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#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🆕 ताजा अपडेट #🙏कर्म क्या है❓
🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 - ShareChat
00:30
#🌷शुभ सोमवार #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇
🌷शुभ सोमवार - ShareChat
00:30
#🌷शुभ सोमवार #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #👏🌸श्री सोमनाथ महादेव मंदिर, प्रथम ज्योतिर्लिंग, गुजरात🌸👏 #श्री सोमनाथ यात्रा
🌷शुभ सोमवार - ShareChat
00:55
#🌷शुभ सोमवार #🆕 ताजा अपडेट #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
🌷शुभ सोमवार - तीन लोक के नाथ को मन में लिया बसाय जीवन अब "महादेव" भरोसे. वो ही पार लगाय..!! ৪২ ৪২ সঙ্ানব तीन लोक के नाथ को मन में लिया बसाय जीवन अब "महादेव" भरोसे. वो ही पार लगाय..!! ৪২ ৪২ সঙ্ানব - ShareChat
यज्ञ ( हवन ) करने की सटीक और सही विधि :- हमारे बहुत से आर्य समाज के मित्र या अन्य सनातनी भी बहुत सा यज्ञ करते और करवाते हैं परन्तु यज्ञ का पूरा लाभ जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है वैसा लाभ नहीं उठा पाते हैं । इसका कारण है कि बहुत से प्रकार की भिन्न भिन्न यज्ञ पद्धतियों का प्रचलित होना । प्रत्येक आर्य समाज में या गायत्री संस्थानों में या अन्य सनातनी मंदिरों, मठों में यज्ञ करने की प्रक्रिया अलग अलग है । अधिकतर तो आर्य समाज के विद्वानों से यज्ञ की महिमा सुनकर अनेकों परिवार चाव में आकर अपने घरों में यज्ञ तो शुरु कर देते हैं परन्तु फिर कहते हैं "हमने तो पूरा एक वर्ष यज्ञ किया परन्तु हमें तो कोई लाभ नहीं हुआ" इसका कारण गलत प्रकार से यज्ञ करना है । ठीक विधि से यज्ञ न करने से लाभ के बजाए हानी होने की संभावना भी है । तो सही और गलत विधि क्या है इसपर नीचे के बिन्दुओ में विस्तार से लिखा जाता है :- (१) सबसे पहले तो यज्ञ कुंड उसी आकार और परिमाण का होना चाहिए जैसी की शास्त्रों में बताया गया है । यानी कि ऊपर का चौकोर ( Square ) नीचे के चौकोर से चार गुना चौड़ा होना चाहिए । उदाहरण :- जैसे कि ऊपर का चौकोर यदि 16" x 16" है तो नीचे का 4" x 4" होना चाहिए और ये यज्ञ कुंड उतना ही गहरा यानी कि 16" होना चाहिए । यज्ञकुंड के इस आकार को गणित में Frustrum Square Pyramid भी कहा जाता है । इससे अलग परिमाण में बना हुआ यज्ञकुंड सही नहीं माना जाता । (२) यज्ञकुंड सबसे सर्वोत्तम तो मिट्टी का ही माना गया है जिसकी लिपाई देसी गाँय के गोबर से होती रहे । क्योंकि इस यज्ञकुंड में किए गए यज्ञ से चारों ओर सुगँध का प्रभाव अति तीव्र होचा है जो कि अन्य धातु निर्मित यज्ञकुंड से नहीं होता । यद्यपि धातु के यज्ञकुंड का निर्माण भी किया जा सकता है जो कि बाजार में मिलते हैं । धातु के यज्ञकुंड में चीकनी मिट्टी पोत लेनी चाहिए जिससे कि उससे वही सारे लाभ मिलें जो कि मिट्टी के यज्ञकुंड से मिलते हैं । (३) यज्ञकुंड का निर्माण भी यज्ञ के प्रकारों के अनुसार ही करना चाहिए । जैसे अकेले दैनिक यज्ञ करने के लिये छोटा यज्ञकुंड, घर के सदस्यों के साथ करने के लिये थोड़ा बड़े आकार का और बहुत बड़े यज्ञ जैसे कि चतुर्वेद परायण यज्ञ आदि के करने के लिये बड़े यज्ञकुंडों का निर्माण