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. चुणक ऋषि
एक चुणक नाम का ऋषि ज्ञानी आत्मा था। उसने ओम् नाम का जाप तथा हठयोग हजारों वर्ष किया। जिससे उसमें सिद्धियाँ आ गई। ब्रह्म की साधना करने से जन्म मृत्यु, स्वर्ग नरक का चक्र सदा बना रहेगा क्योंकि गीता अध्याय 2 श्लोक 12 गीता अध्याय 4 श्लोक 5 गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि अर्जुन! तेरे और मेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। तू, मैं तथा ये सर्व राजा लोग पहले भी जन्में थे, आगे भी जन्मेंगे। यह न सोच कि हम सब अब ही जन्में हैं। मेरी उत्पत्ति को महर्षिजन तथा ये देवता नहीं जानते क्योंकि ये सब मेरे से उत्पन्न हुए हैं।
इससे स्वसिद्ध है कि जब गीता ज्ञान दाता ब्र्रह्म भी जन्मता मरता है तो इसके पुजारी अमर कैसे हो सकते हैं? इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्म की उपासना से वह मोक्ष नहीं हो सकता जो गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में तथा अध्याय15 श्लोक4 में कहा है। इन श्लोकों में गीता ज्ञानदाता ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि हे भारत! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर परम अक्षर ब्रह्म की शरण में जा। उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परमशान्ति को तथा सनातन परमधाम अर्थात् सत्यलोक को प्राप्त होगा। तत्वज्ञान समझकर उसके पश्चात् परमात्मा के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते।
चुणक ऋषि ने ऊँ नाम का जाप तथा हठ योग किया। वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद में बताई भक्ति से परमात्मा प्राप्ति नहीं होती। इसका प्रमाण गीता अध्याय 11 श्लोक 47,48 में है। गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने बताया है कि हे अर्जुन! मुझ काल ब्रह्म का यह विराट रूप है। मेरे इस रूप के दर्शन तेरे अतिरिक्त पहले किसी को नहीं हुए, मैंने तेरे ऊपर अनुग्रह करके यह रूप दिखाया है। मेरे इस रूप के दर्शन अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति न तो वेदों में वर्णित विधि से अर्थात् ऊँ नाम के जाप से, न तप से, न हवन आदि-आदि यज्ञों से होते हैं अर्थात् वेदों में वर्णित विधि से ब्रह्म प्राप्ति नहीं होती।
यही कारण रहा कि चुणक जैसे ऋषि भी ब्रह्म को निराकार कहते रहे। चुणक ऋषि में सिद्धियाँ आ गई। जिस कारण से संसार में प्रसिद्ध हो गया। सिद्धि प्राप्त साधक अपनी वर्षों की साधना से की गई चार्ज बैट्री से किसी को श्राप देकर अपनी भक्ति का नाश करते हैं, किसी को आशीर्वाद देकर अपनी भक्ति का नाश करते हैं। किसी पर सिद्धि से ज-मन्त्र करके अपनी भक्ति का नाश करते हैं तथा संसार में प्रशंसा के पात्र बनकर स्वयं प्रभु बन बैठते हैं।
एक मानधाता चक्रवर्ती राजा था। उसका पूरी पृथ्वी पर राज्य था। उसने अपने राज्य में यह जाँचना चाहा कि क्या पृथ्वी के अन्य राजा जो मेरे आधीन हैं क्या उनमें से कोई स्वतन्त्र होना चाहता है? इसलिए राजा ने अपने निजी घोड़े के गले में एक पत्र लिखकर बाँध दिया कि जिस किसी राजा को मानधाता राजा की पराधीनता स्वीकार न हो, वह इस घोड़े को पकड़ ले और युद्ध के लिए तैयार हो जाए, राजा के पास 72 अक्षौणी सेना है। उस घोड़े के साथ सैंकड़ों सैनिक भी चले। सारी पृथ्वी पर चक्कर लगाया। किसी राजा ने उस घोड़े को नहीं पकड़ा। इससे स्पष्ट हो गया कि पूरी पृथ्वी के छोटे राजा अपने चक्रवर्ती शासक मानधाता के आधीन हैं।
