🙏 सिद्धिदात्री
बाणदेवी ! या शक्तिधारी नागिन का आयुध हमारे यहां आयुधों के पूजन की पुरानी परंपरा है। नवरात्र या शक्तिपूजा के पर्व के अवसर पर आयुधों की पूजा की जाती है। होली, दीपावली पर भी ऐसी पूजाओं की परंपरा देखने में आती है, मगर खास तौर से शक्तिपूजा के दिनों में यह दिखाई देती है। राजमार्तण्‍ड (10वीं सदी) में राजाओं, सामंतों, सैनिकों द्वारा बल की वृद्धि के उद्देश्‍य से इस प्रकार की नीराजन विधि का वर्णन आया है, किंतु बहुत पहले वराहमिहिर ने बृह्द्योगयात्रा, बृहत्‍संहितादि ग्रंथों में इस प्रकार से आयुधादि की पूजा का वर्णन किया गया है। यही वर्णन विष्‍ण्‍ुाधर्मोत्‍तर, कालिकापुराण आदि में आया है। भारत ही नहीं, विदेशों में भी राजवंशों में अपने-अपने कुल के आयुध की मान्‍यता रही है, कोई तलवार को पूजता है ताे कोई कटार, कोई छुरी या असिपुत्रिका तो कोई कुंतादि को। इनको देवी के रूप में माना जाता है, जाहिर है ये शक्ति के प्रतीक हैं बाण की पूजा भी होती है। कुछ राजवंशों में बाण को माता या देवी के रूप में भी पूजा जाता है। मेवाड भी इससे अलग नहीं है। यहां आयुधों की सवारी तक निकाली जाती है, मेवाड में तो खडग की सवारी आयोजित होती है ही। यह परंपरा यहीं पर नहीं, विदेश में भी रही है। वहां भी बाण को देवी के रूप में जाना जाता है। एक चित्र में नाग पर देवी को विराजित किया गया है, यह नाग बाण के रूप में है।इसकी पहचान 'गोडेस ऑफ स्‍नेक' के रूप में की गई है, यह बाणरूप में है। हमारे यहां नागमुखी बाणों का विवरण मिलता है, उनके चित्रादि भी धनुर्वेदादि ग्रंथों में मिलते हैं। महाभारत में अनेक प्रकार के मुखधारी बाणों का वर्णन मिलता है और उसका विश्‍लेषण-विवरण भारतभाव दीपिका में भी लिखा गया है। नागपाश के लिए भी नागमुखी बाण के संधान के प्रसंग मिल जाते हैं। ग्रीक के एक मिथक में देवी के सर्प से लिपट कर सृष्टि की रचना करने की बात आई है। यह नारी की उस उर्वरा शक्ति का प्रसंग लगता है जो जीवन की संगति-विसंगतियों में सर्पाकार, वक्रवीथियों में भी अपने लक्ष्‍य को पूरा करती है। एक मिथक किस तरह परंपरा बनकर हमारी आस्‍थाओं की पग‍डंडियों को आधार दे रहा है, विचारणीय है। ✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू सर्पासना : भूमि से निकली राजस्थान के दक्षिण में बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ के पास बड़ी सरवा गांव में एक घर की खुदाई में निकली देवी प्रतिमा। प्रतिहार काल का अलंकरण और गोल मुखमंडल सहित पद्माभ लिए यह देवी की चतुर्भुज प्रतिमा है। इसमें प्रदक्षिणत: आयुधक्रम है : 1. खेटक (ढाल) 2. मोदक (लड्डू) या फल (बीजपूरक) 3. खड्ग (खंडित) और 4. नागास्त्र। यह नाग पर ही आरूढ़ दिखाई गई है। यह पार्वती का एक रूप है, जिसे पहले गोधासना ( गोह पर बैठी हुई) बनाई जाती थी। मित्रों ने पद्मावती और मंशादेवी के रूप में भी पहचानने को कहा है। यही नहीं, योगिनी का एक रूप भी। देवी के अनेक रूप हैं और अनेक नामों से वह आराधिता भी है : नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम। अनुमान है कि यह 10वीं सदी की हो। आमझरा में जिस प्रतिमा परंपरा का विकास हुआ, वह मालवा से लगे इलाकों में रमणीय होती गई...। ✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में "शिखर", और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी। आदि शंकराचार्य के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो! तो इस तरह तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा। एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानि मानवविज्ञानी जब धर्म का अध्ययन करते हैं तो उसे दो भागों में बांटने की कोशिश करते हैं। रिलिजन या मजहब के लिए संभवतः ये तरीका आसान होगा। वृहत (ग्रेटर) धारा में वो उस हिस्से को डालते हैं जिसमें सब कुछ लिखित हो और उस लिखे हुए को पढ़ने, समझने और समझाने के लिए कुछ ख़ास लोग नियुक्त हों। छोटी (लिटिल) धारा उसे कहते हैं जो लोकव्यवहार में हो, उसके लिखित ग्रन्थ नहीं होते और कोई शिक्षक भी नियुक्त नहीं किये जाते। भारत में धर्म की शाक्त परम्पराओं में ये वर्गीकरण काम नहीं करता क्योंकि आदि शंकराचार्य को किसी ने “नियुक्त” नहीं किया था। रामकृष्ण परमहंस या बाम-खेपा जैसे शाक्त उपासकों को देखें तो बांग्ला में “खेपा” का मतलब पागल होता है। इससे उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं आती, ना ही उनकी उपासना पद्दति कमतर या छोटी होती है। तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता श्रृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। बाकी आस पास के रामकृष्ण मिशन या दूसरे जो भी योग अथवा संस्कृत विद्यालय हों, वहां तक जाकर भी देखिये। संस्कृति को जीवित रखना समाज का ही कर्तव्य है। #नवरात्र ✍🏻 आनन्द कुमार #🙏प्रेम से बोलो 'जय माता दी' #🙏 महानवमी #🙏 सिद्धिदात्री
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1 महीने पहले
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