महाभारत
1K Posts • 5M views
sn vyas
597 views
#महाभारत दुर्योधन में कोई अच्छा गुण नहीं था। दुर्योधन असल मे एक डरपोक व्यक्ति था। उसने भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न किया,पांडवों को जला कर मारने का प्रयत्न किया, जुए में धोखा करके पांडवों को वन भेज दिया,द्रौपदी जैसी विदुषी नारी पर झूठा आरोप लगाया कि उसने अंधे का पुत्र अंधा कहा इत्यादि। इन सब मौकों पर उसके पास विकल्प था कि वो ललकार कर पांडवों से युद्ध कर लेता पर उसने नही किया। लोग शकुनि को दोष देते हैं पर अंततः व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है। दुर्योधन को शुरू से पता था कि भीष्म और द्रोण पांडवों को नही मारेंगे और बिना पांडवों का वध किये उसका काम नही होगा। इसलिए उसने कर्ण को बहुत महत्व देना शुरू किया। कर्ण डींगें हांकने में निपुण था। उसने कभी कोई युद्ध नही जीता था। उसने एक दिग्विजय की थी जो हस्तिनापुर के ध्वज के तले थी, मतलब अगर कोई राजा कर्ण को हरा कर पकड़ता या मारता तो फिर भीष्म और द्रोण युद्ध के लिए आते।इनसे लड़ना कौन चाहता? इसलिए ये दिग्विजय अकेले कर्ण की नही कही जा सकती।बाकी सब जगह कर्ण भाग जाता था। खुद दुर्योधन ने कभी कोई युद्ध नही लड़ा था। इनकी शिक्षा समाप्त होने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को हराने की बात की थी तब दुर्योधन ,कर्ण,दुशासन को अकेले द्रुपद ने हरा कर भगा दिया था। गन्धर्वों से युद्ध मे भी दुर्योधन बंदी हो गया था,कर्ण भाग गया था। पूरे 18 दिन के महाभारत युद्ध मे दुर्योधन की वीरता का कोई वर्णन नही है। उसने किसी बड़े योद्धा को मारा हो ये भी नही लिखा।यहां तक कि युधिस्ठिर ने भी एक बड़े वीर शल्य को मारा पर दुर्योधन से कुछ न हुआ। " सुई की नोक बराबर भूमि नही दूंगा" की डींगें मारने वाला दुर्योधन युद्ध की हार के बाद सामने से लड़ने के बजाय युद्धभूमि से भागकर छिप गया। पांडवों ने उसको ढूंढकर ललकारा तो उसने कहा कि मुझे नही लड़ना,तुम लोग राज करो 😂 दुर्योधन जैसे लोग विक्टिम कार्ड खेलने में माहिर होते हैं, पूरे जीवन उसने यही किया। उसने पांडवों को उन्ही के धर्म से बांध दिया। अच्छे लोगों की तब और अब भी यही समस्या है कि" किसी ने हमारे साथ बुरा किया और अगर हमने भी उसके साथ बुरा किया तो उसमें और हममें क्या अंतर रह जायेगा"। श्री कृष्ण ने यही समझाया कि ये अंतर होना भी नही चाहिए। जब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई तो वो ये नही सोचते बैठे कि अगर मैं लंका में आग लगा दूँ तो इसमे और मुझमें क्या अंतर रह जायेगा। ऐसे ही किसी जाहिल ने किसी समय अयोध्या में मन्दिर गिरकर मस्जिद बना दी थी तो उचित समय पर फिर से मंदिर बने यही न्याय है। इसमे किसी को कोई अपराध बोध नही होना चाहिए। इसी तरह जीवन भर षड्यंत्र रचने वाले दुर्योधन की जांघ तोड़कर मारने में कुछ भी गलत नही था।
15 likes
6 shares
sn vyas
563 views
