umashankar
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#😂फनी जोक्स🤣
😂फनी जोक्स🤣 - कुछ सालो पहले बीवियाँ अपने पतियों का इंतज़ार किया करती थी कि ~ "ये आएँगे तो फ़िर साथ में खाएँगे इंतज़ार तो आज भी करती हैं पर ये सोचकर कि ~ ये आकर कुछ बनाएँगे तो र्ह कुछ सालो पहले बीवियाँ अपने पतियों का इंतज़ार किया करती थी कि ~ "ये आएँगे तो फ़िर साथ में खाएँगे इंतज़ार तो आज भी करती हैं पर ये सोचकर कि ~ ये आकर कुछ बनाएँगे तो र्ह - ShareChat
#😂फनी जोक्स🤣
😂फनी जोक्स🤣 - कुछ लोग जानबूझ कर मुझे बदनाम करते हैं... १० वी फेल कहने की क्या जरूरत है 9 वी पास भी बोल सकते है ना...!! कुछ लोग जानबूझ कर मुझे बदनाम करते हैं... १० वी फेल कहने की क्या जरूरत है 9 वी पास भी बोल सकते है ना...!! - ShareChat
"खुशियों के रंग..... यार मोहन.....अगर बुरा ना मानो तो एकबात कहूं.... डयूटी पर तैनात सहकर्मी सिक्योरिटी गार्ड राजीव सिक्योरिटी गार्ड मोहन से बोला .... हां बोल ना ....मोहन ने कहा.. देख यार हमदोनों गार्ड की नौकरी करते है साथी है भाइयों जैसा प्यार है हमारे बीच ..... तू दूसरी शादी कयो नहीं कर लेता आराध्या अभी छोटीसी बच्ची है उसका तो सोच ....यार उसे भी एक मां मिल जाएगी और तुझे जीवनसाथी ....ये जिंदगी का सफर अकेले नहीं कटता मेरे दोस्त ..... राजीव..... सच कहूं बहुत कमी खलती है कविता की ..... आजभी लगता है जब घर वापसी जाता हूं वो कहीं से आ जाए बस.....कहकर सुबक पडा..... ऐ.....चुप ना ....जो चला गया उसे तो लौटकर लाना नामुमकिन है मगर जीवन में आगे की ओर बढ मेरे दोस्त.... राजीव.... डरता हूं आगे बढने से ....कहीं आरु की जिंदगी.... यार सौतेली मां ....कहीं मेरे जीवन के सुखद करने के चलते उसकी पूरी जिंदगी ना बरबाद होकर रह जाए..... इसलिए तो उसे उसके नाना नानी के पास छोड रखा है इसलिए तो हर शनिवार डबल डयूटी करता हूं ताकि रविवार को उसके साथ कुछ वक्त बीता सकूं ...ये हमारी बारह घंटे की नौकरी ....अकेले उसे कैसे संभालू यही चिंता रहती थी वरना कौन अपने कलेजे के टुकड़े से दूर रहना चाहता है .... दुनिया की हर सौतेली मां बुरी होती है .....कया ये जरूरी है ....नहीं ना..... वैसे अगर तुम चाहो तो एक लडकी है मेरी नजर मे जो आरु को बिल्कुल सगी मां बनकर उसकी परवरिश करेगी..... मोहन ने बडे गौर से राजीव की ओर देखा ..... हां....सच कह रहा हूं मोहन .....मेरी बहन सुधा ...... देखा है उसको मेरे बच्चों के साथ अपनी ममता लुटाते हुए यकीन मानो वो एक अच्छी मां एक अच्छी पत्नी बनेगी....तेरी तरह वो भी किस्मत की मारी हुई है दोस्त .... बडे अरमानों से शादी की थी अपनी छोटी बहन की बहुत रोया था मे ....मुझे छोटा पापा कहती थी ना .... उसके लिए मे बचपन से अपनी कोई भी खुशी कोई भी कीमती चीज देने से कभी नहीं हिचकिचाया ...... मगर शादी के बाद पता चला उसका पति ....वो उसे नशा करके मारता पीटता था और वो चुपचाप .... कभी बताया तक नहीं सोचती रहती पिता नहीं है तो कहीं मुझपर अपने भाई पर बोझ ना बनकर रह जाए वो....जानती थी ना हम सिक्योरिटी गार्ड की सैलरी के बारे मे .... सैलरी आती बाद मे है और लुट ऐसे जाती हैं कि .....वो तो भला हो उसके साथ वाली आंटीजी का जिन्होंने छुपकर हमें सबकुछ बता दिया वरना वो जिंदगी भर उस हैवान के जुल्मों को सहते रहती और हम समझते वो खुश..... फिर.... फिर कया हुआ ....मोहन ने आश्चर्य से पूछा होना कया था पुलिस कम्पलेंट कर दी .....केस हुआ....वो माफी मांगने लगा सुधा को साथ वापस ले जाने के लिए भी तैयार था मगर जब सुधा की आँखों में उसके लिए वो डर वो नफरत देखी तो मैने साफ मना कर दिया और तलाक दिलवा दिया मुक्ति दिलवा दी उससे अपनी बहन को..... मोहन .....मे अपनी बहन अपनी बेटी को बहुत अच्छे से जानता हूं मेरे दोस्त ....कोई जबरदस्ती नहीं है बस एकबार समय निकालकर उससे मिल ले .... आगे जो तुम्हें अच्छा लगे वहीं करना .....तेरा दोस्त हूं और उसका भाई दोनों को दर्द में देखकर मुझे लगता है तुमदोनो एकदूसरे का मजबूत सहारा बनोगे ......देख मे जानता हूं तुमभी मेरी तरह एक गरीब परिवार से हो..... मोहन ने राजीव की बातें सुनकर गांव में अपने माता पिता से बात की .....