कभी-कभी मैं घंटों खुद के साथ चुपचाप बैठ जाती हूँ। न कोई शोर, न कोई बातचीत, बस मैं और मेरा अकेलापन, मेरी सोचें। पहले यही सन्नाटा भारी लगता था, जैसे दिल के भीतर कोई खाली जगह गूंज रही हो। लेकिन धीरे-धीरे उसी खामोशी ने मुझे अपने करीब ला दिया। अब यह अकेलापन नहीं लगता, बल्कि जैसे खुद से मिलने का एक शांत और मध्यम सा अवसर बन गया है।
इस खामोशी में बैठकर मैंने अपने दिल की वो बातें सुनी हैं, जिन्हें दुनिया के शोर में कभी सुन ही नहीं पाई थी। अपने डर, अपनी थकान, अपने टूटे हुए भरोसे, सबको धीरे-धीरे समझा है। शायद इसी वजह से अब अकेले बैठना, खुद से भागना नहीं लगता, बल्कि खुद को संभालने और समझने की एक ताकत बन गया है।
और कमाल की बात यह है कि अब वही सन्नाटा जो कभी चुभता था, आज सुकून देता है। अब अकेले होने का मतलब खाली होना नहीं, बल्कि खुद से भरा होना लगता है। शायद यही वह पल होता है जब इंसान समझता है कि सबसे सच्चा साथ वही है, जो उसे खुद के भीतर मिलता है।
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