महाभारत युद्ध

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sn vyas
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#महाभारत #महाभारत की कथा महाभारत में द्युत के खेल के पश्चात पांडवों को १२वर्ष का वनवास और १ वर्ष का अज्ञातवास मिला। वनवास के लिए पांचों पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ निकले। उन्होंने अपनी वृद्ध माता को वन ले जाना उचित नहीं समझा इसीलिए कुंती हस्तिनापुर में ही रुकी। इसके अतिरिक्त पांडवों के पुत्र भी छोटी अवस्था में होने के कारण वन को नहीं गए। यहाँ पर एक प्रश्न आता है कि यदि पांडवों के पुत्र वन को नहीं गए तो आखिर वे वनवास और अज्ञातवास की इस अवधि में कहाँ रुके थे? आम तौर पर लोगों को लगता है कि इस अवधि में द्रौपदी के पांचों पुत्र अपने नाना द्रुपद की नगरी पांचाल में थे किन्तु ऐसा नहीं है। इसका वर्णन हमें महाभारत के वनपर्व में मिलता है। महाभारत के वनपर्व के अंतर्गत मार्कण्डेय समस्या उप-पर्व के १८३वें अध्याय में ये बताया गया है कि जब अर्जुन स्वर्ग से सभी दिव्यास्त्र प्राप्त कर के लौट आये तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ पांडवों से मिलने आये। इसी सन्दर्भ में हमें ये पता चलता है कि वनवास की अवधि में पांडवों के पुत्र पांचाल में नहीं बल्कि श्रीकृष्ण के साथ उनकी नगरी द्वारका में थे। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्रौपदी से मिलकर उन्हें बताते हैं कि "हे पांचाली! तुम्हारे सभी पुत्र बड़े सुशील हैं। उन सब का विशेष अनुराग धनुर्वेद में है। वे अपना जीवन सदाचार और धर्म सहित जी रहे हैं। तुम्हारे पिता और भाइयों ने राज्य आदि की सुविधा दिखा कर उन्हें अनेक बार पांचाल में आमंत्रित किया किन्तु फिर भी तुम्हारे बच्चे अपने नाना द्रुपद और मामा धृष्टधुम्न आदि के घरों में रहना पसंद नहीं करते। वे कहते हैं कि वहां उनका मन नहीं लगता।" आगे श्रीकृष्ण द्रौपदी से कहते हैं - "कृष्णे! तुम्हारे जो पुत्र, जिनका प्रेम धनुर्वेद में है, वे कुशलपूर्वक वृष्णिपुरी द्वारका में हैं। वहां रहकर उन्हें देवताओं के लोक में भी जाने की इच्छा नहीं होती। उन बालकों को तुम या आर्या कुंती जैसा सदाचार सिखा सकती हो, वैसे ही संस्कार सुभद्रा उन्हें सावधानी पूर्वक दे रही है। वे उन बालकों को सही शिक्षा देकर सदैव सदाचार में प्रतिष्ठित करती है।" आगे उनकी शिक्षा के बारे में श्रीकृष्ण द्रौपदी को बताते हैं कि "रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न जिस प्रकार अपने पुत्र को युद्ध शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार वही तुम्हारे पुत्रों के भी शिक्षक और संरक्षक हैं।" आगे श्रीकृष्ण कहते हैं - "उनके संरक्षण में अभिमन्यु भी तुम्हारे शूरवीर पुत्रों को गदा और तलवार के दांव-पेंच सिखाते रहते हैं। साथ ही साथ वे उन्हें रथ चलाने और घोड़े हांकने की कला भी सिखाते हैं। अभिमन्यु सदा उनकी शिक्षा-दीक्षा में लगे रहते हैं। अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग की पूरी शिक्षा देकर उन्होंने तुम्हारे पुत्रों को अनेकों अस्त्र-शस्त्र भी दे रखे हैं। अभिमन्यु और तुम्हारे पुत्रों का पराक्रम देख कर प्रद्युम्न बड़े संतुष्ट रहते हैं। जब तुम्हारे पुत्र नगर की शोभा देखने जाते हैं तो उस समय उन सबके पीछे रथ, घोड़े, हाथी और पालकियां जाती हैं।" इसके आगे भी वनपर्व के अंतर्गत द्रौपदी सत्यभामा संवाद उप-पर्व में भी श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा द्रौपदी को सांत्वना देते हुए उनके पुत्रों की कुशलता का वर्णन करती हैं। वे कहती है कि "युधिष्ठिर कुमार प्रतिविन्ध्य, भीमसेन नंदन सुतसोम, अर्जुन कुमार श्रुतकर्मा, नकुल नंदन शतानीक तथा सहदेव कुमार श्रुतसेन - तुम्हारे ये सभी वीर पुत्र शस्त्रविद्या में निपुण हो गए है। वे सब अभिमन्यु की भांति बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां रहते हैं।" आगे वे कहती हैं - "सुभद्रा तुम्हारी ही तरह उन सबके साथ सब प्रकार से प्रेमपूर्वक बर्ताव करती है। वे किसी के प्रति भेदभाव ना रखकर उन सबके प्रति निश्छल स्नेह रखती है। वे उन बालकों के दुःख से ही दुखी और उनके सुख से सुखी होती है। रुक्मिणी देवी भी उन सबकी सब प्रकार से सेवा और देखभाल करती है। श्रीकृष्ण भी अपने पुत्रों से भी बढ़कर तुम्हारे पुत्रों को मानते हैं। मेरे श्वसुरजी भी प्रतिदिन उनके भोजन-वस्त्र आदि की समुचित व्यवस्था रखते हैं। बलरामजी भी सदैव उनकी सभी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हैं।" तो महाभारत के इस प्रकरण से हमें पता चलता है कि वनवास के समय द्रौपदी के सभी पुत्र अपने नाना या मामा एक पास, यानि पांचाल में नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका में उनके संरक्षण में रह रहे थे। वहां अर्जुन की पत्नी सुभद्रा उन सब का उचित पालन पोषण कर रही थी और श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उन सभी को युद्ध शिक्षा दे रहे थे।
