भारत दर्शन
हर साल 14 अगस्त आता है, चला जाता है किन्तु 1947 के भीषण विभाजन की टीस भरी यादें छोड़ जाता है। हम अपने मन के उस संकल्प को पुनः नया करते हैं कि भक्त प्रह्माद की नगरी मुल्तान, जहाँ नरसिंह अवतार हुआ, श्री राम के पुत्रगण कुश व लव द्वारा बसाये गये कुशपुर (कुसूर) और लवपुर (लाहौर) जहाँ गुरु अर्जुनदेव, वीर हकीकत राय तथा भगत सिंहराजगुरु, सुखदेव बलिदान हुए, भारत के पुत्र तक्ष की नगरी तक्षशिलाछोटे पुत्र पुष्कल की पुष्कलावती, हिंगलाज माता का शक्तिपीठ, पाण्डवों की स्मृति संजोये कटाक्षराज (कटासराज, गुरु नानक देव का पंजा साहिब, ढाकेश्वरी माता का मंदिर, चट्टाम- यशोहर (जैसोर) खुलना के शक्तिपाठ - ये सब हमें फिर सुलभ होंगे। 1947 का रक्त-रंजित विभाजन पश्चिमी भाग में 8 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि पर पाकिस्तान तथा पूर्वी भाग में 1.50 लाख वर्ग किलोमीटर में पू. पाकिस्तान बना दिया गया। लगभग 1.50 करोड़ हिन्दू इन क्षेत्रों से भारत में शरण लेने आयेकुल लगभग 20 लाख हत्याएं हुई। साथ ही लाखों माताबहनों के अपहरणक्रयविक्रय जैसे अकथनीय अपराध ने मानवता को कलंकित कर डाला। भारत द्वारा न्यायमूर्ति जी.डी. खोसला के माध्यम से कराये गये सर्वेक्षण (द स्टर्न रैकनिंग) के अनुसार भी 10 लाख की जनहानि का अनुमानित आंकड़ा है। • पर 1947 भारत के विभाजनों का अंतिम बिंदु नहीं है। • उसके बाद कश्मीर के हिस्से पाकिस्तान और फिर चीन ने कब्जाये। इस समय 78,114 हजार वर्ग किलोमीटर पाकिस्तान तथा 42,735 हजार वर्ग किमी चीन के अवैध अधिकार में है। इसमें पाकिस्तान द्वारा 1963 में अपने कब्जे से चीन को 'उपहार' में दिया गया 5180 वर्ग किमी क्षेत्र भी सम्मिलित है। • मणिपुर की स्वर्ग समान सुन्दर काबो घाटी (11,000 वर्ग कि.मी.) भी नेहरू सरकार ने बर्मा को दे दी। • नागालैण्डमणिपुर के कुछ भाग बर्मा को गये। कोको द्वीप गया। • कच्छ का कुछ हिस्सा और छम्ब पाकिस्तान ने ले लिया। बेरुबाड़ी और तीन बीघा पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) को दिये गये। कच्चातीवू द्वीप लंका को गया। • भारत का आक्चन सिकुड़नबहुत लम्बा चल लिया है। यह हमारी मूच्छवस्था का द्योतक है। खण्डित मूर्ति अस्वीकार है । स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- विस्तार चेतना का लक्षण है। आक्चन च्छों या मृत्यु का...तो क्या यह राष्ट्र अब असंदिग्ध शब्दों में - अपनी चैतन्य-युक्तता का परिचय देते हुए कहेगा कि विभाजन आगे और नहीं? और इससे भी बड़ा सवाल भूतकाल में हुए विभाजनों को निरस्त करने की शुरुआत होगी? क्योंकि यह भारतभूमि एक दिव्य चेतना वाली भूमि है। यह सर्वेश की सगुण साकार मूर्ति है और मूर्ति का खंडित रहना अस्वीकार्य है। अखण्ड भारत ही सच्चा भारत है। वही हर भारत-आराधक के दिल में बसा है। मानचित्र में दीखने वाला विभाजन पूरी तरह अप्राकृतिक व कृत्रिम है। मानचित्र में जो दिखता है नहीं देश भारत है। भू पर नहीं दिलों में ही अब शेष कहीं भारत है। हमारे दिलों में बसी अखण्ड प्रतिमा भू पर भी हम अवतरित करेंगे, यह संकल्प अखण्ड भारत दिवस (14 अगस्त) पर लें। यह काम वर्तमान पीढ़ी न कर पायी, तो अगली करेगी, पर करेगी जरूर। #भारत दर्शन #*_🌹तोड़ते __रहो तुम __दिल को कांच__ की तरह,_*🌹 *सनम*❤ *🌹_हम टूटकर__ भी सिर्फ तुम्हे ___ही चाहेंगे !!