आवश्यक्ता के अनुसार करवा लेना चाहिए । यज्ञकुंड के आकार के अनुसार ही उसमें ईंधन का व्यय होता है । (४) यज्ञकुंड के आकार के अनुसार ही समिधाओं ( हवन की लकड़ियों ) का चयन करना चाहिए । यदि छोटा यज्ञ करना हो तो छोटी समिधाएँ पर्याप्त हैं । अधिक मात्रा में ली गईं या बड़ी समिधाओं से घृत का व्यय अधिक होता है । और समिधाएँ भी ऋतु अनुकूल ही लेनी चाहिएँ । जैसे कि यज्ञ करने के लिये आम, ढाक, पीपल, बड़, चन्दन, बेरी, नीम आदि की समिधाएँ सबसे उत्तम मानी गई हैं । यदी समिधाएँ बहुत मोटी या बड़ी हैं तो उनको आरी से काटकर पतला या छोटा कर लेना चाहिए जिससे की घृत का अधिक व्यय न हो । और देखना चाहिए कि समिधाओं में किसी प्रकार की दीमक न हो या कोई गंदगी न लगी हो यज्ञ करने से पहले प्रयोग होने वाली इन समिधाओं को शुद्ध और साफ कर लेना चाहिए । (५) ये देखा गया है बहुत से लोग बाजार में मिलने वाले मिलावटी घी, भैंस के घी या डालडा आदि घृत से यज्ञ करते और करवाते हैं जो कि पूर्ण रूप से गलत है इससे तो प्रदूषण दूर होने के बजाए और बढ़ता है । भैंस के घृत से तो आलस्य ता संचार होता है । यज्ञ करने के लिये तो सर्वोत्तम मिलावट रहित गाँय का शुद्ध देसी घृत ही है । यदि आप मात्र 6 ग्राम ऐसा शुद्ध देसी घी अग्नि में डालेंगे तो इस एक चम्मच से लगभग 1000 किलो वायु शुद्ध होती है ऐसा यज्ञ पर शोध करने वालों ने पता लगाया है । (६) जो हवन सामग्री है वह ऋतु के अनुकूल ही होनी चाहिए क्योंकि प्रत्येक ऋतु में यदि एक ही प्रकार की फल सब्जियाँ सदा लाभ नहीं करतीं तो ठीक वैसे ही सर्वदा एक ही प्रकार की आयुर्वैदिक औषधियाँ सदा लाभ नहीं कर सकतीं । बहुत से आर्य समाजों में वही पैकेट में पड़ी पुरानी सामग्री से ही लोग हवन करते रहते हैं जिससे किसी प्रकार का लाभ नहीं होता बल्कि हानी ही होती है । तभी हमें प्रत्येक ऋतु के अनुकूल लाभ और हानी विचारकर ही हवन सामग्री का निर्माण स्वयं करना चाहिए जिसके लिये आप पंसारी की दुकान से सभी औषधियाँ जड़ी बूटियाँ मात्रा के अनुसार ओखली में कूटकर स्वयं तैय्यार कर सकते हैं जिसका कि आपको विशेष लाभ होगा । जैसे कि मान लें शरद ऋतु में लगभग 25 ऐसी औषधियाँ ( जटामासी, चिरायता आदि ) हैं तो प्रत्येक को लगभग २० ग्राम लें और पाऊडर करके आपके पास 250 ग्राम की सामग्री तैयार हो गई । जो कि समाप्त होने पर फिर से बनाई जा सकती है । ये ध्यान रखें कि सामग्री में चारों प्रकार के पदार्थों की मात्रा प्रचुर होनी चाहिए (क) मीठे पदार्थ ( मेवा, खाण्ड आदि ) (ख) रोगनाशक ( नीम आदि ) (ग) पुष्टिकारक (अखरोट, मखाने आदि ) (घ) बलवर्धक, बुद्धिवर्धक ( शंखपुष्पि, ब्राह्मी, गौघृत आदि ) (७) यज्ञ के जितने मंत्र हैं वे सब कंठस्थ होने चाहिएँ जिससे कि यज्ञ करने में आपका समय अधिक न लगे । इसके इलावा यज्ञ के मंत्रों के अर्थ भी आपको पता होने चाहिएँ । जैसे कि ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना, प्रातः साँयकालीन, स्वस्तिवाचनम्, शान्तिकरणम् , जन्मदिवस आदि के मंत्रों के स्पष्ट अर्थ आपको पता होने चाहिएँ । ऐसा होने से आपको यज्ञ करने में हृदय से विशेष प्रकार का रस आयेगा । और मंत्रों का उच्चारण आपका शुद्ध और सप्षट होना चाहिए तांकि सुनने वाले यजमानों को और दूर से सुनने वालों को भी