चाणक्य नीति 4.16
दयाहीन धर्म को छोड़ दो, विध्या हीन गुरु को छोड़ दो, झगड़ालू और क्रोधी स्त्री को छोड़ दो और स्नेहविहीन बंधु-बान्धवो को छोड़ दो। #😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 4.15
बार-बार अभ्यास न करने से विध्या विष बन जाती है। बिना पचा भोजन विष बन जाता है, दरिद्र के लिए स्वजनों की सभा या साथ और वृद्धो के लिए युवा स्त्री विष के समान होती है। #😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 4.14
बिना पुत्र के घर सुना है। बिना बंधु-बांधवों के दिशाएं सूनी है। मूर्ख का ह्रदय भावों से सूना है। दरिद्रता सबसे सूनी है, अर्थात दरिद्रता का जीवन महाकष्टकारक है। #😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 4.13
पत्नी वही है। जो पवित्र और चतुर है, पतिव्रता है, पत्नी वही है जिस पर पति का प्रेम है, पत्नी वही है जो सदैव सत्य बोलती है। #😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 4.12
तपस्या अकेले में, अध्ययन दो के साथ, गाना तीन के साथ, यात्रा चार के साथ, खेती पांच के साथ और युद्ध बहुत से सहायको के साथ होने पर ही उत्तम होता है। #😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 4.11
राजा लोग एक ही बार बोलते है (आज्ञा देते है), पंडित लोग किसी कर्म के लिए एक ही बार बोलते है (बार-बार श्लोक नहीं पढ़ते), ये दो एक ही बार होने से विशेष महत्व रखते है। #😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 4.10
इस संसार में दुःखो से दग्ध प्राणी को तीन बातों से सुख, शांति प्राप्त हो सकता है। सुपुत्र से, पतिव्रता स्त्री से और सद्संगति से। #😇 चाणक्य नीति