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कृष्णा सुदामा मित्रता दिवस स्पेशल स्टेटस

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sn vyas
2K views • 19 days ago
#कृष्ण सुदामा की मित्रता #😍 सुदामा श्री कृष्ण मिलन 🤩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌺राधा कृष्ण💞 कृष्ण सुदामा की मित्रता 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ बहुत समय पहले उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में दो बालक साथ-साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। एक थे द्वारका के भावी राजा भगवान श्रीकृष्ण और दूसरे थे गरीब ब्राह्मण बालक सुदामा। दोनों की मित्रता इतनी गहरी थी कि वे साथ पढ़ते, साथ भोजन करते और हर सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ निभाते थे। उनके बीच न कोई बड़ा था, न छोटा, न राजा और न गरीब—उनके लिए केवल सच्ची मित्रता मायने रखती थी। एक दिन गुरु माता ने दोनों बालकों को जंगल से लकड़ियां लाने के लिए भेजा। दोनों लकड़ियां इकट्ठी कर ही रहे थे कि अचानक आसमान में काले बादल छा गए और तेज बारिश के साथ भयंकर तूफान शुरू हो गया। चारों तरफ अंधेरा छा गया। दोनों बालक जंगल में ही फंस गए, लेकिन उन्होंने गुरु की आज्ञा का पालन नहीं छोड़ा। पूरी रात वे वर्षा में भीगते हुए लकड़ियों की रक्षा करते रहे। सुबह जब वे आश्रम लौटे तो उनकी हालत देखकर गुरु और गुरु माता भावुक हो गए। उनकी सेवा और आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर महर्षि सांदीपनि ने दोनों को आशीर्वाद दिया। यही बाल्यकाल की मित्रता आगे चलकर ऐसी मिसाल बनी, जिसे युगों तक याद किया गया। समय बीता और दोनों की शिक्षा पूरी हुई। श्रीकृष्ण अपने जीवन के महान उद्देश्य की ओर बढ़ गए और आगे चलकर द्वारका के राजा बने। दूसरी ओर सुदामा ने सांसारिक धन-संपत्ति की इच्छा नहीं की। वे विद्वान, सरल और भगवान के अनन्य भक्त बने रहे। लेकिन धीरे-धीरे उनके परिवार पर गरीबी का ऐसा संकट आया कि कई बार घर में खाने के लिए अन्न का एक दाना तक नहीं होता था। उनके बच्चे भूख से व्याकुल रहते और उनकी पत्नी बड़ी कठिनाई से परिवार का पालन करती थीं। सुदामा स्वयं अपनी स्थिति से परेशान तो थे, लेकिन उन्होंने कभी भगवान से धन मांगने की इच्छा नहीं की। एक दिन सुदामा की पत्नी ने उनसे विनम्रता से कहा, “स्वामी, आपके बाल सखा स्वयं द्वारकाधीश श्रीकृष्ण हैं। यदि आप उनसे मिलने जाएंगे तो कम से कम उनसे सहायता मांग सकते हैं। आखिर मित्रता इसी दिन तो काम आती है।” सुदामा कुछ देर मौन रहे। उन्हें अपने मित्र से कुछ मांगने में संकोच हो रहा था। लेकिन पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर वे श्रीकृष्ण से मिलने के लिए तैयार हो गए। घर में देने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए उनकी पत्नी ने पड़ोस से थोड़ा सा चिवड़ा यानी तंदुल उधार लिया और उसे एक पुराने कपड़े में बांधकर श्रीकृष्ण के लिए भेंट के रूप में रख दिया। सुदामा कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद द्वारका पहुंचे। सामने चमचमाते महल, विशाल द्वार और राजसी वैभव देखकर उन्हें अपने पुराने मित्र की याद आने लगी। उनके साधारण वस्त्र और कमजोर शरीर को देखकर महल के सैनिकों ने उन्हें सामान्य ब्राह्मण समझकर रोक दिया। तभी सुदामा ने विनम्रता से कहा, “मैं द्वारकाधीश से मिलने आया हूं। मैं उनका बाल सखा हूं।” यह समाचार जैसे ही श्रीकृष्ण तक