POET UMESH SUWASIYA 18
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@poet_umesh_suwasiya_18
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poet - ये जो शायर चुप सा रहता है, 93 बहकी बहकी बातें कर रहा है वो गूंगी खामोशियो की आवाजें ध्यान से सुनता था, जमा भी करता था चाँद के साये , गीली सी नूर की बूंदे, रुखे रुखे से राख के पत्ते अबभी संभाल रखे थे उसने , इस गनी भीड़ के जंगल में कच्चे पक्के लम्हे चुनता থা বী, हाँवही वो अजीब सा शायर आधी रात को कोहनी के बल उठके चाँद का माथा चूमा करता था. कल सुना है अब वो जिंदा लाश बन चुका है... -/3দথ মুবামিযা (মাকাং) ये जो शायर चुप सा रहता है, 93 बहकी बहकी बातें कर रहा है वो गूंगी खामोशियो की आवाजें ध्यान से सुनता था, जमा भी करता था चाँद के साये , गीली सी नूर की बूंदे, रुखे रुखे से राख के पत्ते अबभी संभाल रखे थे उसने , इस गनी भीड़ के जंगल में कच्चे पक्के लम्हे चुनता থা বী, हाँवही वो अजीब सा शायर आधी रात को कोहनी के बल उठके चाँद का माथा चूमा करता था. कल सुना है अब वो जिंदा लाश बन चुका है... -/3দথ মুবামিযা (মাকাং) - ShareChat