@somanath778
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~☆☝श्रीपाद प्रेम💓मुद्रा🙏☆

🍁॥श्री सकल संत गाथा॥🍁#आपण नाही आपली गुणवत्ता बोलते..

विरह क्या है???? पूछते हो तो समझ न पाओगे; समझते तो पूछते नहीं। समझ सकते, तो भी पूछते नहीं। क्योंकि विरह कोई सिद्धात तो नहीं है, दर्शनशास्त्र की कोई धारणा तो नहीं है—प्रीति की अनुभूति है। जैसे किसी ने प्रेम नहीं ‘किया और पूछे कि प्रेम क्या है? अब कैसे समझाएं उसे, कैसे जतलाएं उसे? ऐसे जैसे अंधे ने पूछा, प्रकाश क्या है? विरह अनुभूति है; प्रेम किया हो तो जान सकते हो। और जिसने प्रेम किया है, वह विरह जान ही लेगा। तो पहले प्रेम में पड़ो। और आश्चर्य तो यही है कि लोग प्रेम में पड़े बिना कैसे बच जाते हैं! आश्चर्य यह नहीं है कि तुम पूछते हो कि विरह क्या है, आश्चर्य यह है कि तुम्हें अब तक प्रेम का पता नहीं! लेकिन एक उलझन हो गयी है, उस उलझन में ही तुम्हारी सारी व्यथा—कथा है। सदियों —सदियों से तुम्हें समझाया गया है कि परमात्मा को प्रेम करना है तो आदमी को प्रेम करना छोड़ना पड़ेगा। आदमी को प्रेम करना छोड़ दो तो मैं तुमसे कहता हूं तुम परमात्मा को कभी प्रेम कर ही न पाओगे। आदमी तो सीढ़ी है; सीढ़ी ही तोड़ दी…! मैं तुमसे कहता हूं : आदमी को प्रेम करो। वहीं तुम प्रेम का पहला पाठ सीखोगे। और वही पाठ तुम्हें इतना मदमस्त कर देगा कि तुम जल्दी ही पूछने लगोगे...और बड़ा प्रेमपात्र कहां खोजूं? मनुष्य से प्रेम करने से ही तुम्हें अनुभव होगा कि मनुष्य छोटा पात्र है; प्रेम को जगा तो देता है, लेकिन तृप्त नहीं कर पाता। प्रेम को उकसा तो देता है, लेकिन संतुष्ट नहीं कर पाता। प्रेम विवाह भी निष्फल हो जाते है। प्रेम की पुकार तो पैदा कर देता है; खोज शुरू हो जाती है। लेकिन पुकार इतनी बडी है और आदमी इतना छोटा कि फिर पुकार पूरी नहीं हो पाती। फिर वही बड़ी पुकार, जो आदमी तृप्त नहीं कर सकता, और वही प्रेम की अतृप्ति, प्रेम की यात्रा बनकर...... "परमात्मा" की तलाश में निकलती है। आदमी तो छिछला—छिछला पानी है। तैरना सीख लो वहा, फिर बड़े सागर हैं! मगर छिछले पानी से ही बचते रहे, तो बड़े सागरों में कब तैरोगे, कब तिरोगे, कैसे तैरोगे, कैसे तिरोगे? मुल्ला नसरुद्दीन जाता था नदी पर तैरना सीखने। पहले ही दिन, पुराना घाट, जमी हुई काई ( लील ) पत्थर पर। डरा—डरा गया था। उस्ताद सिखाने जो ले गये थे, वे तो अपना कपड़ा ही उतार रहे थे कि मुल्ला का पैर फिसल गया काई ( लील ) पर। चारों खाने चित्त गिर पड़ा। घबड़ाकर उठा और एकदम घर की तरफ भागा। उस्ताद ने पूछा कि नसरुद्दीन कहां जाते हो, तैरना नहीं सीखना? नसरुद्दीन ने कहा : अब जब तैरना सीख लूंगा, तभी नदी के पास आऊंगा। यह तो खतरनाक मामला है। यह तो भगवान की कृपा कहो कि घाट पर ही फिसला पैर, और पत्थर पर ही गिरा। चोट तो खायी है खूब, ठीक है दो—चार दिन में सब ठीक हो जायेगी; अगर पानी में पड़ गया होता तो आज जान गंवा दी होती! और उस्ताद! तुम तो कपड़े ही उतार रहे थे, तुम्हें तो पता ही न चलता, मैं फिसल गया। में आऊंगा, एक दिन जरूर आऊंगा; लेकिन अब जब तैरना सीख लूंगा तभी आऊंगा। मगर तैरना कहां सीखोगे? बैठकखाने में गद्दी इत्यादि बिछा के तैरना सीखोगे! ऐसे कहीं तैरना सीखा जाता है, लेकिन तर्क तो ठीक है नसरुद्दीन का कि बिना तैरे नदी मत जाना। तर्क तो बिलकुल ठीक है, सौ प्रतिशत ठीक है। रत्तीभर भूल