और आखिर वो सुधा से मिलने के लिए तैयार हो गया .....सुधा से मिलने पर उसे सुधा एकदम चुपचाप सी रहनेवाली एक सीधी सादी लडकी लगी....आखिर दोनों ने एकदूसरे को पसंद करते हुए शादी का फैसला कर लिया ....और जल्द ही एक सादगी भरे प्रोग्राम में दोनों ने एकदूसरे को अपना जीवनसाथी चुन लिया था ..... शादी के शुरुआती दिनों से मोहन देख रहा था सुधा कभी कोई भी मांग या फरमाइश नहीं करती जो अपनी स्वेच्छा से लेकर आता वहीं बढिया तरीक़े से बना देती घर भी पूर्ण रूप से संवार दिया था जो कविता के जाने के बाद से एक कबाडखाना अधिक लगता था ......मोहन अपनी सैलरी लाकर उसे देकर बोला .....लो ....आजसे तुम जैसे चाहे अपने तरीकों से घर चलाओ..... सुधा ने एकटक मोहन की ओर देखा और कहा .....यदि आप ऐसा चाहते है तो ठीक है ..... अगले दिन मोहन डयूटी से घर लौटने को था कि उसे एक गजरे वाला दिखा...... महीने से अधिक हो गया मगर आजतक सुधा ने मुझसे कुछ उपहार नहीं मांगा ....ना कोई साडी ना जेवर ....ना कहीं घूमने के लिए कहा ....एकदम चुपचाप रहनेवाली सुधा ने मेरी जिंदगी में तो खुशियों के रंग भर दिए मगर मैंने अबतक...... मुझे भी उसे खुशियों का एहसास कराना चाहिए ....यही सोचते हुए मोहन ने एक खूबसूरत गजरा ले लिया ..... घर पहुंचा तो वो हैरान सा रह गया .......घरमे उसके माता पिता और आराध्या के नाना नानी सहित आराध्या हंसते हुए साथ मे बैठे थे .....आप ....मम्मी पापा ....और आप आराध्या ...... इससे पहले मोहन कुछ और बोले आराध्या उछलकर उसकी गोदी में जा चढी .....पापा .....मम्मी ने मुझे बहुत अच्छी सी फ्रांक दी ये देखिए और चाँकलेट भी ...... हां मोहन .....सुधा बिटिया ने ही हमें यहां बुलाया था और तुम्हें बताने से मना किया था वो कया बोलते हैं सपराइस... नानी सपराइस नहीं सरप्राइज..... हा...हां...वहीं ......बेटा सुधा से मिलकर आज ऐसा लगा जैसे ईश्वर ने कविता को रुप बदलकर वापस हमारे पास भेज दिया ....हमें आज फिर से बेटी मिल गई ..... हां मोहन .....सचमुच सुधा बहुत अच्छी लडकी है कहती है मां बाबूजी ....अब आपको गांव वापस नहीं जाने दूंगी मुझे आपकी छाया में ही रहना है भीगी हुई पलकों को पोछते हुए मोहन के माता पिता बोले ..... कहा है ....कहते हुए मोहन दौड़ते हुए रसोईघर में पहुंचा .....और जेब में से गजरा निकालकर सुधा के बालों में लगाते हुए बोला ....सोचा था आज तुम्हें सरप्राइज देकर खुशियों से तुम्हारे जीवन मे रंग भर दूंगा मगर तुमने तो मुझे ही ...... शशशशशशशश......ये खुशियों के रंग हमारे है ....हमारे अपनो से .....है ना.... हां....हां सुधा ....कहकर मोहन ने सुधा को अलिगंन मे बांध लिया वहीं सुधा ने भी स्वयं को मोहन के सीने लगते हुए अपने प्यार को मोहन को समर्पित कर दिया... एक सुंदर रचना... 🙏🙏🙏 #🙏 प्रेरणादायक विचार #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
*एक आदर्श बेटी "निली" !!* 👌👌✍️👌👌 *अरे पापा !! आप अभी तक तैयार नहीं हुए। बैग कहां है आपका ? चलिए मैं पैक करती हूं। पापा ने एक उदास नजर निली पर डाली। निली बेटा !! मैं कहीं नहीं जाऊंगा। ये घर तेरी मां की यादों से भरा हुआ है।निली की ‌आंखे भर आई पापा मां को गये छह महीने हो गए हैं आपकी तबियत भी ठीक नहीं है ऐसे में मैं आपको अकेले नहीं छोड़ सकती।आप मेरे घर चल रहे हैं मेरे साथ। बेटा मैं तेरे घर कैसे रह सकता हूं?* बेटी के घर का तो लोग पानी तक नहीं पीते हैं। फिर वहां तेरे सास ससुर भी हैं ।उन्हें मेरा वहां रहना कैसे अच्छा लग सकता है !!आखिर हूं तो मैं एक बाहरी आदमी। पापा वो लोग ऐसे नहीं हैं वो मेरे साथ कितने अच्छे हैं।निली पापा का हाथ अपने हाथ में लेकर बैठ गई। पिछली बार आपको शुगर का अटैक आया था। कितनी मुश्किल से ठीक... कहते हुए उसकी आंखों में आंसू आ गए। पापा मैं आपकी इकलौती बेटी हूं।आपकी सारी जिम्मेदारी अब मेरी है। बस मैं और कुछ नहीं सुनुंगी। *पापा सोच में डूब गए अनिल (दामाद) जी ने तो एक बार भी नहीं कहा। हां ये जरूर कहा था कि पापा हम आते रहेंगे आपसे मिलने।निली तूने दामाद जी को पूछा ? अरे पापा उनकी और मेरी राय अलग थोडे़ ही है।