विशेष आनंद आए और ये यज्ञ के प्रति आकर्षित हो पाएँ । वेद मंत्रों में वैसे ही आकर्षण और सौन्दर्य है जिससे कि सामने वाला सुनकर खिंचा चला आता है । (८) यज्ञ करते समय ये ध्यान रखें कि पर्याप्त समिधाएँ और पर्याप्त घृत अग्नि को अर्पण करते रहें तांकि अग्नि की लप्टें ऊपर ऊपर तक जाएँ क्योंकि ऊँची लप्टों वाला यज्ञ सर्वोत्तम माना जाता है । (९) यज्ञ की अग्नि में कोई उच्छिष्ट ( जूठा ) पदार्थ , नमकीन, कृमीयुक्त ( कीड़ों वाला ) पदार्थ कभी न डालें । (१०) यज्ञ करने से पूर्व यज्ञ के स्थान को स्वच्छ कर लें । (११) यज्ञ करने के स्थान पर शोर शराबा न हो । प्रयास करें कि शांतमय वातावरण में यज्ञ हो और आपका ध्यान न भटके । (१२) यज्ञ करते समय गले में गायत्री मंत्र या ओ३म् के पट्टे डालें तांकि जिससे स्वयं की और सामने देखने वालों में भी यज्ञ के प्रती श्रद्धा उत्पन्न हो । (१३) यदि संभव हो तो प्रतीदिन दो समय दैनिक यज्ञ घर में किया करें, यदि नहीं तो एक बार किया करें यदि इससे भी नहीं तो सप्ताह मे एक बार यदि इतना भी नहीं तो पूर्णमासी और अमावस्या को ही यज्ञ घर में किया करें । (१४) जिस स्थान पर यज्ञ किया हो उस स्थान पर वायु अत्यन्त शुद्ध होती है वहाँ पर किये गए प्राणायाम और ध्यान आदि का विशेष लाभ होता है । (१५) यज्ञ समाप्त होने पर यजमानों के साथ वैदिक धर्म के सिद्धान्तों पर भी थोड़ी सी चर्चा किया करें , या फिर रामायण, महाभारत या मनुस्मृति की शिक्षाप्रद बातों पर चर्चा किया करें जिससे कि अच्छे संस्कारो का संचार प्रत्येक यजमान के मन में होता रहे । (१६) यज्ञ की अग्नि में थोड़े से सूखे नीम के पत्ते या निमोलियाँ डालने से मच्छर मर जाते हैं । (१७) जन्मदिवस, वैवाहिक वर्षगांठ आदि पर पार्टीयाँ करके धन को व्यर्थ बहाने के बजाए कम खर्च में ही घर में बड़ा यज्ञ करवाया करें । जिससे कि सभी सगे सम्बन्धियों में अपनी प्रतिष्ठा भी बढ़े और पवित्रता का संचार घर मे हो । (१८) प्रयास करना चाहिए कि यज्ञ धूएँ रहित हो या कम से कम धूआँ उत्पन्न हो । (१९) यज्ञ करने का सही समय सूर्योदय से लेकर आगे ४५ मिनट तक का और सांयकाल में सूर्यास्त से पूर्व ३० मिनट का होता है अर्थात् सूर्य के प्रकाश में ही यज्ञ करने का विधान है । तो ऐसे ही अनेकों सुधार यज्ञ पद्धति में करने से ही यज्ञ का विशेष लाभ मिलेगा । गलत विधि से यज्ञ करके यज्ञ की निन्दा करने वाले महामूर्ख होते हैं । -- कुमार आर्य #🌷शुभ सोमवार #🙏कर्म क्या है❓ #🆕 ताजा अपडेट
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यज्ञ ( हवन ) करने की सटीक और सही विधि :- हमारे बहुत से आर्य समाज के मित्र या अन्य सनातनी भी बहुत सा यज्ञ करते और करवाते हैं परन्तु यज्ञ का पूरा लाभ जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है वैसा लाभ नहीं उठा पाते हैं । इसका कारण है कि बहुत से प्रकार की भिन्न भिन्न यज्ञ पद्धतियों का प्रचलित होना । प्रत्येक आर्य समाज में या गायत्री संस्थानों में या अन्य सनातनी मंदिरों, मठों में यज्ञ करने की प्रक्रिया अलग अलग है । अधिकतर तो आर्य समाज के विद्वानों से यज्ञ की महिमा सुनकर अनेकों परिवार चाव में आकर अपने घरों में यज्ञ तो शुरु कर देते हैं परन्तु फिर कहते हैं "हमने तो पूरा एक वर्ष यज्ञ किया