✍गझल🎼
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✍गझल🎼

ग़ज़ल- अजब मामूल है आवारगी का गिरेबां झाँकती है हर गली का न जाने किस तरह कैसे ख़ुदा ने भरोसा कर लिया था आदमी का अभी इस वक़्त है जो कुछ है वरना कोई लम्हा नहीं मौजूदगी का मुझे तुमसे बिछड़ने के एवज़ में वसीला मिल गया है शायरी का ज़मीं है रक़्स में सूरज की जानिब छिपा कर जिस्म आधा तीरगी का मैं इक ही सतह पर ठहरूंगा कैसे उतरता चढ़ता पानी हूँ नदी का मैं मिटटी गूंध कर ये सोचता हूँ मुझे फ़न आ गया कूज़ागरी का खटक जाऊँगा सोफ़े को तुम्हारे मैं बंदा बैठने वाला दरी का मैं उस मंज़र में पाया ही गया कब जहाँ भी ज़ाविया निकला ख़ुशी का समंदर जिसकी आँखों का हो ख़ाली वो कैसे ख्व़ाब देखे जलपरी का निकालो कील को दीवार में से वगरना टांग लो फ़ोटो किसी का #✍गझल🎼
191 जणांनी पाहिले
1 महिन्यांपूर्वी
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काढून टाका
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मला ही पोस्ट रिपोर्ट करावी वाटते कारण ही पोस्ट...
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