निली पापा को लेकर अपने घर आ गई। उसके सास-ससुर समधी को देख कर चौंक गए अनिल ने भी पैर छुए और कहा - अच्छा किया पापा जो आप कुछ दिन के लिए यहां आ ग‌ए। पापा रहने तो लगे पर उन्हें लग‌ रहा‌ था कि शायद दामाद और उनके माता-पिता उनके यहां आने से खुश नहीं हैं। एक दिन पापा लॉन में घूम रहे थे कि अचानक उन्हें अनिल की आवाज सुनाई दी।* निली पापा यहां पर कब तक रहेंगे। ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप !! वहां पर उनका है ही कौन‌ और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है। अरे तुम समझ नहीं रही हो हमें तो अपने घर में ही अजीब सा महसूस होने लगा है। हमें किसे? अच्छा मम्मी-पापा जी ने कहा आपसे।अब तुम जो भी समझो। अरे वहां पर उनकी अच्छी व्यवस्था कर सकती हो। पापा और नहीं सुन सके कांपते हुए कदमों से वापस आ ग‌ए। अगले दिन जाने की तैयारी करने लगे। *निली बोली पापा ऐसे कैसे जायेंगे आप। पापा उसे ‌डांटने लगे। निली मेरी फिजूल में चिंता मत करो अपने पति और सास ससुर का ध्यान रखो बेटा मैं अपना ख्याल खुद रख सकता हूं।निली बेटा बहुत दिन हो गए अब जाना चाहिेए मैं अनिल से बात करती हूं। अभी आपकी तबियत ठीक नहीं है। जब आप ठीक हो जाएंगे तो मैं आपको खुद छोड़ आऊंगी। नहीं निली देखो मैं तुमसे नाराज हो जाऊंगा।निली नाश्ता बनाने लगी।* सोच रही थी कि पापा को किसी ने कुछ तो कहा है। नाश्ता करने के बाद उसने कहा - आज पापा जा रहे हैं। वह अपने सास, ससुर और अनिल का चेहरा देख रही थी कि उनके चेहरे पर चमक आ गई थी। तभी उसने कहा कि मैंने एक फैसला किया है कि पापा इतनी बड़ी कोठी में अकेले कैसे रहेंगे। सोच रही हूं कि गरीब बच्चों के लिए उसमें एक छोटा-सा स्कूल खोल दिया जाय। *पापा और मैं मिल कर एक ट्रस्ट बनाएंगे ताकि पापा के बाद भी स्कूल चलता रहे। और पापा आपकी वो जमीन पडी़ है उसे बेच देते हैं दो करोड़ की वैल्यू है उसकी उसे ट्रस्ट के फंड में जमा कर देंगे उसके इंट्रेस्ट से उन गरीब बच्चों की फीस में मदद करेंगे जो कुछ करना चाहते हैं उसमें योगदान देंगे। बाकी आपकी पेंशन और फंड आपके लिए बहुत है। पापा मैं आज से ही इस पर काम शुरू करती हूं। पापा हतप्रभ हो कर उसे देख रहे थे।* अनिल की आंखों के सामने तो अंधेरा छा गया उसके मम्मी पापा का मुंह खुला रह गया। मन ही मन हिसाब करने लगा पांच करोड़ की कोठी दो करोड़ की जमीन और फंड इतना बड़ा नुकसान। जब‌ निली पापा को छोड़कर लौटी तो अनिल उसका इंतजार कर रहा था। ये सब क्या बकवास कर रही थी तुम। निली मुस्कराई और बोली ये बकवास नहीं सच है। ऐसा मैं इसलिए करूंगी कि किसी को भी मेरे पिता की मौत का इंतजार न रहे। *पापा ने मेरी शादी पर ऐसी कौन सी चीज है जो नहीं दी ।अनिल गुस्से से बोला ये तो उनका फर्ज था।फर्ज सिर्फ लड़की के बाप का होता है। क्योंकि उसने लड़की पैदा करने की गलती की है। मैं अपने पापा की इकलौती बेटी हूं। तो क्या मेरा फर्ज नहीं था उनकी देखभाल करने का वो भी ऐसे वक्त में जब उनकी तबीयत ठीक नहीं है। और उन्हें सहारे की जरूरत है।* माफी चाहती हूं कि उनके कुछ दिन यहां रहने से सबको तकलीफ हुई। मैंने कभी तुम्हें तुम्हारे फर्ज निभाने से नहीं रोका। अपने सास ससुर की सेवा में भी कोई कमी नहीं रखी। तुम मुझे मेरे पिता के प्रति मेरा फर्ज निभाने से नहीं रोक सकते। उसकी आवाज में दृढ़ता थी,अनिल खामोश हो कर उसे देख रहा था। *शिक्षा~हर संतान का यह फर्ज रहता है कि वो अपने माँ पिता के साथ-साथ अपने सास ससुर की भी जिम्मेदारिया निभाये।जिससे दो परिवारों का रिश्ता हमेशा अटूट बना रहे।* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बेटे भाग्यशाली के यहाँ जन्म लेते हैं, लेकिन बेटियां सौभाग्यशाली के घर ही जन्म लेतीं है 🙏 आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो। #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ #🙏 प्रेरणादायक विचार
