अरावली को क्यों, हिमालय को हटा दो!
हिमालय के सीने में बहुत खनिज भरा पड़ा है। सोचो, कितना पत्थर, कितना लोहा, कितना सोना मिलेगा? और अगर हिमालय बीच से हट जाए, तो तिब्बत जाने का रास्ता कितना साफ हो जाएगा! विकास की रेल दौड़ेगी,
समंदर को सुखा दो!
समंदर में खनिजों का अथाह भंडार है ,भारत तीन तरफ से समंदर से घिरा है,
सुखा दो इसे! मिट्टी डालो, कंक्रीट भरो और निकाल लो सारा खजाना। पूरी दुनिया के सबसे अमीर देश बन जाएंगे हम,
अब….न हिमालय को हिलाने का दम है, न समंदर को सोखने का हौसला। वहां तो प्रकृति अपने विराट रूप में खड़ी है इसलिए, जो कमजोर दिखा, जो शांत खड़ा रहा, उसे ही लपक लिया ,
हाँ, अरावली सही है! इसी के गले पर आरी चलाओ, इसी की कोख उजाड़ो, इसे ही लूट लो ,
आज के समय प्रकृति का संरक्षण होना चाहिए वहाँ भक्षण हो रहा है ,
अच्छा अरावली खनन के क्या फायदे हैं ??
यही ना कि सरकार को नगद में राजस्व प्राप्त होगा ??
क्या अब हम राजस्व इकट्ठा करने के लिए सिर्फ खनन पर निर्भर हैं ?? क्या खनन इतना जरूरी है ??
क्या बिना अरावली के देश गरीब हो जाएगा ? या अरावली खनन के बाद देश दुनियाँ का सबसे अमीर देश हो जाएगा ??
जरूरी क्या है ? प्रकृति? या पैसा ??
क्या अरावली ,लोगों के स्वास्थ्य के लिए बाधा है ??
क्या अरावली देश के उत्थान में बाधा बन के खड़ी है ??
अरावली के खनन की क्या जरूरत पड़ गई ??
सिर्फ़ तुरंत राजस्व इकट्ठा करने के लिए ???
कंक्रीट , बजरी के लिए ???
या अन्य खनिजों के लिए ??
प्रकृति वो माँ है जो सिर्फ़ देती ही देती है , अरावली ने सिर्फ़ दिया ही दिया है , उसी की कोख उजाड़ना चाहते हो ? किसलिए ??
राजस्व इकट्ठा करना है तो अरावली का उत्थान करो ,
बिना खनन के अरावली टूरिज्म को विकसित करो , इको-टूरिज्म और एडवेंचर टूरिज्म डेवलोप करो ,
यही टूरिज्म भविष्य में भर भर कर राजस्व बढ़ाएगा , यही टूरिज्म वाहन के लोगों के लिए नए रोजगार पैदा करेगा , यही टूरिज्म होटल इंडस्ट्री से लेकर फ़ूड इंडस्ट्री को आगे बढ़ाएगा और प्राकृतिक संपदा बची रहेगी , अरावली के लोगों में खुशहाली आएगी ,
अब रही बात पत्थर , गिट्टी , बजरी , कंकरीट की तो भाई आज की युग में जहाँ हम तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं , एडवांस होते जा रहे हैं तो अपनी सोच को और एडवांस काहे नहीं करते ??
ना जाने कितने विकसित देश कचरे का उपयोग करके रोड़ी कंक्रीट बनाते हैं , हम कियूँ नहीं करते ?? अगर हम शहरी कचरे का इस्तेमाल कर सकते हैं कचरे से बनी ईंटें , नार्मल ईंट से ज़्यादा मजबूत होती है ,
विदेशों में इसे waste to wealth कहा गया है जहाँ जितना भी प्लाटिक वेस्ट होता है जैसे दूध की थैलियां , सिंगल यूज़ प्लास्टिक , चिप्स के पैकेट , सारे कचरे की ईंटें बना दी जाती हैं जिसके इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन में होता है ,
शहर से कचरा भी साफ़ होगा , जो शहरों में बड़े बड़े कूड़े के ढेर लगे हैं वो हट जाएँगे ,
अरे पहाड़ ख़त्म करने हैं तो कूड़े के पहाड़ ख़त्म करो , प्रकृति तो बिना मांगे सब कुछ दे रही है , प्रकृति माँ है , बिन मांगे सब देती है , वही जीवनदाहिनी है , चंद राजस्व का हवाला देकर प्रकृति का विनाश मत करो ,
यकीन करना जो आपको अरावली खनन से प्राप्त होता होगा , उससे ज़्यादा प्रकृति ख़ुद ही अपने आप दे देगी बस नई सोच , नई पहल की ज़रूरत है , प्रकृति से प्यार करने की ज़रूरत है , प्रकृति को बचाने की ज़रूरत है , संरक्षण की ज़रूरत है ,
हाँ अगर फिर भी खनन से तुरंत राजस्व इकट्ठा करने की ज़रूरत है तो समझो देश के हालात ख़राब हैं , फिर गंभीर समस्या है ,
किसान हो या कोई भी व्यक्ति , उसपर अगर कर्ज होता है तो पहले जमीनें बेचता है , उसे पता होता है कि आने वाले वर्षों में जितने की जमीन बिकी उससे ज़्यादा , जमीं फसल पैदा कर के दे देगी , पर अगर आपातकालीन स्थिति में पैसे चाहिए होते हैं , कर्ज चुकाना होता है तो जमीन , घर , प्लॉट बेच देता है ,
तब क्या देश के अंदर राजस्व की कमी है ?? क्या हमारा देश कर्जे में है ??
अगर नहीं तो फिर अरावली का उत्थान करो , टूरिज्म बढ़ाओ , रोजगार पैदा करो , कचरे से कंक्रीट बनाने की तकनीकी लाओ और विकास की राह पर आगे बढ़ते रहो , प्रकृति का सरक्षण करते रहो जो मानव और मानव जीवन के लिए बेहद जरूरी है !
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