विश्व सिकल सेल उन्मूलन जागरूकता दिवस

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सुशील मेहता
528 views 2 days ago
विश्व विधवा दिवस दरअसल, सभी उम्र, क्षेत्र और संस्कृति की विधावाओं की स्थिति को विशेष पहचान दिलाने के लिए 23 जून 2011 को पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाने की घोषणा की, और तब से हर साल इस दिन को 23 जून को मनाया जाता है। यहां आपको बताते चले कि ब्रिटेन की लूंबा फाउंडेशन पूरे विश्व की विधवा महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार पर विगत सात सालों से संयुक्त राष्ट्र संघ में अभियान चला रही है। अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के दिन को मनाने के पीछे का उद्देश्य ये है कि पूरी दुनिया में विधवा महिलाओं की स्थिति में सुधार हो सके, ताकि वे भी बाकी लोगों की तरह समान्य जीवन जी सके और बराबरी का अधिकार प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही हम कितनी भी तरक्की कर चुके हों, लेकिन विधवा को आज भी बराबरी की नजर से नहीं देखा जाता है। दुनिया की लाखों विधवाओं को गरीबी, हिंसा, बहिष्कार, बेघर, बीमार, स्वास्थ्य जैसी समस्याएं और कानून व समाज में भेदभाव सहना करना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक कहा जाता है कि, लगभग 115 मिलियन विधवाएं गरीबी में रहने को मजबूर हैं, जबकि 81 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं जो शारिरिक शोषण का सामना करती हैं।विश्व विधवा दिवस दरअसल, सभी उम्र, क्षेत्र और संस्कृति की विधावाओं की स्थिति को विशेष पहचान दिलाने के लिए 23 जून 2011 को पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाने की घोषणा की, और तब से हर साल इस दिन को 23 जून को मनाया जाता है। यहां आपको बताते चले कि ब्रिटेन की लूंबा फाउंडेशन पूरे विश्व की विधवा महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार पर विगत सात सालों से संयुक्त राष्ट्र संघ में अभियान चला रही है। अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के दिन को मनाने के पीछे का उद्देश्य ये है कि पूरी दुनिया में विधवा महिलाओं की स्थिति में सुधार हो सके, ताकि वे भी बाकी लोगों की तरह समान्य जीवन जी सके और बराबरी का अधिकार प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही हम कितनी भी तरक्की कर चुके हों, लेकिन विधवा को आज भी बराबरी की नजर से नहीं देखा जाता है। दुनिया की लाखों विधवाओं को गरीबी, हिंसा, बहिष्कार, बेघर, बीमार, स्वास्थ्य जैसी समस्याएं और कानून व समाज में भेदभाव सहना करना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक कहा जाता है कि, लगभग 115 मिलियन विधवाएं गरीबी में रहने को मजबूर हैं, जबकि 81 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं जो शारिरिक शोषण का सामना करती हैं। #जागरूकता दिवस
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सुशील मेहता
1K views 3 days ago