"सहारा...... मम्मी आप यहां...... ऐसे कयुं बैठी है ....चाय बना लाऊं आपके लिए ...... नही कुछ नही सुधा .....बस यूहीं ....नींद नहीं आ रही थी .....सुषमा जी बोली मम्मी .....तबीयत तो ठीक है ना आपकी ....दिखाइए..... बदन को हाथ लगाते हुए सुधा बोली..... ठीक है बहु .....बेकार चिंता मत कर .....अब मुझ बुढिया की उम्र में .....खैर ....जा बिटिया मोहन जाग गया होगा तुम्हें उसके पास जाना चाहिए...... सुधा कुछ परेशान सी होकर पति मोहन के पास पहुंची.... सुनिए .....मोहनजी...... हां.... कया है सुधा ....उठता हूं अभी थोड़ी देर में ...... आप यहां सो रहे है बेफिक्र से वहां मां.... मां....कया हुआ मां को .....कया हुआ ..... मोहनजी पिछले कुछ दिनों से देख रही हूं वह ना तो ठीक से खाती है और ना ठीक से सो पाती है ....अभी भी बालकनी मे बैठी है गुमसुम सी .....मुझे उनकी चिंता हो रही है ......पापा के अचानक चले जाने से शायद वह ..... सुधा .....पापा का अचानक चले जाना हमसब के लिए बडी क्षति पहुंचाने वाला है एक छाया जो अबतक हमें अपने अनुभवों के पतों से बचाती थी अब वो छाया .....कहकर सुबकने लगा..... मोहनजी ....जो चला गया उसे तो वापस हम नही ला सकते मगर जो है उसे भी खोना .....मोहनजी मां का यूं अकेला रहना नींद ना लेना अच्छे से खाना नही खाना ...उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा नही है..... ठीक कहती हो सुधा ....मे आज ब्लकी अभी उन्हें डाक्टर के पास..... मोहनजी .....उनका इलाज डाक्टर के पास नहीं ब्लकी हमारे ही पास है ..... कया मतलब..... हमारे पास.... मोहनजी ....जब बचपन में आप डर जाते थे तो और अकेलेपन से घबराते थे तो आप कया करते थे... मां के पास......ओह......समझ गया ...... हां .....अबसे मां के साथ आप उनके कमरे में रहेंगे .....दिन मे मे और आराध्या उनके आसपास रहेंगे उनसे बातचीत करेंगे वैसे ही आप रात मे उनसे बचपने की बातें वो नादानियों से उनकी डांटने वाली समझाने वाली घटनाओं को स्मरण कराएंगे ...... सुधा ......मे आजरात से मां के पास ही सोऊंगा .... हूं..... यही अच्छा होगा...... रात को मां के कमरे में...... कौन..... कौन है..... मां....मे हूं मोहन..... मोहन......तू यहां ......बेटा काफी रात हो गई है तू सोया नही ....कुछ काम था .... हां.....आज मे आपके पास सोऊंगा यहां..... कया...... मगर बहु ....और आराध्या .....बेटा तुम्हें उनके पास होना चाहिए ..... नही मां...... मां .....कहा ना मे आपके पास सोऊंगा..... कया सुधा से झगडकर आया है .....देख वो बडी प्यारी बच्ची है उससे झगड़ा मत किया कर ....जा अभी ....और मना ले उसे..... नही मां .....ऐसा कुछ नहीं है .....सुधा सचमुच बहुत अच्छी है .....मां याद है बचपन में जब मे डर जाता था तो आपके पास आकर सोता था .... हां....याद है .....कयोंकि तू उसवक्त बच्चा था .....कमजोर था ......डरता था घबराता था .....इसलिए तू मेरे पास आकार लिपटकर सो जाता था..... मां .......जैसे हम बच्चे बचपन में कमजोर घबराकर डरकर अपने बडे मां के आंचल मे बेखौफ होकर सो जाते थे वैसे ही जब बडे बुजुर्ग अकेले में घबराहट महसूस करने लगे तो कया उन बच्चों का जो अब जवान हो चुके हैं उन बुजुर्गों का सहारा नही बनना चाहिए...... मां .....मुझे पता है आप पापा के अचानक चले जाने से अकेला महसूस करने लगी है....... मां ....आप अकेली नही हो ....आपका मजबूत कंधा आपके पास है आपका बेटा ...... मां .....कहकर मोहन एकबारगी फिर से मां से बचपने की तरह लिपट गया ..... दोनों की आँँखे भीगी हुई थी .....कुछ देर मे बेखौफ बेखबर मां सचमुच बडी अच्छी नींद में सो रही थी ..... एक प्ररेणास्त्रोत रचना... #दीप...🙏🙏🙏 #🙏 प्रेरणादायक विचार #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
"पिता का प्यार " वेद प्रकाश दिल्ली जल बोर्ड मे आपरेटर थे तीन दशकों से उनका परिवार सरकारी क्वार्टर मे रहता था। पानी की टंकी के आस पास खाली जगह खूब ज्यादा थी। घर के लिए साग सब्जी से लेकर किराये पर गाड़ियों की पार्किंग से अच्छा पैसा कमा लेते थे। शादी ब्याह और त्यौहारों पर तो कई गुना आमदनी हो जाती थी। उपर वाले की कृपा थी कभी तनख्वाह से खर्च चलाने की जरूरत नही पड़ी थी। चार लडकियों और दो लड़को के साथ ठाट से रहते आये थे। अपनी खुद की गाड़ियां थी जो किराये पर चलती थीं। इन सब सुख सुविधाओं मे एक ही बात जो परेशान करती थी वो थी बेटों की