मंदिर दर्शन
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sn vyas
795 views 19 days ago
सन 1682 में उस मुस्लिम शासक ने 1000 मजदूरों को इकट्ठा किया और इस मंदिर को तोड़ने का काम दिया, मजदूरों ने 1 साल तक इसे तोड़ा, 1 साल लगातार तोड़ने के बाद वो सब इसकी कुछ मूर्तियाँ ही तोड़ सके, हार कर उस मुस्लिम शासक ने उन्हें वापस बुला लिया, वो शासक था औरंगजेब, जिसकी मूर्ख सेना ये समझ बैठी थी कि ये कोई ईंट और मिट्टी से बना साधारण मंदिर है.. लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि ये मंदिर हमारे पूर्वजों ने धरती की सबसे कठोर चट्टान को चीरकर बनाया है. ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से, इसने पत्थर का रूप लिया कैलास मंदिर को U आकार में उपर से नीचे काटा गया है जिसे पीछे की तरफ से 50 मीटर गहरा खोदा गया है. पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?.. हथौड़े और छेनी से?? आपको मंदिर की दीवारों पर छेनी के निशान दिख जायेंगे पर वहाँ के आध्यात्मिक गुरुओं का कहना है कि ये छेनी के निशान बाद के हैं,.. जब पूरा मंदिर बना दिया गया ये बस किनारों को Smooth करने के लिए उपयोग की गयीं थी. इतनी कठोर बेसाल्ट चट्टान को खोद कर उसमे से इस मंदिर को बना देना कहाँ तक संभव है??? कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है. क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?.. ये एक जायज सवाल है यहाँ कुछ वैज्ञानिक आँकड़ों पर बात कर लेते हैं,.. पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए 400,000 टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें 18 साल का समय लगा होगा . तो आइये एक सरल गणित की कैलकुलेशन करते हैं माना की इस काम को करने के लिए वहाँ काम कर रहे लोग 12 घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे जिसमें उन्हें कोई ब्रेक या रेस्ट नहीं मिलता होगा वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे . तो अगर 400,000 टन पत्थर को 18 साल में हटाना है तो उन्हें हर साल 22,222 टन पत्थर हटाना होगा , जिसका मतलब हुआ 60 टन हर दिन और 5 टन हर घंटे . ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का... उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन, नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सैंकड़ों मूर्तियों में लगा होगा. एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया?? उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता.. ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया,.. आखिर वो गया तो गया कहाँ?? क्या आप को अभी भी लगता है कि ये कारनामा आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथौड़े की मदद से अंजाम दिया गया होगा. राष्ट्रकूट राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया, जैसा कि बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम(756 - 773) ने करवाया था. यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता. ये उस मुस्लिम शासक की बर्बरता और इस मंदिर के विरले कारीगरों की कुशलता दोनों को साथ में लिए आज भी खड़ा है और हमारे पूर्वजों के कौशल और पुरुषार्थ के सबूत देते हुए आधुनिक मानव को उसकी औकात दिखाते हुए कह रहा है कि दम है तो मुझे फिर से बनाकर दिखाओ. Jain Dinesh #मंदिर दर्शन
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sn vyas
620 views 20 days ago