तुम तर्क में न निकाल सकोगे, कि तैरना सीख लो तो ही नदी जाना, नहीं तो खतरा है। तर्क तो ठीक है मगर जीवन विपरीत है। नदी न जाओगे; तो तैरना सीखोगे कैसे? जोखिम तो लेनी ही होगी। हां, जरूरी नहीं है कि तुम बड़े सागरों में सीखने जाओ; नदी पर सीख लो, तट पर सीखो, उथले—उथले सीख लो। फिर जब सीखना आ जाये तो फिर सारे सागर तुम्हारे हैं। ऐसा ही मैं तुमसे कहता हूं : पत्नी को प्रेम किया है, यह परमात्मा के विपरीत नहीं। बच्चे को प्रेम किया है, यह परमात्मा के विपरीत नहीं। मित्र को चाहा है, यह परमात्मा के विपरीत नहीं। यह नदी की उथली— उथली धार है; यहां सीख लो। यह सब परमात्मा के पक्ष में है। ये परमात्मा के पहले पाठ हैं। और इनसे तृप्ति नहीं मिलेगी, इसलिए आश्वस्त रही। ये अतृप्त करेंगे, ये अतृप्त ही करेंगे, यही तो मजा है इनका। यही इनका राज है। किस मनुष्य को मनुष्य से तृप्ति मिली है, कब मिली है? इतिहास में कोई उल्लेख नहीं। इससे कुछ सीखो। इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य के साथ प्रेम में अतृप्ति सघन होती है। प्यास तो जग जाती है, जल नहीं मिलता। फिर जल की तलाश शुरू होती है। वही तलाश विरह है। फिर तुम परमात्मा को खोजने निकलते हो। तुम कहते हो : इतने प्रेम की आकांक्षा दी है, तो कहीं सरोवर भी होगा जो इस आकांक्षा को तृप्त करता होगा। ज्ञानियों ने कहा है : इसके पहले कि वह तुम्हें जीवन देता, वह तुम्हारे जीवन की तृप्ति के आयोजन कर देता है। देखते नहीं हो, मां के पेट से एक बच्चे का जन्म होता! बच्चे का जन्म होते—होते या होने के पहले ही मां के स्तन दूध से भर जाते हैं। अभी बच्चा आया नहीं, लेकिन भोजन का आयोजन तैयार हो गया। चिड़िया घोंसला बनाने लगती है, अभी अंडे रखे नहीं हैं; लेकिन कोई अचेतन हाथ चिड़िया को घोंसला बनाने में संलग्न कर देता है। उसके पास कुछ गणित भी नहीं है, कोई हिसाब—किताब भी नहीं है कि कब बनाये घोंसला। लेकिन कुछ अचेतन ऊर्जा, कोई सहज प्रतीति गहन में, उसे घोंसला बनाने में रत कर देती है। देखते हो, दीवाने की तरह भागी— भागी लाती है घास—पात, फूल—पत्ते, बना लेती है घोंसले को। इसके पहले कि अंडे रखने का क्षण आये, घोंसला तैयार हो जाता है। इस जगत को अगर तुम गौर से देखोगे, तो यहां भूख के पहले भोजन है, प्यास के पहले जल है। इसका ही नाम श्रद्धा है। इसको देख लेने का नाम श्रद्धा है। तो अगर तुम्हारे भीतर परमात्मा को पाने की आकांक्षा उठे, तो मान ही लेना, जान ही लेना कि परमात्मा भी होगा। नहीं तो प्यास उठ नहीं सकती थी। फिर प्यास तड़फायेगी बहुत; जब तक मिलन न हो जायेगा तब तक रुलायेगी बहुत। उस अदभुत रुदन की यात्रा का नाम विरह है। विरह दुख नहीं है, या अगर कहना चाहो ठीक से तो बड़ा मधुर दुख है, बड़ा मीठा दुख है। सौभाग्यशालियों को ही उपलब्ध होता है। अभागे तो उससे वंचित रह जाते हैं। प्रेम के दो अंग हैं—विरह और मिलन। विरह में पकता है भक्त और मिलन में परीक्षा पूरी हो गयी, पुरस्कार मिला। विरह तैयारी है, मिलन उपलब्धि है। आंसुओ से रास्ते को पाटना पड़ता है मंदिर के, तभी कोई मंदिर के देवता तक पहुंचता है। रो—रो कर काटनी पड़ती है यह लंबी रात, तभी सुबह होती है। और जितनी ही आंखें रोती हैं, उतनी ही ताजी सुबह होती है! और जितने ही आंसू बहे होते हैं, उतने ही सुंदर सूरज का जन्म होता है। "मरो है जोगी मरो" ( गुरु गोरखनाथ ) - ओशो #ओशो प्रवचन #॥ भक्ती चिंतन ॥