बेरोजगारी। दोनो ने बी टेक की पढ़ाई कर रखी थी पर मनमाफिक तनख्वाह न मिलने के कारण नौकरी छोड़े बैठे थे। कम सैलरी वाली जगह सुविधायें भी नही होती और तान कर काम लिया जाता था बेटे नाजो नख्श मे पले थे। उनहें कष्ट सहने की आदत न थी सो ऐसी जगह से भाग पड़ते थे। वेद ने कई अफसरों से बात चलाई आज के जमाने मे सरकारी नौकरी गेहूं के खेत मे सूई ढूंढने जैसा है। बड़ी मुश्किल से एक जगह बड़े वाले बेटे की बात बनी तो डेढ़ महीने मे ही वह काम छोड़कर भाग आया। कितनी मिन्नतें, कितने मिठाई के डिब्बे और पांच लाख रुपयों का चढ़ावा देना पड़ा था तब कही बात बन पाई थी। अब साहबजादे वापस जाने का नाम ही न ले रहे हैं। काम कौन सा बुरा था, साहब की थोड़ी टहल सिफारिश कर दो। कभी पानी चाय मांग दी तो क्या हो गया आखिर अफसर है पर इनको तो अपनी डिग्री का गुरूर था। बी टेक जो ठहरे। अरे भई जो रोटी ना दिला सके उस डिग्री को रख कर क्या ही करना है। वहां ड्यूटी पर किसी ने ताना मार दिया बीटेक करके भी पानी ही पिला रहा है। अफसर की झाड़ सुन रहा है बस तीर सरीखे लग गई यह बात और जनाब भाग आये। इतना ही नही अफसर की मां बहन को भी अपशब्द कह दिया सो अलग। वो तो पुराना जानकार था सो बख्श दिया वर्ना घर पर पुलिस भी आती। पर अब क्या होगा ये तो निठल्ले यूं ही पड़े रहेंगे। कमाऊ पिता एक ऐसी बरगद की छांव होता है जिसके तले सभी सुस्ताते हैं। कुछ तो वहीं डेरा ही जमाने की जुगत मे रहते हैं। यहां घर मे पड़े पड़े ये निखटटू हो चले थे काम के नाम पर दिन भर बच्चों के साथ कैरम खेल लेते शाम को खाने मे कुछ कम हो तो घर की औरतों पर खीझ निकाल लेते। दिन ब दिन हालात और खराब ही होते जा रहे थे। अब शाम को पिता ने अपने पास बिठाना और समझाने शुरू कर दिया तो इससे बचने के लिए सैर सपाटे पर निकलने लगे। अब बाहर जो गये तो शायद, देखा तो नही पर लोगों की सुनाई बातों के हिसाब से आदत मे भी बिगाड़ आ गया था। खैनी सुरती भी खाने लगे हैं। एक दिन तंग आकर पिता ने सोचा आज फैसला कर ही देते है दिन मे थोड़ी बहुत बातें हुई तो बबलू घर से बाहर निकल कर कही बाहर चला गया। देर रात हो चली थी पर बेटा घर नही आया था। प्रकाश कुछ देर तो गुस्से मे बुरा भला कहते रहे पर जब घड़ी का कांटा 12 को भी पार करने लगा तो हल्की सी चिन्ता होने लगी कही कोई अनहोनी तो नही हो गई। पोता बार बार पूछ रहा था बाबा, पापा कब तक आयेंगे ? कोई जवाब नही अब मन मे आशंकाये उठने लगीं कही कोई बात हो गई हो और कहीं कुछ गलत कदम न उठा ले मन मे अभी यही द्वंद चल रहा था। तभी पत्नी ने अपने मायके के एक लड़के की कहानी बतानी शुरू की कैसे उसने बार बार फेल होने की वजह से अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। अब तो सास बहू दोनो रोने लगी गनीमत थी पोता सोने चला गया था, छोटे बेटे की आंखे भी नम हो चली थीं। रात जब गहराने लगी तो चिंता भी अब निश्चितता का रूप लेने लगी। गुस्से के समंदर मे डूबे पिता को अब आत्मग्लानि सताने लगी। वहीं बिस्तर पर सोये पोते को सहलाते हुए दूर तक सोचती एक गहरी सांस भरी। अपना कुर्ता खूंटी पर से उतारा और दरवाजे के पीछे से सोटा ले उसे खोजने चल पड़े। छोटा बेटा साथ चलने को आगे बढ़ा उसे मना कर दिया। पहले बबलू के दोसतों और परिचितों के यहां पहुंचे कोई खबर मिलती न देख गलियों, चौराहों, पार्कों मंदिर और रेलवे-स्टेशन आदि हर संभावित जगह पर ढूंढा। पूरी रात उस पिता ने जितनी मिन्नतें की उतनी तो उसके जन्म के खातिर नही की थी। थक हार कर थाने पहुंचे और गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवायी हारे मन से घर लौटे तो रात काफी बीत चुकी थी पर अंधेरा अभी भी था। वहीं घर की ड्योढी पर पहुंचे ही थे की अनमने ढंग से वहीं बाहर ही बैठ गये। घर वालों को क्या जवाब देंगे आखिर आज क्या गलत कह दिया था। बाप हूं क्या इतना भी नही कह सकता कि कोई काम कर ले। मन मे यही सब कुछ चल रहा था। जाने कब बूढ़े शरीर को नीद ने अपने आगोश मे ले लिया और सपने मे देखने लगे कैसे बबलू जब पैदा हुआ था। उसकी दादी ने पूरे गांव मे सत्यनारायण का प्रसाद बंटवाया था। सब कितने खुश थे घर का चिराग था। हाय रे भगवान! अब