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1 दिन पहले
भगवान तो आते है, हम पहचान नहीं पाते एक ब्राम्हण था, कृष्ण के मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था। उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता। भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता। एक दिन घर में लड्डू बने। ब्राम्हण ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया। पत्नी इससे नाराज हो गई, कहने लगी कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो। अबकी बार बिना खिलाए न लौटना, देखती हूं कैसे भगवान खाने आते हैं। बस ब्राम्हण ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है। मंदिर में जाकर धूनि लगा ली। भगवान के सामने लड्डू रखकर विनती करने लगा। एक घड़ी बीती। आधा दिन बीता, न तो भगवान आए न ब्राम्हण हटा। आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई। सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है। मक्खियां भिनभिनाने लगी ब्राह्मण उन्हें उड़ाता रहा। मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं। ब्राम्हण ने उन्हें भी हटाया, फिर मंदिर के बाहर खड़े आवारा कुत्ते भी ललचाकर आने लगे। ब्राम्हण ने उनको भी खदेड़ा। लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए। एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो ब्राम्हण ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया। . दिन ढल गया, शाम हो गई। न भगवान आए, न ब्राम्हण उठा। शाम से रात हो गई। लोगों ने सोचा ब्राम्हण देवता पागल हो गए हैं, भगवान तो आने से रहे। धीरे-धीरे सब घर चले गए। ब्राम्हण को भी गुस्सा आ गया। लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए। भिखारी, कुत्ते,चीटी, मक्खी तो दिनभर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े। उदास ब्राम्हण भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा। इतने सालों की सेवा बेकार चली गई।कोई फल नहीं मिला। ब्राम्हण पत्नी के ताने सुनकर सो गया। रात को सपने में भगवान आए। बोले- " तेरे लड्डू खाए थे मैंने। बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता। कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए। मक्खी, चीटी, कुत्ता, भिखारी। पर तुने हाथ नहीं धरने दिया। दिनभर इंतजार करना पड़ा। आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट्टी लग गई थी। अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना। भगवान चले गए।" ब्राम्हण की नींद खुल गई। उसे एहसास हो गया। भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया। बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं। . मुझमें राम ,तुझमें राम सबमें राम समाया, सबसे करलो प्रेम जगतमें, कोई नहीं पराया जय श्री कृष्णा।।। आपने मातृभूमि को रक्षा हेतु आपने धर्म को पहचाने #भारत दर्शन #श्रीमद भागवत कथा #श्रीमद् भागवत कथा
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104 ने देखा
5 दिन पहले
मित्रो आज , पहले गुरुमहाराज जी वंदना करेगें, फिर आपको मृत्युशैया पर लेटे भीष्म ने युधिष्ठिर को बहुत बहुत ज्ञानवर्धक बातें बताई थी, वही आपको बतायेगे !!!!! *बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥ भावार्थ:-मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है॥ एक बार उपदेश के बीच में ही हस्तक्षेप करते हुए द्रौपदी ने कहा- आपके ये उपदेश उस समय कहां गए थे, जब मेरा चीरहरण किया जा रहा था? द्रौपदी के इस प्रश्न पर पितामह भीष्म ने कहा- 'बेटी, उस समय मैंने दुर्योधन का दूषित अन्न खा रखा था इसलिए मेरी बुद्घि में उस समय दोष था, पर अब इतने लंबे समय तक बाणों की शैया पर रहने से मेरा दूषित रक्त बह गया है अत: अब मेरी बुद्घि भी निर्मल हो गई है। ...जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन।' महाभारत अनंत ज्ञान का भंडार है। उसी में धर्म, नीति, राजनीति, ज्ञान, विज्ञान, योग, इतिहास, मानवशास्त्र, रहस्य, दर्शन, व्यवस्था आदि की संपूर्ण बातों का समावेश है। यह धर्मिक ग्रंथ होने के साथ-साथ इतिहास और समाज का ग्रंथ भी है। दुनिया के सभी धर्म, दर्शन, विज्ञान, ज्योतिष, वास्तु के सिद्धांत सभी महाभारत से ही प्रेरित हैं। महाभारत युद्ध और काल की विषम परिस्थितियों में भी ज्ञान की गंगाएं बही। यह ज्ञान आज हमारे समक्ष 1.भीष्म नीति, 2.विदुर नीति, 3.गीता और 4.यक्ष प्रश्नके नाम से प्रचलित है। यह सभी महाभारत के ही हिस्से हैं। इसके अलावा भी हमें महाभारत में हजारों तरह के ज्ञान की बातें पढ़ने को मिलती है। महाभारत को घर मे रखना चाहिए। भीष्म और युद्धिष्ठिर संवाद हमें महाभारत के भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में मिलता है। इसमें केवल 2 अध्याय (167 और 168) हैं। इसमें भीष्म के पास युधिष्ठिर का जाना, युधिष्ठिर की भीष्म से बात, भीष्म का प्राणत्याग, युधिष्ठिर द्वारा उनका अंतिम संस्कार किए जाने का वर्णन है। अठारह दिनों के युद्ध में दस दिनों तक अकेले घमासान युद्ध करके भीष्म ने पाण्डव पक्ष को व्याकुल कर दिया और अन्त में शिखण्डी के माध्यम से अपनी मृत्यु का उपाय स्वयं बताकर महाभारत के इस अद्भुत योद्धा ने शरशय्या पर शयन किया। उनके शरशैया पर लेटने के बाद युद्ध 8 दिन और चला। लेकिन भीष्म पितामह ने शरीर नहीं त्यागा था, क्योंकि वे चाहते थे कि जब सूर्य उत्तरायण होगा तभी वे शरीर का त्याग करेंगे। भीष्म पितामह शरशय्या पर 58 दिन तक रहे। उसके बाद उन्होंने शरीर त्याग दिया तब माघ महीने का शुक्ल पक्ष था। कहते हैं कि इस युद्ध के समय अर्जुन 55 वर्ष, श्रीकृष्ण 83 वर्ष और भीष्म पितामह150 वर्ष के थे। उस काल में 200 वर्ष की उम्र होना सामान्य बात थी। बौद्धों के काल तक भी भारतीयों की सामान्य उम्र 150 वर्ष हुआ करती थी। इसमें शुद्ध वायु, वातावरण, उचित आहार और योग-ध्यान का बड़ा योगदान था। बाद में जब सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे-संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुंचते हुए। उन सबसे पितामह ने कहा कि इस शरशय्या पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूं। इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा मांगकर शरीर त्याग दिया। सभी लोग भीष्म को याद कर रोने लगे। युधिष्ठिर तथा पांडवों ने पितामह के शरविद्ध शव को चंदन की चिता पर रखा तथा दाह-संस्कार किया। भीष्म सामान्य व्यक्ति नहीं थे। वे मनुष्य रूप में देवता वसु थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य का कड़ा पालन करके योग विद्या द्वारा अपने शरीर को पुष्य कर लिया था। दूसरा उनको इच्छामृत्यु का वरदान भी प्राप्त था। माना जाता है कि भीष्म ही युद्ध में सबसे अधिक उम्र के थे। उन्हें राजनीति का ज्यादा अनुभव होने के कारण वेदव्यास ने संपूर्ण महाभारत में भीष्म को राजनीति का केंद्र बनाकर राजनीति के बारे में उन्होंने जो भी कहा, उसका प्राथमिकता से उल्लेख किया। जब पितामह भीष्म बाणों की शैया पर लेते हुए थे तब युधिष्ठिर उनसे मिलने आए। युधिष्ठिर बहुत दुखी एवं शर्मिंदा थे। अपने पितामह की हालत का जिम्मेदार खुद को मानकर अत्यंत ग्लानि महसूस कर रहे थे। उनकी यह स्थिती देख पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को अपने समीप बुलाकर पूछा– हे पुत्र! तुम इतना दुखी क्यूं हो क्या तुम मेरी इस स्थिती का उत्तरदायी खुद को समझ रहे हो? तब युधिष्ठिर ने नम आंखों के साथ हां में उत्तर दिया। जिस पर पितामह ने उन्हें एक कथा सुनाई। इस कथा में उन्होंने बताया कि क्यों मुझे तीरों की शैया नसीब हुई। भीष्म के मृत्यु शैया पर लेटे होने के अवसर पर वहां उपस्थित लोगों के सामने गंगाजी प्रकट होती हैं और पुत्र के लिए शोक प्रकट करने पर श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हैं। भीष्म यद्यपि शर शय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए उपदेश दिया। भीष्म पितामह शर शय्या पर 58 दिन तक रहे। उसके बाद उन्होंने शरीर त्याग दिया तब माघ महीने का शुक्ल पक्ष था। इन 58 दिनों में भीष्म के समक्ष सभी संध्या को एकत्रित होते थे और उनसे ज्ञान की बाते सुनते थे। भीष्म और युद्धिष्ठिर के बीच हुआ संवाद... भीष्म युद्धिष्ठिर संवाद :जब पितामह भीष्म बाणों की शैया पर लेते हुए थे तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा:- 'तुम्हारे मन में अशान्ति है। तुम भीष्मजी के पास जाओ और अपनी कठिनाई का वर्णन करो। धर्म का ज्ञान रखने वालों में भीष्म सबसे श्रेष्ठ हैं। जब वे नहीं रहेंगे तो संसार ऐसा तमोमय हो जाएगा, जैसे चन्द्रमा के न रहने से रात्रि हो जाती है। भीष्म जीवन और मृत्यु के बीच लटक रहे हैं। जाओ, उनसे जो कुछ पूछना है, पूछ लो।' युधिष्ठिर, कृष्ण, कृप और पाण्डवों के साथ कुरुक्षेत्र में पहुंचे। मृत्यु शय्या पर पड़े हुए भीष्म ने जो उपदेश उस समय दिए, उनमें से कुछ नीचे दिए जा रहे हैं:- भीष्म ने इस दौरान राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है। * जब भीष्म पितामह मृत्यू शैया पर थे तब युधिष्टर ने उनकी लम्बी आयु व स्वस्थ जीवन के रहस्य जानने के लिए उपदेश देने की प्रार्थना की तब भीष्म पितामह ने निम्न 12 बिन्दू बताए जो आज भी प्रासंगिक हैं। 1.मन को वश में रखना, 2.घमंड नहीं करना, 3.विषयों की ओर बढ़ती हुई इच्छाओं को रोकना, 4.कटु वचन सुनकर भी उतर नहीं देना,। 5.मार खाने पर भी शांत व सम रहना, 6.अतिथि व लाचार को आश्रय देना, 7.दूसरों की निन्दा न करना न सुनना, 8.नियमपूर्वक शास्त्र पढ़ना व सुनना, 9.दिन में नहीं सोना, 10.स्वयं आदर न चाहकर दूसरों को आदर देना, 11.क्रोध के वशीभूत नहीं रहना, 12.स्वाद के लिए नहीं स्वास्थ्य के लिए भोजन करना। * सत्य धर्म सब धर्मों से उत्तम धर्म है। ‘सत्य’ ही सनातन धर्म है। तप और योग, सत्य से ही उत्पन्न होते हैं। शेष सब धर्म, सत्य के अंतर्गत ही हैं। * सत्य बोलना, सब प्राणियों को एक जैसा समझना, इन्द्रियों को वश में रखना, ईर्ष्या द्वेष से बचे रहना क्षमा, शील, लज्जा, दूसरों को कष्ट न देना, दुष्कर्मों से पृथक रहना, ईश्वर भक्ति, मन की पवित्रता, साहस, विद्या-यह तेरह सत्य धर्म के लक्षण हैं। वेद सत्य का ही उपदेश करते हैं। सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान सत्य का फल होता है। * सत्य ब्रह्म है, सत्य तप है, सत्य से मनुष्य स्वर्ग को जाता है। झूठ अन्धकार की तरह है। अन्धकार में रहने से मनुष्य नीचे गिरता है। स्वर्ग को प्रकाश और नरक को अन्धकार कहा है। * ऐसे वचन बोलो जो, दूसरों को प्यारे लगें। दूसरों को बुरा भला कहना, दूसरों की निन्दा करना, बुरे वचन बोलना, यह सब त्यागने के योग्य हैं। दूसरों का अपमान करना, अहंकार और दम्भ, यह अवगुण है। * इस लोक में जो सुख कामनाओं को पूरा करने से मिलता है और जो सुख परलोक में मिलता है, वह उस सुख का सोलहवां हिस्सा भी नहीं है जो