात्विक स्थलों (एंटीगुआ और बारबुडा) तथा पाम्पुल्हा मॉडर्न एन्सेम्बले (ब्राजील) को भी धरोहर सूची में शामिल किया गया है। करिए हमें फॉलो ..
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3 साल पहले
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एग्जाम प्रिपरेशन

विश्व के धरोहर =>"नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर विश्व धरोहर, यूनेस्को ने दी नई पहचान" - यूनेस्को ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कर लिया। 15 जुलाई को करीब दो बजे यूनेस्को ने अपनी वेबसाइट पर जब इसे शामिल किया तो विश्व के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा की खोई प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई मिली। ★यूनेस्को नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (यूनेस्को) ने महाबोधि मंदिर के बाद बिहार के दूसरे स्थल नालंदा के खंडहर को विश्व धरोहर में शामिल किया है। ★★विश्व धरोहर में शामिल होने वाला यह भारत का 33 वां धरोहर है। =>बढ़ेंगे सैलानी :- ★वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल होने से यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होगी। सैलानियों को मिलने वाली सुविधाओं में बढ़ोतरी के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था पहले की अपेक्षा अधिक चुस्त होगी। ★धरोहर के संरक्षण पर पहले से अधिक खर्च किये जाएंगे। कर्मियों की संख्या बढ़ेगी। साइट के कम से कम दो किलोमीटर दूरी को बफर जोन घोषित किया गया है। इसके विकास, सुरक्षा व संरक्षण की जिम्मेवारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और बिहार सरकार की होगी। =>कनिंघम ने की थी खोज ★नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेषों की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी। ★ पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 450 ई के आसपास हुई थी। गुप्त वंश के शासक कुमार गुप्त ने इसकी स्थापना की थी। ★ हर्षवर्द्धन ने भी इसको दान दिया था। हर्षवर्द्धन के बाद पाल शासकों ने भी इसे संरक्षण दिया। न केवल स्थानीय शासक वंशों, बल्कि विदेशी शासकों ने भी इसे दान दिया था। =>बख्तियार खिलजी ने जला दिया था विश्वविद्यालय:- ★विश्वविद्यालय का अस्तित्व 12वीं शताब्दी तक बना रहा। लेकिन तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को जला डाला। =>कहां है नालंदा के खंडहर - बोधगया से 62 किलोमीटर व पटना से 90 किलोमीटर दक्षिण में -14 हेक्टेयर में फैले हैं विश्वविद्यालय के अवशेष। =>कैसी है इमारतें ★खुदाई में मिली सभी इमारतों का निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। परिसर दक्षिण से उत्तर की ओर बना हुआ है। मठ या विहार इस परिसर की पूर्व दिशा में स्थित थे, जबकि मंदिर या चैत्य पश्चिम दिशा में। इस परिसर की सबसे मुख्य इमारत विहार-एक थी। ★ वर्तमान समय में भी यहां दो मंजिली इमारत है। यह इमारत परिसर के मुख्य आंगन के समीप बनी हुई है। संभवत: यहां ही शिक्षक अपने छात्रों को संबोधित किया करते थे। इस विहार में एक छोटा सा प्रार्थनालय भी अभी सुरक्षित अवस्था में बचा हुआ है। इस प्रार्थनालय में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा भग्न अवस्था में है। =>मंदिर संख्या तीन है सबसे विशाल :- ★मंदिर संख्या 3 इस परिसर का सबसे बड़ा मंदिर है। इस मंदिर से समूचे क्षेत्र का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। यह मंदिर कई छोटे-बड़े स्तूपों से घिरा हुआ है। इन सभी स्तूपो में भगवान बुद्ध की