परन्तु हमें तो कोई लाभ नहीं हुआ" इसका कारण गलत प्रकार से यज्ञ करना है । ठीक विधि से यज्ञ न करने से लाभ के बजाए हानी होने की संभावना भी है । तो सही और गलत विधि क्या है इसपर नीचे के बिन्दुओ में विस्तार से लिखा जाता है :- (१) सबसे पहले तो यज्ञ कुंड उसी आकार और परिमाण का होना चाहिए जैसी की शास्त्रों में बताया गया है । यानी कि ऊपर का चौकोर ( Square ) नीचे के चौकोर से चार गुना चौड़ा होना चाहिए । उदाहरण :- जैसे कि ऊपर का चौकोर यदि 16" x 16" है तो नीचे का 4" x 4" होना चाहिए और ये यज्ञ कुंड उतना ही गहरा यानी कि 16" होना चाहिए । यज्ञकुंड के इस आकार को गणित में Frustrum Square Pyramid भी कहा जाता है । इससे अलग परिमाण में बना हुआ यज्ञकुंड सही नहीं माना जाता । (२) यज्ञकुंड सबसे सर्वोत्तम तो मिट्टी का ही माना गया है जिसकी लिपाई देसी गाँय के गोबर से होती रहे । क्योंकि इस यज्ञकुंड में किए गए यज्ञ से चारों ओर सुगँध का प्रभाव अति तीव्र होचा है जो कि अन्य धातु निर्मित यज्ञकुंड से नहीं होता । यद्यपि धातु के यज्ञकुंड का निर्माण भी किया जा सकता है जो कि बाजार में मिलते हैं । धातु के यज्ञकुंड में चीकनी मिट्टी पोत लेनी चाहिए जिससे कि उससे वही सारे लाभ मिलें जो कि मिट्टी के यज्ञकुंड से मिलते हैं । (३) यज्ञकुंड का निर्माण भी यज्ञ के प्रकारों के अनुसार ही करना चाहिए । जैसे अकेले दैनिक यज्ञ करने के लिये छोटा यज्ञकुंड, घर के सदस्यों के साथ करने के लिये थोड़ा बड़े आकार का और बहुत बड़े यज्ञ जैसे कि चतुर्वेद परायण यज्ञ आदि के करने के लिये बड़े यज्ञकुंडों का निर्माण आवश्यक्ता के अनुसार करवा लेना चाहिए । यज्ञकुंड के आकार के अनुसार ही उसमें ईंधन का व्यय होता है । (४) यज्ञकुंड के आकार के अनुसार ही समिधाओं ( हवन की लकड़ियों ) का चयन करना चाहिए । यदि छोटा यज्ञ करना हो तो छोटी समिधाएँ पर्याप्त हैं । अधिक मात्रा में ली गईं या बड़ी समिधाओं से घृत का व्यय अधिक होता है । और समिधाएँ भी ऋतु अनुकूल ही लेनी चाहिएँ । जैसे कि यज्ञ करने के लिये आम, ढाक, पीपल, बड़, चन्दन, बेरी, नीम आदि की समिधाएँ सबसे उत्तम मानी गई हैं । यदी समिधाएँ बहुत मोटी या बड़ी हैं तो उनको आरी से काटकर पतला या छोटा कर लेना चाहिए जिससे की घृत का अधिक व्यय न हो । और देखना चाहिए कि समिधाओं में किसी प्रकार की दीमक न हो या कोई गंदगी न लगी हो यज्ञ करने से पहले प्रयोग होने वाली इन समिधाओं को शुद्ध और साफ कर लेना चाहिए । (५) ये देखा गया है बहुत से लोग बाजार में मिलने वाले मिलावटी घी, भैंस के घी या डालडा आदि घृत से यज्ञ करते और करवाते हैं जो कि पूर्ण रूप से गलत है इससे तो प्रदूषण दूर होने के बजाए और बढ़ता है । भैंस के घृत से तो आलस्य ता संचार होता है । यज्ञ करने के लिये तो सर्वोत्तम मिलावट रहित गाँय का शुद्ध देसी घृत ही है । यदि आप मात्र 6 ग्राम ऐसा शुद्ध देसी घी अग्नि में डालेंगे तो इस एक चम्मच से लगभग 1000 किलो वायु शुद्ध होती है ऐसा यज्ञ पर शोध करने वालों ने पता लगाया है । (६) जो हवन सामग्री है वह ऋतु के अनुकूल ही होनी चाहिए क्योंकि प्रत्येक ऋतु में यदि एक ही प्रकार की फल सब्जियाँ सदा लाभ नहीं करतीं तो ठीक वैसे ही सर्वदा एक ही प्रकार की आयुर्वैदिक औषधियाँ सदा लाभ नहीं कर