संस्कृत सुभाषित

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sn vyas
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#संस्कृत सुभाषित प्रीणाति य: सुचरितै: पितरं स पुत्रो यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् । तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद् एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥ [ किरातर्जुनीयम , सर्ग- ११ , श्लोक- ४० ] अर्थात् 👉🏻 जो अपने सदाचरण से पिता को प्रसन्न/संतुष्ट रखे , वही वास्तव में पुत्र है । जो सदैव अपने पति की शुभेच्छु हो , वही पत्नी है । जो सुख-दुख में सदैव समान भाव रखे , वही वास्तविक मित्र है तथा ये तीनों उसी को प्राप्त होते हैं जिसने संसार में पुण्यकर्म किए हों । 🌄🌄 प्रभातवन्दन 🌄🌄
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sn vyas
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नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् । उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा ॥ [ महाभारत, शान्ति पर्व - १५/५० ] ☝🏻 यह प्रसिद्ध श्लोक गुण एवं दोष के महत्व को दर्शाता है । आइए इसे विस्तार से समझते हैं— नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् - नात्यन्तं गुणवत्— कोई भी वस्तु अत्यधिक गुणवान नहीं होती - किञ्चित् — कोई भी वस्तु - न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् — तथा न ही अत्यधिक दोषपूर्ण होती है उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा - उभयं— दोनों ( गुण एवं दोष ) - सर्वकार्येषु— सभी कार्यों में - दृश्यते— देखे जाते हैं - साध्वसाधु वा— अच्छे अथवा बुरे रूप में - अर्थात् 👉🏻 कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें सर्वथा गुण ही गुण हों । ऐसी भी वस्तु नहीं है जो सर्वथा गुणों से वंचित ही हो । सभी कार्यों में अच्छाई तथा बुराई दोनों ही देखने में आती है । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 #सुभाषित
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