सर्व सैनिक जो घोड़े के साथ थे, खुशी से वापिस आ रहे थे। रास्ते में ऋषि चुणक की कुटिया थी। चुणक ऋषि ने सैनिकों से पूछा जो घोड़ों पर सवार थे कि हे सैनिको! कहाँ गए थे? इस घोड़े का सवार कहाँ गया? सैनिकों ने ऋषि जी को सर्व बात बताई। ऋषि ने कहा क्या किसी ने राजा मानधाता का युद्ध नहीं कारा? सैनिक बोले कि है किसी की बाजुओं में दम, पिलाया है किसी माता ने दूध जो हमारे राजा के साथ युद्ध कर ले। राजा के पास 72 अक्षौणी अर्थात् 72 करोड़ सेना है। जॉड़ तोड़ देंगे यदि किसी ने युद्ध करने की हिम्मत की तो।
ऋषि चुणक जो काल ब्रह्म का पुजारी था ने कहा कि हे सैनिको! आपके राजा का युद्ध मैंने स्वीकार कर लिया, यह घोड़ा बाँध दो मेरी कुटिया वाले वृक्ष से। सैनिक बोले कि हे कंगले! तेरे पास दाने तो खाने को नहीं हैं, क्या युद्ध करेगा तू राजा मानधाता के साथ? अपनी भक्ति कर ले, क्यों श्यात् बोल दे रही है तेरी अर्थात् तेरी क्यां सामत आई है? ऋषि ने कहा, जो होगा सो देखा जाएगा। जाओ, कह दो तुम्हारे राजा को कि तुम्हारा युद्ध चुणक ऋषि ने स्वीकार कर लिया है। राजा को पता चला तो सोचा कि आज एक कंगाल सिरफिरे ऋषि की हिम्मत हुई है, कल कोई अन्य हिम्मत करेगा। बुराई को प्रारम्भ में ही समाप्त कर देना चाहिए।
जनता को भयभीत करने के लिए एक व्यक्ति को मारने के लिए राजा ने 72 करोड़ सेना की चार टुकडि़याँ बनाई। एक टुकड़ी 18 करोड़ सैनिक पहले भेजे ऋषि से युद्ध करने के लिए। काल ब्रह्म के पुजारी चुणक ऋषि ने सिद्धि शक्ति से चार पुतलियाँ बनाई अर्थात् चार परमाणु बम्ब तैयार किए। एक पुतली छोड़ी, उसने 18 करोड़ सेना को काट डाला। राजा ने दूसरी टुकड़ी भेजी। ऋषि ने दूसरी पुतली छोड़ी। इस प्रकार राजा मानधाता की 72 क्षौणी सेना का नाश काल ब्रह्म के पुजारी चुणक ने कर दिया।
ऋषि-महर्षियों को राजाओं के बीच में टाँग नहीं अड़ानी चाहिए। कारण यह है कि ऋषिजनों ने हजारों वर्ष नाम का जाप किया परमात्मा प्राप्ति के लिए। परमात्मा मिला नहीं क्योंकि गीता अध्याय 11 श्लोक 47,48 में लिखा है कि चारों वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद मे वर्णित भक्ति विधि से ब्रह्म प्राप्ति नहीं है। इसलिए इससे ऋषियों में सिद्धियाँ प्रकट जाती हैं। अज्ञानता के कारण उसी भूल-भूलइया को ये भक्ति की उपलब्धि मान बैठे। जिस कारण से भक्ति करके भी उस पद को नहीं प्राप्त कर सके, जहाँ जाने के पश्चात् पुनः जन्म नहीं होता क्योंकि इनको तत्वदर्शी सन्त नहीं मिले।
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👆👆राजस्थान के संत हरिसागर को कबीर परमात्मा मिले थे, और उनको नाम उपदेश दिया था......
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, #गर्भावस्था
कबीर, वो दिन याद कर, पग ऊपर तले शीश।
मृत मंडल में आय कर, भूल गया जगदीश।।
कबीर साहिब जी कहते हैं कि जब इंसान मा के गर्भ मे होता है तब वहा पर जठरअग्नि की तपत, बदबू, शीलन जलन, आदि समस्या से ग्रस्त प्राणी परमात्मा से भजन करता है कि मुझे एक बार मा के गर्भ से बाहर निकल दो फिर मै आपका भजन करूगा। बाहर आते ही जीव पांच महाविकार मे उलझ जाता है। परमात्मा को याद नही रखता।
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा,रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा..............................!
नाभ कमल में नीर जमया तेरा, दिन्या महल बनाय............!
नीचै जठरा अग्नि जले थी,तेरे लगी न ताती बाय..............!
निचे शीश चरण ऊपर कू, वो दिन याद कराय.................!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा, रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
नैन नाक मुख दुवारा देहि, यो नक्षक साज बनाय..............!
दाँत नही जबदूध दिया था,अमीमहारस खाया भरया उदर तेरा!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा, रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा,रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
दाई आई रे घूंटी प्याई, माता गोद खिलाय......................!
