#💐अबुल कलाम आजाद की पुण्यतिथि💐
भारत के पहले शिक्षा मंत्री, जो ‘ज्ञान’ को आज़ादी से भी बड़ा मानते थे!
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद — एक ऐसा नाम जिसने भारत को केवल आज़ादी ही नहीं, बल्कि एक सोच दी कि “विकास की असली कुंजी है शिक्षा।”
उन्होंने कम उम्र में ही धर्म, दर्शन, इतिहास और विज्ञान की गहरी समझ विकसित की। सर सैय्यद अहमद ख़ान की शिक्षा-नीति से प्रेरित होकर उन्होंने पश्चिमी विचारों का अध्ययन किया और समाज में जागरूकता फैलाने के लिए ‘अल-हिलाल’ और ‘अल-बलाग़’ जैसे अख़बार निकाले। इन लेखों ने ब्रिटिश सत्ता को हिला दिया — और एक युवा मौलाना को बना दिया आज़ादी की आवाज़।
स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में, आज़ाद ने समझा कि देश की असली ताक़त उसके शिक्षित नागरिकों में है। उन्होंने 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की नींव रखी, जिसे आज भी भारत का संविधान मान्यता देता है। ग्रामीण इलाकों, महिलाओं और वयस्कों की शिक्षा को उन्होंने समान प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में बने संस्थान केन्द्रीय शिक्षा संस्थान (Central Institute of Education), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE), साहित्य अकादमी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) — आज भी देश के शिक्षा ढांचे की रीढ़ हैं।
1945 में उन्होंने भारत के पहले प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की नींव रखी, और बेंगलुरु में Indian Institute of Science तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में Faculty of Technology के विकास पर विशेष ज़ोर दिया। उनका मानना था कि “तकनीकी शिक्षा ही आधुनिक भारत का भविष्य तय करेगी।”
यही दृष्टि आज देश को वैज्ञानिक और तकनीकी ताक़त बना रही है। उनके योगदानों के सम्मान में, 1992 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया और 11 नवंबर उनके जन्मदिवस को मनाया जाने लगा ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ के रूप में।
मौलाना आज़ाद केवल एक नेता नहीं, बल्कि उस भारत के पहले सपने देखने वाले थे जहाँ हर बच्चा पढ़ सके, सोच सके और अपने भविष्य को खुद गढ़ सके।