🌳🌴🌳🌴🌳🌴🌳 *🙏सादर वन्दे* *🚩धर्म यात्रा🚩* मेे आज *🦚 महाबलेश्वर , महाराष्ट्र 🦚* भारत के महाराष्ट्र राज्य के सतारा ज़िले में स्थित महाबलेश्वर एक नगर है। यह इसी नाम के तालुका का मुख्यालय भी है। यहाँ समीप ही कृष्णा नदी का उद्गम है , जिसके कारण से यह एक हिन्दू तीर्थस्थान भी है। महाबलेश्वर रमणीय वातावरण से घिरा एक हिल स्टेशन व पर्यटन स्थल है। ऊँची चोटियाँ , भय पैदा करने वाली घाटियाँ , चटक हरियाली , ठण्‍डी पर्वतीय हवा , महाबलेश्‍वर की विशेषताएँ है। यह महाराष्‍ट्र का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्वतीय स्‍थान है और एक समय ब्रिटिश राज के दौरान यह बॉम्‍बे प्रेसीडेंसी की ग्रीष्‍मकालीन राजधानी हुआ करती थी । *यहाँ महाबलेश्‍वर का प्रसिद्ध प्राचीन शिव मन्दिर है , जहाँ स्‍वयं भू लिंग विराजमान है एवं भगवान शिव का रुद्राक्ष के आकार का विग्रह है ।* महाबलेश्वर मन्दिर के गर्भगृह में 6 फिट ऊॅंचा ‘स्वयंभू’ (स्वयं उत्पन्न) शिव लिंग है , जिसे “महालिंगम” के नाम से जाना जाता है , जो दुनिया में एकमात्र रुद्राक्ष के आकार का शिव लिंग होने के कारण यह शिवलिंग अद्वितीय है। हजारों साल पुराना यह शिवलिंग ‘त्रिगुणात्मक लिंग’ का प्रतीक है , जो महाबलेश्वर , अतिबलेश्वर और कोटेश्वर का प्रतीक है। मन्दिर परिसर में नंदी और कालभैरव की कई मूर्तियाँ भी विद्यमान हैं। महाबलेश्वर मन्दिर स्वयं लगभग 800 वर्ष पुराना है , जबकि स्वयंभू शिव लिंग करोड़ों वर्ष पुराना माना जाता है ; जिनमें त्रिशूल , रुद्राक्ष और डमरू शामिल हैं , जो लगभग 300 साल पुराने हैं .ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव स्वयं सावन के पवित्र महीने में इन पवित्र वस्तुओं का उपयोग करने के लिए इस मन्दिर में आते हैं। मन्दिर में एक बिस्तर , त्रिशूल , डमरू और रुद्राक्ष है , माना जाता है कि भगवान शिव हर रात मन्दिर में इसका इस्तेमाल करते हैं , क्योंकि हर सुबह बिस्तर बिखर जाता है।कहते है महबलेश्वर ही वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने अपने कालभैरव रूप को प्रकट किया , यही वह स्थान है जहाँ ब्रह्मजी के छटे सिर को भिराव ने धड़ से अलग किया था। पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि की रचना के दौरान भगवान ब्रह्मा मानव की रचना के लिए सह्याद्रि के जंगलों में ध्यान कर रहे थे। उस समय दो राक्षस भाई , अतिबल और महाबल ने इस क्षेत्र में आतंक मचा रखा था दोनो राक्षस , ऋषियों और अन्य प्राणियों को परेशान कर रहे थे। तब ब्रह्मदेव के कहने पर भगवान विष्णु अतिबल को मारने में कामयाब रहे , वहीं महाबल को अमरता का वरदान प्राप्त था , महाबल को इस संसार से मुक्ति दिलाने के लिए ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान शिव और देवी आदिमाया से प्रार्थना की तब महाबल का संहार किया ; परिणामस्वरूप , भगवान शिव रुद्राक्ष के आकार में शिव लिंग के रूप में प्रकट हुए , और महाबल के नाम से इस क्षेत्र का नाम ‘ महाबलेश्वर ' रखा गया। महाबलेश्‍वर में अनेक दर्शनीय स्‍थल हैं और प्रत्‍येक स्‍थल की एक अनोखी विशेषता है। बे‍बिंगटन पॉइंट की ओर जाते हुए धूम नामक बांध जो रूकने के लिए एक अच्‍छा स्‍थान है अथवा आप पुराने महाबलेश्‍वर और प्रसिद्ध पंच गंगा मन्दिर जा सकते हैं , जहाँ पाँच नदियों का झरना है : कोयना , वैना , सावित्री , गायित्री और पवित्र कृष्‍णा नदी। समुद्र तल से 1372 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह महाराष्ट्र का सबसे अधिक ऊँचाई वाला लोकप्रिय व खूबसूरत पर्वतीय स्थल है।महाबलेश्वर की हरियाली से लबालब मनोरम दृश्यावलियाँ , पर्यटक को स्वप्नलोक में विचरण करने को विवश कर देती हैं । हरे-भरे मोड़ों वाली घुमावदार सड़कों पर से आप जैसे-जैसे महाबलेश्वर की ओर बढ़ेंगे , वैसे-वैसे हवा की ताजगी व ठंडक महसूस कर आप अपनी शहरी थकान और चिन्ताओं को भूल जाएँगे। महाबलेश्वर जाने का असली मजा अपना वाहन लेकर जाने में है क्योंकि वहाँ स्थित 30 दर्शनीय स्थल देखने के लिए बस काम नहीं आती । *महाबलेश्वर कहाँ है ----* महाबलेश्वर मुंबई से 247, पुणे से 120 , औरंगाबाद से 348 , पणजी से 430 कि.मी. दूर है। महाबलेश्वर में देखने योग्य लगभग 30 पॉइंट हैं । एलाफिस्टन पॉइंट , माजोरी पॉइंट , सावित्री पॉइंट , आर्थर पॉइंट , विल्सन पॉइंट , हेलन पॉइंट , नाथकोंट , लाकविग पॉइंट , बॉम्बे पार्लर , कर्निक पॉइंट और फाकलेंड पॉइंट वादियों का नजारा देखने के लिए आदर्श जगहें हैं। महाबलेश्वर के दर्शनीय स्थानों में लिंगमाला वाटर फाल , वेन्ना लेक , पुराना महाबलेश्वर मन्दिर प्रमुख हैं। भिलर टेबललैंड , मेहेर बाबा गुफाएँ , कमलगर किला और हेरिसन फोली भी दर्शनीय हैं। प्रतापगढ़ :----यह महाबलेश्वर से 24 कि.