बाहर आया भ्रम भुलाया, तेरे बाजे तुर शहनाय................!
तुंही तुंही तो छोड़ दिया, इब चल्या अधम किस राह...........!
जो दिन आज सो काल नही रे, आगे फिर धर्मराय............!
कहा गया डर तेरा, ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा टेक..!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा, रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
काले काग गए घर अपने, ये बैठे श्वेत बुगाय...................!
जाड़ दाँत तेरे उखड गई या, जीभ गयी ततुलाय...............!
जम किंकर तेरे सिराणे रे बैठाया, यो खर्च कदे का खाय.....!
रसना बीच जो मेख मार दे, फिर सेनो दाम बताय.............!
ऎसे सुम भतेरे जगत में, धरया ढक्या रह जाय.................!
कहा गया जर तेरा,ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा........!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा, रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
कुल के लोग जंगल में लेज्या कै, तू दिन्या ठोक जलाय......!
फिर पीछे तो पशुआ कीजे, दीजे बैल बनाय...................!
चार पहर जंगल में डोले, तेरा तो न उदर भरै...................!
सिर पर सिंग दिए मन बहुरे, एक दुम ते मछर मत उड़ाय.....!
काँधे जुआ रे जोते कुआँ, कोन्दो का भुस खाय................!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा,रोव था भजन करूँगा हर तेरा.!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
जब थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा..............................!
रोव था भजन करूँगा हर तेरा....................................!
फिर पीछे तू खर कीजे गा, कितै कुरडी चरने जाय.............!
टूटी कमर पजावै रे चढ़ै, तेरा काग माँस गीलावै................!
कहा गया घर वासा तेरा, आटि थी भजन करूंगा हर तेरा....!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा,रोव था भजन करूँगा हर तेरा!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
सुखदेव न चौरासी रे भुगती, कहा रंक कहा राय..............!
ऐसी माया राम बली की, ये नारद मुनि भरमाय...............!
ध्रुव प्रहलाद कबीर नाम दे, रहे निशान घुराय..................!
दास गरीब चरण का चेरा, शब्द् शब्द समाय,
अमरापुर होया डेरा.................................................!
थे उपर न पैर तलै नै सिर तेरा,रोव था भजन करूँगा हर तेरा.!
ओटी थी के भजन करूँगा हर तेरा...............................!
भाई वो दिन करले याद गर्भ में था डेरा...........................!
रोवै था के भजन करूँगा हर तेरा..................................!
जब मां के पेट मे थे, वहां भी हमारी देखभाल उसी कबीर साहब ने की। कोई मां बाप वहां भोजन नही कराने आता था। वहां तो बडी बडी कसमें खा लेते थे भगवान मुझे इस कैद से बाहर करो मै आपकी भक्ति करूंगा। राम जी कृष्ण जी भी इसी गर्भ से आये है स्वयंभू तो सिर्फ एक कबीर साहब है जो सशरीर आते है और सशरीर जाते है। जिसका वेद भी गुणगान करते है और कुरान, गुरू ग्रन्थ साहेब भी, हम ने पहचाना अब आपको बता रहे है।
कहीं कल मर के धर्मराज को यह ना कहो हमे तो कबीर साहब का ज्ञान बताने वाला कोई मिला नही। वहा सब हिसाब किताब देना पडेगा।
अपराधों को आधार बनाकर, कर्म समझ कर करते है
पापी को ऊपर ले जाकर, यमराज पकौड़े तलते है।।
जन्म से लेकर मृत्यु तक, पलपल का न्याय भी करते है
सुना है ऊपर ले जाकर, यमराज पकौड़े तलते हैं।।
देखा है मैंने माँ को भी,आलू में बेसन का लपटाना,
तेल गरम करके बर्तन में, लाल पकौड़े तल जाना।।
छीटा जरा भी पड़े तेल का, हाय फफोले पड़ते है,
