#😮प्रेम बाईसा मौत केस में बड़ा खुलासा🗞️ साध्वी प्रेम बाईसा मामला 👇
जोधपुर में साध्वी प्रेम बाईसा की मौत का मामला अब केवल एक चिकित्सकीय घटना नहीं रहा, बल्कि यह इलाज में लापरवाही, जवाबदेही और सिस्टम की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पुलिस द्वारा अब तक की गई जांच में मौत का कारण कार्डियक अरेस्ट और सांस संबंधी बीमारी बताया गया है, लेकिन साथ ही कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो इस मामले को और अधिक चिंताजनक बनाते हैं।
पुलिस के अनुसार, प्रेम बाईसा पहले से ही अस्थमा और सांस की गंभीर समस्या से पीड़ित थीं। यह तथ्य मेडिकल जांच में सामने आया है। इसके बावजूद, उनकी तबीयत बिगड़ने पर जिस तरह से उपचार किया गया, वह संदेह के घेरे में है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना डॉक्टर की पर्ची के इंजेक्शन क्यों लगाया गया? और जब हालत लगातार बिगड़ रही थी, तो उन्हें समय रहते अस्पताल क्यों नहीं भेजा गया?
शनिवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जोधपुर पुलिस कमिश्नर ओम प्रकाश ने बताया कि एसआईटी जांच में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे प्रथम दृष्टया उपचार में लापरवाही की आशंका स्पष्ट होती है। जांच में यह भी सामने आया कि कंपाउंडर देवी सिंह राजपुरोहित द्वारा बिना किसी वैध डॉक्टर की सलाह के इंजेक्शन लगाया गया। यह अपने आप में एक गंभीर लापरवाही मानी जा सकती है, खासकर तब जब मरीज पहले से श्वसन संबंधी बीमारी से ग्रसित हो।
यह भी सामने आया है कि जब साध्वी की स्थिति बिगड़ती चली गई, तब भी उन्हें किसी बड़े या सक्षम अस्पताल में रेफर नहीं किया गया। सवाल यह उठता है कि क्या समय पर मेडिकल हस्तक्षेप और सही निर्णय उनकी जान बचा सकता था? एसआईटी को इस संबंध में कुछ अहम प्रमाण भी मिले हैं, जो आगे की जांच को निर्णायक दिशा दे सकते हैं।
हालांकि पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि अंतिम मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद ही कानूनी कार्रवाई की दिशा तय की जाएगी। इसका अर्थ यह है कि अभी जांच पूरी नहीं हुई है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब तक सामने आए तथ्य व्यवस्था की लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये की ओर इशारा करते हैं।
यह मामला केवल एक साध्वी की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सच्चाई को उजागर करता है जहां बुनियादी मेडिकल प्रोटोकॉल की अनदेखी जानलेवा साबित हो सकती है। यदि दोष सिद्ध होता है, तो यह आवश्यक है कि जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह एक चेतावनी है—इलाज में लापरवाही भी अपराध है, और जीवन से बढ़कर कुछ नहीं। न्याय तभी सार्थक होगा, जब सच सामने आए और जिम्मेदारी तय हो।