#महाभारत ⚡ मौन का मूल्य: महाभारत का सबसे भारी सत्य! ⚡ कुरुक्षेत्र की वह भूमि, जो कल तक 'हर-हर महादेव' के उद्घोष और शंखनादों से गुंजायमान थी, अब एक भयानक सन्नाटे की चादर ओढ़े सो रही थी। युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों की विजय पताका लहरा रही थी, किन्तु उस विजय में विजय का नाद नहीं, केवल विध्वंस का विलाप था। हवा में चंदन की सुगंध नहीं, बल्कि चिताओं के धुएं की कड़वाहट घुली थी। गीध आकाश में मंडरा रहे थे और धरती विधवाओं के रुदन से थर्रा रही थी। हस्तिनापुर का वह स्वर्ण-सिंहासन, जिसके लिए इतना रक्त बहा, अब पांडवों का था—परंतु उस राजमुकुट का भार लोहे से अधिक, उस पर लगे अपनों के रक्त के कारण प्रतीत हो रहा था। गंगा की लहरें भी आज शांत थीं, मानो वे भी इस महाविनाश पर शोक मना रही हों। धर्मराज युधिष्ठिर कमर तक जल में खड़े थे। उनके हाथों में तर्पण का जल था, और नेत्रों में अश्रु। एक-एक कर वे अपने गुरुओं, भाइयों और पुत्रों को जलांजलि दे रहे थे। हर अंजलि के साथ उनका हृदय ग्लानि के बोझ से और झुक जाता था। "यह कैसा धर्मयुद्ध था केशव?" उनका अंतर्मन चीत्कार कर रहा था, "जहाँ विजय का अर्थ केवल शमशान का राजा बनना रह गया?" तभी, पीछे से बजरी पर किसी के लड़खड़ाते कदमों की आहट हुई। युधिष्ठिर ने मुड़कर देखा। वह राजमाता कुंती थीं। वही माँ, जिनका मस्तक कभी गर्व से ऊँचा रहता था, आज लज्जा और पीड़ा के भार से झुका हुआ था। उनकी आँखों में एक ऐसा शून्य था, जिसमें दशकों का दर्द समाया हुआ था। वे युधिष्ठिर के समीप आईं, उनका शरीर सूखे पत्ते की भांति काँप रहा था। कुंती ने अत्यंत क्षीण स्वर में कहा, "पुत्र युधिष्ठिर... क्या तुमने अपने सभी परिजनों को तर्पण दे दिया?" युधिष्ठिर ने डबडबाई आँखों से उत्तर दिया, "हाँ माँ। पितामह, गुरु द्रोण, अभिमन्यु... और वे सभी जो हमारे अपने थे, उन्हें जल दे चुका हूँ।" कुंती ने एक गहरी, कांपती हुई श्वास ली और कहा, "नहीं पुत्र... अभी एक अंजलि शेष है। एक तर्पण और करो... उस वीर कर्ण के लिए।" युधिष्ठिर चौंक पड़े। उनके हाथों का जल छलक गया। "कर्ण? वह सूतपुत्र? वह दुर्योधन का मित्र और हमारा कट्टर शत्रु? माँ, उसके लिए तर्पण क्यों? उसने तो जीवन भर हमें केवल कष्ट दिया है।" कुंती अब और नहीं संभाल सकीं। उनका संयम, जो वर्षों से पत्थर की तरह कठोर था, क्षण भर में रेत की तरह ढह गया। वे फूट-फूटकर रो पड़ीं। "वह सूतपुत्र नहीं था युधिष्ठिर! वह राधा का पुत्र नहीं था... वह सूर्यपुत्र था। वह तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता था। मेरी कोख से जन्मा मेरा पहला अंश... जिसे मैंने लोक-लाज के भय से गंगा की इन्हीं लहरों में बहा दिया था।" समय जैसे थम गया। गंगा का प्रवाह, हवा का वेग—सब स्तब्ध रह गए। युधिष्ठिर के कानों में ये शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। "मेरा बड़ा भाई? कर्ण?" स्मृतियों का एक बवंडर उनकी आँखों के सामने नाच उठा। * वह द्यूत क्रीड़ा में कर्ण का अट्टहास... * द्रौपदी का अपमान... * और