चाणक्य नीति 3.17
शौक और दुःख देने वाले बहुत से पुत्रों को पैदा करने से क्या लाभ है। कुल को आश्रय देने वाला तो एक पुत्र ही सबसे अच्छा होता है।
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चाणक्य नीति 3.16
जिस प्रकार चन्द्रमा से रात्रि की शोभा होती है। उसी प्रकार एक सुपुत्र, अर्थात साधु प्रकृति वाले पुत्र से कुल आनन्दित होता है।
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चाणक्य नीति 3.14
एक ही सुगन्धित फूल वाले वृक्ष से जिस प्रकार सारा वन सुगन्धित हो जाता है। उसी प्रकार एक सुपुत्र से सारा कुल सुशोभित हो जाता है।
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चाणक्य नीति 3.12
अति सुंदर होने के कारण सीता का हरण हुआ, अत्यंत अहंकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान के कारण राजा बलि बांधा गया। अतः सभी के लिए अति ठीक नहीं है। ‘अति सर्वथा वर्जयते।’ अति को सदैव छोड़ देना चाहिए।
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चाणक्य नीति 3.11
उद्धयोग-धंधा करने पर निर्धनता नहीं रहती है। प्रभु नाम का जप करने वाले का पाप नष्ट हो जाता है। चुप रहने अर्थात सहनशीलता रखने पर लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। और वो जागता रहता है। अर्थात सदैव सजग रहता है उसे कभी भय नहीं सताता।
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चाणक्य नीति 3.10
किसी एक व्यक्ति को त्यागने से यदि कुल की रक्षा होती हो तो उस एक को छोड़ देना चाहिए। पूरे गांव की भलाई के लिए कुल को तथा देश की भलाई के लिए गांव को और अपने आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए सारी पृथ्वी को छोड़ देना चाहिए।
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चाणक्य नीति 3.9
कोयल की शोभा उसके स्वर में है। स्त्री की शोभा उसका पतिव्रत धर्म है। कुरूप व्यक्ति की शोभा उसकी विद्वता में है। और तपस्वियों की शोभा क्षमा में है।
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चाणक्य नीति 3.8
रूप और यौवन से संपन्न तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी यदि विध्या से रहित है। तो वह बिना सुगंध के फूल की भांति शोभा नहीं पाता।
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