सकतीं । बहुत से आर्य समाजों में वही पैकेट में पड़ी पुरानी सामग्री से ही लोग हवन करते रहते हैं जिससे किसी प्रकार का लाभ नहीं होता बल्कि हानी ही होती है । तभी हमें प्रत्येक ऋतु के अनुकूल लाभ और हानी विचारकर ही हवन सामग्री का निर्माण स्वयं करना चाहिए जिसके लिये आप पंसारी की दुकान से सभी औषधियाँ जड़ी बूटियाँ मात्रा के अनुसार ओखली में कूटकर स्वयं तैय्यार कर सकते हैं जिसका कि आपको विशेष लाभ होगा । जैसे कि मान लें शरद ऋतु में लगभग 25 ऐसी औषधियाँ ( जटामासी, चिरायता आदि ) हैं तो प्रत्येक को लगभग २० ग्राम लें और पाऊडर करके आपके पास 250 ग्राम की सामग्री तैयार हो गई । जो कि समाप्त होने पर फिर से बनाई जा सकती है । ये ध्यान रखें कि सामग्री में चारों प्रकार के पदार्थों की मात्रा प्रचुर होनी चाहिए (क) मीठे पदार्थ ( मेवा, खाण्ड आदि ) (ख) रोगनाशक ( नीम आदि ) (ग) पुष्टिकारक (अखरोट, मखाने आदि ) (घ) बलवर्धक, बुद्धिवर्धक ( शंखपुष्पि, ब्राह्मी, गौघृत आदि ) (७) यज्ञ के जितने मंत्र हैं वे सब कंठस्थ होने चाहिएँ जिससे कि यज्ञ करने में आपका समय अधिक न लगे । इसके इलावा यज्ञ के मंत्रों के अर्थ भी आपको पता होने चाहिएँ । जैसे कि ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना, प्रातः साँयकालीन, स्वस्तिवाचनम्, शान्तिकरणम् , जन्मदिवस आदि के मंत्रों के स्पष्ट अर्थ आपको पता होने चाहिएँ । ऐसा होने से आपको यज्ञ करने में हृदय से विशेष प्रकार का रस आयेगा । और मंत्रों का उच्चारण आपका शुद्ध और सप्षट होना चाहिए तांकि सुनने वाले यजमानों को और दूर से सुनने वालों को भी विशेष आनंद आए और ये यज्ञ के प्रति आकर्षित हो पाएँ । वेद मंत्रों में वैसे ही आकर्षण और सौन्दर्य है जिससे कि सामने वाला सुनकर खिंचा चला आता है । (८) यज्ञ करते समय ये ध्यान रखें कि पर्याप्त समिधाएँ और पर्याप्त घृत अग्नि को अर्पण करते रहें तांकि अग्नि की लप्टें ऊपर ऊपर तक जाएँ क्योंकि ऊँची लप्टों वाला यज्ञ सर्वोत्तम माना जाता है । (९) यज्ञ की अग्नि में कोई उच्छिष्ट ( जूठा ) पदार्थ , नमकीन, कृमीयुक्त ( कीड़ों वाला ) पदार्थ कभी न डालें । (१०) यज्ञ करने से पूर्व यज्ञ के स्थान को स्वच्छ कर लें । (११) यज्ञ करने के स्थान पर शोर शराबा न हो । प्रयास करें कि शांतमय वातावरण में यज्ञ हो और आपका ध्यान न भटके । (१२) यज्ञ करते समय गले में गायत्री मंत्र या ओ३म् के पट्टे डालें तांकि जिससे स्वयं की और सामने देखने वालों में भी यज्ञ के प्रती श्रद्धा उत्पन्न हो । (१३) यदि संभव हो तो प्रतीदिन दो समय दैनिक यज्ञ घर में किया करें, यदि नहीं तो एक बार किया करें यदि इससे भी नहीं तो सप्ताह मे एक बार यदि इतना भी नहीं तो पूर्णमासी और अमावस्या को ही यज्ञ घर में किया करें । (१४) जिस स्थान पर यज्ञ किया हो उस स्थान पर वायु अत्यन्त शुद्ध होती है वहाँ पर किये गए प्राणायाम और ध्यान आदि का विशेष लाभ होता है । (१५) यज्ञ समाप्त होने पर यजमानों के साथ वैदिक धर्म के सिद्धान्तों पर भी थोड़ी सी चर्चा किया करें , या फिर रामायण, महाभारत या मनुस्मृति की शिक्षाप्रद बातों पर चर्चा किया करें जिससे कि अच्छे संस्कारो का संचार प्रत्येक यजमान के मन में होता रहे । (१६) यज्ञ की अग्नि में थोड़े से सूखे नीम के पत्ते या