फिर युद्धभूमि में कर्ण का वह तेजस्वी चेहरा। * वह स्मरण आया कि कैसे इंद्रशक्ति होने के बाद भी कर्ण ने अर्जुन को छोड़ किसी पांडव का वध नहीं किया। * वह स्मरण आया कि कैसे वह दानवीर, कवच-कुंडल रहित होकर भी अर्जुन से लड़ता रहा। युधिष्ठिर का हृदय विदीर्ण हो गया। वे चीख पड़े, "हे विधाता! यह आपने क्या अनर्थ करा दिया?" वे माँ की ओर मुड़े, उनकी आँखों में अब आदर नहीं, प्रश्न थे। "माँ! आपने यह भेद क्यों छिपाया? यदि मुझे पता होता कि कर्ण मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, तो मैं उनके चरणों में यह राज्य रख देता। मैं वन चला जाता, उनकी सेवा करता। मैंने... मैंने अपने ही अग्रज का वध करवा दिया!" युधिष्ठिर का शोक अब भीषण क्रोध में बदल रहा था। यह क्रोध कुंती पर नहीं था, यह क्रोध उस 'गोपनीयता' पर था, जिसने कुरुवंश का नाश कर दिया। यह क्रोध उस 'मौन' पर था, जिसने भाइयों को एक-दूसरे के रक्त का प्यासा बना दिया। वे पुनः गंगा के जल में उतरे। उनका शरीर क्रोध और पीड़ा से जल रहा था। उन्होंने दोनों हाथों में जल भरा और सूर्य को साक्षी मानकर एक भीषण प्रतिज्ञा की। उस समय, उनकी वाणी में धर्मराज की सौम्यता नहीं, बल्कि एक आहत पुत्र का आक्रोश था: > "जिस प्रकार एक माँ के मौन ने, एक छिपे हुए सत्य ने आज कुरुवंश को शमशान बना दिया... जिस रहस्य ने मेरे हाथों मेरे ही भाई का रक्त बहाया... मैं, धर्मराज युधिष्ठिर, आज समस्त नारी जाति को यह श्राप देता हूँ— > कि आज के बाद, सृष्टि के अंत तक, कोई भी स्त्री अपने मन में कोई 'रहस्य' नहीं छिपा सकेगी। उसका पेट किसी भेद को नहीं पचा पाएगा। ताकि भविष्य में फिर कभी किसी 'छिपे हुए सत्य' के कारण किसी भाई को अपने भाई का वध न करना पड़े!" यह केवल एक श्राप की कथा नहीं है, यह मानवीय संवेदनाओं के चरम की कथा है। * कुंती की त्रासदी: सोचिए उस माँ की पीड़ा, जिसने अपने एक बेटे (अर्जुन) को बचाने के लिए दूसरे बेटे (कर्ण) के वध का मूक समर्थन किया। कर्ण का शव देखकर उनकी आत्मा किस तरह छटपटाई होगी। * कर्ण का महात्याग: कर्ण को युद्ध से पहले ही कृष्ण और कुंती से सत्य पता चल चुका था। फिर भी, उसने वह सत्य युधिष्ठिर को नहीं बताया। वह जानता था कि यदि धर्मराज को सत्य पता चला, तो वे राज्य कर्ण को दे देंगे, और कर्ण वह राज्य दुर्योधन को दे देगा। धर्म की स्थापना के लिए 'सत्य जानते हुए भी मौन रहना' कर्ण को महाभारत का सबसे महान चरित्र बनाता है। * श्राप का यथार्थ: आज जब समाज में मज़ाक में कहा जाता है कि "औरतों के पेट में बात नहीं पचती", तो हम भूल जाते हैं कि यह उक्ति हँसी के लिए नहीं बनी थी। यह उस महाविनाश की राख से जन्मी एक चीख थी। यह एक चेतावनी है कि पारदर्शिता के अभाव में रिश्ते और समाज कैसे नष्ट हो जाते हैं। युधिष्ठिर का वह श्राप, वास्तव में एक प्रार्थना थी—कि सत्य चाहे कितना भी कड़वा हो, उसे सामने आ जाना चाहिए, क्योंकि अंधेरे में रखा गया सत्य, झूठ से भी अधिक घातक होता है।
15 likes
11 shares