सुना है ऊपर ले जाकर, यमराज पकौड़े तलते है।।
लिया हाथ में कलम औ पत्री, अपना एक हिसाब किया,
खण्ड बाँट कर पापपुण्य का,कर्मो पे गहन विचार किया।
पुण्य तो याद रहे न इक भी, पापों को मैंने स्वीकार किया,
स्मरण शक्ति पर जोर डालकर, लेखाजोखा तैयार किया।।
कटु वचन कहे किस से, कितनो से मैंने दुर्व्यवहार किया,
बाल्यकाल की माया में, छोटों पर है अनुचित वार किया।
भय ग्रसित ह्रदय अब डरता है, प्रतिकार नही ये करता है,
चूक से चीटी कुचली न जाये, ये कदम फूंक कर रखता है
सतगुरू जी दिया नाममन्त्र, घन्टो जुबां पर लाता था।
जो पाप हुए वो माफ़ करो, हर वाक्य यही दोहराता हूँ।।
पल दो पल बीते कुछ पल में, निद्रा ने मुझको घेर लिया,
शिथिल पड़े ललाट पटल पर,स्वप्नों ने फिर आखेट किया
यमराज थे कोई और थे, उज्जवल सी थी उनकी काया।
मैं सिर पर पाँव राखा, बोला, भागो! दंडाधिकारी आया।।
वो रोकें और मुझे बोले, क्यों भय तेरे मुख पे है छाया।
दण्ड से क्यों तू डरती है, अभी तेरा वक्त नही आया।।
लेखाजोखा कर्ता में सबका, मैं ही पुर्ण ब्रह्म सुन प्यारा हूँ
दण्ड कभी देता नही मैं, मैं तो केवल तारणहारा हूँ।।
सीर नीचे किये करजोड़ खड़ा,सतगुरू को प्रणाम किया।
नीचसी युक्ति सूझी मुझको,मेरी मूड़ अक्ल ने काम किया।
हे गुरू! एक है बिनती मेरी, काट दीजिये मेरे सारे पाप।
ऐसा लेखा लिखिए मेरा, पुण्य बढ़ जाएँ अपने आप।।
जोखिम इसमें है बहुतेरे, पर हो सके तो थोड़ी दया दे दो।
मन भाप मेरा सतगुरू कहे, ये अक्ल कहा से लातो हो।
उलटी सीधी तिकड़म करता, फिर दण्ड से क्यों घबराते हो।
धन दौलत का मुझे मोह नही,मैं न्याय सदैव ही करवाता हूँ।
सिर्फ तेरे पाप और पुण्य नही, ब्रम्हांड का करता धर्ता हूँ।
कहा सुना सब बिसरा दे, तेरी पाप डिलीट में करता हूँ।।
फिर ऐसा सोची तो पाप लगेगा,यह बात रिपीट मैं करता हूँ
चल जाता हूँ है काम मुझे, एक पल का नही विश्राम मुझे।।
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, भक्ति रूपी पौधा
अक्षर पुरुष एक पेड है निरंजन वकी डार।
तीनों देवा शाखा भये, ये पात रुप संसार।।
गीता अध्याय 15 श्लोक 1.4 को इस अमृतवाणी में संक्षिप्त कर बताया है किः-जो ऊपर को मूल वाला तथा नीचे को तीनों गुण रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव रूपी शाखा वाला संसार रूपी वृक्ष है।
कबीर, अक्षर पुरूष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार।
तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।।
जैसे पौधे को मूल की ओर से पृथ्वी में रोपण करके मूल की सिंचाई की जाती है तो उस मूल परमात्मा (परम अक्षर ब्रह्म) की पूजा से पौधे की परवरिश होती है। तब तना, डार, शाखाओं तथा पत्तों का विकास होकर पेड़ बन जाता है। छाया, फल तथा लकड़ी सर्व प्राप्त होती है जिसके लिए पौधा लगाया जाता है। यदि पौधे की शाखाओं को मिट्टी में रोपकर जड़ों को ऊपर करके सिंचाई करेंगे तो भक्ति रूपी पौधा नष्ट हो जाएगा।
इसी प्रकार एक मूल (परम अक्षर ब्रह्म) रूप परमेश्वर की पूजा करने से सर्व देव विकसित होकर साधक को बिना माँगे फल देते रहेंगे। जिसका वर्णन गीता अध्याय 3 श्लोक 10 से 15 में भी है। इस प्रकार ज्ञान होने पर साधक का प्रयोजन उसी प्रकार अन्य देवताओं से रह जाता है जैसे झील की प्राप्ति के पश्चात् छोटे जलाश्य में रह जाता है। छोटे जलाश्य पर आश्रित को ज्ञान होता है कि यदि एक वर्ष बारिश नहीं हुई तो छोटे तालाब का जल समाप्त हो जाएगा। उस पर आश्रित भी संकट में पड़ जाऐंगे। झील के विषय में ज्ञान है कि यदि दस वर्ष भी बारिश न हो तो भी जल समाप्त नहीं होता।