निमोलियाँ डालने से मच्छर मर जाते हैं । (१७) जन्मदिवस, वैवाहिक वर्षगांठ आदि पर पार्टीयाँ करके धन को व्यर्थ बहाने के बजाए कम खर्च में ही घर में बड़ा यज्ञ करवाया करें । जिससे कि सभी सगे सम्बन्धियों में अपनी प्रतिष्ठा भी बढ़े और पवित्रता का संचार घर मे हो । (१८) प्रयास करना चाहिए कि यज्ञ धूएँ रहित हो या कम से कम धूआँ उत्पन्न हो । (१९) यज्ञ करने का सही समय सूर्योदय से लेकर आगे ४५ मिनट तक का और सांयकाल में सूर्यास्त से पूर्व ३० मिनट का होता है अर्थात् सूर्य के प्रकाश में ही यज्ञ करने का विधान है । तो ऐसे ही अनेकों सुधार यज्ञ पद्धति में करने से ही यज्ञ का विशेष लाभ मिलेगा । गलत विधि से यज्ञ करके यज्ञ की निन्दा करने वाले महामूर्ख होते हैं । -- कुमार आर्य #🆕 ताजा अपडेट #🙏कर्म क्या है❓ #🌷शुभ सोमवार #🙏गुरु महिमा😇
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कौन कहता है अकेले, जंग नही जीती जाती, बन के कोई सूरजमल, जंग में उतरे तो सही। #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🆕 ताजा अपडेट #🌸बड़े साहिबजादे शहीदी दिवस🙏 #⚔️वीर बाल दिवस💐 #🫡शहीदों को श्रद्धांजलि🕯️
📢 ताज़ा खबर 🗞️ - युग प्रुरूष महाराजा सूरजमल जी के बलिदान दिवस पर भावभीनी श्रद्वांजलि| युग प्रुरूष महाराजा सूरजमल जी के बलिदान दिवस पर भावभीनी श्रद्वांजलि| - ShareChat
#🌷शुभ सोमवार #🙏कर्म क्या है❓ #हर_हर_महादेव #सुप्रभात #सनातन
🌷शुभ सोमवार - a W वैभव नही वैराग्य जीता है | उसे 1  क्या चढाऊ जो अमृत छोड vur೯ / a W वैभव नही वैराग्य जीता है | उसे 1  क्या चढाऊ जो अमृत छोड vur೯ / - ShareChat
#🌸शुभ शुक्रवार🙏 हाथी के पैरों तले कुचलवाकर मारे गए थे कबीरदास ......प्रामाणिक तथ्य....... — मधु धामा कबीर के जन्म की तरह ही मृत्यु को लेकर भी अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हैं, परन्तु साहित्य तथा इतिहास सम्बन्धी शोधों के आधार पर जो तथ्य प्रमाणित होते हैं, वे यही सिद्ध करते हैं कि कबीर को वेदों के प्रचार के अपराध में मौत की सजा मिली थी। संवत् 1551 अर्थात सन् 1494 के आसपास, जब सिकन्दर लोदी काशी आया, वह इनकी मौत का कारण बना। मृत्यु का प्रामाणिक कारण भी सिकन्दर लोदी के आदेश से काजी द्वारा हाथी के पैरों तले कुचलवाया जाना ही है। कबीर को जिस समय हाथी के पैरों तले कुचलवाया जा रहा था, उस समय कबीर का एक शिष्य ही वहां मौजूद था, जिसने बाद में यह पद लिखा : अहो मेरे गोविन्द तुम्हारा जोर काजी बकिवा हस्ती तोर। बांधि भुजा भलैं करि डार्यो हस्ति कोपि मूंड में मार्यो। भाग्यो हस्ती चीसां मारी वा मूरत की मैं बहिहारी। महावत तोकूं मारौं सांटी इसहि मराऊं घालौं काटी। हस्ती न तोरे धरे धियान वाकै हिरदै बसे भगवान। कहा अपराध सन्त हौ कीन्हा बांधि पोट कुंजर कूं दीन्हा। कुंजर पोट बहु बन्दन करै अजहु न सूझे काजी अंधरै। तीन बेर पतियारा लीन्हा मन कठोर अजहूं न पतीना। कहै कबीर हमारे गोब्यन्द चौथे पद में जन का ज्यन्द। अर्थात ‘हे गोविन्द! आपकी शक्ति की बलिहारी जाऊं। काजी ने आपको (कबीर को) हाथी से तुड़वाने का आदेश दिया। कबीर की भुजाएं अच्छी तरह से बांधकर डाल दिया गया। महावत ने हाथी को क्रोधित करने के लिए उसके सिर पर चोट मारी। हाथी चिंघाड़कर दूसरी ओर भाग चला। उस