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#uttarakhand #🎶पहाड़ी गाने🎧 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा का मायका चमोली जिले का कुरुड़ गाँव माना जाता है और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था, जिनका निवास स्थान कैलाश पर्वत है।कहानी के अनुसार, मां नंदा कई सालों बाद अपने मायके (कुरुड़) आती हैं। जब वह अपने मायके पहुँचती हैं, तो पूरे क्षेत्र में खुशहाली छा जाती है। मायके वाले अपनी लाडली बेटी को पाकर बहुत खुश होते हैं और उसे खूब लाड-प्यार देते हैं।लेकिन, समय बीतने के साथ ही उनकी विदाई का वक्त भी आ जाता है। जब माता नंदा वापस अपने पति के घर (कैलाश) जाने लगती हैं, तो पूरे पहाड़ के लोग भावुक हो जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी साधारण परिवार में बेटी की विदाई पर सब रो पड़ते हैं।चार सींगों वाला मेढ़ा (खाडू) 🐑इस विदाई यात्रा की सबसे अनोखी बात है चार सींगों वाला मेढ़ा (जिसे स्थानीय भाषा में चौसिंग्या खाडू कहा जाता है)।माना जाता है कि जब यात्रा शुरू होती है, तो यह अनोखा मेढ़ा कहीं न कहीं से अपने आप प्रकट हो जाता है। वह पूरी यात्रा में श्रद्धालुओं के आगे-आगे चलता है और रास्ता दिखाता है। वह किसी के बांधने या हांकने से नहीं चलता, बल्कि खुद अपनी मर्जी से आगे बढ़ता है।हिमालय की आखिरी सीमा पर विदाई 🌌श्रद्धालु माता की डोली को अपने कंधों पर उठाकर बेहद कठिन रास्तों, ऊंचे पहाड़ों और जंगलों से होते हुए हिमालय के सुनसान इलाके "होमकुंड" तक ले जाते हैं।होमकुंड पहुँचकर, चौसिंग्या खाडू के पीठ पर मायके वालों की तरफ से दी गई पोटली (जिसमें माता के लिए कपड़े, श्रृंगार का सामान और पकवान होते हैं) बांधी जाती है। इसके बाद, वह मेढ़ा इंसानी बस्ती को छोड़कर अकेले ही बर्फीले कैलाश पर्वत की ओर बढ़ जाता है।ऐसा माना जाता है कि वह मेढ़ा माता नंदा का सामान लेकर सीधे भगवान शिव के पास कैलाश पहुँचता है। इस जगह पर सभी भक्त अपनी लाडली बेटी नंदा को भारी मन से विदा करते हैं और रोते हुए अपने घरों को लौट आते हैं।क्या आप माता नंदा की विदाई के समय गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीतों (जागर) के बारे में जानना चाहते हैं, या यात्रा के कठिन रास्तों (जैसे रूपकुंड) के बारे में कुछ और सुनना चाहेंगे? #🌸 सत्य वचन #❤️जीवन की सीख
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