माझ्या लेखणीतून
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2122 2122 212 आँख में अश्को के धारे हो गये दूर हम से सब किनारे हो गये हमने चाहा था दिलो जाँ से जिसे वो खुदा को मेरे प्यारे हो गये अब न उम्मीदें रहीं ना आरजू ख्वाब मेरे सब तुम्हारे हो गये सामने हो कर मेरी आँखों के भी गुम निगाहों से नजारे हो गये ज़िन्दगी में मेरे भर कर अंधेरे आसमाँ के वो सितारे हो गये बद नसीबी रोकता कैसे भला गर्दिशों में सब ही तारे हो गये चार दिन की चाँदनी थी ज़िन्दगी अपने ही किस्मत के मारे हो गये युँ छुड़ा कर हाथ हाथो से मेरे अपने गैरो के सहारे हो गये ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 22/1/2018 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
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