प्रकार भागते हुए हाथी की मूरत पर मैं बलिहारी जाऊं। हाथी को भागता देख काजी ने महावत से कहा कि मैं तुझे छड़ी से पीटूंगा और इस हाथी को कटवा डालूंगा। लेकिन हाथी तो उस समय भगवान के ध्यान में मस्त था। लोग भी कहने लगे कि इस सन्त ने क्या अपराध किया है। जो इसका गट्ठर सा बांधकर हाथी के सामने डाल दिया गया है। लेकिन हाथी बार-बार उस गट्ठर की वन्दना करने लगा। पर अज्ञान से अन्धे हुए काजी को यह देखकर भी कुछ सुझाई न दिया। तीन बार उसने परीक्षा ली, परन्तु कठोर मनवाले काजी को अब भी विश्वास न हुआ। कबीर मन में कहने लगे कि गोविन्द तो हमारे हैं, मैं जन का जिंदा समाज सुधारक हूं तथा मैंने चौथी बार चौथे पद (मोक्ष) को प्राप्त कर लिया।’ ऊपर दिया पद नागरी प्रचारिणी सभा की ‘कबीर ग्रंथावली’ में तो है ही, साथ ही ‘गुरु ग्रंथ साहब’ में भी मिलता है। कबीर की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए कोई आगे नहीं आया। कहते हैं कि उन्हें जंगल में फेंक दिया गया। लेकिन इसके विपरीत कबीर साधक मानते हैं कि वे स्वेच्छा से अपनी मौत मरे थे और उनका शरीर पुष्पों में बदल गया था। जिस महात्मा ने जीवन-भर अंधविश्वासों का विरोध किया, उनके खुद के जीवन के साथ भी अंधविश्वासपूर्ण बातें किंवदन्तियां प्रचलित हो गई। कुछ लोग तो उन्हें मुस्लिम ही बताने लगे। #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇
🌸शुभ शुक्रवार🙏 - ShareChat
किस रज से बनते कर्मवीर…! विवाह संस्कार भोग नहीं संयम और साधना का पथ है… दुनियां के कई देशों बांग्लादेश,नेपाल आदि में जेन जी के चर्चे ,उपद्रव स्वतंत्रता की लड़ाई ,अधिकारों के लिए संघर्ष आदि की चर्चायें सुनते सुनते मन को ऐसा लगता था कि भारत का युवा ऐसा करने लगा तो क्या होगा..? समाज के अन्यान्य प्रबुद्ध लोगों की चर्चाओं में भी ये बात चल पड़ी थी कि भारत की Gen Z भी विद्रोह के तरफ़ बढ़ रही है.. मन चिंतित भी था कि भारत में ऐसा हुआ.तो…! पर मन ने कभी स्वीकार ही नहीं किया कि भारत का युवा ऐसा कैसे कर सकता है…? भारत तो त्याग , समर्पण और साधना का देश है..यहाँ अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों की मान्यता के स्थान पर कर्तव्य बोध पर जीने वालों की मान्यता अधिक है.. यह भारत भूमि है ही ऐसी ..यहाँ राम ,कृष्ण ध्रुव,प्रह्लाद , गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी,भगत सिंह ,आजाद , बंकिम चंद्र चटर्जी , डॉ हेडगेवार की धरती है..यहाँ तो लोगों ने अपनी मातृभूमि की सेवा में जीवन का सर्वस्व समर्पण किया है..हमारी प्रेरणा कर्तव्य है..अधिकार नहीं..! मध्यप्रदेश के देवास जिले के खातेगांव का एक युवा शिवम यादव .. पिताजी शासकीय शिक्षक माँ एक कुशल गृहणी .. बेटा घर और नगर का होनहार जिसने अच्छी पढ़ाई की … अकेला बेटा… माँ पिताजी की देखभाल के कारण बाहर कहीं नौकरी नहीं की … माँ- बाबूजी की सहमती से विवाह तय हुआ … बड़े ही धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ..सारे मित्र रिश्तेदार सब प्रसन्नचित्त थे और वो दोनों पति पत्नी भी अत्यंत आनंदित थे … संवाद में उन्होंने बताया कि विवाह के दस दिन बाद हम दोनों ने माँ नर्मदा की पैदल परिक्रमा का संकल्प लिया है.. यह सुनकर मन स्तब्ध रह गया …माँ नर्मदा की परिक्रमा … २६००-३५०० किमी की दूरी..