मूर्तियां बनी हुई हैं। ये मूर्तियां विभिन्न मुद्राओं में बनी हुई हैं। =>बौद्ध शिक्षा का था प्रमुख केन्द्र ★पांचवी से बारहवीं शताब्दी में नालंदा बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुका था। सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग भी यहां अध्ययन के लिए आया था। =>दुनिया का पहला आवासीय विवि था नालंदा महाविहार ★दुनिया के इस पहले आवासीय अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में दुनिया भर से आए 10 हजार छात्र रहकर शिक्षा लेते थे। 2,000 शिक्षक उन्हें दीक्षित करते थे। यहां आने वाले छात्रों में बौद्ध यतियों की संख्या ज्यादा थी। =>यहां थी तीन लाइब्रेरी ★प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में तीन लाइब्रेरी थीं। इनके नाम रत्नसागर, रत्नोदधि व रत्नरंजिता थे। माना जाता है जब विश्वविद्यालय में आग लगायी गयी, तो ये पुस्तकालय छह माह तक जलते रहे थे। इतना ही नहीं, यह भी माना जाता है कि विज्ञान की खोज से संबंधित पुस्तकें विदेशी लेकर चले गये थे। ★यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल हो जाने से न सिर्फ नालंदा और बिहार, बल्कि पूरे देश की गरिमा बढ़ी है। गरिमा बढ़ने के साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण व बिहार सरकार के दायित्व भी काफी बढ़ गये हैं।
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3 साल पहले
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एग्जाम प्रिपरेशन

पर्यावरण पर निबंध " ‪‎पर्यावरण‬ संरक्षण हेतु सार्थक प्रयास की जरुरत" - आजकल पर्यावरण संरक्षण का सवाल सबसे अहम् है। इसका मानव जीवन से सीधा सम्बंध है। न तो इसका नाम नया है और न ही इसकी अवधारणा नयी है। यदि इसके शाब्दिक अर्थ के बारे में विचार करें तो पाते हैं कि एक विषेष आवरण जिसे दूसरे अर्थों में हम प्रकृति का आवरण भी कह सकते हैं। वास्तविक अर्थों में यह एक रक्षा कवच है। तात्पर्य यह कि वह आवरण, वह रक्षा कवच जिसमें हमें आनंद की अनुभूति होती है, पर्यावरण है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं है कि सभी धर्मों का अवलम्बन पर्यावरण है। हरेक धर्म का सार पर्यावरण ही तो है। प्रकृति को अलग करके धर्म की कल्पना असंभव है। क्योंकि प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है और इसी में हमारा जीवन है, प्राण है। लेकिन विडम्बना है कि इसी प्रकृति की हम निरंतर उपेक्षा कर रहे हैं। अपने स्वार्थ कहें या अपनी आवष्यकताओं की पूर्ति की खातिर हम उसका बेदर्दी से दोहन कर रहे हैं। वह भी बिना यह सोचे कि इसका दुष्परिणाम क्या होगा। जबकि मानव जीवन में जल, जंगल और जमीन की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। यदि इतिहास पर नजर डालें तो प्राचीनकाल से ही वृक्षों के प्रति भारतीय समाज का अनुराग सांस्कृतिक परंपरा के रूप में विकसित हुआ है। इसी परंपरा को जीवंत बनाये रखने हेतु आज से 286 साल पहले 1730 ई. में राजस्थान के खेजड़ली गांव में 363 विश्नोई समुदाय के स्त्री-पुरूषों ने खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा हेतु अपना बलिदान किया था। उनका बलिदान मानव जीवन और पर्यावरण की रक्षा की दिशा में अभूतपूर्व है और चिर-स्मरणीय भी। लेकिन भारत में नेतृत्व की विकास की अवधारणा के फलस्वरूप वनों का ही नहीं, हरे-भरे खेतों का स्थान भी कंक्रीट के जंगलों ने ले लिया। इसकी गाज सबसे पहले वन्य जीवों पर पड़ी। नतीजतन कुछ वन्य जीव जो ‘पंचतंत्र’, ‘जातक कथाओं’ और ‘पौराणिक कथाओं’ के अनुसार कभी देवी-देवताओं के वाहक