क्या करूं यही सोच कर रोने लगे। आंसू बहते जा रहे हैं अचानक ऐसा लगा जैसे बबलू सामने खड़ा होकर पुकार रहा है "बाबू जी, ओ बाबू जी। उनीदीं आंखे खोली तो बिखरे बाल गंदे कपड़ो में बबलू खड़ा था। आंखे मींच मींच कर देखा तो वही खड़ा है। वेद ने न आव देखा न ताव खींच कर दो झापड़ लगाये बबलू कुछ समझ पाता इससे पहले उसे बांहो मे जकड़ कर सीने पे खींच लिया जैसे कहीं भागा जा रहा हो। बेटे को अपने पिता की आंखो मे गुस्से की जगह एक डर देख कर बड़ा अजीब सा लगा वह चुप उनसे चिपटा रहा। यह शोर शराबा सुनकर थोडी ही देर मे घर के सभी लोग दौड़कर आ गये बबलू को देखकर सभी हर्षित थे। सास बहू फिर रोने लगी छोटा बेटा भी फफक़ कर रो रहा था। बबलू ने घबराकर पिता के हाथ मे सात सौ रूपये रख दिए और पूरा वाक्या बताया। उस रात उसने शहर की मंडी मे पल्लेदारी की थी और उसी कमाई को पिता को देकर बोला "बाबू जी आप ही कहते थे न काम कोई छोटा नही होता सो आज मैने खुद को आजमाया। अब आप बताइये कैसा किया मैने? पिता ने बेटे को गले से लगाकर पीठ पर हल्की धौल जमाई। बाप बेटे दोनो की आंखे नम थीं पिता अपनी अप्रत्याशित जीत पर बहुत खुश था आज बेटा वास्तव मे लौट आया था। #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ #🙏 प्रेरणादायक विचार
दुल्हन ने विदाई के वक़्त शादी को किया नामंजूर❗ (कहानी आपको सोचने पर विवश करेगी।) शादी के बाद विदाई का समय था, नेहा अपनी माँ से मिलने के बाद अपने पिता से लिपट कर रो रही थीं। वहाँ मौजूद सब लोगों की आंखें नम थीं। नेहा ने घूँघट निकाला हुआ था, वह अपनी छोटी बहन के साथ सजाई गयी गाड़ी के नज़दीक आ गयी थी। दूल्हा अविनाश अपने खास मित्र विकास के साथ बातें कर रहा था। विकास -'यार अविनाश... सबसे पहले घर पहुंचते ही होटल अमृतबाग चलकर बढ़िया खाना खाएंगे... यहाँ तेरी ससुराल में खाने का मज़ा नहीं आया।' तभी पास में खड़ा अविनाश का छोटा भाई राकेश बोला -'हा यार..पनीर कुछ ठीक नहीं था...और रस मलाई में रस ही नहीं था।' और वह ही ही ही कर जोर जोर से हंसने लगा। अविनाश भी पीछे नही रहा -'अरे हम लोग अमृतबाग चलेंगे, जो खाना है खा लेना... मुझे भी यहाँ खाने में मज़ा नहीं आया..रोटियां भी गर्म नहीं थी...।' अपने पति के मुँह से यह शब्द सुनते ही नेहा जो घूँघट में गाड़ी में बैठने ही जा रही थी, वापस मुड़ी, गाड़ी की फाटक को जोर से बन्द किया... घूँघट हटा कर अपने पापा के पास पहुंची...। अपने पापा का हाथ अपने हाथ में लिया..'मैं ससुराल नहीं जा रही पिताजी... मुझे यह शादी मंजूर नहीं।' यह शब्द उसने इतनी जोर से कहे कि सब लोग हक्के बक्के रह गए...सब नज़दीक आ गए। नेहा के ससुराल वालों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा... मामला क्या था यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। तभी नेहा के ससुर राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा से पूछा -- 'लेकिन बात क्या है बहू? शादी हो गयी है...विदाई का समय है अचानक क्या हुआ कि तुम शादी को नामंजूर कर रही हो?' अविनाश की तो मानो दुनिया लूटने जा रही थी...वह भी नेहा के पास आ गया, अविनाश के दोस्त भी। सब लोग जानना चाहते थे कि आखिर एन वक़्त पर क्या हुआ कि दुल्हन ससुराल जाने से मना कर रही है। नेहा ने अपने पिता दयाशंकरजी का हाथ पकड़ रखा था... नेहा ने अपने ससुर से कहा -'बाबूजी मेरे माता पिता ने अपने सपनों को मारकर हम बहनों को पढ़ाया लिखाया व काबिल बनाया है। आप जानते है एक बाप केलिए बेटी क्या मायने रखती है?? आप व आपका बेटा नहीं जान सकते क्योंकि आपके कोई बेटी नहीं है।' नेहा रोती हुई बोले जा रही थी- 'आप जानते है मेरी शादी केलिए व शादी में बारातियों की आवाभगत में कोई कमी न रह जाये इसलिए मेरे पिताजी पिछले एक साल से रात को 2-3 बजे तक जागकर मेरी माँ के साथ योजना बनाते थे... खाने में क्या बनेगा...रसोइया कौन होगा...पिछले एक साल में मेरी माँ ने नई साड़ी नही खरीदी क्योकि मेरी शादी में कमी न रह जाये... दुनिया को दिखाने केलिए अपनी बहन की साड़ी पहन कर मेरी माँ खड़ी है... मेरे पिता की इस डेढ़ सौ रुपये की नई शर्ट के पीछे बनियान में सौ छेद है.... मेरे माता पिता ने कितने सपनों को मारा होगा...