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ओशो प्रवचन

ओशो प्रवचन - GOD सुना है तेरी नगरी में प्रेम बरसता है तेरे प्रेम में भीगने को मेरा मन तरसता है । - ShareChat
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6 तासांपूर्वी
*लोकसत्ता :: चैतन्य चिंतन ०१९. नित्यनेम :: २५ जानेवारी * श्रीगोंदवलेकर महाराज यांनी नित्यनेमा बाबत सांगितलेला विचार आपण जाणून घेत आहोत. श्रीमहाराज म्हणतात, ".... जो अखंड नामस्मरण करतो तो नेहमीच नित्यनेमात असतो... आपल्याला सदा नामात कसे राहता येईल, याचा विचार करावा. याकरिता गुरुआज्ञा प्रमाण मानणे हेच खरे साधन आहे. गुरु सांगेल तोच नित्यनेम होय. त्याला शरण जावे रोज थोडेसे वाचन, त्यानंतर मनन, मानानानंतर त्याप्रमाणे आचरण आणि शेवटी गुरूस अनन्य शरण, हाच साधकाचा साधनाक्रम आहे आणि हाच नित्यनेम आहे... केवळ नेम आहे म्हणून उगीच करू नये; साधकाने कोणतीही गोष्ट मनापासून करायला शिकावे.' (९ फेब्रुवारीच्या प्रवचनातून) 'फार नेम करू नये,' या वाक्यात 'फार' हा अंतरंगातील खोलीला नव्हे तर दृश्यातील त्याच्या व्याप्तीकडे संकेत करणारा आहे. अवडंबराला लागू आहे. नित्यनेम म्हणजे नित्य जो भगवंत त्याचं स्मरण ठेवण्याचा नेम. नित्यनेम म्हणजे अनित्यत ण गुंतण्याचा अभ्यासपूर्वक प्रयत्न.. तो कसा साध्य होईल? तर श्रीसदगुरूंचा जो बोध आहे त्याचं मनन करीत त्यानुसार आचरणाचा प्रयत्न सुरु केला तरच ! आता आज ते होत नाही कारण ज्या मनानं नित्याचं स्मरण राखायचं तेच मन अनित्य अशा दुनियेच्या मननात गुंतलं आहे. मनाचा एक विशेष असा कि मन ज्या गोष्टींवर केंद्रित होतं तिच्या विचारानं आणि प्रभावानं ते व्यापून जातं. त्यामुळे मनाच्या या क्षमतेचा उपयोग नित्याच्या प्रभावानं मन आणि त्यायोगे जीवन व्यापून जावं, यासाठी करता येऊ शकतो. त्यासाठी मनात नित्याचं बीज रुजवलं पाहिजे. ते बीज रुजविण्याचा उपाय म्हणजे नाम आहे. श्री महाराज म्हणतात. "भगवंताचे स्मरण राहील व ते प्राणाबरोबर सांभाळता येईल असा नियम असावा. नेम अगदी सुटसुटीत व सहज करता येण्यासारखा असावा." (बोधवचने, अनु. १०२) आता नाम हे सुटसुटीत साधन आहे, सहज आहे. ते कुणीही, कोणत्याही स्थितीत आणि कुठेही सहज घेऊ शकतो. मृत्यूशय्येवर ताल्माल्णारा माणूस जवळच्या आप्तांच्या नावाचा पुकारा करतो, याचाच अर्थ प्राणाबरोबर जर काही सहज सांभाळता येत असेल तर ते केवळ नामाच आहे ! हेच नाम जर समजून केलं तर ते भगवंतचं स्मरण घडविणारं साधनही आहे. ते समजून करण्यावरच श्रीमहाराजंचा भर आहे. म्हणूनच ते सांगतात. 'नेम आहे म्हणून उगीच करू नये.' या 'उगीच' चा अर्थ त्यांच्यात शब्दांत अधिक स्पष्ट झाला आहे. - "नामस्मरण समजून करावे. समजून म्हणजे राम कर्ता आहे या भावनेने." (बोधवचने, अनु. ८५) जर दुनियाकेंद्रित होऊन, दुनियेनंच व्यापून मन जर नाम घेण्याचा प्रयत्न करीत असेल तर तो नेम उगीच करायचा म्हणून करणे आहे. त्याचाही उपयोग होईल, यात शंका नाही पण वेळ फार लागेल आणि तो जो आवश्यक वेळ आहे तिथवर माझे साधन सुरूच राहील, याचीही हमी नाही. त्यामुळे नामस्मरण जे करायचे ते राम कर्ता आहे, या भावनेने समजून केले पाहिजे. #॥ श्रीपाद माऊली ॥ #॥ चैतन्य चिंतन ॥ #स्वरूप चिंतन #॥ भक्ती चिंतन ॥
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॥ श्रीपाद माऊली ॥

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