, ऊंट राजस्थान का राज्य पशु है. इसे रेगिस्तान का जहाज भी कहा जाता है. हर साल ऊंटों के संरक्षण को लेकर 22 जून को अंतरराष्ट्रीय ऊंट दिवस मनाया जाता है. इस बार साल 2024 को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय कैमलिड्स वर्ष घोषित किया है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से वर्ष 2024 को अंतररार्ष्ट्रीय कैमलिड्स वर्ष घोषित किया गया है. दरअसल, इसका उद्देश्य यही है कि दुनिया भर में ऊंट का संरक्षण हो. दुनिया के 90 से अधिक देशों में पाए जाने वाला ऊंट से सिर्फ आजीवीकोपार्जन का ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में बहुत काम आता है. बात करें दुनिया भर में ऊंट की जनसंख्या की तो भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है. भारत में सबसे ज्यादा ऊंट राजस्थान में और खासतौर से पश्चिमी राजस्थान में पाए जाते हैं. सड़कों के बिछते जाल और कम होते रेगिस्तान के चलते ऊंट की जनसंख्या में काफी गिरावट आई है. ऊंट के संरक्षण को लेकर 2014 में राजस्थान सरकार ने इसे राज्य पशु घोषित किया था. पिछले कुछ सालों में देश-विदेश में ऊंट की जनसंख्या में काफी गिरावट देखने को मिली है। : पश्चिमी राजस्थान की अगर बात करें तो यहां की लोगों की दैनिक जीवनचार्य में ऊंट पूरी तरह से शामिल रहा है. रियासत काल के समय ऊंट को विशेष दर्जा हासिल था. अभिलेखागार के निदेशक डॉ नितिन गोयल कहते हैं कि करीब डेढ़ सौ साल पहले रियासत काल के पुराने दस्तावेजों को देखने से मालूम चलता है कि उस वक्त ऊंट का कितना महत्व था. उन्होंने बताया कि एक अभिलेख में उल्लेख है कि किसी गांव में व्यक्ति ने ऊंट को मार दिया. उस वक्त रियासत की ओर से उस व्यक्ति से ₹70 जुर्माना वसूल किया गया. इसके लिए बाकायदा रियासत की ओर से वसूली के लिए सिपाही को भेजा गया और जुर्माना वसूल किया गया। रियासत की ओर से फसल का एक हिस्सा ऊंट के लिए सुरक्षित रखा जाता था. गवार की फसल का एक हिस्सा केवल ऊंट के खाने के काम आता था. इसके लिए भी बाकायदा आदेश है, जिसकी प्रति आज भी अभिलेखागार में सुरक्षित है. वह कहते हैं कि इसके अलावा रियासत के हर गांव में ऊंट के पीने की पानी की व्यवस्था के लिए भी आदेश थे और किसी भी युद्ध और आपात स्थिति में ऊंट महत्वपूर्ण भूमिका में होती थी. आपात स्थिति के लिए वह हर समय तैयार रहें इसको लेकर भी उनको चलवाया जाता था. साथ ही ऊंट के बीमार होने पर उसकी तीमारदारी की पूरी व्यवस्था की जाती थी। रेगिस्तान के जहाज से जुड़ा ऊंट महोत्सव (Camel festival in Hindi) राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। ऊँट राजस्थान का आधिकारिक राज्य पशु है। रेगिस्तान का जहाज़ ऊँट एक सुन्दर और राजसी जानवर है। यह कैमलस प्रजाति से संबंधित है। यह साहसी जानवर स्थानीय लोगों को रेगिस्तान में जीवित रहने में मदद करता है और इस "रेगिस्तान के जहाज" के सम्मान में बीकानेर हर साल ऊंट महोत्सव (Camel festival in Hindi) की मेजबानी करता है। राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग की एक पहल, ऊंट महोत्सव (Camel Festival in Hindi) का उत्सव अन्य उत्सवों के समान है जिनकी राजस्थान मेजबानी करता है। बीकानेर में ऊंट महोत्सव (Bikaner Camel Festival in Hindi) की शुरुआत जूनागढ़ किले के परिसर में ऊंटों के एक रंगीन जुलूस के साथ होती है। स्थानीय भाषा में गोरबंध कहे जाने वाले लगाम और विस्तृत हार पहनकर लुभावने प्रदर्शन किए जाते हैं। विभिन्न प्रकार के ऊँट खेलों और गतिविधियों का भी बड़े जोर-शोर से आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक शामिल होते हैं। ऊंट महोत्सव (Camel Festival in Hindi) कार्यक्रम के दौरान सदस्यों द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जैसे रस्साकशी, पगड़ी बांधना और कुश्ती कबड्डी। इस कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोग कई चीजों के साथ अपनी लालसा को संतुष्ट करना पसंद करते हैं, ऊंट उत्सव के समय विशेष रूप से उपलब्ध कराई जाने वाली ऐसी ही एक डिश है ऊंट चाय। यह ऊँट महोत्सव कालबेलिया, घूमर आदि जैसे जीवंत प्रदर्शनों के साथ समाप्त होता है। #जागरूकता दिवस