पहुंचा, वे एक पल भी नहीं रुके। राजसभा छोड़कर वे स्वयं महल के द्वार की ओर दौड़ पड़े। अपने प्रिय मित्र सुदामा को देखते ही श्रीकृष्ण ने उन्हें गले से लगा लिया। दोनों की आंखों से प्रेम के आंसू बहने लगे। उस क्षण द्वारका का राजा और गरीब ब्राह्मण नहीं, बल्कि गुरुकुल के वही दो बाल मित्र एक-दूसरे के सामने खड़े थे। श्रीकृष्ण स्वयं सुदामा का हाथ पकड़कर उन्हें राजमहल के भीतर ले गए। उन्होंने अपने मित्र को सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया और उनके चरण धोए। श्रीकृष्ण का यह प्रेम देखकर रुक्मणी सहित पूरा राजपरिवार भावुक हो उठा। श्रीकृष्ण ने सुदामा से उनके जीवन का हाल पूछा, लेकिन सुदामा अपने दुखों की चर्चा करने में संकोच करते रहे। तभी श्रीकृष्ण की नजर सुदामा के पुराने कपड़े में बंधी पोटली पर पड़ी। वे मुस्कुराकर बोले, “मित्र, मेरे लिए क्या लाए हो?” सुदामा शर्माने लगे। उन्हें लगा कि इतने बड़े राजा को साधारण तंदुल कैसे भेंट करूं। लेकिन श्रीकृष्ण ने स्वयं वह पोटली खोल ली। पोटली में रखे साधारण तंदुल देखकर श्रीकृष्ण की आंखों में खुशी आ गई। उन्होंने प्रेम से एक मुट्ठी तंदुल उठाकर खाया और कहा, “मित्र, तुम्हारे प्रेम से बढ़कर मेरे लिए संसार में कोई भेंट नहीं।” मान्यता है कि उस एक मुट्ठी तंदुल के साथ ही श्रीकृष्ण ने सुदामा के जीवन की दरिद्रता दूर करने का संकल्प कर लिया। जब श्रीकृष्ण दूसरी मुट्ठी लेने लगे, तब रुक्मणी ने उनका हाथ रोक दिया। कथा की मान्यता के अनुसार यदि श्रीकृष्ण तीसरी मुट्ठी भी खा लेते तो सुदामा के लिए तीनों लोकों का वैभव भी कम पड़ जाता। सुदामा ने फिर भी अपने मित्र से कुछ नहीं मांगा। वे केवल कृष्ण के प्रेम से संतुष्ट होकर अपने घर की ओर लौट पड़े। रास्ते भर सुदामा सोचते रहे कि उन्होंने कृष्ण से कुछ मांगा ही नहीं। उन्हें लगा कि शायद वे खाली हाथ ही घर लौट रहे हैं। लेकिन जब वे अपने गांव पहुंचे तो उनकी आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं। जहां पहले उनकी छोटी-सी टूटी झोपड़ी हुआ करती थी, वहां एक भव्य भवन खड़ा था। आसपास हरियाली थी, घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी और उनका परिवार सुंदर वस्त्रों में उनके स्वागत के लिए खड़ा था। सुदामा समझ गए कि उन्होंने श्रीकृष्ण से भले ही कुछ नहीं मांगा था, लेकिन उनके मित्र ने उनके मन की सारी पीड़ा बिना कहे ही समझ ली थी। सुदामा की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने आकाश की ओर देखकर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और मन ही मन कहा, “हे मेरे मित्र, मैंने आपसे धन नहीं मांगा था, फिर भी आपने मेरी जरूरत समझ ली। लेकिन आपने मुझे केवल संपत्ति नहीं दी, आपने मेरी मित्रता का मान रखा।” सुदामा ने उस वैभव को भगवान का प्रसाद माना और अपने जीवन में अहंकार को प्रवेश नहीं करने दिया। इस कथा की सबसे बड़ी सीख यही है कि सच्ची मित्रता धन, पद और प्रतिष्ठा की मोहताज नहीं होती। श्रीकृष्ण द्वारका के राजा थे और सुदामा अत्यंत गरीब ब्राह्मण, लेकिन कृष्ण के लिए सुदामा की कीमत उनके धन से नहीं, उनके प्रेम से थी। सुदामा ने एक मुट्ठी साधारण तंदुल प्रेम से दिए और श्रीकृष्ण ने उसके बदले अपना सारा प्रेम लुटा दिया। यही कारण है कि कृष्ण और सुदामा की मित्रता आज भी संसार की सबसे पवित्र मित्रताओं में गिनी जाती है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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