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🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें - शिव तांडव स्तोत्र || CHALISAHANTRA CON जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेsव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्।  डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद  चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् II१I१ dTdu जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।  ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममः I१२ II  धगद्घगद्घगज्ज्वल धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।  कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि II३।I जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व " ٤39/ रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्धुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि Il४II  मदांधसिंधु " सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां " घ्रिपीठभूः|  भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः II५II  द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकनम न्निलिंपनायकम्।  ललाटचत्वरज्वल सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः I१६।१  करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके | धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम II७ll नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः | निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः II८II  प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे II९।I  নিতৃপ্তা : अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी मधुव्रतम्। स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे II१० ]l  जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमदद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तितः प्रचण्ड ताण्डवः शिवः II११।।  दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।  तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे I११२I। निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्। రడా विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम I११३ | इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम  विशुद्धमेति संततम्। स्तवं ब्रुवन्नरो पठ स्मरन हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् II१६।l शिव तांडव स्तोत्र || CHALISAHANTRA CON जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेsव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्।  डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद  चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् II१I१ dTdu जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।  ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममः I१२ II  धगद्घगद्घगज्ज्वल धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।  कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि II३।I जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व " ٤39/ रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्धुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि Il४II  मदांधसिंधु " सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां " घ्रिपीठभूः|  भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः II५II  द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकनम न्निलिंपनायकम्।  ललाटचत्वरज्वल सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः I१६।१  करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके | धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम II७ll नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः | निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः II८II  प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे II९।I  নিতৃপ্তা : अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी मधुव्रतम्। स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे II१० ]l  जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमदद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तितः प्रचण्ड ताण्डवः शिवः II११।।  दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।  तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे I११२I। निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्। రడా विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम I११३ | इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम  विशुद्धमेति संततम्। स्तवं ब्रुवन्नरो पठ स्मरन हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् II१६।l - ShareChat
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radhekrishna - {೬೬ सच्चा प्यार तो वह है जिसमें किसी के मिलने की उम्मीद भी ना होफिर भी इंतजार सिर्फ उसी का हो..!! {೬೬ सच्चा प्यार तो वह है जिसमें किसी के मिलने की उम्मीद भी ना होफिर भी इंतजार सिर्फ उसी का हो..!! - ShareChat
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#🌞 Good Morning🌞 #🌞सुप्रभात सन्देश
🌞 Good Morning🌞 - सुना है अच्छे इंसान को. याद करने से दिन. अच्छा गुजरता है इसलिए हमने. आपको याद किया. 5 34 GOOD NORIIIG सुना है अच्छे इंसान को. याद करने से दिन. अच्छा गुजरता है इसलिए हमने. आपको याद किया. 5 34 GOOD NORIIIG - ShareChat