#सीताराम

18 Posts • 5K views
sn vyas
728 views 16 days ago
#सीताराम माता की अग्नि परीक्षा ,,,,,,, ( रामायण में अग्नि परीक्षा एक ऐसी घटना है जो चरित्र एवं निष्ठां जैसे देविक विचार की महत्ता को प्रतिपादित करती है ! यह घटना आज के युग में असंभव अवश्य लगती है परन्तु सम्भवतः यह उस युग में विशेष कारणों से शरीर में " अग्नि तत्व " की जांच को कहते हो !) प्रभुश्री राम जी ने हनुमान्‌जी को बुलाया और कहा तुम लंका की जाओ। जानकी को सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल समाचार लेकर तुम चले आओ॥ हनुमानजी आज्ञा पाकर गए और सीताजी को दूर से ही प्रणाम किया। जानकीजी ने पहचान लिया कि यह वही श्री रघुनाथजी का दूत है (और पूछा-) हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेना सहित कुशल से तो हैं? हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! कोसलपति श्री रामजी सब प्रकार से सकुशल हैं। उन्होंने संग्राम में दस सिर वाले रावण को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमान्‌जी के वचन सुनकर सीताजी के हृदय में हर्ष छा गया॥ सीता जी आज बहुत खुश है और नेत्रों में (आनंदाश्रुओं का) जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं- हे हनुमान्‌! मैं तुझे क्या दूँ? इस समाचार के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है! हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! सुनिए, मैंने आज निःसंदेह सारे जगत्‌ का राज्य पा लिया, जो मैं रण में शत्रु को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्री रामजी को देख रहा हूँ। जानकीजी ने कहा- हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदय में बसें और हे हनुमान्‌! शेष (लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझ पर प्रसन्न रहें॥ सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥ सीताजी कहती हैं- अब तुम वही उपाय करो, जिससे मैं इन नेत्रों से प्रभु के कोमल श्याम शरीर के दर्शन करूँ। श्री रामचंद्रजी के पास जाकर हनुमान्‌जी ने जानकीजी का कुशल समाचार सुनाया॥ श्री रामजी ने संदेश सुनकर युवराज अंगद और विभीषण को बुला लिया (और कहा-) हनुमान्‌ जी के साथ जाओ और जानकी को आदर के साथ ले आओ॥ वे सब तुरंत ही वहाँ गए, जहाँ सीताजी थीं। सब की सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजी ने शीघ्र ही उन लोगों को समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकार से सीताजी को स्नान कराया,बहुत प्रकार के गहने पहनाए और फिर वे एक सुंदर पालकी सजाकर ले आए। सीताजी प्रसन्न होकर सुख के धाम प्रियतम श्री रामजी का स्मरण करके उस पर हर्ष के साथ चढ़ीं॥ रीछ-वानर सब दर्शन करने के लिए आए, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े॥ श्री रघुवीर ने कहा- हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीता को पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माता की तरह देखें। गोसाईं श्री रामजी ने हँसकर ऐसा कहा॥ प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गए। आकाश से देवताओं ने बहुत से फूल बरसाए। सीताजी (के असली स्वरूप) को पहिले अग्नि में रखा था। अब भीतर के साक्षी भगवान्‌ उनको प्रकट करना चाहते हैं॥ इसी कारण करुणा के भंडार श्री रामजी ने लीला से कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हे सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं॥ प्रभु के वचनों को सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्म से पवित्र श्री सीताजी बोलीं- हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्माचरण में सहायक बनो और तुरंत आग तैयार करो॥ लक्ष्मणजी के नेत्रों में (विषाद के आँसुओं का) जल भर आया। वे हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभु से कुछ कह नहीं सकते॥ फिर श्री रामजी का रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत सी लकड़ी ले आए। अग्नि को खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजी के हृदय में हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ॥ सीताजी ने लीला से कहा-) यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्री रघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मन की गति जानते हैं, (मेरे भी मन की गति जानकर) मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाएँ॥ प्रभु श्री रामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वंदित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यंत विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चंदन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गए। प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं॥ तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत्‌ में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्री रामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णु भगवान्‌ को लक्ष्मी समर्पित की थीं। वे सीताजी श्री रामचंद्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यंत ही सुंदर है। मानो नए खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो॥ देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाश में डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥ श्री जानकीजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी की अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गए और सुख के सार श्री रघुनाथजी की जय बोलने लगे। विशेष ,,,, पद्म पुराण के अनुसार रामायण में थी दो माता सीता पद्म पुराण की कुछ कहानियों को आपस में जोड़ा जाए तो इससे ये बात सामने आती है कि रामायण में एक नहीं बल्कि दो सीता थी, पहली असली और दूसरी माया. अगर पद्म पुराण की कहानियों को सच मानें तो माता सीता को कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी पड़ी थी और ना ही उन्हें वनवास जाना पड़ा था. यही नहीं खुद भगवान राम भी माता सीता के इन दोनों रुपों के बारे में जानते थे. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता सीता अग्नि देव की पूजा करती थीं और त्रेतायुग में ये धारणा थी कि अगर कोई व्यक्ति सच्चा है तो उसे अग्नि कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती. माता सीता की भक्ति से प्रसन्न होकर अग्नि देव ने अग्निपरीक्षा के दौरान सीता की जगह उनकी माया सीता को रखा जिसे रावण अपने साथ अपहरण करके लंका ले गया था ! ऐसा कहा जाता है कि जब सीता को भगवान राम ने रावण से बचाया था उसके बाद उन्होंने माया सीता से विनती की थी कि वो वापस चली जाएं और असली सीता वापस आ जाएं. इसीलिए सीता की अग्निपरीक्षा के दौरान असली सीता बाहर आयी जिन्हें रावण छू भी नहीं पाया था. यहाँ यह विचारणीय है कि माता सीता के चरित्र पर उंगली उठानेवाली प्रजा को जवाब देने के लिए जब राम ने सीता की अग्निपरीक्षा ली तो इससे ये साबित हो गया था कि वो पवित्र और निष्ठावान हैं ! 🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷
12 likes
21 shares
Viyaan Originals
1K views 23 days ago AI indicator
🙏 इसे सेव कर लें। 21 दिनों तक प्रतिदिन सुबह, दोपहर और रात श्रद्धा से इस प्रार्थना को सुनें। जय श्री राम 🚩 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🙏🏻 मेरे भगवान 🙏🏻 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏शुभ मंगलवार🌸 #🙏🏻सीता राम
22 likes
11 shares