थे, आज इतिहास और काल के पात्र बनकर रह गए हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ा। दरअसल मानव जगत का पृथ्वी तथा उसके वायुमण्डल से घनिष्ठ सम्बंध है। मनुष्य इसी पृथ्वी पर अपना निवास बनाता है, अनाज पैदा करने से लेकर जंगल से वनस्पति व खनिज का उपयोग करने तथा तमाम कार्यकलापों से वह अपना जीवन-यापन करता है। पृथ्वी तथा वायुमण्डल से मिलकर बना वातावरण जिसे दूसरे शब्दों में ‘पर्यावरण’ कहते हैं; पृथ्वी के भौतिक वातावरण व उसके घटकों से मिलकर बनता है। प्रकृति के सभी घटक निश्चित मात्रा में अपने कार्य करके प्रकृति को स्वच्छ रखते हैं। भौतिक वातावरण व उसमें रहने वाले सभी जीव मिलकर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। लेकिन जब मानवीय हस्तक्षेप प्रकृति के इस सन्तुलित तंत्र में विक्षोभ उत्पन्न करता है तो इसके घातक प्रभाव पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों व मनुष्यों पर पड़ते हैं। इस सन्तुलन को बिगाड़ने में मनुष्य की भूमिका महत्वपूर्ण है। उसी के स्वार्थ ने उसकी विवेकीय शक्तियों पर विजय पाकर उसे तात्कालिक लाभ व सुख सुविधाओं के लिए प्रेरित किया है। परिणामस्वरूप जल, जंगल, जमीन, वायु, नदी सभी प्राकृतिक संसाधन जो मानव जीवन के आधार हैं, प्रदूषित हो गए हैं। इस सबके लिए हम ही दोषी हैं। पाष्चात्य सभ्यता के मोहपाष में बंध अपने खान-पान, आचार-विचार और स्वास्थ्य के प्रति दिन प्रतिदिन लापरवाह होते चले जाना और भौतिक संसाधनों की अंधी दौड़ के चलते प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के प्रति उदासीनता और उनका अंधाधुंध दोहन इसका प्रमुख कारण है। इसके चलते हमने अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य ही अंधकार में धकेल दिया है। असल में प्राकृतिक संसाधन और उनका उचित उपयोग राष्ट्र को विकसित तथा अनुचित उपयोग गरीब बनाता है। गरीब राष्ट्र के गरीबीग्रस्त भाग में पर्यावरण की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक खराब पायी जाती है। पर्यावरण का चहुंमुखी विकास या संरक्षण तभी सम्भव है, जब ऐसे राष्ट्र या उसके ऐसे भाग में जहां गरीबी का बोलबाला हो, वहां के लोगों को गरीबी के दलदल से निकाला जाये तथा उनके जीवन-स्तर को सुधारा जाये अन्यथा प्रदूषण और गरीबी के दलदल का मिला-जुला रूप एक मीठे जहर के रूप में उभरकर समूचे राष्ट्र में फैलकर अपना असर भयंकर नासूर की तरह दिखाने लगेगा। यही स्थिति हमारे देश की है जहां विकास के मौजूदा ढांचे जिसमें औद्योगिक विकास को प्रमुखता दी गई है, ने समूचे पर्यावरण को प्रदूषित करके रख दिया है और निहित स्वार्थ के चलते हम उसको दिनोंदिन और बढ़ाने में अहम् भूमिका निबाह रहे हैं। हकीकत में पर्यावरण प्रदूषण आज व्यापक समस्या बन चुका है। आज यह समस्या देश की ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है। यही कारण है कि विश्व के तमाम देश गंभीरता से इसका समाधान निकालने में जुटे हैं। गौरतलब है कि हमारे यहां पृथ्वी को उजाड़ने में जो कारक उत्तरदायी हैं, उन पर कभी सोचने का प्रयास ही नहीं किया गया। वर्तमान में पड़ रही भीषण गर्मी और मौसम में आ रहे बदलाव इसका पर्याप्त संकेत दे रहे हैं कि यदि हमने पर्यावरण की रक्षा की गंभीर कोशिशें नहीं कीं तो आने वाले दिन भयावह होंगे। औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया में घने वन-उपवनों के उजाड़ से पर्यावरण संतुलन काफी हद तक बिगड़ गया है। यह सच है कि औद्योगीकरण के चलते रोजगार के नये अवसर खुले और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई, पर इसका नकारात्मक पहलू यह है कि औद्योगिक विकास ने पर्यावरण को काफी क्षति पहुंचायी। आज उद्योगीकरण और रासायनिकीकरण के चलते हमारी नदियां, समुद्र, जल, भूजल, वायु-सभी के सभी भयावह स्तर तक प्रदूषित हो चुके हैं। कई नदियों का तो अस्तित्व ही मिट गया है। रासायनिक तत्वों के अत्याधिक उपयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति निरंतर घटती जा रही है। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों से हमारे प्राकृतिक संसाधन ही नहीं बल्कि समूचा वायुमंडल विषाक्त हो रहा है। कागज के कारखानों से हाइड्रोजन सल्फाइड, ताप बिजलीघरों से सल्फर डाइआक्साइड, तेल शोधक कारखानों से हाइड्रोकार्बन और रासायनिक उर्वरक कारखानों से उत्सर्जित अमोनिया वायुमंडल ही नहीं, नदियों को भी खतरनाक ढंग से प्रदूषित करती है। कार्बन डाईआॅक्साइड से वायुमंडल का ताप बढ़ता है। ओजोन में कमी व कार्बन डाईआॅक्साइड में बढ़ोतरी से 2030 तक तापमान दो डिग्री से ज्यादा बढ़ जायेगा। इससे समुद्र व वातावरण में नमी से जल का वाष्पन होगा, ग्लेिषयरों पर जमी बर्फ तेजी से पिघलेगी, समुद्र के पानी में बढ़ोतरी होगी जिससे भीषण तबाही मच सकती है और जलवायु व मौसम में भारी परिवर्तन हो सकता है। हमारे यहां लोग सबसे पहले उन मुद्दों पर सोचते हैं जो जीवन के लिए अनिवार्य हैं। उस समय जो भी संसाधन उपलब्ध हों, वे चाहे वन, वन्यप्राणी, खनिज पदार्थ हों या कोई अन्य, उसको प्राप्त करने के लिए सबसे पहले पहल की जाती है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण संरक्षण अपना महत्व खो देते हैं। असलियत में पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति के मामले में आम जनता की कोई हिस्सेदारी नहीं है। इसलिए आमजन को जागरूक करने की जरूरत है। इसके बिना इस समस्या पर पार पाना असम्भव है। आज समय की महती आवश्यकता है कि हम सभी पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति के प्रति न केवल चिंतित हों बल्कि उसकी रक्षा के लिए कमर कस कर तैयार हों और ऐसी जीवन पद्धति विकसित करें जो हमारे पर्यावरणीय संतुलन को बनाये रखने में सहायक हो। अब हमें इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास करने होंगे, तभी स्थिति में कुछ सुधार संभव है।
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3 साल पहले
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=>" रियो में 14 खेलों में 122 भारतीय खिलाड़ी पेश करेंगे अपनी चुनौती - इस साल रियो डी जेनेरियो में होने वाले 31वें ओलंपिक खेलों में 122 भारतीय खिलाड़ी 14 खेलों में अपनी चुनौती पेश करेंगे। ★ बता दें कि इस बार ओलंपिक में भारत का सबसे बड़ा दल उतरने जा रहा है। चूंकि इस बार ओलंपिक में हमारा सबसे बड़ा दल भाग लेने जा रहा है। ऐसे में खिलाडिय़ों से अपेक्षाकृत ज्यादा पदकों की उम्मीद होगी। - जिन लोगों ने ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया है उनमें से अधिकतर को सरकार की ओलंपिक पोडियम स्कीम से लिया गया है। हर खिलाड़ी को उसकी पसंद के हिसाब से प्रशिक्षण और सुविधाएं उपलब्ध कराई गयी हैं। ★ अपनी तैयारी के लिए उन्होंने जहां भी भेजने के लिए कहा उन्हें भेजा गया। उन्हें भारतीय से लेकर विदेशी कोच उपलब्ध कराए गए। हमने रियो में उनके लिए उचित आवास की व्यवस्था भी कर ली है। इस ओलंपिक दल में एथलेटिक्स की विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में 38, हॉकी में 32, निशानेबाजी में 12, कुश्ती में आठ, बैडमिंटन में सात, तीरंदाजी, टेबल टेनिस और टेनिस में चार-चार खिलाड़ी अपनी चुनौती रखेंगे।