वो भी पैदल.. मौसम की ठंडक और रास्ता भी दुर्गम … कई संत / महात्मा इस परिक्रमा को ३ साल,३ महीने १३ दिन में पूर्ण करते है… ये सब सोचते सोचते मन ठिठक गया कि इतने कष्ट सहकर ये यात्रा क्यों कर रहे होंगे.. लाखों रुपए खर्च करके किसी देश मे हनीमून पर जा सकते थे.. खूब मौज मस्ती करते सुंदर तस्वीरें वायरल होती युवाओं में कौतूहल होता अच्छा लगता ..घर के अकेले बेटे थे कोई कष्ट नहीं था पर इन्होंने तो कंटकाकीर्ण मार्ग चुना एक तरफ़ दुनियाँ के अन्य देशों के युवा अपने अधिकारों के लिए किसी के अधिकार छीनने के लिए तैयार खड़ा है वहीं अपने भारत के युवा नदी की पैदल परिक्रमा ..क्या मिलेगा इससे..? धर्म के कार्य से क्या मिलेगा..? क्या नहीं मिलेगा ये चिंतन भारत का नहीं है पर बहुत कुछ मिलेगा … सैकड़ों दिनों तक नर्मदा मैया का सानिध्य … दुनियाँ में केवल एक ही नदी है नर्मदा जिसकी परिक्रमा की जाती है. हमारा विश्वास है नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से कल्याण होता है … जीवन में आत्मविश्वास,सात्विकता.. संतुष्टि.. किसी को जीतने की जगह अपने मन पर विजय प्राप्त करना और पता नहीं क्या क्या मिलेगा..? जिसकी कल्पना नहीं केवल अनुभूति ही की जा सकती है..इसी कामना से सुदूर जंगलों में अत्यंत अभाव में रहने वाले से लेकर बड़े बड़े धनाढ्य , ज्ञानी , ध्यानी ,साधु ,संत ,महात्मा लाखों की संख्या में नर्मदा परिक्रमा करते है..भारत भोग की नहीं त्याग की परंपरा का देश है .. माता भूमि पुत्रोंअहम पृथिव्य: को जीवन में धारण करने वाला अपना देश है.. वंदेमातरम् मंत्र को संकल्प मानकर साधना करने वाला देश है..जिसकी साधना से अंग्रेजों के बंगभंग का षड्यंत्र भी विफल हो जाता है..वंदेमातरम् भारत के जन जन की प्रेरणा है… आज भी भारत का युवा अपनी मातृभूमि के सर्वस्व न्योछावर करने को अपना सौभाग्य मानता है … यही है भारत का चिंतन..। ये कहानी केवल शिवम् की नहीं है उससे कहीं अधिक शिवम् के साथ पाणिग्रहण करने वाली बेटी रोशनी की भी है…जिसने घर की सुख सुविधा का त्याग कर महीनों कष्ट सहकर पदयात्रा का संकल्प स्वीकार किया… कोई तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर महिला स्वतंत्रता और अधिकार के नाम पर मिथ्या भ्रम फैला सकता है पर ये सीता के चरित्र को हृदयंगम कर जीने वाली बेटियों का भारत है.. और यही भारतवर्ष में स्त्री चरित्र भी है । जिस भारत की युवा पीढ़ी शिवम् -रोशनी जैसी हो तो फिर कैसी चिंता .. ? और कैसा भय … ? सारे संशय मिट गए दुनियाँ के देशों में कितने भी तख्त पलट हों सकते है पर भारत का संस्कृतिक तख्त बहुत मजबूती से खड़ा है जो अभी तक न डिगा है न कभी डिगेगा..।बस प्रभु से एक ही कामना है की इनकी नर्मदा परिक्रमा सकुशल पूर्ण हो मुझे विश्वास है भारत की भावी पीढ़ी को परिक्रमा में नर्मदा मैया दर्शन अवश्य देंगी.. यात्रा शुभ हो.. सफल हो.. सार्थक हो.. नर्मदा मैया की जय । वंदेमातरम् । ।। भारत माता की जय ।। #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #😇 चाणक्य नीति #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #💔 हार्ट ब्रेक स्टेटस #🙏कर्म क्या है❓
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