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सुशील मेहता
593 views 5 days ago
विश्व शरणार्थी दिवस विश्व शरणार्थी दिवस, प्रत्येक वर्ष 20 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय पर्व है। यह दिवस दुनिया भर में शरणार्थियों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। 4 दिसंबर 2000 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निर्णय लिया कि 2000 से, 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सभी शरणार्थियों को सम्मानित करने, जागरूकता बढ़ाने और समर्थन करने के लिए यह स्मरण किया जाता है।वह लोग बहुत ही भाग्यशाली हैं जिनके पास अपनी एक पहचान है, जो देश के निवासी हैं और जिन्हें मुख्यधारा में शामिल करके शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधा दी जा रही है. सबसे अहम बात तो उन्हें राजनीतिक अधिकार प्राप्त है लेकिन आपने कभी यह सोचा है कि अगर किसी व्यक्ति को यह सुविधा और अधिकार न मिले तो उसका जीवन कैसा होगा। जिन कारणों से शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है उनमें युद्ध, प्राकृतिक आपदा और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं. लगातार हो रहे युद्ध, प्राकृतिक आपदा की वजह से आज मानव अस्थाई रूप से रहने के लिए विवश हो रहा है तथा अपना जीवनयापन करने के लिए मजदूरी कर रहा है. कहने को तो इनके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बने हुए हैं लेकिन इनकी कोई सुनवाई नहीं है. सरकार और राजनीतिक पार्टियों से लेकर आम लोगों तक कोई इनकी बातें सुनने के लिए तैयार ही नहीं है। संयुक्त राष्ट्र 1951 शरणार्थी सम्मेलन के अनुसार, शरणार्थी वह व्यक्ति होता है जो अपनी जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता या राजनीतिक राय के कारण उत्पीड़न के एक ठोस डर के कारण अपने घर और देश से भाग गया हो। कई शरणार्थी प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं के प्रभावों से बचने के लिए निर्वासन में हैं। शरणार्थियों का कहना है कि वे शरणार्थी हैं और शरणार्थियों की तरह हीशरणार्थियों का कहना है कि वे शरणार्थी हैं और शरणार्थियों की तरह ही अपने घरों से भागे हैं, लेकिन जिस देश में वे भागे हैं, वहां शरणार्थी स्थिति के उनके दावे का अभी तक निर्णायक रूप से मूल्यांकन नहीं किया गया है। राज्यविहीन व्यक्तियों की कोई मान्यता प्राप्त राष्ट्रीयता नहीं होती तथा वे किसी भी देश के निवासी नहीं होते। राज्यविहीनता की स्थिति आमतौर पर कुछ समूहों के खिलाफ भेदभाव के कारण होती है। उनकी पहचान की कमी - नागरिकता प्रमाण पत्र - उन्हें स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा या रोजगार सहित महत्वपूर्ण सरकारी सेवाओं तक पहुंच से वंचित कर सकती है। अपने घरों से भागे हैं, लेकिन जिस देश में वे भागे हैं, वहां शरणार्थी स्थिति के उनके दावे का अभी तक निर्णायक रूप से मूल्यांकन नहीं किया गया है। वापस आने वाले लोग पूर्व शरणार्थी होते हैं जो निर्वासन में समय बिताने के बाद अपने देश या मूल क्षेत्र में लौटते हैं। वापस आने वाले लोगों को निरंतर समर्थन और पुनः एकीकरण सहायता की आवश्यकता होती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे अपने घर पर अपना जीवन फिर से शुरू कर सकें। #जागरूकता दिवस
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