कामनाओं से मुक्त होने पर मिलता है। * जब मनुष्य अपनी वासनाओं को अपने अन्दर खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने सब अंग भीतर को खींच लेता है, तो आत्मा की ज्योति और महत्ता दिखाई देती है। * मृत्यु और अमृतत्व—दोनों मनुष्य के अपने अधीन हैं। मोह का फल मृत्यु और सत्य का फल अमृतत्व है। * संसार को बुढ़ापे ने हर ओर से घेरा है। मृत्यु का प्रहार उस पर हो रहा है। दिन जाता है, रात बीतती है। तुम जागते क्यों नहीं? अब भी उठो। समय व्यर्थ न जाने दो। अपने कल्याण के लिए कुछ कर लो। तुम्हारे काम अभी समाप्त नहीं होते कि मृत्यु घसीट ले जाती है। * स्वयं अपनी इच्छा से निर्धनता का जीवन स्वीकार करना सुख का हेतु है। यह मनुष्य के लिए कल्याणकारी है। इससे मनुष्य क्लेशों से बच जाता है। इस पथ पर चलने से मनुष्य किसी को अपना शत्रु नहीं बनाता। यह मार्ग कठिन है, परन्तु भले पुरुषों के लिए सुगम है। जिस मनुष्य का जीवन पवित्र है और इसके अतिरिक्त उसकी कोई सम्पत्ति नहीं, उसके समान मुझे दूसरा दिखाई नहीं देता। मैंने तुला के एक पल्ले में ऐसी निर्धनता को रक्खा और दूसरे पल्ले में राज्य को। अकिंचनता का पल्ला भारी निकला। धनवान पुरुष तो सदा भयभीत रहता है, जैसे मृत्यु ने उसे अपने जबड़े में पकड़ रखा है। * त्याग के बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। त्याग के बिना परम आदर्श की सिद्धि नहीं होती। त्याग के बिना मनुष्य भय से मुक्त नहीं हो सकता। त्याग की सहायता से मनुष्य को हर प्रकार का सुख प्राप्त हो जाता है। * वह पुरुष सुखी है, जो मन को साम्यावस्था में रखता है, जो व्यर्थ चिन्ता नहीं करता। जो सत्य बोलता है। जो सांसारिक पदार्थों के मोह में फंसता नहीं, जिसे किसी काम के करने की विशेष चेष्टा नहीं होती। * जो मनुष्य व्यर्थ अपने आपको सन्तप्त करता है, वह अपने रूप रंग, अपनी सम्पत्ति, अपने जीवन और अपने धर्म को भी नष्ट कर देता है। जो पुरुष शोक से बचा रहता है, उसे सुख और आरोग्यता, दोनों प्राप्त हो जाते हैं। * सुख दो प्रकार के मनुष्यों को मिलता है। उनको जो सबसे अधिक मूर्ख हैं, दूसरे उनको जिन्होंने बुद्धि के प्रकाश में तत्व को देख लिया है। जो लोग बीच में लटक रहे हैं, वे दुखी रहते हैं। “श्रेष्ठ और सज्जन पुरुष का चिह्न यह है कि वह दूसरों को धनवान देख कर जलता नहीं। वह विद्वानों का सत्कार करता है और धर्म के सम्बन्ध में प्रत्येक स्थान से उपदेश सुनता है। * जो पुरुष अपने भविष्य पर अधिकार रखता है (अपना पथ आप निश्चित करता है, दूसरों की कठपुतली नहीं बनता) जो समयानुकूल तुरन्त विचार कर सकता है और उस पर आचरण करता है, वह पुरुष सुख को प्राप्त करता है। आलस्य मनुष्य का नाश कर देता है। * भोजन अकेले न खाये। धन कमाने का विचार करे तो किसी को साथ मिला ले। यात्रा भी अकेला न करे। जहां सब सोये हुए हों, वहां अकेला जागरण न करे। * जो पुरुष अपने आपको वश में करना चाहता है उसे लोभ और मोह से मुक्त होना चाहिए। * दम के समान कोई धर्म नहीं सुना गया है। दम क्या है? क्षमा, धृति, वैर-त्याग, समता, सत्य, सरलता, इन्द्रिय संयम, कर्म करने में उद्यत रहना, कोमल स्वभाव, लज्जा, बलवान चरित्र, प्रसन्नचित्त रहना, सन्तोष, मीठे वचन बोलना, किसी को दुख न देना, ईर्ष्या न करना, यह सब दम में सम्मिलित हैं। * कामनाओं को त्याग देना; उन्हें पूरा करने से श्रेष्ठ है। आज तक किस मनुष्य ने अपनी सब कामनाओं को पूरा किया है? इन कामनाओं से बाहर जाओ। पदार्थ के मोह को छोड़ दो। शान्त चित्त हो जाओ। ♥ #भारत दर्शन #सम्पूर्ण भागवत दर्शन ♥इतिहास जाने 👇
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