#ओड़िसा के ST अनुसूचित जनजाति इलाके मल्लीपासी गाँव में रहने वाला जीतू मुंडा किसी के लिए हीरो नहीं है।
न उसके पास बड़े-बड़े सपने हैं, न चमचमाते शब्द।
उसके पास बस एक बहन थी — कलारा मुंडा।
जो अब नहीं है।
दो महीने पहले कलारा की मौत हुई।
बैंक में उसके नाम पर महज़ 19,300 रुपए थे।
जीतू उन पैसों को निकालना चाहता था। बहन के नाम पर मिले वो रुपए — शायद उसकी याद में, या फिर घर चलाने के लिए।
लेकिन जीतू अनपढ़ है।
हस्ताक्षर भी नहीं कर सकता। बैंक वालों के सामने बस एक फरियाद लेकर खड़ा होता —
बहन मर गई है। पैसे दे दो।
बैंक कर्मचारी का जवाब था —
“जिसके नाम पर खाता है, वही आएगा, हस्ताक्षर करेगा, तभी पैसे मिलेंगे।
जीतू हर बार कहता — “मर गई वो।
लेकिन कानों तक आवाज़ पहुँची ही नहीं।
नियम की दीवार के आगे एक मर चुकी बहन का रोना हवा थी।
दो महीने बीत गए।
गाँव वालों ने उसे पागल कहना शुरू कर दिया। बैंक वाले झुँझला उठे।
एक दिन जीतू के दिमाग़ में कुछ टूट गया —
या शायद एक आखिरी समझ आई:
अब बहन का कंकाल ही बता सकता है कि वो मर चुकी है…
उसने अपनी मृत बहन को ज़मीन से निकाला।
वो कंकाल — दो महीने पहले की ममता और यादों का ढाँचा — उठाया, और सीधे बैंक पहुँच गया।
वहाँ हंगामा मच गया।
बैंक के लोग घबरा गए।
किसी ने पुलिस बुला ली।
लोगों की भीड़ जमा हुई — हँसने वाले थे, सहमने वाले थे, मज़ाक उड़ाने वाले थे।
और जीतू?
वो चुपचाप खड़ा था, एक कंकाल थामे —
जैसे पूछ रहा हो:
अब मानोगे कि मेरी बहन मर चुकी है.....??
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