ayodhya
1K Posts • 13M views
sn vyas
771 views
#अयोध्या श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे, इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था, जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते। एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं, वहीं पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे, पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा - पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है, माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा। पंडित जी ने कहा - ठीक है महाराज, संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे। पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते। जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा - पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी । हम बहुत प्रसन्न है, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो। संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे, श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे। पंडित जी बोले- महाराज हम बहुत गरीब है, हमें बहुत सारा धन मिल जाये। संत ने प्रार्थना की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये। भगवान् जी मुस्कुराने लगे, संत बोले - तथास्तु । फिर संत ने पूछा - मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले - हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए । संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए । संत बोले - तथास्तु, तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा । फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो। पंडित जी बोले - श्री सीतारामजी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो। संत बोले नहीं, यह नहीं मिलेगा। पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए कि महात्मा क्या बोल गए। पंडित जी ने पूछा - संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी..? संत बोले तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है । दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है । जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती । भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हे क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा । उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामुगुह लखन समेता॥ केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥ #भावार्थ:- निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्री सीताजी और श्री रामचन्द्रजी (नाव से) उतरकर गंगाजी की रेत (बालू) में खड़े हो गए। तब केवट ने उतरकर दण्डवत की। (उसको दण्डवत करते देखकर) प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥ पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥ कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥ #भावार्थ:-पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए॥ नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥ #भावार्थ:-(उसने कहा-) हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥ प्रभु के बार बार कहने पर भी केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की। हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए - बल, बुद्धि, सिद्धि, अमरत्व आदि परंतु उन्होंने कुछ प्रसन्नता नहीं दिखाई। अंत में जानकी जी और प्रभु श्रीराम ने अपने प्रेम और अखंड भक्ति का वर दिया। प्रभु की भक्ति में ही शक्ति है और शक्ति से ही जीवन में मोक्ष प्राप्त हो सकता है। अगर मन में लगन है तो हम क्या कुछ नहीं पा सकते हैं। #जय_श्री_रामजी 🚩 #जय_श्री_हनुमानजी 🚩
12 likes
12 shares
https://youtu.be/nNQIKkRVOxI Shri Hanuman Garhi Ayodhya Live Darshan Today | श्री हनुमान गढ़ी मंदिर अयोध्या से महावीर हनुमान भगवान का अद्भूत लाईव दर्शन। #Ayodhya Dham #जय श्री राम अयोध्या धाम #अयोध्या धाम #अयोध्या धाम
25 likes
16 shares