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3 साल पहले
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एग्जाम प्रिपरेशन

=>ये पैलेट गन क्या है और क्यों पुलिस और सीआरपीएफ ने प्रदर्शनकारियों पर इसका इस्तेमाल किया? -: हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे के बाद सुरक्षा बल और प्रदर्शनकारियों के बीच अब तक सैकड़ों दफा हिंसक झड़पें हो चुकी हैं। कई दफा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बल पैलेट गन का इस्तेमाल करते हैं। इसके इस्तेमाल से हजारों घायल हो गए हैं और सैकड़ों लोगों को देखने में दिक्कत आने लगी है। =>ये नॉन लीथल हथियार है यानी गैर-जानलेवा हथियार :- ★ ये नॉन लीथल हथियार है यानी गैर-जानलेवा हथियार जिससे जान नहीं जाती है। जब आपकी खुद की जान अटकी हो और कोई दूसरा उपाय न हो तो विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर और क्या इस्तेमाल किया जाए। आप लोगों पर डंडा चलाएंगे तो क्या ऐसी हिंसक उग्र भीड़ भागेगी? =>उपद्रव में शामिल लोगों ने आंसू गैस का जैसे तोड़ निकाल लिया है :- - इसके अलावा नॉन लीथल वेपन के तौर पर आंसू गैस के गोले हैं। उपद्रवियों में शामिल लोगों ने इसका जैसे तोड़ निकाल लिया है और कई बाद देखा गया है कि वह पहले से तैयार रहते हैं। आंसू गैस का गोला फायर होने पर ये लोग उस पर गीले बोरे डाल देते हैं जिससे उसका असर नहीं के बराबर हो जाता है। - इसके बाद और हथियार हैं जिसे मिर्ची बम कहते हैं। इसे आलियोरेजन भी कहा जाता है। इसे लोगों पर फेंकने पर आंखों और त्वचा में जलन होने लगती है। पर ये भी उतना असरदार नहीं होता क्योंकि इसका असर भीड़ में मौजूद चंद लोगों तक ही सीमित रहता है और सैकड़ों लोगों की भीड़ पर काबू पाना मुश्किल सा हो जाता है। =>पैलेट गन से एक बार फायर होने से सैकड़ों छर्रे निकलते हैं जो रबर और प्लास्टिक के होते हैं ★ले देकर पुलिस और सीआरपीएफ के पास पैलेट गन ही बचती है। इसके एक बार फायर होने से सैकड़ों छर्रे निकलते हैं जो रबर और प्लास्टिक के होते हैं। ये जहां-जहां लगते हैं उससे शरीर के हिस्से में चोट लग जाती है। अगर आंख में लग जाए तो वह काफी घातक होता है। इसकी रेंज 50 से 60 मीटर होती है। छर्रे जब शरीर के अंदर जाते हैं तो काफी दर्द तो होता है। पूरी तरह ठीक होने में कई दिन लग जाते हैं। ★=>सुरक्षा बल का कहना है वे इसे कमर के नीचे फायर करते हैं :- ★सुरक्षा बल की कोशिश होती है कि इसे सामने से फायर न करें लेकिन, ज्यादातर इनकी भिड़ंत आमने-सामने होती है। सुरक्षा बल का ये भी कहना है वो इसे कमर के नीचे फायर करते हैं लेकिन ये कई बार कमर के ऊपर भी लग जाता है। वजह है जैसे बंदूक से निशाने साधे जाते हैं और गोली वही लगती है जहां फायर की जाती है। पैलेट गन में ऐसा कुछ भी नहीं है। ★सुरक्षा बल के अधिकारियों का कहना है कि इसके खराब रिजल्ट्स मालूम है, पर इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। पैलेट बंदूकें ही हैं जिन्हें विरोध के दौरान आसानी से इस्तेमाल किया जा सका है। ★★ऐसा भी नहीं कि इस हथियार का इस्तेमाल पहली बार हो रहा है। इसका इस्तेमाल तो 2010 से हो रहा है। भीड़ से निपटने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल दुनिया के कई देशों में हो रहा है। ★हो सकता है अब पहली बार इतनी आवाजें उठ रही हैं तो इसके दूसरे विकल्प के बारे में भी सोचा जाए। जिससे बेकाबू लोगों पर काबू भी पाया जा सके और सुरक्षा बलों को भी कोई नुकसान न हो।
15k ने देखा
3 साल पहले
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