मी. दूर 900 मीटर की ऊँचाई पर है। यह उन किलों में से एक है जिसका निर्माण छत्रपति शिवाजी ने सन्‌ 1656 में अपने निवास स्थान के लिए किया था। पंचगनी :--- कृष्णा घाटी में दक्षिण में स्थित पंचगनी महाबलेश्वर से मात्र 19 कि.मी. दूर है। यह चारों ओर से रमणीक दृश्यों से भरपूर होने के कारण सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ टेबल टॉप या टेबल लैंड है , जहाँ अनगिनत फिल्मों के प्रेमगीतों की शूटिंग होती रहती है। यहाँ पर्वत श्रृंखला को देखना और तेज हवाओं से बात करना एक अनूठा अनुभव है । *आप भी धर्मयात्रा🚩 हेतु जुड़ सकते हैं। *🙏 शिव 🙏 9993339605* 🌿🎿🌿🎿🌿🎿🌿 #मंदिर दर्शन
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sn vyas
807 views 1 months ago
🎪💥🎪💥🎪💥🎪 *🙏सादर वन्दे🙏* *🚩धर्म यात्रा 🚩* *🔔योगेश्वरी मन्दिर , अम्बाजोगाई , महाराष्ट्र🔔* अम्बाजोगाई परली से मात्र 25 कि.मी. दूर है , यहाँ अंबामाता का " योगेश्वरी मन्दिर " बड़ा प्रसिद्ध मन्दिर है। " योगेश्वरी " संस्कृत शब्द है, जिसका अनुवाद जोगेश्वरी भी है यह हिंदू देवी " दुर्गा " का ही एक नाम है , योगेश्वरी जिसका अर्थ "योग की देवी" भी है । उनका सबसे प्रमुख मन्दिर महाराष्ट्र के बीड जिले के अम्बाजोगाई शहर में स्थित है। अम्बाजोगाई में इस देवी को ग्रामदेवी या शहर की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है और ये देवी कई मराठा कुलों की कुलदेवी भी हैं। यह महाराष्ट्र के *साढ़े तीन शक्तिपीठों* मे गिना जाता है । योगेश्वरी मन्दिर , जयवंती नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है जयवंती नदी के तट पर बसा होने से यह शहर जयवंतीनगर के नाम से भी जाना जाता है। योगेश्वरी मन्दिर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है। मुख्य द्वार के सामने एक ' नागा खाना ' है -- संगीतकारों के लिए जगह और ' दीपमाल ' है । दुष्टों के संहार के लिये अत्यंत तीक्ष्ण खड्ग योगेश्वरी माँ के हाथ में रहता है और रुद्राक्ष की माला वह धारण करती है। उनकी जिह्वा लम्बी है , तीक्ष्ण दाढ़ है , भयंकर मुख है , केश उनके ऊपर को उठे हुए हैं। कंठ में वह नरकपाल और अस्थियों की माला पहनती हैं। उनके वाम हस्त में रक्त और मांस से भरा हुआ खप्पर है और दक्षिण हस्त में वह बर्छी धारण किए हैं। उनके तीन नेत्र हैं। उनका उदर अंदर को घुसा हुआ है। प्रातः 5:00 बजे से मन्दिर के लाउडस्पीकर पर भजन सुनाए जाते हैं। इस मन्दिर का तांबूल प्रसाद , जिसमें कुचले हुए पत्ते होते हैं ; इस मन्दिर की एक अनोखी चीज़ है। योगेश्वरी मन्दिर से , पैदल दूरी पर , सांकेतिक गणेश मन्दिर है। ऐसा कहा जाता है कि योगेश्वरी मन्दिर में आने वाला हर व्यक्ति इस गणपति मन्दिर के दर्शन अवश्य करता है। अम्बाजोगाई महाराष्ट्र के बीड़ जिले का एक प्राचीन नगर है। यह एक तहसील है और एक नगरपरिषद (म्युनिसिपल काउंसिल) भी है। इसके अतिरिक्त यहाँ अनेक पुरातात्विक धरोहरें भी हैं। यह नगर मराठवाड़ा क्षेत्र की सांस्कृतिक राजधानी मानी जाती है। अम्बाजोगाई का निकटतम रेलवे स्टेशन परली वैजनाथ है , जो कि अम्बाजोगाई से 25 कि.मी. दूर है। अंबाजोगाई सड़क मार्ग से भी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है और नियमित रूप से चलने वाली राज्य परिवहन (एसटी) बसें और निजी बसें इसे लातूर , बीड़ , औरंगाबाद , पुणे और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों से जोड़ती हैं। *आप भी धर्मयात्रा🚩 हेतु जुड़ सकते हैं :* *धर्मयात्रा में दी गई ये जानकारियाँ , मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। यहाँ यह बताना जरूरी है कि , धर्मयात्रा किसी भी तरह की मान्यता , जानकारी की पुष्टि नहीं करता है ।* *🙏शिव🙏9993339605* 🎪💥🎪💥🎪💥🎪 #मंदिर दर्शन
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