#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱बम बम भोले🙏 #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी
शिव पुराण की रुद्र संहिता (युद्ध खंड) में भगवान शिव के परम कृपालु और भक्त-वत्सल रूप का अलौकिक वर्णन मिलता है। यह कथा काशी (वाराणसी) के प्रसिद्ध 'कृत्तिवासेजेश्वर शिवलिंग' की स्थापना और उत्पत्ति से जुड़ी है।
1. महिषासुर के पुत्र गजासुर का कठिन तप
जब भगवान विष्णु (दुर्गा रूप) ने महिषासुर का वध कर दिया, तो उसका पुत्र गजासुर (जिसे गजेंद्र या गजेश्वर भी कहा जाता है) अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने देवताओं से प्रतिशोध लेने का निश्चय किया।
गजासुर ने काशी क्षेत्र के समीप जाकर भगवान शिव की हज़ारों वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की। उसने अपने शरीर को अग्नि में तपाया और जल तथा वायु त्याग कर ध्यान लगाया। उसकी भीषण तपस्या से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा।
गजासुर ने अपनी बुद्धि के छल से ऐसा वरदान माँगा:
"हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे वरदान दीजिए कि मैं किसी भी देव, दानव, अस्त्र, शस्त्र, या मनुष्य द्वारा न मारा जाऊँ। और जब तक मेरा शरीर कामदेव की अग्नि (कामानल) से रहित रहे, तब तक कोई भी मुझे पराजित न कर सके।"
भोलेनाथ ने 'तथास्तु' कह दिया।
2. गजासुर का अत्याचार और साधुओं की प्रताड़ना
वरदान पाते ही गजासुर घमंड में अंधा हो गया। उसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली और इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया। वह काशी में निवास करने वाले ऋषियों, मुनियों और शिव-भक्तों को विशेष रूप से सताने लगा।
वह गज़ (हाथी) का विशालकाय रूप धारण कर लेता था और तपस्या में लीन ऋषियों को अपने पैरों तले कुचल देता था। उसने शिव-पूजन पर प्रतिबंध लगा दिया और ऋषियों के आश्रम नष्ट कर दिए।
जब गजासुर का अत्याचार सीमा पार कर गया, तब काशी के समस्त ऋषि-मुनि और देवता भगवान शिव की शरण में पहुँचे और रक्षा की गुहार लगाई।
3. भगवान शिव का प्रकट होना और युद्ध
ऋषियों और देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रुद्ध हुए। वे स्वयं काशी पधारे।
गजासुर ने जब भगवान शिव को देखा, तो वह अपने विशाल हाथी के रूप में उन पर झपटा। वरदान के प्रभाव से उस पर किसी भी साधारण अस्त्र-शस्त्र का असर नहीं हो सकता था।
भगवान शिव ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र का उपयोग किए, अपने नखों (Trishul/Claws) से ही गजासुर के विशालकाय शरीर को चीर दिया और उसे अपने त्रिशूल की नोक पर उठा लिया।
4. गजासुर का पश्चाताप और अंतिम प्रार्थना
जब गजासुर शिव जी के त्रिशूल पर टंगा हुआ मृत्यु की अंतिम घड़ियाँ गिन रहा था, तब शिव-स्पर्श के प्रभाव से उसके समस्त पाप भस्म हो गए और उसका अज्ञान दूर हो गया। उसे बोध हुआ कि सामने साक्षात देवाधिदेव महादेव खड़े हैं।
गजासुर ने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान शिव की स्तुति की और कहा:
*"हे देवों के देव! आपकी उग्र कांति का दर्शन करके मेरा अज्ञान मिट गया है। मैं आपके हाथों मृत्यु पाकर धन्य हो गया। मेरी केवल दो अंतिम इच्छाएँ हैं—
मेरी इस चर्म (हाथी की विशाल खाल) को आप अपने दिव्य शरीर पर वस्त्र की भांति धारण करें।
जिस स्थान पर आपने मेरा विदारण किया है, वहाँ आपका नाम मेरे नाम से जोड़ा जाए।"*
5. 'कृत्तिवासेश्वर' नाम और शिव जी की कृपा
दयालु महादेव अपने शत्रु रहे असुर की इस भक्ति और प्रार्थना से प्रसन्न हो गए। उन्होंने गजासुर की दोनों इच्छाएँ स्वीकार कीं:
कृत्तिवासा: भगवान शिव ने गजासुर की खाल (कृत्ति) को ओढ़ लिया और तब से वे 'कृत्तिवासा' (गजचर्म धारण करने वाले) कहलाए।
कृत्तिवासेश्वर: काशी में जिस स्थान पर गजासुर का मोक्ष हुआ, वहाँ स्वयं भगवान शिव एक दिव्य लिंग के रूप में स्थापित हुए, जिसे 'कृत्तिवासेश्वर शिवलिंग' कहा जाता है।
शिव जी ने वरदान दिया कि जो भी मनुष्य काशी जाकर 'कृत्तिवासेश्वर' लिंग के दर्शन और पूजन करेगा, उसे गोजग (हाथी) या पशु योनि से मुक्ति मिलेगी और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी।
कथा का आध्यात्मिक संदेश: यह कथा दर्शाती है कि भगवान शिव अपने शरण में आए शत्रु को भी दंड देने के बाद अभय और मोक्ष प्रदान करते हैं। बाह्य रूप (अहंकार) का अंत ही वास्तविक मोक्ष का द्वार खोलता है।