जस्टिस फ़ॉर असीफा
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जस्टिस फ़ॉर असीफा

प्यारी सी थी वह एक नन्ही कली दुनिया से अनजान बेखौफ पली खिलना था उसे पर खिल ना सकी जीना था उसे पर जी ना सकी खिलखिलाती उस गुड़िया पर एक रोज दरिंदों की नजर पड़ी आपसी रंजिश में आकर जब इंसानियत ने बड़ी भूल करी बहला-फुसलाकर ले गए उस कली को दर्द वो दी गए चिल्लाती चीखी पर कुछ हुआ नहीं खामोश जंगल ने भी कुछ सुना नहीं एक पल में सब बदल गया उस चिड़िया के पंख कतर दिए चह- चहाने वाली चिड़िया के इज्जत के टुकड़े टुकड़े कर दिए फिर भी उनका मन भरा नहीं पकड़ लिया उसे जंजीरों में उस खुदा का भी खौफ ना था जो ले गए उस मंदिर में एक के बाद एक फिर नोचा उसे आवाज उसकी खामोश हो गई थी दर्द का सिल-सिला बढ़ रहा था वो वेसूव होकर सब कुछ सह रही थी मैं हिंदू हूं मैं मुसलमान हूं कहते हुए उतर आए सब सड़कों पर करनी जंग आज इंसानियत ने दिखा दिया अपने अंदर के जानवर का असली रंग दोस्तों समय है अभी संभल जाओ दरिंदों का महाजब और धर्म नहीं होता इन्हें तो सिर्फ नफरत और दरिंदगी आती है इनमें भगवान तो छोड़ो इंसान नहीं होता बलात्कार का मतलब जिस पता नहीं तो घिनौना हादसे उससे साथ हो गया पैसा और सियासत की हवाऐ सी लगी कि रक्षक भी देखो कैसे बच्चे हो गया अब सजा तो देनी होगी दरिंदों को सियासत का खेलना खेल सरकार उस बच्ची की आत्मा भी पूछ रही है जो मेरे साथ हुआ ... क्या वही होता है क्या बलात्कार Shivani Khairan (sabalgarh)
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8 महीने पहले
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