न अच्छा खाया न अच्छा पीया... बस एक ही ख्वाहिश थी कि मेरी शादी में कोई कमी न रह जाये...आपके पुत्र को रोटी ठंडी लगी!!! उनके दोस्तों को पनीर में गड़बड़ लगी व मेरे देवर को रस मलाई में रस नहीं मिला...इनका खिलखिलाकर हँसना मेरे पिता के अभिमान को ठेस पहुंचाने के समान है...। नेहा हांफ रही थी...।' नेहा के पिता ने रोते हुए कहा -'लेकिन बेटी इतनी छोटी सी बात..।' नेहा ने उनकी बात बीच मे काटी -'यह छोटी सी बात नहीं है पिताजी...मेरे पति को मेरे पिता की इज्जत नहीं... रोटी क्या आपने बनाई! रस मलाई ... पनीर यह सब केटर्स का काम है... आपने दिल खोलकर व हैसियत से बढ़कर खर्च किया है, कुछ कमी रही तो वह केटर्स की तरफ से... आप तो अपने दिल का टुकड़ा अपनी गुड़िया रानी को विदा कर रहे है??? आप कितनी रात रोयेंगे क्या मुझे पता नहीं... माँ कभी मेरे बिना घर से बाहर नही निकली... कल से वह बाज़ार अकेली जाएगी... जा पाएगी? जो लोग पत्नी या बहू लेने आये है वह खाने में कमियां निकाल रहे... मुझमे कोई कमी आपने नहीं रखी, यह बात इनकी समझ में नही आई??' दयाशंकर जी ने नेहा के सर पर हाथ फिराया - 'अरे पगली... बात का बतंगड़ बना रही है... मुझे तुझ पर गर्व है कि तू मेरी बेटी है लेकिन बेटा इन्हें माफ कर दे.... तुझे मेरी कसम, शांत हो जा।' तभी अविनाश ने आकर दयाशंकर जी के हाथ पकड़ लिए -'मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी...मुझसे गलती हो गयी...मैं ...मैं।' उसका गला बैठ गया था..रो पड़ा था वह। तभी राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा के सर पर हाथ रखा -'मैं तो बहू लेने आया था लेकिन ईश्वर बहुत कृपालु है उसने मुझे बेटी दे दी... व बेटी की अहमियत भी समझा दी... मुझे ईश्वर ने बेटी नहीं दी शायद इसलिए कि तेरे जैसी बेटी मेरी नसीब में थी...अब बेटी इन नालायकों को माफ कर दें... मैं हाथ जोड़ता हूँ तेरे सामने... मेरी बेटी नेहा मुझे लौटा दे।' और दयाशंकर जी ने सचमुच हाथ जोड़ दिए थे व नेहा के सामने सर झुका दिया। नेहा ने अपने ससुर के हाथ पकड़ लिए...'बाबूजी।' राधेश्यामजी ने कहा - 'बाबूजी नहीं..पिताजी।' नेहा भी भावुक होकर राधेश्याम जी से लिपट गयी थी। दयाशंकर जी ऐसी बेटी पाकर गौरव की अनुभूति कर रहे थे। नेहा अब राजी खुशी अपने ससुराल रवाना हो गयी थीं... पीछे छोड़ गयी थी आंसुओं से भीगी अपने माँ पिताजी की आंखें, अपने पिता का वह आँगन जिस पर कल तक वह चहकती थी.. आज से इस आँगन की चिड़िया उड़ गई थी किसी दूर प्रदेश में.. और किसी पेड़ पर अपना घरौंदा बनाएगी। यह कहानी लिखते वक्त मैं उस मूर्ख व्यक्ति के बारे में सोच रहा था जिसने बेटी को सर्वप्रथम 'पराया धन' की संज्ञा दी होगी। बेटी माँ बाप का अभिमान व अनमोल धन होता है, पराया धन नहीं। कभी हम शादी में जाये तो ध्यान रखें कि पनीर की सब्ज़ी बनाने में एक पिता ने कितना कुछ खोया होगा व कितना खोएगा... अपना आँगन उजाड़ कर दूसरे के आंगन को महकाना कोई छोटी बात नहीं। खाने में कमियां न निकाले... । बेटी की शादी में बनने वाले पनीर, रोटी या रसमलाई पकने में उतना समय लगता है जितनी लड़की की उम्र होती है। यह भोजन सिर्फ भोजन नहीं, पिता के अरमान व जीवन का सपना होता है। बेटी की शादी में बनने वाले पकवानों में स्वाद कही सपनों के कुचलने के बाद आता है व उन्हें पकने में सालों लगते है, बेटी की शादी में खाने की कद्र करें। अगर उपर्युक्त बातें आपको अच्छी लगे तो कृपया दूसरों से भी साझा करें.... एक कदम बेटियों के सम्मान के खातिर।।🙏💐 #🙏 प्रेरणादायक विचार #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