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sn vyas
703 views 6 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्‌गार...(दिन 456) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जनमेजय उवाच एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । अत ऊर्ध्वं द्विजश्रेष्ठ किमकुर्वत पाण्डवाः ।। १ ।। जनमेजय ने पूछा- द्विजश्रेष्ठ! कुन्तीके महारथी पुत्र पाण्डव जब एकचक्रा नगरीमें पहुँच गये, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । ऊषुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ।। २ ।। वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! एकचक्रा नगरीमें जाकर महारथी कुन्तीपुत्र थोड़े दिनोंतक एक ब्राह्मणके घरमें रहे ।। २ ।। रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च । पार्थिवानपि चोद्देशान् सरितश्च सरांसि च ।। ३ ।। चेरुर्भेक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते । बभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः ।। ४ ।। जनमेजय ! उस समय वे सभी पाण्डव भाँति-भाँतिके रमणीय वनों, सुन्दर भूभागों, सरिताओं और सरोवरोंका दर्शन करते हुए भिक्षाके द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। अपने उत्तम गुणों के कारण वे सभी नागरिकों के प्रीति-पात्र हो गये थे ।। ३-४ ।। (दर्शनीया द्विजाः शुद्धा देवगर्भोपमाः शुभाः । भैक्षानर्हाश्च राज्यार्हाः सुकुमारास्तपस्विनः ।। सर्वलक्षणसम्पन्ना भैक्षं नार्हन्ति नित्यशः । कार्यार्थिनश्चरन्तीति तर्कयन्त इति ब्रुवन् ।। बन्धूनामागमान्नित्यमुपचिन्त्य तु नागराः । भाजनानि च पूर्णानि भक्ष्यभोज्यैरकारयन् ।। मौनव्रतेन संयुक्ता भैक्षं गृह्णन्ति पाण्डवाः । माता चिरगतान् दृष्ट्वा शोचन्तीति च पाण्डवाः । त्वरमाणा निवर्तन्ते मातृगौरवयन्त्रिताः ।।) उन्हें देखकर नगरनिवासी आपसमें तर्क-वितर्क करते हुए इस प्रकारकी बातें करते थे - 'ये ब्राह्मणलोग तो देखने ही योग्य हैं। इनके आचार-विचार शुद्ध एवं सुन्दर हैं। इनकी आकृति देवकुमारोंके समान जान पड़ती है। ये भीख माँगनेयोग्य नहीं, राज्य करनेके योग्य हैं। सुकुमार होते हुए भी तपस्यामें लगे हैं। इनमें सब प्रकारके शुभ लक्षण शोभा पाते हैं। ये कदापि भिक्षा ग्रहण करनेयोग्य नहीं हैं। शायद किसी कार्यवश भिक्षुकोंके वेशमें विचर रहे हैं।' वे नागरिक पाण्डवोंके आगमनको अपने बन्धुजनोंका ही आगमन मानकर उनके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भरे हुए पात्र तैयार रखते थे और मौनव्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उनसे वह भिक्षा ग्रहण करते थे। हमें आये हुए बहुत देर हो गयी, इसलिये माताजी चिन्तामें पड़ी होंगी-यह सोचकर माताके गौरव-पाशमें बँधे हुए पाण्डव बड़ी उतावलीके साथ उनके पास लौट आते थे। निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि । तया विभक्तान् भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक् पृथक् ।। ५ ।। प्रतिदिन रात्रिके आरम्भमें भिक्षा लाकर वे माता कुन्तीको सौंप देते और वे बाँटकर जिसके लिये जितना हिस्सा देतीं, उतना ही पृथक् पृथक् लेकर पाण्डवलोग भोजन करते थे ।। ५ ।। अर्ध ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परंतपाः । अर्ध सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुङ्क्ते महाबलः ।। ६ ।। वे चारों वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आधी भिक्षाका उपयोग करते थे और सम्पूर्ण भिक्षाका आधा भाग अकेले महाबली भीमसेन खाते थे ।। ६ ।। तथा तु तेषां वसतां तस्मिन् राष्ट्र महात्मनाम् । अतिचक्राम सुमहान् कालोऽथ भरतर्षभ ।। ७ ।। भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार उस राष्ट्रमें निवास करते हुए महात्मा पाण्डवोंका बहुत समय बीत गया ।। ७ ।। ततः कदाचित् भैक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः । संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथया सह ।। ८ ।। तदनन्तर एक दिन नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि चार भाई भिक्षाके लिये गये; किंतु भीमसेन किसी कार्यविशेषके सम्बन्धसे कुन्तीके साथ वहाँ घरपर ही रह गये थे ।। ८ ।। अथार्तिजं महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने । भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ।। ९ ।। भारत! उस दिन ब्राह्मणके घरमें सहसा बड़े जोरका भयानक आर्तनाद होने लगा, जिसे कुन्तीने सुना ।। ९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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Saurabh Bhatia
920 views 18 days ago AI indicator
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