वह व्यक्ति छोटे जलाश्य को छोड़कर तुरंत बड़े जलाश्य पर आश्रित हो जाता है। भले ही छोटे जलाशय जल पीने में झील के जल जैसा ही स्वादिष्ट है, परंतु पर्याप्त व चिर स्थाई नहीं है। इसी प्रकार अन्य देवताओं (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) की भक्ति से मिलने वाले स्वर्ग का सुख बुरा नहीं है, परंतु क्षणिक है, पर्याप्त नहीं है। इन देवताओं तथा इनके अतिरिक्त किसी भी देवी-देवता, पित्तर व भूत पूजा करना गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15, 20 से 23 में मना किया है।
इसलिए भी इनकी भक्ति करना शास्त्र विरूद्ध होने से व्यर्थ है जिसका गीता अध्याय 16 श्लोक 23,24 में प्रमाण है। कहा है कि शास्त्र विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करने वालों को न तो सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही परम गति यानि पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ प्रयत्न है।(गीता अध्याय 16 श्लोक 23) इससे तेरे लिए अर्जुन! कर्तव्य यानि जो भक्ति कर्म करने चाहिऐ और अकर्तव्य यानि जो भक्ति कर्म न करने चाहिऐ, उसके लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं यानि शास्त्रों को आधार मानकर निर्णय लेकर शास्त्रों में वर्णित साधना करना योग्य है।(गीता अध्याय 16 श्लोक 24)
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सुदामा केवल कृष्ण भक्त नहीं थे? अगले जन्म की कहानी खोलती है बड़ा रहस्य।
देखिए "कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6"।
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सुदामा, कृष्ण के भक्त नहीं थे। यह बात खुद सुदामा की आत्मा ने अगले जन्म में लिखकर बताई।
जानने के लिए देखिए कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6, Factful Debates यूट्यूब चैनल पर
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![whatsaap status - गीता अध्याय 45 { व 2 तश श्लोक 7 16-17 13122 (रजगुण) शिव (तमगुण) बह्मा विष्णु (सतगुण) క कबीर हे अक्षर पुरुष एक निरंजन बाकी डार। तीनों देवा शाखा हिं डार 2 पात रूप ससारी ] ब्रह्म अर्थात 8R डार ~ೆಕ क्षर पुरुष (कालब्रह्म) নেনা अक्षर ब्रह्म अर्थात (39ಷ)] तना अक्षर पुरुष कबीर साहेब (मूल जड़) साधना शास्त्रानुकूल भक्ति रूपी पौधा अर्थात सीधा बीजा हुआ गीता अध्याय 45 { व 2 तश श्लोक 7 16-17 13122 (रजगुण) शिव (तमगुण) बह्मा विष्णु (सतगुण) క कबीर हे अक्षर पुरुष एक निरंजन बाकी डार। तीनों देवा शाखा हिं डार 2 पात रूप ससारी ] ब्रह्म अर्थात 8R डार ~ೆಕ क्षर पुरुष (कालब्रह्म) নেনা अक्षर ब्रह्म अर्थात (39ಷ)] तना अक्षर पुरुष कबीर साहेब (मूल जड़) साधना शास्त्रानुकूल भक्ति रूपी पौधा अर्थात सीधा बीजा हुआ - ShareChat whatsaap status - गीता अध्याय 45 { व 2 तश श्लोक 7 16-17 13122 (रजगुण) शिव (तमगुण) बह्मा विष्णु (सतगुण) క कबीर हे अक्षर पुरुष एक निरंजन बाकी डार। तीनों देवा शाखा हिं डार 2 पात रूप ससारी ] ब्रह्म अर्थात 8R डार ~ೆಕ क्षर पुरुष (कालब्रह्म) নেনা अक्षर ब्रह्म अर्थात (39ಷ)] तना अक्षर पुरुष कबीर साहेब (मूल जड़) साधना शास्त्रानुकूल भक्ति रूपी पौधा अर्थात सीधा बीजा हुआ गीता अध्याय 45 { व 2 तश श्लोक 7 16-17 13122 (रजगुण) शिव (तमगुण) बह्मा विष्णु (सतगुण) క कबीर हे अक्षर पुरुष एक निरंजन बाकी डार। तीनों देवा शाखा हिं डार 2 पात रूप ससारी ] ब्रह्म अर्थात 8R डार ~ೆಕ क्षर पुरुष (कालब्रह्म) নেনা अक्षर ब्रह्म अर्थात (39ಷ)] तना अक्षर पुरुष कबीर साहेब (मूल जड़) साधना शास्त्रानुकूल भक्ति रूपी पौधा अर्थात सीधा बीजा हुआ - ShareChat](https://cdn4.sharechat.com/bd5223f_s1w/compressed_gm_40_img_719231_277ab07a_1778681672435_sc.jpg?tenant=sc&referrer=user-profile-service%2FrequestType50&f=435_sc.jpg)