●●सम्मान निधि●● ========= माँ, तुम भी न ...यह क्या पिताजी की जरा सी 12000 रुपये की पेंशन के लिए इतना माथापच्ची कर रही हो, अरे इससे ज़्यादा तो हम तनख्वाह पेमेंट में एक कर्मचारी को दे देतें हैं.. मोहित ने चिढ़कर अपनी माँ के साथ स्टेट बैंक की लंबी कतार में लगने की बजाय माँ को घर वापस घर पर ले जाने के लिए आग्रह करने लगा। वैसे मोहित ने सच ही कहा था, करोड़ों का बिजनेस था उनका, लाखों रुपये तो साल भर में यूँ ही तनख्वाह और भत्ते के नाम पर कर्मचारियों पर निकल जाते हैं, फ़िर मात्र 12000 रुपये प्रतिमाह की पेंशन पाने के लिये, स्टेट बैंक की लम्बी कतार में खड़े होकर पेंशन की औपचारिकता पूर्ण करने के लिये इतना समय व्यर्थ करने का क्या औचित्य ?? मोहित के पिता विशम्भरनाथ जी का निधन पिछले माह ही बीमारी की वजह से हुआ था, वह लगभग 12 वर्ष पूर्व एक सरकारी स्कूल में प्राध्यापक पद से रिटायर हुये थे , तब से उनके नाम पर पेंशन आया करती थी, विशम्भर नाथ जी मृत्यु के उपरांत आधी पेंशन उनकी पत्नी सरला जी को मिलने का शासकीय योजना के अनुसार प्रावधान था, जिसके लिये सरला जी आज स्टेट बैंक में अपने बेटे मोहित के साथ जाकर पेंशन की औपचारिकता पूर्ण करने आई हुई थी। ★ उस दिन मोहित के बेटे कुशाग्र का आठवां जन्मदिन था, उसने अपनी दादी से साइकिल की फ़रमाइश की थी, सरला के खुद के बैंक अकाऊंट में पैसे नाममात्र के ही बचे थे, उनकी पेंशन अभी शुरू नहीं हुई थी..इसलिए उन्होंने मोहित से 10000 हज़ार रुपये माँगें... मोहित अपने ऑफिस जाने की तैयारी में व्यस्त था, उसने अचानक माँ के द्वारा दस हज़ार रुपये की माँग पर थोड़ा अचरज़ से देखा, फिर अपनी पत्नी श्रेया को माँ को दस हज़ार रुपये देने को कहकर चला गया। श्रेया ने एक दो बार माँगने पर अपनी सास को दस हजार रुपये देते हुये कहा, "पता नहीं आजकल बहुत मंदी चल रही है, थोड़ा हाँथ सम्हालकर खर्च करना... " हलांकि शाम को जब सरला ने उन पैसों से कुशाग्र की साइकिल खरीदी, तो घर का माहौल पूर्ववत हँसी मज़ाक का हो गया। अगले हफ्ते मोहित की बड़ी बहन दो दिन के लिए मायके आई थी, जब तक विशम्भरनाथ जी जीवित थे, सरला को कभी पैसे के लिये किसी से पूछना नही पड़ता, वह खुद ही अपनी पेंशन से एक रकम निकाल कर सरला को दे देते थे, मग़र आज बेटी की विदाई के लिए सरला को बहु से पैसे माँगते समय उसके शब्द "पता नहीं आजकल बहुत मंदी चल रही है, थोड़ा हाँथ सम्हालकर खर्च करना..." याद आ गये और बहुत दुःखी मन से बेटी को बिना कुछ दिये ही विदा करने लगी, तब बहु ने खुद आकर सरला के हाथ में 2000 रुपये पकड़ाकर कहा, बेटी को खाली हाथ विदा करेंगी क्या? सरला ने महसूस कर लिया था कि बहु की बात में अपनापन कम उलाहना ज्यादा है। ★★ ऐसा नहीं था कि सरला के जीवन में पैसे का आभाव आ गया हो, उसके इलाज़ के लिए, दवा के लिये, मोबाइल रिचार्ज करना, छोटी मोटी जरूरतों के लिए तो मोहित बिना कुछ कहे ही पैसा लाकर दे देता था, परन्तु इसके इतर सरला को जो भी खर्च करना होता जैसे किसी मंदिर में दान करना, नौकरों को उनकी जरूरत या त्योहार पर पैसा देना या अपने रिश्तेदारों के आने पर उपहार देना जैसे छोटी मोटी जरूरतों के लिए उसे मोहित या बहु से पैसा माँगना स्वाभिमान को चोट करता था। अभी दो दिन पहले सरला की बहन आई हुई थी, बहन की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, इसलिए वह सरला से कुछ आर्थिक सहयोग की अपेक्षा कर रही थी, मग़र खुद सरला को छोटे-छोटे खर्चो के लिए बहु की तरफ मुँह देखते देखकर उसने अपनी बहन से कुछ न कहा। आज जैसे ही उसके मोबाईल पर पहली बार स्टेट बैंक का SMS आया, सरला ने आश्चर्य से मैसेज खोलकर देखा, पिछले छः महीने की पेंशन 72000 रुपये उसके अकाउंट में क्रेडिट होने का मैसेज था वह। सरला नज़दीक के ATM से 10000 रुपये निकालकर जब सरला घर आ रही थी, उसके आत्मविश्वास और कदमों की चाल ही बता रही थी कि पेंशन को "सम्मान निधि" क्यों कहतें हैं। अपने करोड़पति बेटे की करोड़ों की दौलत से ज्यादा वजन सरला को अपने पति की पेंशन से मिले 12000 रुपयों में लग रहा था। =================== #🙏 प्रेरणादायक विचार #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
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😂फनी जोक्स🤣 - *पुरूष बड़े भोले होते हैं.... *कोई भी लड़की बस प्यार से देखभर ले* *নী * *्यहा तक भूल जाते हैं की घर परीएकँ बीवी और* *दो बच्चे भी हें *पुरूष बड़े भोले होते हैं.... *कोई भी लड़की बस प्यार से देखभर ले* *নী * *्यहा तक भूल जाते हैं की घर परीएकँ बीवी और* *दो बच्चे भी हें - ShareChat