१७ ह व्ह्यू · ८.२ ह प्रतिक्रिया | हर कुछ वर्षों में एक नया आंदोलन, एक नया चेहरा और एक नया नारा सामने आता है। कैमरे बदलते हैं, पोस्टर बदलते हैं, लेकिन पटकथा वही रहती है। देश का युवा रोजगार चाहता है, किसान समाधान चाहता है, आम नागरिक विकास चाहता है। लेकिन अक्सर उन्हें आंदोलनों और नारों के बीच उलझा दिया जाता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना ज़रूरी है, लेकिन सवाल पूछने वालों से सवाल पूछना भी उतना ही ज़रूरी है। क्या पुराने आंदोलनों के वादे पूरे हुए? क्या देश को वास्तव में समाधान मिला? या फिर हर बार सिर्फ चेहरे बदले और कहानी वही रही? आखिर फैसला सोशल मीडिया, टीवी डिबेट या नारों से नहीं होता। फैसला उस मतदाता का होता है जो मतदान केंद्र में खड़े होकर अपना वोट देता है। चेहरे बदलते रहेंगे। नारे बदलते रहेंगेहर कुछ वर्षों में एक नया आंदोलन, एक नया चेहरा और एक नया नारा सामने आता है। कैमरे बदलते हैं, पोस्टर बदलते हैं, लेकिन पटकथा वही रहती है। देश का युवा रोजगार चाहता है, किसान समाधान चाहता है, आ� | Savayra
हर कुछ वर्षों में एक नया आंदोलन, एक नया चेहरा और एक नया नारा सामने आता है।
कैमरे बदलते हैं, पोस्टर बदलते हैं, लेकिन पटकथा वही रहती है।
देश का युवा...